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आपका सोशल स्टेटस और दोस्त कैसे यह आप क्या खाते हैं इस पर डिसाइड करता है, हर पांचवां बच्चा सोशल फोबिया का शिकार

हम क्या खाते-पीते हैं, कहां घूमने जाते हैं। इससे हमारा सोशल स्टेटस डिसाइड होता है। लेकिन अगर आपको कोई कहे कि पेट में किस तरह की चीजें हैं, यह हमारे दोस्त की संख्या और उनके साथ हमारा रिश्ता तय कर सकती हैं। तो शायद ही आप मानें। अब आयरलैंड की ‘यूनिवर्सिटी ऑफ कॉर्क’ में हुई एक नई रिसर्च ऐसा ही कुछ दावा कर रही है। इस रिसर्च में पाया गया कि सोशल एंग्जाइटी का सीधा संबंध हमारे पेट से है। मतलब आपका खाना-पीना आपके रिश्ते और सामाजिक रुतबे को प्रभावित करता है।

यह रिसर्च अपने आप में एक नई जानकारी है। अभी तक ऐसा माना जाता था कि कोई कितना शर्मीला होगा और उसका सोशल स्टेटस कैसा होगा, ये सारी बातें उसके बर्ताव-परवरिश पर निर्भर करती हैं। लेकिन आयरलैंड में हुई नई रिसर्च इसका संबंध पेट और खाने से जोड़ कर बताती है। आज ‘सेहतनामा’ में पेट और सोशल स्टेटस के इसी रिश्ते की बात करेंगे।

  • क्या खाने से होता है सोशल फोबिया

पुरानी कहावत है कि जैसा होगा अन्न, वैसा होगा मन। यानी खाने का हमारे मन पर असर होता है। सोशल फोबिया से बचने के लिए अपने खाने में विटामिन डी, फाइबर, विटामिन बी, मैग्नीशियम और मिनिरल्स वाले फूड को ऐड करें। वहीं, कैफीन, एल्कॉहल, निकोटीन वाली खाने-पीने की चीजों से दूरी बनाएं। इस तरह की चीजें डिप्रेंशन और एंग्जाइटी को बढ़ावा देंगी।

कौन सी चीजें बनाती हैं शर्मीला

‘हमारा बच्चा बहुत शर्मीला है। ज्यादा किसी से घुलता मिलता नहीं है।’ कुछ माता पिता से आपने यह जरूर सुना होगा। लेकिन क्या कभी इसके पीछे के साइंस को समझना चाहा।

दरअसल, ऐसी बातें बच्चों के दिमाग में बचपन से बिठा दी जाती हैं। जिससे बच्चा खुद को लेकर दिमाग में एक नेगेटिव इमेज बना लेता है। यही बातें मंच पर बोलने, लोगों के साथ घुलने मिलने के दौरान दिमाग पर असर करती हैं। कई बार स्कूल कॉलेज में बुली, गाली गलौच और रैगिंग से भी बच्चे के दिमाग पर असर पड़ता है।

43% लोगों में बढ़ा सोशल फोबिया

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO की रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर के अलग-अलग देशों में सोशल फोबिया से करोड़ों लोग जूझ रहे हैं।

भारत में, 2017 दिसबंर से जनवरी 2018 के बीच पुड्डुचेरी के ग्रामीण इलाके में 1018 स्कूली बच्चों पर एक स्टडी की गई। जिसमें 10 से 13 साल के 738 बच्चे सोशल फोबिया का शिकार मिले। इनमें 520 लड़के थे। मतलब लड़कियों के मुकाबले लड़कों में सोशल फोबिया का डर ज्यादा होता है। यह स्टडी यह भी बताती है कि हर पांच में से एक बच्चे में सोशल फोबिया होने का खतरा रखता है। चीन की पीकिंग यूनिवर्सिर्टी में कोरोना के बाद लोगों की सोशल लाइफ में आए बदलाव को लेकर एक रिसर्च की गई। जिसमें पाया गया कि कोरोना से पहले की तुलना में 43.7% लोगों में ‘सोशल फोबिया’ बढ़ा है। साथ ही 27.5% लोगों के जीवन में कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला। वहीं 28.8% लोगों ने माना कि कोविड के बाद उनका ‘सोशल फोबिया’ कम हुआ है।

