'70 के दशक की बात है। मैं 9 महीने का था। एक रोज अचानक से तेज बुखार हुआ और पोलियो का अटैक आ गया। उस वक्त पोलियो की कोई दवा नहीं हुआ करती थी। कमर से नीचे, दोनों पैर बेजान हो गए। घरवालों ने कई डॉक्टरों से दिखवाया। लोग जहां-जहां कहते, दादा-पापा दिखवाने के लिए ले जाते, लेकिन कुछ हुआ नहीं।
मैं घर में पैर के सहारे लुढ़कता रहता। बड़ा परिवार था, हम लोग दिल्ली में ही रहते थे। दादा की चांदनी चौक पर मिठाई की दुकान थी। जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ, तो वे मुझे गोद में लेकर दुकान पर जाने लगे। दिनभर मैं वहां रहता, जब वे घर आते तो मुझे भी अपने साथ लेते आते।
6 साल का हो चुका था, लेकिन स्कूल की शक्ल नहीं देखी थी। मुश्किल तो यह थी कि कैसे जाता, कौन ले जाता। मिठाई की दुकान पर एक टीचर आते थे। एक रोज उन्होंने दादा से बोला- इसे गंवार ही रखना है क्या? स्कूल क्यों नहीं भेजते हो?
दादा बोले- पढ़ता तो है यह। सब कुछ जानता है, जो इसे इस उम्र में जानना चाहिए। टीचर ने कहा- नहीं, नहीं... इसे स्कूल भेजो। घर में पढ़ना अलग है, स्कूल में पढ़ना अलग। टीचर की बात सुनकर दादा कुछ सोचने लगे। शायद उनके मन में रहा होगा कि मैं विकलांग हूं। कैसे स्कूल जाऊंगा।'
मैं दिल्ली के प्रीतमपुरा इलाके में हूं। व्हीलचेयर पर बैठे अजय गुप्ता मुझे लिफ्ट से अपने फ्लोर की तरफ ले जा रहे हैं। रास्ते में अपनी कहानी सुना रहे हैं। अजय गुप्ता 'बचपन प्ले स्कूल' के फाउंडर हैं। 'एसके एजुकेशन' नाम से कंपनी चलाते हैं।
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| ये 'बचपन प्ले स्कूल' के फाउंडर अजय गुप्ता हैं। 2004 में इसकी शुरुआत की थी। अजय ने कुछ साल पहले ऋषिहुड यूनिवर्सिटी भी शुरू की है। |
अजय गुप्ता की बिल्डिंग के नीचे दर्जनभर गाड़ियां लगी हुई हैं। दर्जनों स्टाफ हैं। वे कहते हैं, 'आज इतना सब कुछ आप देख रहे हैं। गाड़ी, बंगला... सब। हमारी पूरी एक लग्जरी लाइफ है, लेकिन शुरुआत में तो कुछ भी नहीं था।
मेरा बस सपना था कि जिस दिन मरूं, बतौर सक्सेस बिजनेसमैन मरूं। आज वह दिन देख रहा हूं जब 'बचपन' का सालाना बिजनेस 100 करोड़ है। 1200 से ज्यादा ब्रांच हैं। 200 से ज्यादा लोग काम कर रहे हैं।'
सुबह के तकरीबन 10 बज रहे हैं। ब्रेकफास्ट का वक्त हो गया है। अजय मुझे भी नाश्ते के लिए इनवाइट करते हैं। सामने कॉफी, फ्रूट्स, उपमा समेत कई चीजें परोसी हुई हैं।
अजय मुस्कुराते हुए कहते हैं, 'यहां आने से पहले जैसे आपको नहीं पता रहा होगा कि मैं नाश्ते में क्या परोस रहा हूं। वैसे ही मुझे भी कभी नहीं पता था कि यहां तक पहुंच पाऊंगा या नहीं! जब लोगों को खड़ा होकर अपने पैरों पर चलते हुए देखता था, किसी चीज को खरीदते देखता था, तो मैं भी सोचता था काश ! मैं भी अपने पैरों पर चल पाता।'
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| 8 साल पहले तक अजय कैलिपर्स के सहारे चलते थे। उन्हें व्हीलचेयर की जरूरत नहीं होती थी, लेकिन अब वो पूरी तरह से व्हीलयेर पर हैं। |
अजय की आंखों में बेबसी के बदले एक चमक नजर आ रही है।
वह कहते हैं, 'दादा लाहौर से वापस दिल्ली आ गए थे। दरअसल 1946 में रोजी-रोटी की तलाश में वे लाहौर चले गए थे। वहां उन्होंने कई छोटे-छोटे काम किए। साइकिल से घूम-घूमकर कपड़ा बेचा करते थे।
जब भारत के विभाजन और पाकिस्तान बनने की बात छिड़ी, तो दादा वापस दिल्ली आ गए।'
आप लोग दिल्ली से ही हैं?
