मुंबई/ अखिलेंद्र मिश्र का स्ट्रगल भी बाकी स्टार्स से अलग रहा। उन्हें मुंबई जैसे शहर में भूखा तो नहीं रहना पड़ा। मगर, थिएटर से लेकर फिल्मों में खुद की पहचान बनाने के जद्दोजहद ने उनके जज्बे को कई बार तोड़ना चाहा। इसके बावजूद वो कभी रुके नहीं।
बचपन के दिन
उन्होंने कहा, ‘मेरा जन्म बिहार के सिवान जिले के छोटे से गांव में हुआ था। हर बच्चे की तरह मेरा बचपन भी बहुत खूबसूरत बीता। हम कुल दस भाई-बहन थे। पिता जी केंद्र सरकार के कस्टम एक्साइज डिपार्टमेंट में कार्यरत थे। उनकी पोस्टिंग एक जगह से दूसरे जगह होती रहती थी। ऐसे में भाई-बहनों की पढ़ाई भी अलग-अलग स्कूल में हुई।
जब पिता जी की पोस्टिंग महुआ में हुई तो मेरी उम्र स्कूल जाने की हो गई थी। एडमिशन के लिए उन्होंने जान-पहचान के लोगों से पता किया। उनमें से किसी ने गुरदेव जी के गुरुकुल के बारे में बताया। उनकी बात मान पिता जी ने एडमिशन वहीं करा दिया और इस तरह मैं गुरदेव के सानिध्य में आ गया।
रोज सुबह मैं और कुछ बच्चे गुरुकुल पहुंच जाते। फिर झाड़ू-पोंछा लगाने के बाद हम गुरदेव को उठाते थे, क्योंकि उनको लकवा मार गया था। फिर उनका नित्य-क्रिया कराने के बाद हम सभी पढ़ने के लिए बैठ जाते। यहां पर मैं करीब चार-साढ़े चार साल तक पढ़ा। फिर पिता जी का तबादला हो गया।
उस गुरुकुल में पढ़ने का प्रभाव इतना गहरा था कि इसके बाद मेरा सीधे एडमिशन 5वीं क्लास में हुआ। अंत में पूरा परिवार गोपालगंज आ गया। यहां पर मैंने छपरा जिला स्कूल से आगे की स्कूलिंग की। फिर ग्रेजुएशन (फिजिक्स, ऑनर्स) छपरा राजेंद्र कॉलेज से 1982 में पूरा किया।’
अखिलेंद्र कहते हैं, ‘एक्टिंग की शुरुआत तो बचपन से ही हो गई थी। हमारे गांव में दुर्गा पूजा के दौरान दो नाटक होते थे, एक हिंदी और दूसरा भोजपुरी में। छुट्टियों के दौरान हम सभी चचरे भाई-बहन वहां इकट्ठा होते थे।
एक बार एक नाटक के लिए छोटे बच्चे की जरूरत थी, जिसमें मुझे कास्ट किया गया। मेरे लिए ये पल बहुत खुशी का था। उस वक्त गांव में लाइट नहीं थी। इस कारण हम सभी रात में लालटेन की रोशनी में नाटक की तैयारी करते थे। इस नाटक को करने के बाद एक्टिंग से ऐसा जुड़ा कि आज तक इससे खुद को अलग नहीं कर पाया।’
बिग बी का फैन
‘जब तक छोटा था, तब तक घरवालों को मेरा नाटक करना रास आता था, लेकिन बड़े होने पर उन्हें ये चीज खटकने लगी। यहां तक कि सिनेमाघर में फिल्म देखने की छूट नहीं थी। सबसे छिप कर फिल्म देखने जाता था। उस वक्त सबसे ज्यादा अमिताभ बच्चन की दीवानगी सवार थी। नई फिल्म में वो जो कपड़े पहनते, वही सब आस-पास के लड़के पैसा इकट्ठे कर सिला लेते। फिर बारी-बारी से पहनकर अपनी इच्छा पूरी करते।’
फिल्म देखने पर बड़े भाई ने बहुत पीटा
