मॉडर्न और ईजी लिविंग के कॉन्सेप्ट ने किचन में प्लास्टिक के इस्तेमाल को काफी बढ़ा दिया है। घरों में फ्रिज प्लास्टिक के कंटेनर्स से भरी रहती है। पानी की बोतल से लेकर खाने की लगभग सभी चीजें को लोग प्लास्टिक में स्टोर करते हैं।
दूसरी तरफ ऑनलाइन फूड ऑर्डर की बात करें तो रोजाना बड़ी संख्या में प्लास्टिक के कंटेनरों में गर्म खाना पैक करके डिलिवर किया जाता है। प्लास्टिक के इन कंटेनरों की क्वालिटी इतनी खराब होती है कि ये खाने पर बुरा असर डालते हैं और यही खाना हम बड़े मजे से खाते हैं। दरअसल, प्लास्टिक को इस्तेमाल करना आसान है। देखने में ये कंटेनर्स डिजाइनर होते हैं और इनके जल्दी टूटने का भी डर नहीं रहता है। इसलिए लोग इनका खूब इस्तेमाल करते हैं।
लेकिन, यही प्लास्टिक धीरे-धीरे जहर बनकर हमारे खून में घुल रहा है। आंखों से न दिखने वाले इसके कण किडनी और लिवर को खराब कर रहे हैं, जो कैंसर की वजह बन रहा है। गौर करें तो प्लास्टिक इंसानों क्या पूरी धरती के लिए खतरनाक साबित हो रहा है।
- प्लास्टिक हमारे शरीर को कैसे नुकसान पहुंचाता है।
- किचन में प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हुए क्या सावधानियां बरतनी चाहिए।
- घर को प्लास्टिक फ्री बनाने के लिए क्या करना चाहिए।
सत्यवादी राजा हरीशचंद्र अस्पताल के सीनियर रेजीडेंट डॉ. पर्व शर्मा से बातचीत की।
कॉमनवेल्थ साइंटफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक “भारत की आबादी 1.4 अरब से अधिक है और हर दिन 26,000 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है।” आम तौर पर इस्तेमाल में लाए जाने वाले प्लास्टिक के डिब्बे, थैलियां सैकड़ों सालों तक डीकंपोज नहीं होते हैं। जिससे सेहत के साथ पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है। इसे एक-एक करके समझते हैं- प्लास्टिक निर्माण के समय निकलने वाली जहरीली गैस पर्यावरण को प्रदूषित करती है। खाने के साथ प्लास्टिक निगलने से हर साल लाखों जीव जंतुओं, व्हेल, डॉल्फिन, कछुओं और पेंग्विन की मौत हो जाती है। सैंकड़ों साल तक प्लास्टिक के डीकंपोज न होने से पानी, जमीन यहां तक कि ग्राउंड वाटर भी प्रदूषित होता है। प्लास्टिक में स्टोर किए गए खाने में हानिकारक तत्व और केमिकल मिल जाते हैं। जो कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बनते हैं।
- अंडर ग्राइंड प्लास्टिक स्टोरेज ड्रेनेज सिस्टम के लिए खतरा बन चुका है।
- प्रेग्नेंसी और गर्भावस्था के दौरान बच्चे में विकार होने का खतरा रहता है।
- महिलाओं की रिप्रोडॅक्टिव हेल्थ पर बुरा असर पड़ता है।
- पुरुषों की स्पर्म क्वालिटी खराब होती है और प्रोस्टेट कैंसर का खतरा रहता है।
- इससे ब्लड प्रेशर, टाइप-2 डायबिटीज, हार्ट अटैक की आशंका बढ़ जाती है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरनमेंटल हेल्थ साइंसेज के मुताबिक, 5 मिलीमीटर और इससे छोटे आकार के प्लास्टिक के कणों को माइक्रोप्लास्टिक कहते हैं। ये माइक्रोप्लास्टिक पानी की बोतल, खाने के डिब्बों से लेकर टूथब्रश और हवा के जरिए हमारे शरीर में पहुंचते हैं। हर प्लास्टिक कंटेनर को खतरनाक नहीं माना जा सकता है। अलग-अलग क्वालिटी के हिसाब से उनमें मार्किंग की जाती है।
