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पैदा होने के 21 साल बाद लड़की बनी लेकिन घर जाना पड़ेगा वापस लड़के के रूप में

‘बनारस। बाबा विश्वनाथ की नगरी। जहां दुनियाभर से लोग आस्था और मोक्ष के लिए आते हैं और यहां की गलियों की रौनक में खो जाते हैं। बनारस की इन्हीं गलियों में धमाचौकड़ी मचाते मैं बड़ी हुई।

मैं शरीर से लड़का थी। ऑपरेशन कर अब मैंने लड़की का शरीर पा लिया है। फिर भी गली-मोहल्ले के लोग मुझे लड़के के तौर पर ही जानते हैं। जाहिर-सी बात है कि मेरी परवरिश एक लड़के की तरह हुई है। आपसे बात करने के बाद मैं अपने घर जाऊंगी। उससे पहले मुझे अपने एक दोस्त के घर जाना होगा। ये साड़ी- ब्लाउज और आईलाइनर सब उसी के घर उतार दूंगी। वहां मैंने जींस-टीशर्ट रखा है, जिसे पहनकर ही अपने घर जाऊंगी।

मेरे डोरबेल बजाने पर मेरी मां अपने बेटे के लिए दरवाजा खोलेंगी और भाभी अपने देवर के लिए चाय बनाएंगी।

अब मैं लड़की की बॉडी में खुश हूं। सर्जरी के बाद लगा कि मुझे तो बस यही चाहिए था। मेरी यह खुशी समाज-परिवार के लिए कोई मायने नहीं रखती। मैं रोज घरवालों के सामने हार जाती हूं।’

ये रजनी (बदला हुआ नाम) हैं। उम्र -22 साल। छह महीने पहले ही इन्होंने सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी यानी SRS करवाई है।

हरी साड़ी में दिख रहीं रजनी इस रूप में घर नहीं जा सकतीं। उन्होंने अपने एक दोस्त के पास लड़कियों के कपड़े और मेकअप का सामान छुपाकर रखा है। घर जाने से पहले उन्हें जींस-टीशर्ट पहनना होगा। घर वालों को नहीं पता कि उन्होंने सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी करवा ली है।

हरी साड़ी में दिख रहीं रजनी इस रूप में घर नहीं जा सकतीं। उन्होंने अपने एक दोस्त के पास लड़कियों के कपड़े और मेकअप का सामान छुपाकर रखा है। घर जाने से पहले उन्हें जींस-टीशर्ट पहनना होगा। घर वालों को नहीं पता कि उन्होंने सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी करवा ली है।

दरअसल जिन लोगों को जेंडर डायसोफोरिया होता है, उन्हें सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी करवाने की जरूरत पड़ती है। यानी ऐसे केस में एक लड़की, लड़के की तरह और लड़का, लड़की की तरह महसूस करने लगते हैं। दोनों जेंडर बदलकर रहना चाहते हैं, जो सिर्फ ऑपरेशन से संभव हो पाता है।

खैर, रजनी जब पैदा हुईं तो परिवार को लगा कि लड़का पैदा हुआ है। बचपन में उन्हें लड़के की तरह ही बड़ा किया गया। जब वो 14-15 साल की उम्र में पहुंचीं तब उन्हें यह महसूस हुआ कि वो लड़की की तरह रहने में ज्यादा कंफर्टेबल हैं। लड़के के शरीर में उन्हें छटपटाहट हो रही थी।

हरी साड़ी में छह फीट की लंबाई वाली रजनी जब सड़क पर चलती हैं तो सब उनकी तरफ देखते हैं। माफ करिए, घूरते हैं। अपने जन्म वाले जेंडर से नाखुश कुछ लोगों से मिलने मैं उत्तरप्रदेश आया हूं। ऐसे लोग तो बहुत मिले, लेकिन कैमरे के सामने बात करने को कोई तैयार नहीं था।

गाजीपुर की रहने वाली रजनी बहुत मुश्किल से बात करने के लिए तैयार हुईं। रजनी सामाजिक रूप से सक्रिय हैं और मुझे महिला दिवस पर आयोजित एक जेंडर मेले में मिलने वाली हैं। कार्यक्रम का मैनेजमेंट संभाल रहीं रजनी मुझसे मिलते ही अपने साथ के सभी लोगों से परिचित कराती हैं।

