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देश-विदेश में सैकड़ों शादियां कराई पं.हरेराम ने लेकिन पिछड़ी जाति का कहकर अपने ही लोग देते हैं गाली

मेरा नाम पंडित हरेराम राजभर है। उत्तर प्रदेश के बलिया का रहने वाला हूं। राजभर पिछड़ी जाति है और मैं ज्योतिष और पूजा-पाठ का काम करता हूं। इसी बात का दुख ऊंची जाति के लोगों को है कि एक छोटी जाति का व्यक्ति पंडितई कैसे कर रहा है। इस वजह से मुझे अक्सर जान से मारने की धमकी मिलती है।

मेरी उम्र 75 साल हो गई है और अब भी मेरे आसपास रहने वाले कुछ लोगों को मेरे काम से शिकायत है। इसी साल पास के गांव का एक लड़का, जिसकी उम्र 20 साल होगी, वो मुझे फोन पर गाली दे रहा था। हत्या की धमकी के साथ कह रहा था कि तुम्हारी पंडितई छुड़ा दूंगा। मैंने कहा कि आओ आमने-सामने बात करते हैं। यह एक फोन नहीं अक्सर लोग मुझे जान से मारने की धमकी देते हैं।

इन्होंने ज्योतिषी की पढ़ाई किसी संस्था या विद्यालय से नहीं की है। खुद से ग्रंथ पढ़कर और कुंडली बनाना और देखना सीखा है।

सच बताऊं तो मुझे इन धमकियों से डर नहीं लगता बल्कि ऐसे लोगों पर तरस आती है। वो लड़का ऊंची जाति से था चाहता तो पढ़-लिखकर कुछ समाज के लिए करता। उसने गाली-गलौज से खुद को खुश करने का रास्ता चुना। ये उसके कर्म है।

ऐसे लोगों की बातें सुनकर मैं मुस्कुरा कर बस इतना ही सोचता हूं कि कर्म प्रधान विश्व रची राखा, जो तस करहीं सो तस फल चाखा। यानी हर व्यक्ति को अपने अच्छे और बुरे कर्म का फल पाना ही होता है। अगर मैं पूजा-पाठ करवाकर गलत काम कर रहा हूं तो फल भुगतने को तैयार हूं।

मैं बचपन की बात करके और अपनी गरीबी का ब्योरा देकर आप सबका समय बर्बाद नहीं करना चाहता। इतना समझ लें कि घर मिट्टी का था और रात को उजाला करके पढ़ने की व्यवस्था नहीं थी। इस वजह से दिन में ही स्कूल जाना, दिन में ही भैंस चराना और दिन में ही रात के हिस्से की पढ़ाई करनी पड़ती थी।

मेरे पिताजी मुझे पढ़ाना चाहते थे। मैंने मैट्रिक यानी 10वीं की परीक्षा शिवपुर के हाई स्कूल से पास की थी। मेरे घर से शिवपुर का स्कूल 5466 कदम था। चौंकिए नहीं। बचपन ऐसा ही होता है, जिस दिन मन करता घर से स्कूल के कदम गिन लेते थे।

12वीं पास करने के बाद बीएससी करने कानपुर आ गया। वहां अपने एक रिश्तेदार के घर रहता था। सिर्फ छुटि्टयों में घर आता था।

ऐसी ही गर्मी की एक छुट्टी में ट्रेन से घर आ रहा था। उस ट्रेन में हस्तरेखा की किताब बेचने वाला आया। पढ़ने का शौक था तो मैंने किताब खरीद ली। उसमें बाएं हाथ की एक रेखा के बारे में कुछ लिखा था। मैंने अपने हाथ से उन बाताें को मिलाया। वो रेखा ठीक उसी तरह से मेरे हाथ में थी, जैसी किताब में लिखी हुई थी। लिखा था कि जिसकी हाथ में ऐसी रेखा होगी उसे समाज में अलग स्थान मिलता है। उस दिन मेरा खुद में और ज्योतिष शास्त्र में भरोसा बढ़ गया।

