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निशक्त बच्चों के घरौंदा सेंटर में अव्यवस्था की भारी लापरवाही, न पर्याप्त कपड़े न ही खाना, फर्स्ट एड की भी सुविधा नहीं


बिलासपुर/ मानसिक और शारीरिक रूप से निशक्त बच्चों की देखरेख के लिए बनाए गए घरौंदा सेंटर में अव्यवस्था को लेकर जनहित याचिका पर हाई कोर्ट ने प्रदेश के 11 जिलों के सेंटर की जांच के लिए कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किए हैं। बिलासपुर के घरौंदा सेंटर की जांच के बाद कोर्ट कमिश्नर ने रिपोर्ट सौंपी है। इस रिपोर्ट में सेंटर में जगह की कमी, खान-पान, समय पर भोजन नहीं मिलना, स्टाफ की कमी समेत 17 तरह की कमियां पाई गई हैं।

इस मामले में हाई कोर्ट ने दो दिन पहले ही सुनवाई करते हुए समाज कल्याण विभाग के डायरेक्टर को शपथ पत्र देने के निर्देश दिए थे। समाज कल्याण विभाग के अंतर्गत संचालित एनजीओ में करोड़ों के शासकीय अनुदान मिलने के बावजूद भूख की वजह से बच्चों की मौत को लेकर एनजीओ कोपल वाणी चाइल्ड वेलफेयर ने वर्ष 2020 में जनहित याचिका लगाई थी।

इसमें बताया कि राज्य शासन द्वारा समाज कल्याण विभाग के अंतर्गत निराश्रित बच्चों के लिए काम कर रही सामाजिक संस्थाओं को अनुदान दिया जाता है। उनके लिए अलग से घरौंदा योजना शुरू की गई थी। सेंटर के लिए नियम- शर्तें तय की गई हैं, लेकिन इन्हें संचालित करने वालों ने भी बच्चों की देखरेख- समाज सेवा की जगह इसे भ्रष्टाचार का जरिया बना लिया है। हाई कोर्ट से नियुक्त कोर्ट कमिश्नरों की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेशभर के सेंटर में बड़े पैमाने पर अव्यवस्था, कमियां मिली हैं।

घरौंदा सेंटर का पता ही गलत

कोर्ट कमिश्नर एडवोकेट अपूर्व त्रिपाठी और शिवाली दुबे की रिपोर्ट के अनुसार बिलासपुर के घरौंदा सेंटर का पता ही गलत है। सेंटर पहले कोनी की एक कॉलोनी में संचालित होता था। बाद में इसे डीपूपारा शिफ्ट कर दिया गया, लेकिन विभाग की वेबसाइट पर अब भी कोनी का ही पता दर्ज है। नियम के अनुसार सेंटर के लिए 10 हजार वर्गफीट की जगह होनी चाहिए, लेकिन बिलासपुर का सेंटर महज 30 बाई 60 की जगह में संचालित किया जा रहा है।

 किचन नहीं, खाना बाहर से मंगाया जाता है

सेंटर में किचन नहीं है, इस कारण खाना बाहर से मंगाया जाता है। इस वजह से बच्चों को समय पर खाना नहीं मिल पाता। नाश्ता देने की व्यवस्था नहीं है। इसी तरह खेलकूद- शारीरिक गतिविधियों के लिए जगह नहीं है। सेंटर के अंदर भी खेलकूद के लिए किसी तरह के उपकरण नहीं हैं।

खर्च का ब्योरा नहीं

कोर्ट कमिश्नर को प्रबंधन नहीं बता सका कि फंड का उपयोग किस तरह से किया जाता है, पैसे का किस तरह हिसाब रखा जाता है। उपस्थिति रजिस्टर भी निरीक्षण के दिन ही तैयार किया गया। बताया गया कि स्पीच थेरेपी के डॉ. अग्रवाल कभी सेंटर नहीं आते, वे अपने सहायक को भेजते हैं। डॉ. अग्रवाल की क्लीनिक में रजिस्टर भेजा जाता है, जिस पर वे महीनेभर का हस्ताक्षर एक साथ करते हैं।

फर्स्ट एड की भी सुविधा नहीं

सेंटर में रहने वाले बच्चों के लिए पर्याप्त कपड़े नहीं हैं। दोपहर और रात को ही खाना दिया जाता है। नाश्ते की व्यवस्था नहीं है। सेंटर में फिजियोथेरेपी की व्यवस्था नहीं है। यहां तक कि प्राथमिक उपचार के लिए कोई कमरा नहीं है। लाइब्रेरी भी नहीं है। कोर्ट कमिश्नरों के कहने पर बच्चों को चाय-नाश्ता दिया गया।

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