‘छिपकर फिल्म देखने के लिए कई बार घरवालों से मार भी पड़ी थी। एक बार मैं फिल्म देखने गया था। वहां से लौटने पर भगवान से मिन्नतें करता आया कि घर पर इसके बारे में किसी को पता नहीं चले। भगवान ने मेरी प्रार्थना उस दिन तो सुन ली। जब घर पहुंचा तो कोई नहीं था, हाथ-पैर धोकर सीधे पढ़ने बैठ गया।
इस बात को कुछ ही दिन बीते थे कि बड़े भाई को उनके दोस्त ने बता दिया कि मैं फिल्म देखने गया था। यह जानने के बाद भाई से बहुत मार पड़ी।
कुछ समय बाद ही मैंने एक्टर बनने का फैसला कर लिया। मगर, सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि घरवालों को कैसे बताऊं कि एक्टर बनना है। बिहार जैसे राज्य में उस वक्त हर मां-बाप की चाहत होती थी कि उनका बच्चा सिविल अधिकारी बने, या फिर डॉक्टर या इंजीनियर। इसके अलावा किसी दूसरे प्रोफेशन में जाने का कल्चर नहीं था। ऐसे में घरवालों के सामने एक्टर बनने की इच्छा रखना सबसे मुश्किल काम था।
पिता जी के सामने यह सब कहने की हिम्मत नहीं थी। ऐसे में हर बात पहले मां से कहते, फिर मां सब कुछ पिता जी से बतातीं। एक दिन मौका देख मैंने भी मां के सामने दिल की बात रख दी।
मां से कहा- ए माई, हम्में एक्टर बने के बा ( मां, हमें एक्टर बनना है)।
यह सुनकर मां ने कहा- अब एक्टर बनबा, इंजीनियर बनला ना ( अब एक्टर बनोगे, इंजीनियर बनो न)।
कुछ देर शांत रहने के बाद मां ने फिर से कहा- का हो ला एक्टर (एक्टर क्या होता है)?
मैंने मां से कहा- माई, अगर हम एक्टर बन जाईब नू, तब डॉक्टर, कलेक्टर सब बन जाईब (अगर मैं एक्टर बन गया तो डॉक्टर इंजीनियर सब बन जाएंगे)।
ये सुन मां हैरान रह गई। फिर कहा- ये बबुआ, एक्टर अईसन कौन नौकरी है, जह में तू सब बन जईबा (बेटा, एक्टर ऐसी कौन सी नौकरी है, जिसमें तुम सब कुछ बन जाओगे)।
तब मैंने उनसे कहा कि एक्टर बनने से मैं सब कुछ बन सकता हूं। इसके बावजूद मां ने भाव नहीं दिया और चली गईं। कुछ समय बाद जब पिता जी को पता चला कि मैं एक्टर बनना चाहता हूं, तो उन्होंने खुशी-खुशी इस फैसले का सपोर्ट किया।’
झाड़ू और साफ-सफाई का काम किया
‘इन सबके बाद बड़ा चैलेंज यह था कि मैं कहां से एक्टिंग का कोर्स करूं। उस वक्त FTII में एक्टिंग क्लास बंद थी। फिर एक एक्टिंग के जानकार की बात मान मैंने इप्टा से जुड़ने का मन बनाया और इसी को पूरा करने के लिए मुंबई आना हुआ। मैं 1983 में मुंबई आ गया था।
मुंबई आकर मुझे 15 दिन इप्टा को खोजने और उसके बारे में पता करने में चला गया। फिर वहां पर पहले कुछ दिन सिर्फ नाटक देखा। इसके बाद मुझे बैक स्टेज झाड़ू और साफ-सफाई का काम मिल गया। सफाई करने के साथ मैं वहां हो रहे नाटकों के रिहर्सल पर भी पूरा ध्यान देता था। सभी के डायलॉग्स को अच्छी तरह से रट लिया करता था। सभी के हाव-भाव पर पूरा ध्यान देता था। मन ही मन सोचता था कि मैं होता तो इस रोल को ऐसे करता, वैसे करता।
