3 सालों में 8-10 एनजीओ को 8.68 करोड़ रुपए दिए, फिर भी घरौंदा सेंटरों में बदइंतजामी, कोर्ट ने कहा- कार्रवाई करें
घरौंदा सेंटर में अव्यवस्था को लेकर लगाई गई जनहित याचिका पर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की बेंच ने सेंटर संचालित कर रहे सभी एनजीओ की नेशनल ट्रस्ट सर्टिफिकेट की जांच कर विधि के अनुरुप कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। जगह कम होने की जानकारी देने पर कोर्ट ने कहा कि वेलफेयर स्टेट होने के कारण यह सरकार की जिम्मेदारी है कि केंद्रों में रहने वालों को बेसिक सुविधाएं मिलें। अब इस मामले पर 30 सितंबर को सुनवाई होगी।
समाज कल्याण विभाग से हर साल लाखों रुपए अनुदान लेने के बाद भी निशक्त, निराश्रित बच्चों के पुनर्वास के लिए बनाए गए घरौंदा केंद्रों में अव्यवस्था को लेकर जनहित याचिका पर सोमवार को सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्रों में जगह कम होने से होने वाली परेशानियां बताई गईं। इस पर महाधिवक्ता ने बताया कि उन्होंने बिलासपुर के दोनों केंद्रों का निरीक्षण किया था। यहां जगह कम है, लेकिन बाकी सुविधाएं ठीक हैं। जगह कम होने की समस्या पर उन्होंने कहा कि ऐसे बच्चों के लिए कोई किराये पर मकान नहीं देना चाहता। खासकर कॉलोनी वाले आपत्ति दर्ज कराते हैं, इस कारण अधिक परेशानी हो रही है। इस पर चीफ जस्टिस सिन्हा की बेंच ने कहा कि वेलफेयर स्टेट होने के कारण सरकार की जवाबदारी है कि उन्हें बेहतर जगह और सुविधाएं मिलें।
जानिए... क्या है मामला
छत्तीसगढ़ के एनजीओ में बच्चों की मौत को लेकर वर्ष 2020 में जनहित याचिका लगाई गई थी। बताया गया था कि एनजीओ को तीन सालों में 8 करोड़ 68 लाख 72 हजार रुपए दिए गए हैं। इसके बाद भी अव्यवस्था बनी हुई है। हाई कोर्ट ने कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किए थे।
कहा- अब मॉनिटरिंग की नई व्यवस्था
केंद्रों के रजिस्टर में दर्ज आंकड़ों की तुलना में निरीक्षण के दौरान कम लोग मिलने की बात पर महाधिवक्ता ने कहा कि पहले कोई सिस्टम नहीं था, लेकिन अब नया सिस्टम बनाया गया है। संबंधित विभाग के अधिकारियों को केंद्रों का माह में एक बार निरीक्षण कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं, जिससे सही मॉनिटरिंग हो सके और व्यवस्था सुधारी जा सके।
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