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अफसरों की लापरवाही से कमार जनजाति बसाहट वाले 68 गाँव में बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरस रहे लोग

गरियाबंद/ छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में आज भी तमाम गांव मूलभूत सुविधाएं से दूर हैं। 68 गांव तो ऐसे हैं, जहां सड़कें और बिजली तक नहीं हैं। पथरीले रास्तों से होकर ग्रामीण राशन और दूसरी जरूरत की चीजें लाते हैं। वाहन नहीं चलने के कारण घोड़ों का इस्तेमाल करते हैं।

ये सारे गांव विशेष पिछड़ी जनजाति (कमार) बसाहट वाले हैं। जिले में ऐसे 191 गांवों में कमार जनजाति के लोग निवास कर रहे हैं। इन गांवों के हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि रोजगार नहीं होने से लोग पलायन करने पर मजबूर हैं। इंदागांव के आश्रित ग्राम अमली गांव के 11 परिवार काम की तलाश में जा चुके हैं। इनमें 11 महिलाओं समेत परिवारों के 28 लोग शामिल हैं।


  • वन अधिनियम बाधा

उपसरपंच रूप सिंह बस्तिया ने कहा कि 80 महिला 130 पुरुषों की बसाहट वाला यह गांव 80 के दशक में बसा है। गांव की मुख्य समस्या सड़क का न होना है। गांव को पंचायत मुख्यालय या जनपद मुख्यालय से जोड़ने की मांग लंबे समय से की जा रही है। ये इलाका उदंती सीता नदी अभयारण्य के दायरे में आता है, ऐसे में सड़क की मंजूरी में वन अधिनियम बाधा बन रहा है।

  • मनरेगा के तहत काम नाकाफी

उपसरपंच ने बताया कि गांव में मनरेगा के काम कराए जाते हैं, जो नाकाफी होते हैं। इसलिए रोजगार के लिए हर साल अमली गांव के कुछ परिवार आंध्र प्रदेश के ईंट-भट्ठे में काम करने अक्टूबर महीने में जाते हैं। काम खत्म होने के बाद यह लोग जुलाई-अगस्त में लौट आते हैं।

68 में से 35 सड़कों के लिए 40 करोड़ की मंजूरी

आदिवासी विकास विभाग के सहायक आयुक्त नवीन भगत ने बताया कि जिले में विशेष पिछड़ी जनजाति वाले 191 गांव के 4919 परिवार को मूलभूत सुविधाएं देने के लिए कार्ययोजना पर काम शुरू हो गया है। सड़क विहीन 68 गांव की सूची में अमली भी शामिल है।

पहले चरण में 35 सड़कों को मंजूरी

सहायक आयुक्त ने बताया कि पहले चरण में 35 सड़कों को मंजूरी मिली है, जिनकी कुल लंबाई 65 किमी है। इसके लिए 40 करोड़ रुपए की राशि मंजूर हुई है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत काम जल्द शुरू किया जाएगा। बाकी सड़कों के लिए वन विभाग से एनओसी लेने की प्रक्रिया जारी है। सड़कों के बिना दूसरी योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा आ रही थी। सड़क बन जाने से ऐसे गांवों में पलायन की समस्या नहीं रहेगी।

  • बुनियादी सुविधाओं के लिए योजना

नवीन भगत ने बताया कि 191 गांवों में विशेष पिछड़ी जनजाति के 17,968 लोग रहते हैं। जरूरतमंद 1,925 परिवारों के लिए आवास की मंजूरी देकर राशि की पहली किस्त उनके खातों में ट्रांसफर कर दी गई है। स्वास्थ्य, पानी, बिजली के साथ साथ इनके रोजगार पर भी काम जारी है। सड़क नहीं होने के कारण घोड़े से राशन ढ़ोते हैं लोग।

  • घोड़े खरीदते हैं ग्रामीण

सड़क के अभाव में मैनपुर विकासखंड के पहाड़ों में बसे कमार जनजाति के लोग जरूरत का सामान ढोने के लिए घोड़ों का इस्तेमाल करते हैं। जमा-पूंजी से कमार जनजाति के लोग वाहन की जगह घोड़े खरीदते हैं। कुल्हाड़ी घाट पंचायत के आश्रित ग्राम कुरुवापानी, भालू डिग्गी, मटाल, ताराझर जैसे गांव में 25 से भी ज्यादा घोड़े हैं।

एक घोड़े की कीमत 20 हजार से 45 हजार तक होती है। 90 के दशक से इन गांवों में जरूरत का सामान ढोने के लिए घोड़े रखने का चलन बढ़ा है। अमली गांव समेत कई गांवों के कमार जनजाति के लोगों को रोजगार नहीं मिलने के कारण पलायन होने को मजबूर हैं।

अफसरों को जानकारी नहीं

मैनपुर जनपद पंचायत के CEO अंजली खलको का कहना है कि उन्हें ग्रामीणों के पलायन की जानकारी नहीं है, लेकिन पंचायत की मांग के आधार पर रोजगार के लिए मनरेगा से पर्याप्त काम कराए जा रहे हैं।

  • क्या है जन मन योजना ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के गरीब, पिछड़े सहित विशेष पिछड़ी जनजातियों के आवासहीन परिवारों को खुद का पक्का मकान देने की पहल की है। विशेष पिछड़ी जनजाति वर्ग की भलाई के लिए सरकार प्रधानमंत्री जनमन योजना संचालित कर रही है।

इस योजना से विशेष पिछड़ी जनजाति वर्ग के लोगों को शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं जैसे-प्रधानमंत्री आवास, आयुष्मान भारत, नलजल, शिक्षा, बिजली, कृषि, सड़क, आधार पंजीयन में शामिल कर विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जा रहा है।

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