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गंदे पानी में चाय का कप धूलते देख आया कप धोने की मशीन बनाने का आईडिया; लेबर की तरह काम किया सिखने के लिए

‘एक रोज मैं अपने भाई धवल के साथ चाय की दुकान, जिसे टपरी कहते हैं, पर बैठा हुआ था। चाय के बनने का इंतजार कर रहा था। कॉलेज के सामने ये दुकान थी। मैंने देखा कि एक व्यक्ति पानी से भरे टब में चाय के कप धो रहा है। जैसे ही वो व्यक्ति 2 मिनट के लिए इधर-उधर गया, एक बकरी आकर उस पानी को पीने लगी।

कुछ देर बाद फिर वो व्यक्ति आया और उसी पानी में चाय का कप धोने लगा। हमने मन ही मन सोचा कि कितने गंदे तरीके से चाय का कप ये लोग धो रहे हैं। जब उस व्यक्ति से कहा, तो उसने गुजराती में बोला- सब देखने की बात है। हम दोनों बिना चाय पीए वहां से उठकर चल दिए।’

जयेश कहते हैं, ‘इंडिया में पानी के बाद यदि सबसे ज्यादा कुछ पिया जाता है, तो वो चाय है। हमने सोचा क्यों न चाय के शौकीन देश को साफ-सुथरे कप्स में चाय पिलाई जाए। हमने ऐसी मशीन बनाई, जो कप धोती है। इस मशीन में बिल्कुल साफ-सुथरे तरीके से चाय का कप धुलता है।’

जयेश और उनके भाई धवल ने 2019-20 में 'प्रहंतम' नाम से चाय के कप धोने की मशीन बना रहे हैं। दिलचस्प है कि इतनी कम उम्र में दोनों भाइयों ने चाय का कप धोने की मशीन बनाई है। इनका दावा है कि ये इंडिया की पहली ऐसी मशीन है।

जयेश कहते हैं, ‘ये हमारा पेटेंट प्रोडक्ट है। इसमें एक बार में 9 कप 30 सेकेंड में धुल जाते हैं। कप के भीतरी और बाहरी, दोनों हिस्सों की बराबर धुलाई होती है। मशीन के साथ एक पानी और एक डिटर्जेंट का टैंक कनेक्ट होता है। हम कस्टमाइज मशीन भी बनाते हैं। 5वीं तक हम दोनों ने गुजरात के नवसारी से पढ़ाई की है। जब घर पर दादा की तबीयत खराब होने लगी, तो पापा गांव आ गए। वे नवसारी में डायमंड इंडस्ट्री में हीरा घिसने का काम करते थे। मामूली तनख्वाह थी।

अहमदाबाद से 200 किलोमीटर दूर एक गांव है धनेरा, जहां के हम लोग रहने वाले हैं। गांव वापस आने के बाद पापा ने कई छोटे-छोटे काम किए। उन्होंने नाई का काम करने से लेकर कपड़े बेचने, फोटो-स्टूडियो चलाने तक का काम किया है।

हमारी आर्थिक स्थिति ज्यादा खराब थी। गांव की भी स्थिति कुछ अच्छी नहीं थी। आज भी जब आप मेरे गांव जाएंगे, तो यहां का एक भी व्यक्ति आपको सेटल्ड नहीं दिखेगा। मेरी उम्र के ज्यादातर बच्चे गलत काम, शराब-दारू… इन सब के आदी हैं।

मैं तो कभी-कभी सोचता हूं कि यदि गांव से निकलकर यहां नहीं आता, तो शायद मैं भी उन बच्चों की तरह दारू-शराब की गिरफ्त में रहता। हम दोनों भाई बचपन से गरीबी देखते हुए बड़े हुए हैं। धवल 10वीं के बाद पॉलिटेक्निक करने लगा था। इसी दौरान हमारे साथ चाय की दुकान पर कप धुलने वाला वाकया हुआ,जिसके बाद मन में आ गया कि कुछ तो करना है।’


वो कहते हैं, ‘जब 2017-18 में हमें लगा कि कुछ करना चाहिए, तब हमें तो डिजाइन वगैरह कुछ आता नहीं था। धवल के कहने पर पापा ने एक सस्ता लैपटॉप खरीदवाया। इसके पीछे भी कहानी है। अहमदाबाद में लैपटॉप महंगा मिल रहा था।

मेरे पापा के एक जानने वाले मुंबई में रहते थे। उन्होंने मुंबई से कुछ सस्ते दाम पर लैपटॉप दिलवाया। यूट्यूब पर देखकर हमने डिजाइन सीखा कि किसी मशीन को आखिर डिजाइन कैसे करते हैं। फिर एक वेल्डिंग की दुकान पर काम करने लगा।

दरअसल, पापा के जानने वाले की वेल्डिंग की दुकान थी। एक रोज पापा पलंग देखने गए थे। जब पापा से हमने कहा कि हम एक मशीन बनाने की सोच रहे हैं। मैंने वेल्डिंग वाले से कहा कि मुझे कोई सैलरी, पगार नहीं चाहिए। बस मुझे सीखना है। आप काम पर रख लीजिए।

