धर्मनाथ यादव बता रहे पेशे से कुली हूं, धर्मा कुली। पटना जंक्शन पर लोगों की मदद करता हूं। 1991 से यह काम कर रहा हूं। दो पुलिसकर्मी मेरी सुरक्षा के लिए दिन-रात रहते हैं। इस वजह से लोग मुझे बॉडीगार्ड वाला कुली कहते हैं। मैंने कोर्ट-कचहरी करके खुद के लिए सुरक्षा ली है।
आप सोच रहे होंगे कि एक कुली को बॉडीगार्ड की जरूरत क्यों? मैंने देश के लिए काम किया है और खुद को एक फौजी की तरह देखता हूं। आखिर सीमा पर लड़ रहे जवान भी आतंकवादी पकड़ते हैं, मैंने भी पकड़ा।
आंतकी को कैसे पकड़ा, क्यों पकड़ा, यह सब बताने से पहले मैं आपको अपने बचपन की कहानी सुनाता हूं। बलिया, उत्तरप्रदेश के सिताब दियारा से मेरे दादा जी अपने जवानी के समय में आरा में आकर बस गए थे। बहुत बाद में मुझे बताया कि जो मेरा पैतृक गांव था या जहां हम लोग रहने वाले थे वो जगह गंगा के बाढ़ में डूब गई।
दरअसल जिस इलाके में हम रहते हैं वहां गंगा में घाघरा नदी आकर मिलती हैं। घाघरा उफनाती धार और करवट- कटान के लिए जानी जाती है। करवट कटान का मतलब ये कि दस साल के आसपास तक घाघरा लगातार अपने दाहिने किनारे की जमीन काटती है और अगले दस साल अपने बाएं किनारे की।
इसी की भेंट चढ़ने के बाद मेरे दादा जी ने आरा में रहने का फैसला किया। इसके बाद वो पटना में नौकरी करने लगे। मेरा जन्म पटना में हुआ। मैं जब बड़ा हो रहा था तो दादा जी को लाल कपड़ा पहने रेलवे स्टेशन जाते देखता था। मुझे वो स्कूल छोड़ते थे और आठ बजे की दिल्ली से आने वाली ट्रेन की सवारी का सामान ढोने चले जाते थे। न तो उन्होंने कभी मुझे अपने साथ आने को कहा और न ही मेरे कुली का काम करने वाले फैसले का उन पर कोई असर पड़ा।
मुझे इस बात का मलाल है कि दादा ने मुझे कुली बनने से रोका क्यों नहीं। जब मैं उनसे पहली बार बोलने गया तो मेरे दादा जी ने कहा- जइसन तोहार मर्जी (जो तुम्हारी मर्जी)। उस दिन वो मुझे डांटकर पढ़ाई पूरी करने को कहते या कुछ और करने को कहते, तो आज मैं यहां नहीं होता।
मैं सेना में जाना चाहता था। कई साल से तैयारी में लगा था। इसके बावजूद हर साल मेडिकल में अनफिट हो जाता था। उम्र बढ़ती गई और एक दिन घरवालों ने बताया कि तुम्हारी शादी तय हो गई है। मुझे कुछ समझ आता, इससे पहले सब कुछ तय हो चुका था।
2013 में नरेंद्र मोदी की हुंकार रैली पटना में थी। तब उनकी सभा में कई ब्लास्ट हुए थे, इसमें 6 लोगों की जान भी गई। इस घटना का गवाह बनने के लिए धर्मा को 50 लाख का ऑफर मिला था।
1986 में मेरी शादी हो गई। शादी से पहले पैसे की ज्यादा टेंशन नहीं थी। खर्चा चल जाता था। कभी दादा तो कभी घर में कोई अठन्नी दे देता था तो चार-पांच दिन मेरे अच्छी तरह कट जाते थे।
शादी के बाद जिंदगी बदल गई। खर्च और जिम्मेदारी बढ़ गई। एक साल के अंदर बेटा पैदा हो गया। 1992 तक मैं चार बच्चों का पिता बन गया। कमाना जरूरी हो गया तो एक दिन दादा जी के साथ स्टेशन आ गया।
मुझे याद है मैं स्टेशन पहुंचा तो उन्होंने मेरी तरफ बस एक बार देखा। एक आंख से इशारा किया कि मेरे पीछे आओ और फिर अपनी सवारी का एक झोला मुझे देकर साथ चलने को कहा। सप्ताह भर की ट्रेनिंग के बाद मेरा रजिस्ट्रेशन हो गया। पहले दिन तकरीबन 1 रुपए की कमाई हुई थी। इस तरह मैं कुली बन गया और इसी कमाई से घर चलने लगा।
जून 2013 की बात है। मोदी जी गुजरात के सीएम थे। पटना के गांधी मैदान में उनकी हुंकार रैली थी। कुली लोगों को एक आदेश होता है कि स्टेशन पर जब भी बड़ा अधिकारी आए या आईजी-डीआईजी आएं तो हमें उनके आसपास ही रहना होता है।
मैं तो साथ में भी घूमता था। उस दिन साढ़े नौ बजे मैं आकर कुली विश्राम गृह में बैठा था। हम लोगों के विश्राम गृह के ठीक बगल में सार्वजनिक शौचालय है। अचानक से बम फटा। मेरे कान में टन्न की आवाज हुई और लगा कि माथे के पीछे कोई बहुत बड़ा सा घंटा बजा दिया हो।