'मूल रूप से हम लोग हरियाणा के सोनीपत के रहने वाले हैं। दादा ने पहले दिल्ली में साइकिल से कपड़ा बेचना शुरू किया, फिर मिठाई की छोटी-सी एक दुकान खोल ली। मेरे पापा तीन भाई रहे हैं। सभी मिलकर दुकान चलाने लगे। जब मैं 5-6 साल का हुआ और एक टीचर के कहने पर एक सरकारी स्कूल में एडमिशन हो गया।
मुझे आज भी याद है- दादा या दुकान का कोई स्टाफ मुझे गोद में लेकर स्कूल छोड़ने के लिए जाता था।
कई बार ऐसा होता कि वापस स्कूल से मुझे लेने के लिए आने में घरवालों को देर हो जाती, तो कुछ दोस्त मेरे साथ रुकते थे। इस वजह से एक बार तो एक दोस्त की मां ने उसे डांटते हुए कहा- तुम्हें घर आने में इतनी देर क्यों हो जाती है। जरूर उस विकलांग दोस्त के लिए रुकते होगे।'
अब हम दिल्ली के ही शास्त्री नगर स्थित 'बचपन' के ऑफिस की तरफ बढ़ रहे हैं।
रास्ते में अजय गुप्ता बताते हैं, 'जब तक कम उम्र थी, कोई भी गोद में उठाकर ले जाता और स्कूल छोड़ देता था। जैसे ही बड़ा हुआ, शरीर का वजन बढ़ा, गोद में उठाना मुश्किल था। कुछ महीने तक घरवाले पीठ के सहारे, फिर कंधे के सहारे लेकर जाते थे।
उसके बाद साइकिल से मुझे छोड़ दिया जाता था। ऐसे करके मैंने अपनी स्कूल पढ़ाई पूरी की। इसी दौरान जब मैं 14-15 साल का हुआ, तो कमर के सहारे कैलिपर्स लगाया गया, ताकि मैं थोड़ा-बहुत भी चल पाऊं। यदि यह कुछ और साल पहले लग जाता, तो थोड़ा ठीक रहता, लेकिन घरवालों के पास उतने पैसे नहीं थे।
मैं दादाजी के साथ मिठाई की दुकान पर बैठने लगा। करीब 2 साल तक मैंने मिठाई बेची, दुकान चलाई। घर में बहुत लोग थे। सिर्फ मिठाई की दुकान चलाकर घर नहीं चल सकता था। भट्ठी के सामने बैठना भी मुश्किल था। 12वीं के बाद मुझे यह बात समझ में आ गई थी कि रेगुलर पढ़ाई करना मेरे बस की बात नहीं थी। आना-जाना, शरीर से नहीं हो पाएगा।
जॉब मैं कर नहीं सकता था। घरवालों का कहना था- दुकान है। बैठो। इतना तो कर ही दिया हूं कि तुम्हारी जिंदगी कट जाएगी, लेकिन मुझे अपनी पहचान बनानी थी। सिर्फ जिंदगी नहीं जीनी थी। मिठाई की दुकान से हटकर पापा ने सैनिटरी की दुकान खोल ली। मैं भी उनके साथ जाने लगा। इसी बीच मेरी शादी को लेकर बातचीत चलने लगी।'
बचपन के ऑफिस आने के बाद साथ में उनकी पत्नी दीपशिखा भी हैं। अजय 1995-96 में हुई अपनी शादी का किस्सा बताते हैं। कहते हैं, 'जब 23-24 साल का हुआ, तो कुछ रिश्ते आने लगे। एक रिश्ता आया था, जिसमें लड़की 8वीं तक पढ़ी थी।
जब दीपशिखा का रिश्ता आया, तो मैंने देखा कि यह मुझसे ज्यादा पढ़ी-लिखी है। मेरी पत्नी मुझसे उम्र में 6 साल बड़ी भी हैं। इसके बावजूद मैंने ठाना कि शादी इसी से करूंगा। घरवालों की अलग चिंता थी।