प्लास्टिक के डिब्बे पर ये होता है क्वालिटी मार्क
- जिन प्लास्टिक के डिब्बों के नीचे #2, #4 और #5 प्रिंट होता है, वो खाना रखने और स्टोर करने के लिए सुरक्षित माने जाते हैं।
- #6 का मतलब पॉलीस्टाइनिन (पीएस) या स्टायरोफोम है। इसे कम से कम दोबारा उपयोग में ला सकते हैं।
- सिंगल यूज प्लास्टिक के नीचे #1 प्रिंट रहता है। इसका मतलब यह है कि एक बार इस्तेमाल के बाद इसे नष्ट करना है।
- #3 का मतलब है कि यह पीवीसी यानी पॉलीविनाइल क्लोराइड से बना होता है, जो बेहद खतरनाक होता है।
- सबसे खतरनाक #7 प्रिंट वाले प्लास्टिक कंटेनर को माना जाता है। इसमें काफी मात्रा में बीपीए होता है और इसमें खाने-पीने की चीजें नहीं रखनी चाहिए।
किचन में प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हुए बरतें सावधानी
- प्लास्टिक के डिब्बों में गीला या गर्म खाना रखने से बचें।
- माइक्रोवेव में प्लास्टिक के डिब्बे रखने से बचें।
- फूड पैकिंग वाले डिब्बे को बार-बार इस्तेमाल न करें।
- प्लास्टिक के डिब्बे खरीदते समय उसके मार्क पर ध्यान दें।
- कोशिश करें बच्चों का टिफिन और फ्रिज में फूड स्टोर करने वाले डिब्बे स्टील या कांच के हों।
- डिब्बों की साफ-सफाई का ध्यान रखें, ताकि जर्म्स और बैक्टीरिया न इकट्ठा हों।
- ऐसे में अगर आपके किचन में प्लास्टिक के डिब्बे हैं, तो उन्हें एक महीने में कम से कम दो बार जरूर साफ करना चाहिए। ताकि डिब्बों पर पनपने वाले बैक्टीरिया और बदबू को दूर किया जा सके।
प्लास्टिक के डिब्बों को साफ करने के कुछ आसान टिप्स के बारे में जानते हैं-
कास्टिक सोडा: 1 बाल्टी गर्म पानी में 3 चम्मच कास्टिक सोडा मिलाएं। अब प्लास्टिक के डिब्बों को इसमें डाल दें। आधे घंटे बाद सभी को साफ पानी से धोएं।
नींबू रस और सफेद सिरका: एक बाल्टी गर्म पानी में 2 नींबू का रस और 3 चम्मच सफेद सिरका मिलाएं। इसमें डिब्बों को भिगोने के आधे घंटे बाद साफ पानी से धो लें।
लिक्विड क्लोरीन ब्लीच: इसे पानी में मिलाएं। घोल में डिब्बों को भिगोएं। कुछ देर बाद इसे निकालकर साफ पानी से धो लें।
डिटर्जेंट पाउडर या सर्फ: गर्म पानी में डिटर्जेंट पाउडर मिलाकर घोल तैयार करें। इस घोल में प्लास्टिक के डिब्बे को डुबाने के बाद साफ पानी से क्लीन कर लें।
दुनियाभर में हर साल करीब 46 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है। इसमें से करीब 35.3 करोड़ टन प्लास्टिक कुछ ही दिनों में कचरा बन जाता है।
सिर्फ भारत में हर साल 35 लाख टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। इसका 30 फीसदी हिस्सा ही रिसाइकल हो पाता है।
ऐसे मे पर्यावरण को प्लास्टिक मुक्त बनाने और सेहत को दुरुस्त रखने के लिए हमें इससे दूरी बनाना चाहिए।


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