कुछ दिनों बाद मेरी नौकरी इंडियन नेवी में लग गई। पढ़ाई से नौकरी के बीच के कुछ साल में हस्त रेखा और ज्योतिष से संबंधित खूब किताबें पढ़ीं। फिर नौकरी छोड़कर घर आना पड़ा क्योंकि पिताजी बीमार थे। यहां आते ही गांव, खेत, बनिहारी में जुट गया।

गांव में सक्रिय था तो राजनीति करने की सोची। राजभर बाहुल्य बस्ती में नेवी छोड़कर आया नौजवान लोगों को पसंद आया और मैं 1980 में ग्राम प्रधान बन गया। मैंने पांच साल खूब काम किया। तकरीबन 60 बीघा जमीन मैंने पट्टे पर दी। आज मेरी बस्ती में सब के पास जमीन है। दोबारा चुनाव लड़ा लेकिन हार गया। फिर से सबकुछ पहले जैसा हो गया। रोजी-रोटी के लाले पड़ गए। नए काम की तलाश में लग गया।

मेरे गांव में गुरुमुख होने की परंपरा है। लोग किसी शुभ मुहूर्त में गुरुमुख होते हैं और किसी पंडितजी का चेला बनते हैं। मैं भी एक गुरुजी का सम्मान करता था। उनका नाम था बैकुंठ गुरु जी। वो मुझे बचपन से ही बहुत मानते थे और अक्सर कहते थे कि गुरुमुख हो जाओ, मेरे चेला बन जाओ। मैं उनका चेला बन गया।

गुरुजी ने मेरे इंट्रेस्ट को देखते हुए जन्मपत्री और कुंडली वगैरह लिखने का काम दे दिया। वो मुझे एक कुंडली लिखने का पांच रुपया देते थे। मेरे गांव से उनके गांव की दूरी 10 किलोमीटर है। मैं साइकिल से उनके गांव जाता।

एक समय जाति की वजह से लोग इनके घर नहीं आते थे। उन्हें लगता था कि शास्त्र हरेराम जैसी छोटी जाति वालों को पूजा-पाठ कराने और कुंडली देखने की इजाजत नहीं देती। आज कुंडली दिखाने के लिए आए दिन लोग आते हैं।

उनके घर के बाहर बैठकर अपना काम करता। घर के बाहर इसलिए क्योंकि छोटी जाति का होने की वजह से मैं खटिया पर नहीं बैठ सकता था और न ही उनके दिए बर्तन में खा-पी सकता था। इस बात का बुरा लगता था, फिर सोचता समय सब कुछ सिद्ध कर देगा। आज सोचता हूं तो खुद पर गर्व होता है कि मैं कहां से कहां आ गया।

खैर, मेरे काम से खुश होकर गुरुजी ने मेरे पैसे बढ़ा दिए। अब मुझे 5 रुपए से 50 रुपए मिलने लगे। छह महीने में उनके साथ रहकर मैंने कुंडली बनाना सीख लिया। ज्योतिष के साथ-साथ पूजा-पाठ से जुड़ी दूसरी चीजें भी करने लगा।

एक बार किसी ने मेरी बनाई कुंडली में कमी निकाल दी। गुरुजी तो उसे अपने नाम से आगे देते थे लेकिन फंसने पर मुझको बुलवाया गया। वो मुझे साथ लेकर गए। वहां सबके सामने कहा कि कुंडली मेरे चेले हरेराम ने बनाई है तो अपनी सफाई भी वह खुद देगा। अब ये बात उन्होंने डर से कही या मुझे आगे बढ़ाने के लिए उस दिन मैं समझ नहीं पाया। मैंने अपना पक्ष रखा। इस तरह वहां से मेरा विरोध और समर्थन एक साथ शुरू हो गया।