मैंने खिड़की से शौचालय में धुआं उठता देखा। मैं लाठी लेकर शौचालय की तरफ दौड़ कर गया। मैं बाहर ही था तो मुझे दिखा कि कोई तो है जो दरवाजा बंद कर रहा और खोल रहा है। स्टेशन पर अफरातफरी मच गई। लोग दौड़ने लगे, मेरे देखते भर में कम से कम 20 लोग मुंह के बल गिरे और बुरी तरह चोटिल हुए। महिलाएं और बच्चे रो-रोकर सड़क की तरफ भाग रहे थे। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था तभी मुझे सिपाही अशोक मुखर्जी दिखे।
यहां स्टेशन पर अशोक की ड्यूटी रहती थी। मैंने चिल्लाकर उनको बुलाया। सारी बात बताई कि मुझे शक है कि शौचालय में कोई है। हम दोनों शौचालय की तरफ गए। अशोक थोड़ा हिचकिचा रहे थे, लेकिन मैंने कहा कि अब पीछे नहीं हटना है, मेरे पास लाठी है। आज सोचता हूं तो एहसास होता है कि उनके पास तो बम था, लाठी से क्या होगा।
सालों बीत जाने के बाद भी NIA ने कोर्ट में धर्मनाथ की गवाही नहीं कराई है। वो कुली विश्राम गृह में रहते हैं। इस वजह से रात में दोनों बॉडीगार्ड चले जाते हैं। वो प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर अपने लिए घर चाहते हैं।
बाद में मालूम चला कि वो आतंकवादी था।
उसका नाम इम्तियाज अली था। हमने उससे पूछा कि जो नीचे गिरा है वो तुम्हारे साथ था? उसने कुछ नहीं कहा। उसके पास एक बैग था जिसमें तीन शक्तिशाली बम थे और अगर वो चाहता तो हम लोगों को उड़ा देता। हम लोगों ने उसको इतना डांट दिया था कि वो सिर नीचे करके बैठा रहा।
तब तक हल्ला मच गया और प्लेटफॉर्म नं. 10 के जीआरपी के इंचार्ज और बाकी फोर्स आ गई और उसे पकड़ कर ले जाया गया। आरपीएफ के इंस्पेक्टर साहब ने हमें आदेश दिए कि इन लोगों को हॉस्पिटल ले जाओ। हम लोग रिक्शा कर हॉस्पिटल गए। वहां जाते-जाते मुझे कुछ जानकारी नहीं थी कि आगे क्या होगा। मुझसे जो कहा गया, मैंने किया। इसके बाद शाम तक मेरे पास कुछ अखबार वाले आ गए कि आपने पकड़ा है? मैंने सब कुछ बता दिया।
फिर मुझे थाना बुलाया गया। कई बड़े पुलिस के साहब लोगों ने कम से कम दो घंटा पूछताछ की, फिर मेरा नाम गवाही में डाला गया।
इसी बीच मुझे पाकिस्तान से फोन आया। पहले तो उसने अच्छे से बात की और फिर मुझसे कहा कि मिलना चाहता हूं। मैंने उससे साफ कह दिया कि मैं यहां रेलवे स्टेशन पर ही मिलूंगा। इस फोन के बाद मैं डर गया था। मेरी जान को खतरा था। मैंने थाने में जाकर सारी बात बताई। मैंने उनसे अपनी सुरक्षा की मांग की। वहां से मुझे डांटकर भगा दिया गया।
इसके बाद मेरे साथ एक हादसा हुआ जिससे मेरी टेंशन बढ़ गई। सितंबर 2016 में एक दिन अचानक से स्टेशन के बाहर किसी ने पीछे से मेरे सिर पर भारी चीज से वार किया। तीन दिन तक मैं बेहोश रहा। तबीयत ठीक होते ही मैं सीधे एसपी साहब से मिलने गया। फिर डीएम साहब से मिला और जब वहां भी सुनवाई नहीं हुई तो मैंने अपने सुरक्षा की मांग को लेकर केस कर दिया। इसके बाद हाईकोर्ट के आदेश से मुझे एक गार्ड मिला, जो मेरे साथ रहने लगा।
2023 में फरवरी में हाईकोर्ट ने जिला से एक और सिपाही मेरी सुरक्षा में लगा दिया। अब मेरे साथ दो सिपाही रहते हैं। 2016 से जीआरपी के एक सिपाही और 2023 से जिला प्रशासन के एक सिपाही। दिक्कत ये है कि इन्हें मेरे साथ 24 घंटे रहना है, लेकिन न तो हम कुली लोगों के पास ढंग का कोई विश्राम गृह है, न ही कोई रहने की जगह।
हम लोग जहां रहते हैं उसके एक तरफ शौचालय है, दूसरी तरफ उसकी गंदगी। मेरा सम्मान तो बहुत है, लेकिन स्थिति का अंदाजा किसी को नहीं है। मैं अपने पत्नी और बच्चों से भी इस मुद्दे पर बात नहीं करता। मुझे लगता है कि ये सब लड़ाई मेरी है और उन्हें इसके बारे में नहीं जानना चाहिए।
आप यह कह सकते हैं कि कोर्ट-कचहरी से संबंधित कोई भी बात घर पर करके उन लोगों को परेशान नहीं करना चाहता। बस इतना चाहता हूं कि मुझे एक आवास मिल जाए और अगर संभव हो तो मेरे बेटे को नौकरी। देश के लिए कुछ किया हूं इसके बदले मांग रहा हूं। गरीब इंसान का यही स्वार्थ है। अब आप लोग मुझे स्वार्थी भी कहेंगे तो चलेगा, लेकिन सच यह है कि जब सिर पर छत रहेगी तो लड़ाई भी जिम्मेदारी से लड़ी जा सकती है।
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