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भारत के लोगों को बिना चप्पल के देखा तो कोलकाता से बाटा कंपनी की शुरुआत की थॉमस ने

बाटा भारत की सबसे बड़ी फूटवियर कंपनियों में से एक। भारत के 35% से ज्यादा फूट वियर मार्केट पर दबदबा। एक ऐसी कंपनी जो लगती भारतीय है, पर है नहीं। बाटा की शुरुआत 21 सितंबर 1894 को मोची का काम करने वाले थॉमस बाटा ने मध्य यूरोप के चेकोस्लोवाकिया में की थी। बाटा का 90 देशों में बिजनेस चल रहा है। 5 हजार स्टोर्स हैं। 165 देशों में बाटा हर साल 1.7 करोड़ जूते बेचता है। भारत की बात करें, तो बाटा के 1375 रिटेल स्टोर्स हैं। 

थॉमस ने मां से कुछ रुपए उधार लेकर किराए पर दो कमरे लेकर काम करना शुरू किया। पांच साल बाद यानी 1899 में उन्होंने बाटा का पहला स्टोर चेकोस्लोवाकिया में खोला। पहले साल सब कुछ ठीक चला, लेकिन दूसरे साल आर्थिक संकट आया। थॉमस की कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया गया।


इसके बाद थॉमस ने चमड़े के बजाय कैनवास पर जूते बनाने का फैसला किया। कच्चे माल सस्ते होने के कारण जूते भी सस्ते दामों पर मिलने लगे। फिर थॉमस तीन कर्मचारियों के साथ इंग्लैंड में एक जूते-चप्पल की कंपनी में काम करने लगे। उन्होंने वहां 6 महीने तक काम किया। व्यापार की बारीकियां सीखीं।

इंग्लैंड से लौटने के बाद थॉमस ने जूतों का प्रोडक्शन और बढ़ा दिया। 1905 तक हर रोज 2,200 जोड़ी जूते बनाए जाने लगे। जल्द ही बाटा यूरोप की सबसे बड़ी फुट वियर कंपनी बन गई। इसके बाद उन्होंने ऑफिस इम्प्लॉइज पर फोकस किया और उनके लिए जूते बनाना शुरू कर दिया। इससे कंपनी को काफी फायदा हुआ।

कंपनी की कामयाबी के पीछे एक बड़ी वजह बाटा का छोटा नाम होना भी रहा। थॉमस ने अपने सरनेम को ही कंपनी का नाम बनाया था, ताकि लोगों को इसे याद रखने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़े।

पहले विश्व युद्ध के दौरान कीमतें आधी कर दी

बाटा की फैक्ट्री में जूते बनाते कारीगर। बड़े स्केल पर जूता बनाने की वजह से उनकी लागत कम आती थी, जिससे बाटा के जूते कम दाम पर बेचे जाते थे। 1912 तक कंपनी के कर्मचारियों की संख्या 600 के पार हो चुकी थी। 1914 में कंपनी को सैनिकों के लिए जूते बनाने का एक बड़ा ऑर्डर भी मिला। इस वजह से कंपनी को अपने स्टाफ की संख्या बढ़ानी पड़ी।

डिमांड बढ़ी तो बाटा ने जगह-जगह स्टोर भी खोले। हालांकि प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान मंदी का दौर भी आया, जिससे जूतों का प्रोडक्शन बुरी तरह से प्रभावित हुआ। इन हालातों से निपटने के लिए थॉमस ने जूतों की कीमतों को आधा कर दिया। इससे कंपनी का उत्पादन 15 गुना बढ़ गया।

इसके बाद बाटा ने दूसरे देशों में कदम रखना शुरू किया। 1924 तक दुनिया में बाटा की 122 स्टोर्स थे। जूतों के अलावा कंपनी मोजे, टायर, चमड़े से बनी और भी चीजें बनाकर बेचने लगी। थॉमस, कंपनी के कर्मचारियों का काफी ज्यादा ध्यान रखते थे। 1930 में उन्होंने कर्मचारियों के लिए घर, उनके बच्चों के लिए स्कूल, अस्पताल, लाइब्रेरी और मनोरंजन के साधनों की व्यवस्था कर रखी थी।

1932 में हुए एक हवाई हादसे के दौरान थॉमस बाटा की मौत हो गई। उनकी मौत के बाद थॉमस के बेटे जे बाटा ने पिता का बिजनेस संभाला।

भारत के लोगों को बिना चप्पल के देखा, तो भारत में बिजनेस का आइडिया आया

भारत में बाटा कंपनी का पहला शोरूम पश्चिम बंगाल के कोलकाता के करीब कोन्नार गांव में खुला था।

1930 के दशक में जे बाटा जब भारत पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि भारत के ज्यादातर लोग जूते-चप्पल नहीं पहनते थे। तब उनके दिमाग में आया कि भारत में भी बाटा के जूतों का विस्तार करना चाहिए। उन्होंने कोलकाता से सटे कोन्नार नाम के एक छोटे से गांव में कंपनी की शुरुआत की।

2 सालों के अंदर जूतों की मांग इतनी बढ़ गई कि कंपनी को अपना प्रोडक्शन बढ़ाना पड़ा, जिससे यह टाउनशिप बन गया, जिसे लोग बाटानगर के नाम से जानते हैं। 1935 तक बाटा दुनिया में रोजाना 1 लाख 68 हजार जोड़ी जूते बनाता था। 1938 तक बाटा के पास करीब 65 हजार कर्मचारी थे। अकेले भारत में उस समय सिर्फ 4 हजार कर्मचारी थे, जो रोजाना 3500 जोड़ी जूते बनाते थे।

बाटा को उसकी टैग लाइन से मिली पहचान

1938 में पश्चिम बंगाल के अखबारों में बाटा का यह विज्ञापन छपा था। जिसमें बताया गया था कि जूते नहीं पहनने से टेटनस भी हो सकता है।

बाटा पहली ऐसी कंपनी है, जिसने टेनिस बूट को डिजाइन किया था। उस समय सफेद कैनवास पर बनाए टेनिस के जूतों को खिलाड़ियों के साथ-साथ लोगों ने भी काफी पसंद किया था। 1980 के दशक में बाटा को पैरागॉन और खादी जैसी कंपनियों से अच्छी-खासी टक्कर मिलने लगी।

कंपनी ने मार्केट में खुद को आगे रखने के लिए विज्ञापन का सहारा लेना शुरू किया। टैगलाइन में लिखा- 'टेटनस से सावधान रहें, एक छोटी सी चोट आपके जिंदगी के लिए खतरनाक साबित हो सकती है, इसलिए जूते जरूर पहनें।' कहा जाता है कि इस टैगलाइन के चलते भारत में जूतों की मांग बढ़ गई। इसके अलावा फर्स्ट टू बाटा ,देन टू बाटा टैगलाइन भी काफी लोकप्रिय हुई।

बाटा ने मॉडर्न डिजाइन लॉन्च की

बाटा ने पिछले कुछ सालों में बड़े पैमाने पर बदलाव किए है। जिसमें प्रोडक्शन पोर्टफोलियो का बढ़ावा देना, फैशन फॉरवर्ड और ग्लैमर स्टाइल को शामिल करना है। बाटा ने यह बदलाव 2013-14 के आसपास शुरू किया था। जब कंपनी ने मॉडर्न डिजाइन पेश किए थे। जिसे भारत के बाजार और खासकर नई पीढ़ी के लोगों ने काफी पसंद किया। 

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