लोग अब सीधे मेरे पास आने लगे। लोगों का विश्वास बढ़ता गया। धीरे-धीरे गुरु जी भी मेरे घर आने लगे। मैं अपने काम में रमता गया और लोगों की समस्या का समाधान ज्योतिष शास्त्र से ढूंढता गया।

इस काम से मेरी पत्नी खुश नहीं थी। वो मुझे बहुत कुछ सुनाती थीं। उसे लगता था कि पंडित का काम कर मैं अपने ही परिवार पर पाप चढ़ा रहा हूं। उसका तर्क था कि हम लोग छोटे जाति के हैं और ये काम हमारा नहीं। इस बात को लगभग चालीस साल हो गए, मेरी पत्नी को आज भी लगता है कि मैं जो काम कर रहा हूं, वो गलत है।

मेरी सोच पत्नी से अलग है। मैं अपने काम को सही मानता हूं। मुझे ऊंची जाति की बातों का, भेदभाव का बुरा नहीं लगता। 2000 के आसपास मुझे थोड़ी पहचान मिल गई। पूजा-पाठ वगैरह में जाने लगा।

ये कुंडली पंडित हरेराम ने बनाई हैं। उनका कहना है कि वो गणना करके आने वाले या बीते समय की परिस्थिति बताने की कोशिश करते हैं।

भेदभाव की वजह से कई जगहों पर जजमान प्लास्टिक ग्लास में चाय-पानी देते थे। मुझे बुरा लगता था लेकिन किसी से कुछ नहीं कहता।

मैंने विरोध का नया तरीका चुना। जब भी कहीं मुझे प्लास्टिक के ग्लास में पानी या चाय दिया जाता था मैं बैग से स्टील का ग्लास निकालकर देता कि मुझे इसी में चाय दी जाए। इस बात से भी कई लोगों को एतराज था। इस वजह से कुछ लोग मेरे ग्लास में चाय देने से भी मना कर देते। वहां मैं चाय-पानी नही पीता, चुपचाप लौट आता।

एक किस्सा याद आ रहा है। अयोध्या में मुझे मेरे एक यजमान अपने किसी जानने वाले संत के पास लेकर गए। वहां मेरा परिचय कराया गया तो संत जी मुझसे मेरी जाति वगैरह पर सवाल करने लगे। मैं चुप रहा। वो आधे घंटे तक जाति स्ट्रक्चर और शास्त्र में वर्णित व्यवस्था के बारे में समझा रहे थे। उनकी हर बात मेरी जाति पर आकर खत्म हो रही थी।

लगभग 45 मिनट तक मैं एक शब्द नहीं बोला। आखिरी में उन्होंने मेरी राय पूछी। मुझ पर दबाव बनाने लगे कि मैं अपना विचार रखूं। मैंने बस यही कहा कि मैं तो आपको संत समझ कर आया था और मेरी नजर में संत वही है जो सत्य के साथ होता है। आप मेरी जाति देखने लगे तो मुझे चुप रहना ही ठीक लग रहा।

देश-विदेश में सैकड़ों शादियां पं.हरेराम ने कराई हैं। 11 साल पहले उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे एक साइंटिस्ट कपल की शादी भी करवाई हैं।

मुझे पता था कि इस तरह से किसी संत से बात करना अच्छा नहीं। उन्हें समझाने का लेकिन मेरे पास उस दिन कोई दूसरा ऑप्शन नहीं था।

मेरे गांव में ही लोग मुझे गालियां बकते हैं। इससे मुझे दुख से ज्यादा शर्मिंदगी होती है। लोग जाति देखकर मुझसे बात करते हैं। यहीं लोग मेरी बनाई कुंडली पर सवाल उठाएं तो मुझे अच्छा लगेगा। मेरे काम की बात करें तो खुशी होगी।

पं. हरेराम ने अपने जज्बात बताये 

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