महिलाओं को ज्यादा होता सोशल एंग्जाइटी डिसऑर्डर

अमेरिका में नेशनल कॉमोर्बिडिटी सर्वे रेप्लीकेशन ने सोशल एंग्जाइटी को लेकर 2001 से 2003 तक किए एक सर्वे में पाया कि 18-29 साल के बीच के लोगों में सबसे ज्यादा सोशल एंग्जाइटी डिसऑर्डर होता है। इसी सर्वे में बताया गया कि 18 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में भी पुरुषों के मुकाबले सोशल एंग्जाइटी डिसऑर्डर ज्यादा होता हैं। यानी युवा वर्ग नए लोगों से घुलने मिलने में खुद को पीछे रखता है।

आत्मविश्वास की कमी से होता सोशल फोबिया

मनोचिकित्सक डॉ आस्था सक्सेना बताती हैं कि बाकी लोगों के मुकाबले सोशल फोबिया के शिकार लोगों में आत्मविश्वास की कमी और डर होता है। ऐसे लोगों को कुछ भी करने से पहले एंग्जाइटी होने लगती है। यह जेनेटिक या आसपास के माहौल की वजह से भी हो सकता है। हर व्यक्ति में इसके लक्षण अलग- अलग हो सकते हैं।

  • भीड़ के सामने बोलने पर घबराहट होना
  • लोगों से मिलने जुलने में शर्मिदी होना
  • पार्टी में अकेले में ज्यादा समय बिताना
  • लोगों के सामने आते ही खुद को जज करना
  • आंख से आंख मिलाकर बोलने से बचना

सोशल फोबिया में थेरेपी से मिलेगा फायदा

मनोचिकित्सक आस्था सक्सेना बताती हैं कि आमतौर पर सोशल फोबिया का शिकार लोगों के लिए दो तरह के ट्रीटमेंट होते हैं। पहला मेडिकल ट्रीटमेंट और दूसरा थेरेपी। मेडिकल ट्रीटमेंट में लोगों को दवाओं के जरिए एंग्जाइटी में कुछ समय के लिए आराम मिल सकता है। तो वहीं थेरेपी सोशल फोबिया वाले व्यक्ति के लिए काफी इफेक्टिव होती है। जिसमें एक्पोजर थेरेपी यानी मरीज को बोला जाता है कि पहले एक या दो लोगों के सामने बोल कर देखें। छोटी पार्टी में जाकर देखिए। फिर धीरे-धीरे बड़ी पार्टी में जाइए। इसके साथ ही मरीज के विचारों पर भी काम किया जाता है। सोशल फोबिया के मरीज को यही लगता है कि फलां पार्टी में सबका ध्यान मुझ पर होगा। मेरे बारे में लोग क्या सोच रहे होंगे। ऐसे में मरीज को यह भरोसा दिलाया जाता है कि आप उस पार्टी का महज एक हिस्सा भर हैं। आप उस पार्टी का सेंटर ऑफ एटेंशन नहीं हैं।

खुद को रखें रिलैक्स

सोशल फोबिया में दिमाग पूरी तरह ब्लैंक हो जाता है। दिमाग में नेगेटिव विचार बढ़ते जाते हैं। ऐसे में जरूरी है कि सबसे पहले खुद को रिलैक्स रखें और एक लंबी सांस लें। इससे आप खुद को शांत रख पाएंगे और दिमाग को सही इंस्ट्रक्शन दे पाएंगे।

दूसरों पर फोकस करें

लोग हमारे बारे में क्या सोच रहे होंगे इसे लेकर हम खुद के दिमाग में एक सेल्फ इमेज बना लेते हैं। हर विचार जो दूसरों से हटाकर खुद पर ही ले आता है, वह इनसिक्योर बनाता है। इसे एक डिफेंस मैकेनिज्म कहा जाता है जिसे लंबे समय तक रिपीट करने से व्यवहार और पर्सनालिटी का पार्ट बन जाता है। ऐसे में लोगों से आंखों में आंखें डालकर बात करें। यह आपके कॉन्फिडेंस को बूस्ट करेगा। साथ ही लोगों से मिलकर उनसे जुड़े कॉमन मुद्दों पर बात करें।

खुद से प्यार करना सीखें

पहली बार में बच्चा चलना नहीं सीखता। पहले वह घुटनों पर चलता है फिर कई बार गिरकर चलना सीखता है। इसलिए ‘मुझसे नहीं होगा, मुझे नहीं आता है।’ इस तरह के नेगेटिव विचार मन में न लाएं। खुद की छोटी-छोटी अच्छी चीजों को लेकर हमेशा खुशी मनाएं।

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