उनका कहना था- दोनों मियां-बीबी विकलांग रहोगे, तो आगे की जिंदगी कैसे कटेगी। बच्चे पैदा होंगे, तो उसकी परवरिश कौन करेगा। कौन रखेगा, कैसे सब कुछ होगा। शायद उनकी चिंता जायज थी। हालांकि, मैं दो बच्चों का बाप हूं। पूरी पढ़ाई-लिखाई में पत्नी ही बेटे-बेटी के स्कूल-कॉलेज जाती रही हैं। आज बेटा लॉयर और बेटी डॉक्टर है।'
जब से हमारी बातचीत शुरू हुई है, मेरे मन में बचपन की शुरुआत को लेकर उत्सुकता बढ़ती जा रही है। पूछने पर अजय गुप्ता बताते हैं, '1999 के आसपास देशभर में कंप्यूटर सेंटर्स ओपन हो रहे थे। मैंने इस सेक्टर में काम करना शुरू किया। जब 2004 में मेरे दोनों बच्चे हो चुके थे, तब मुझे एक बाप होने और जिम्मेदारी का एहसास हुआ।
मैंने सोचा कि देशभर में कोई ऐसा नेटवर्क नहीं है, जो छोटे बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाई करवाए। मैंने स्कूल खोलने के बारे में सोचने लगा। पहला स्कूल हरियाणा के हिसार में शुरू किया था। मैं बिजनेस बढ़ाने में लगा रहता। मेरी पत्नी मैनेजमेंट संभालती थी।
आप ही बताइए, यदि ये (पत्नी) पढ़ी-लिखी नहीं होती, तो मैं सफल थोड़े ही न हो पाता।'
इतना बड़ा बिजनेस कैसे मैनेज किया?
'शुरुआत में जब मैं फ्रेंचाइजी के लिए शहर-शहर घूमता था, तो लोग यही बोलते थे- दिव्यांग होकर बिजनेस करते हो। जो व्यक्ति चल नहीं सकता, वह बिजनेस क्या ही करेगा। लोग घृणा से देखते थे।
हालांकि, कुछ अच्छे लोग भी मिले। कई बार बहुत दिक्कतें भी होती थीं। बिजनेस के सिलसिले में हमेशा ट्रैवल करता रहता था। उस वक्त इतने पैसे भी नहीं थे कि फ्लाइट में जाऊं या फर्स्ट AC में।
प्लेटफॉर्म से ट्रेन की सीढ़ी की हाइट ऊंची रहती थी। मुझे किसी सामान की तरह कमर के सहारे सपोर्ट लगाकर कोई चढ़ा देता। सबसे बड़ी दिक्कत तो वॉशरूम जाने के दौरान होती थी। आज तो डिजिटली सारी चीजें हैं।
उस वक्त स्कूल सैंपल की हार्ड कॉपी लेकर जाना पड़ता था। लोगों को दिखाना पड़ता था, ताकि वो मेरे स्कूल की फ्रेंचाइजी लें।'
अजय गुप्ता अपनी लाइफ का एक और किस्सा बताते हैं। कहते हैं, 'मेरी फैमिली में एक शादी थी। पूरे कार्यक्रम को मैंने ही ऑर्गेनाइज किया था, लेकिन जब फोटो की बारी आई, तो एक व्यक्ति ने मुझसे ठसक में बोला- आगे से पीछे आ जाओ।
मैंने कहा- क्यों। उसने बोला- फोटो खराब हो जाएगी। उसने मुझे पीछे कर दिया। मैं ताज्जुब में था कि मेरे घर में शादी है। मैंने सब कुछ किया, और मुझे ही पीछे कर दिया। मेरी वजह से फोटो खराब हो जाएगी।
आज देखिए कि एक वक्त था जब मेरे साथ फोटो लेने से, लोगों की तस्वीर खराब हो जाती थी। फ्रेम खराब हो जाता था।
उसके बाद करीब 10 साल तक मैंने कोई फोटो नहीं खिचवाईं। आज लोग मेरे साथ सेल्फी लेते हैं। अब मेरे साथ ली गई तस्वीर से उनकी फोटो सुंदर हो जाती है।
अगर मेरे अंदर खुद्दारी नहीं होती तो शायद ऐसा कुछ नहीं हो पाता।'


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