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पालकी में दूल्हे राजा विराजमान हैं और पूरा शहर व भूत, प्रेत बने लोग इस बारात में शामिल हुए, मां कामाख्या बनीं दुल्हन

गुवाहाटी/ भूत, प्रेत और असुर बने लोग चेहरे पर मुखौटा लगाए इस बारात में शामिल हैं। छत्र उठाए दंडीधरा के पीछे बैंड बाजा वाले हैं। कीर्तन करने वाली नागर मंडली भी मंजीरे बजाती हुईं गा-बजा रही है। पालकी में दूल्हे राजा विराजमान हैं और पूरा शहर इस बारात पीछे चल रहा है। सब नाचते-गाते हुए आगे बढ़ते जा रहे हैं। ये दृश्य हैं एक ऐसी शादी का जहां दूल्हा कामेश्वर महाराज यानी भगवान शिव। दुल्हन हैं मां कामाख्या जिन्हें ब्याहने शिव बारात लेकर निकले हैं। आज यानी 29 दिसंबर को मां कामाख्या की शादी कामेश्वर नाथ यानी शिव से हो रही है।

इस विवाह के साक्षी बनने के लिए देशभर से श्रद्धालु आए हैं। बाहर के किसी आदमी को दान के अलावा किसी तरह की रस्म में शामिल होने की इजाजत नहीं है।




असम के गुवाहाटी से लगभग चार किलोमीटर दूरी पर नीलांचल पर्वत पर है कामाख्या मंदिर। तांत्रिक सिद्धि के लिए यह जगह सर्वोच्च है। माना जाता है कि यहां मां सती की योनि गिरी थी, जिस वजह से यहां कामाख्या शक्तिपीठ की स्थापना हुई। शिव की तरफ से जूना अखाड़े के नागा साधु बाराती बनकर आए हैं। दूल्हे की तरफ से शादी ​​​​​​की तैयारियां गुवाहाटी के जूना अखाड़े में शुरू हैं। पूजा-पाठ चल रही है।

मां कामाख्या की पूजा करने वाले लाल चोगाधारी पंडित घराती हैं।

एक दिन पहले ही मैं यहां पहुंच गई थी। हालात यह है कि माथा टेकने के लिए रात के दो बजे लाइन में लगी थी। अगले दिन दोपहर में दो बजे नंबर आया। श्रद्धालुओं ने अभी से मंदिर प्रांगण में नाच- गाना शुरू कर दिया है।

मां कामाख्या और शिव की शादी के गीत सब गा रहे हैं। स्त्री-पुरुष सब शादी की खुशी में झूम रहे हैं। यह एक ऐसा अनोखा विवाह है जो शिव के इर्द-गिर्द न होकर मां कामाख्या पर आधारित है। मंदिर दुल्हन की तरह से सजा है। पकवान बन रहे हैं। मां को लगने वाले रसगुल्लों का भोग तैयार हो रहा है।

मां कामेश्वरी यानी सती और भगवान कामेश्वर यानी शिवजी का विवाह असमिया रीति-रिवाज से होता है। पूस महीने के कृष्ण पक्ष की द्वितीया और तृतीया को जब पुष्य नक्षत्र का संयोग भी होता है, ठीक उसी समय ये शादी हुई। शादी से एक दिन पहले जूना अखाड़े के नागा साधु और मंदिर के पंडित मां कामाख्या की शादी का न्यौता देने के लिए शिव मंदिर जाते हैं।

ये रस्म ठीक वैसे ही होती है जैसे एक हिंदू विवाह में होता है। यह शिव मंदिर मां कामाख्या मंदिर के पास ही है। वहां न्यौता देने के बाद वहीं स्थित मां मनसा देवी के मंदिर में शादी की सारी रस्में होगी।

कामाख्या और शिव की शादी की तमाम रस्में वैसी ही हैं जैसे आम घरों में इंसानों की शादी की रस्में होती हैं। शादी के पहले मां की हल्दी रस्म हुई थी। इसमें मां को हल्दी लगाई जाती है। यह रस्म पुजारी करते हैं।

हल्दी के अगले दिन संगीत की रस्म हुई, जिसमें साधु समाज और श्रद्धालु जमकर नाचते हैं। हंसी-ठिठोली होती है।

तीसरे दिन विवाह की रस्म होती है। भगवान कामेश्वर यानी शिव के लिए नए कपड़े, मिठाईयां और सोने के गहने लाए जाते हैं। मां कामाख्या को भी वर पक्ष की ओर से चांदी के बर्तन, नए कपड़े भेंट किए जाते हैं।