ऐसा करना मेरे लिए बहुत काम आया। जब कभी किसी कारणवश कोई नाटक में सिलेक्ट हुआ लड़का फाइनल के दिन आने में असमर्थ रहता था, तो उस दिन मैं उस रोल को प्ले करता था।’
मुंबई में गुजर बसर कैसे हुई? उन्होंने कहा, ‘यहां बहुत संघर्ष था। सिर्फ 40 पैसे बचाने के लिए कई किलोमीटर पैदल ही चलता रहता था। उन बचे हुए 40 पैसे से केला खरीद कर खा लेता था। पसीने से तर-बतर हो जाता था, लेकिन इसने बावजूद पैदल चलता ही रहता था। ऐसे कई संघर्ष का सामना करना पड़ा, लेकिन मेरा हौसला नहीं टूटा। हालांकि, आर्थिक रूप से फैमिली ने बहुत सपोर्ट किया। कुछ दिनों बाद मैंने ही उनसे खर्चे लेना बंद कर दिया।’
सलमान खान के साथ फिल्म वीरगति में काम करने का एक्सपीरिएंस कैसा रहा? वो कहते हैं, ‘टीवी शो चंद्रकांता में सुरेंद्र पाल के साथ काम किया था। एक दिन वो मुझे डायरेक्टर के.के सिंह से मिलाने ले गए। हालांकि, ज्यादा समय उन दोनों ने ही बात की। मगर, जाते समय बहुत गर्मजोशी के साथ के.के सिंह ने मुझे अलविदा किया और जल्दी मिलने की इच्छा जताई। कुछ दिन बाद फिर मुलाकात हुई। इस मुलाकात के दौरान उन्होंने मुझे बताया- आपको फिल्म वीरगति में बतौर विलेन सलमान खान के अपोजिट कास्ट किया गया है। इस तरह मैं इस फिल्म का हिस्सा बना।
शूटिंग की बात करूं तो सेट पर काम करने में बहुत मजा आता था। सलमान हमेशा मुझे मोटिवेट करते थे। वो कहते थे- अखिलेंद्र जी, आप बहुत अच्छा कर रहे हैं। इस सीन में तो आप छा गए।
वो खुद हर सीन्स की जबरदस्त प्रैक्टिस करते थे। सीन के हिसाब से बॉडी भी बहुत अच्छी बना रखी थी। रात में भी वो घंटों जिम में पसीना बहाते थे। पहली बार इस फिल्म में वो बिना शर्ट दिखे थे।’
मेरी मौत देख मां रोने लगी थी
सक्सेस पर परिवार वालों का क्या रिएक्शन था? उन्होंने कहा, ‘फिलहाल तो मां-पिता जी इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मेरी कामयाबी देख वो दोनों बहुत खुश हुए थे। चंद्रकांता के बाद जब पिता जी बाहर जाते थे, तो बच्चे उन्हें यक्कू के बाबूजी कह कर पुकारते थे।
वीरगति में जब सलमान खान का रोल इक्का सेठ को यानी मुझे जला देता है, तब वो सीन देख मां रोने लगी थीं। कह रही थी कि ये अभागा कौन है, जिसने मेरे बेटे को मार दिया। आज भी दोनों को अपने करीब ही पाता हूं।’
अपकमिंग फिल्म में कमल हसन के साथ दिखूंगा
मैं आने वाले समय में तमिल फिल्म इंडियन 2 में नजर आने वाला हूं। मेरी कई फिल्मों को देखने के बाद डायरेक्टर एस.शंकर ने इस फिल्म के लिए अप्रोच किया था। कॉन्ट्रैक्ट की वजह से बहुत कुछ नहीं बता सकता हूं, लेकिन यह एक बेहतरीन और अलग सब्जेक्ट पर बनी फिल्म है। इस फिल्म में कमल हसन लीड रोल में हैं।’
.jpeg)

टिप्पणियाँ