रजनी सोशल वर्क करती हैं। सामाजिक कार्यक्रम में भाग लेती हैं। 15-16 साल की उम्र से ही उन्होंने खुद के शरीर पर रिसर्च करना शुरू कर दिया था। उसी दौरान उन्हें सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी के बारे में पता चला।

वो कहती हैं- समय तो है न आपके पास। मेरी कहानी थोड़ी लंबी है।

‘मेरे पापा की चाय की दुकान थी। उनकी एक जमीन पर किसी ने कब्जा कर लिया था। इस वजह से उनकी सारी कमाई और टाइम जमीन की लड़ाई में खत्म हो गई। भइया के बाद मैं पैदा हुई तो घर में वो सब कुछ फिर से हुआ जो एक लड़के के पैदा होने पर होता है। बधाईयां बजीं, सोहर गाए गए और बाकायदा छठी-बरही (लड़के के जन्म के स्थानीय रिचुअल) के साथ समाज-परिवार में ऐलान किया गया कि घर में लड़का पैदा हुआ है।

12 साल की उम्र तक आते-आते मुझे लगने लगा कि मेरे भीतर कुछ तो ऐसा है जो दूसरे लड़कों से अलग है।

बढ़ती उम्र के साथ सीने पर उभार दिखने लगे। मेरी आवाज बदल गई। चाल भी लोगों के हिसाब से ‘बिगड़’ गई क्योंकि वो ‘मर्दों’ वाली नहीं रही। मेरा अक्सर मन करता था कि मैं फ्रॉक पहनूं, बिंदी लगाऊं, चूड़ियां पहनूं।

18 साल की उम्र तक मुझे लगने लगा कि मैं दोहरी जिंदगी जी रही हूं। मैं रोज कमरे में बंद होकर खुद को शीशे के सामने एक टक निहारती थी। सजती-संवरती थी, लिपस्टिक लगाती थी। जैसे ही मम्मी के पायल की आवाज आती या भइया के पैर की आहट सुनाई देती तो दस सेकेंड के भीतर ही मैं तौलिए से सारा चेहरा पोंछ लेती थी।’

कभी किसी ने देखा नहीं? ‘संयोग से कभी वो लोग देख भी लेते थे और तेज आवाज में जब पूछते थे मैंने ये क्यों किया है? तो मैं बड़े आराम से कहती थी कि मेरा मन कर रहा था। घर वाले नाराज हो जाते थे। डांटते थे। उनको रोज- रोज इसका जवाब देकर मैं भी थक गई थी। मैं बस खुलकर सांस लेना चाहती थी।

आपकी क्वालिफिकेशन क्या है? ‘मैंने BA किया है। पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करने लगी। मेरे पापा 2019 में चल बसे। घर में भाई-भाभी और मां हैं।

मैंने अपनी सर्जरी कराने के लिए भइया की शादी हो जाने का इंतजार किया। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से उनकी जिंदगी में कोई परेशानी हो।’

पुरुष से महिला बनने के लिए 18 और महिला से पुरुष बनने के लिए 33 स्टेप से गुजरना पड़ता है। साइकेट्रिस्ट की अनुमति के बिना कोई भी प्लास्टिक सर्जन किसी का लिंग परिवर्तन नहीं करता। इस प्रोसेस में गायनेकोलॉजिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट के साथ वकील भी शामिल होते हैं।

‘मैं बहुत खुश हूं और मुझे ऐसा लग रहा है कि सालों बाद मैंने अपना शरीर पा लिया है। आपसे बातचीत के बाद मुझे कपड़े बदलकर घर जाना है। यही सच्चाई है। मैंने अपने भइया-भाभी और मां को इसके बारे में कुछ नहीं बताया है। उन्हें एक झटके में सब कुछ नहीं बता सकती। थोड़ा-थोड़ा हिंट देती रहती हूं। जैसे- सर्जरी के बाद से घर में यूनिसेक्स कपड़े पहनती हूं।

दिक्कत यह है कि मैं अपनी खुशी तो चाहती हूं, लेकिन मां को रोते-परेशान होते नहीं देख सकती। हम जैसे लोगों के लिए जिंदगी आसान नहीं। लोग हमें किन्नर, छक्का न जाने कितने नामों से बुलाते हैं। इसका निगेटिव प्रभाव मेरी मां पर पड़ेगा।’

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