पापा के जानने वाले ने पापा के कहने पर हमें रख लिया। हम दोनों भाई सुबह से शाम तक लेबर की तरह काम करते थे। बीच के जो दो घंटे लंच के लिए मिलता था, उसमें हम दोनों भाई इस मशीन को बनाने में लग जाते थे।

कबाड़ से मशीन बनाना शुरू किया। पहली बार जो मशीन बनाई, वो पूरी तरह से फेल हो गई। दूसरी बार फिर से हमने कोशिश की, एक-एक मशीन बनाई, लेकिन वो भी फेल। हम जो कर रहे थे, उससे वेल्डिंग शॉप वाले को लगा कि हम अपना और उनका समय जाया कर रहे हैं।

एक रोज वेल्डिंग वाले ने कहा- बेटा क्यों अपना और हमारा टाइम खराब कर रहे हो। अभी पढ़ने-लिखने की उम्र है। जाओ पढ़ाई-लिखाई करो।’ जयेश और धवल अपने पापा के साथ हैं। जब दोनों भाई बार-बार फेल हो रहे थे, तो उनके पापा भी चाहते थे कि बेटा कोई दूसरा काम करे। जयेश और धवल अपने पापा के साथ हैं। जब दोनों भाई बार-बार फेल हो रहे थे, तो उनके पापा भी चाहते थे कि बेटा कोई दूसरा काम करे।

जयेश कहते हैं, ‘बार-बार फेल होने के बाद हम दोनों भाई भी मन ही मन सोचने लगे थे कि अब बहुत हो गया। ये सब बंद कर कुछ काम-धंधा करना पड़ेगा। हालांकि, मशीन का डिजाइन तैयार हो चुका था, लेकिन हमारे पास एक रुपया भी नहीं था।

एक रोज मैं अपने कॉलेज के एक प्रोफेसर के पास गया। उनसे अपनी बातें बताई। आप यकीन नहीं करेंगे, मेरे आइडिया को सुनते ही उन्होंने 10 हजार रुपए दे दिए। कहा- जाओ तुम मशीन बनाओ। हम दोनों भाई फिर से मशीन बनाने में लग गए।

तीन बार विफल के होने के बाद हमने एक मशीन बनाई, जो चाय के कप का भीतरी हिस्सा धोती थी। अब हमें मशीन बनाने के लिए और पैसों की जरूरत थी। इधर घरवालों को लग रहा था कि मैं अपना टाइम खराब कर रहा हूं। पापा के मन में था कि शायद हम उनका हाथ बटाएं, तो घर की स्थिति थोड़ी ठीक हो जाएगी।

हम दोनों भाइयों ने पैसा बचाने के लिए एक वक्त खाना शुरू कर दिया। ये सब कई महीनों तक चलता रहा। फिर से जब मैं उस प्रोफेसर के पास गया, जिन्होंने 10 हजार रुपए दिए थे, तो उन्होंने बताया कि मुझे फंड जुटाना चाहिए। हमने अलग-अलग कॉलेजों में प्रेजेंटेशन देना शुरू किया। इससे तकरीबन एक लाख रुपए इकट्ठा हुए।’

जयेश मुझे पहली मशीन की एक तस्वीर दिखा रहे हैं। कहते हैं, ‘एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया के जरिए मुझसे कॉन्टैक्ट किया था। मैंने उसे फ्री में मशीन दे दी। उसके बाद से मेरे पास ऑर्डर आने लगे। अभी सबसे ज्यादा साउथ के राज्यों में इस मशीन की डिमांड है।

अहमदाबाद समेत गुजरात के भी कई जिलों में हमारी मशीन चाय की दुकान पर इंस्टॉल्ड है। मैं तो चाहता हूं कि हर चाय की दुकान पर ये मशीन हो, ताकि लोगों को हाइजेनिक चाय मिले। दरअसल हम जो वन टाइम कप का इस्तेमाल करते हैं, वो भी वातावरण के लिए अच्छा नहीं है। पूरी तरह से ये कप भी बायोडिग्रेडेबल नहीं है।’

जयेश का अभी गांधीनगर में छोटा सेटअप है। अब वो अपनी यूनिट को अहमदाबाद में शिफ्ट करने वाले हैं। जयेश देशभर में 70 से ज्यादा मशीनें बेच चुके हैं। एक मशीन की कीमत 35-40 हजार रुपए है।

वो कहते हैं, ‘शुरुआत में तो लोग हमें सुनना भी नहीं चाहते थे। मशीन देखना या इसका डेमो लेना तो दूर की बात है। आज हमारे पास दर्जन भर से अधिक प्रोडक्ट के ऑर्डर पाइपलाइन में हैं। चार लोगों की टीम काम कर रही है। धीरे-धीरे हम टीम भी बढ़ा रहे हैं।’

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