अखाड़े के नागा साधु, जो बाराती हैं, वो कामेश्वर मंदिर जाते हैं और वहां से शिव की मूर्ति को पालकी में बिठाकर दूल्हे राजा की तरह सजाकर बारात निकालते हैं।

जब बारात कामाख्या के मंदिर पहुंचती है। आगे-आगे चांदी के छत्रधारी हैं, उनके पीछे पूरा नगर। ढोल-नगाड़ों पर पूरा शहर नाच रहा होता है।

रास्ते में इन बारातियों का पगलपन हद से पार होता दिख रहा है। तिल धरने की जगह नहीं है। अब मेरे सामने मां कामाख्या की पालकी है। उनके साथ घराती यानी लड़की के साइड वाले। कामाख्या मंदिर के बड़पुजारी ही घराती हैं। उनके सिवा इस रस्म में किसी और को शामिल होने की इजाजत नहीं है।

शिव और कामाख्या का बाकायदा विवाह संपन्न होता है। मां कामाख्या को विशेष प्रकार के रसगुल्लों का भोग लगाया जाता है। कहते हैं कि यह रसगुल्ले मां को बहुत प्रिय हैं। इस दिन मां कामाख्या को 56 भोग अर्पित किए जाते हैं। बारात के लिए कुछ लोग राजा, मंत्री तो कुछ भूत और असुर बन कर पहुंचे हैं। सब नाचते-गाते आए। पहले कन्या पक्ष भगवान कामेश्वर मंदिर पहुंचता है और फिर बारात मां कामाख्या देवी के मुख्य मंदिर तक चली जाती है।

गौरतलब है कि कामाख्या में हर दिन मां को लगने वाले भोग में बलि का मांस और मछली जरूरी होता है। सिर्फ मां की शादी वाले दिन मां को शाकाहारी भोग लगता है। शाकाहारी भोग के साथ रसगुल्ले जरूरी तौर पर होते हैं।

शादी के बाद श्रद्धालुओं के लिए बाकायदा अच्छा भोजन बनता है। भक्तों के लिए सुबह से लेकर रात तक खाने का प्रबंध रहता है। इस विवाह के गवाह बने लोग खुद को धन्य मान रहे हैं। ऐसी रौनक और चेहरों पर ऐसी रंगत अपने घर की शादियों में नहीं होती है।

महिला नागा साधु इस क्लिप में दिखाई दे रही हैं। सभी रस्में पूरी होने के बाद मां कामेश्वरी और भगवान कामेश्वर की पालकी पहुंची नात मंदिर। माना जाता है कि यहां देवी-देवता नृत्य के लिए आते थे। यहीं पर उनके फेरे कराए गए।

मां कामाख्या के इस मंदिर में मां की योनि की पूजा होती है। जिस पर हमेशा लाल कपड़ा चढ़ा रहता है। मंदिर के गर्भ गृह में पहले एक मूर्ति आती है। फिर लगभग पांच कदम पर लगभग पांच सीढ़ियां नीचे उतर कर अंधेरे में एक और गर्भगृह है, जहां मां की योनि भाग गिरा था और वह हमेशा पानी से भरा रहता है।

श्रद्धालु यह पानी बोतल में अपने घर ले जाते हैं। कहते हैं कि किसी भी अहम काम को करते वक्त या घर से जाते वक्त वह पानी अपने साथ रखो तो अच्छा होता है। शादी की रस्म तीन दिन तक चलती हैं। भक्तों के लिए सुबह से लेकर रात में भोजन का इंतजाम रहता है, लेकिन ये नीचे बैठकर लंगर की तरह नहीं बल्कि ठीक वैसे जैसे आम शादी की दावत में होता है।

इसी प्रकार अंबुवाची मेले के दौरान मां का रजस्वला होता है, जिसमें तीन दिन के लिए मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं। यह वह वक्त होता है जब यहां सर्वाधिक शक्ति का वास माना जाता है। इन दिनों यहां पूरी दुनिया से तांत्रिक साधना करने के लिए और तप के लिए यहां आते हैं।

कहते हैं कि तीन महीनों की साधना का फल इन तीन दिनों में यहां मिल जाता है। रज्जस्वला के दौरान मां के योनि भाग को सफेद कपड़े से ढक दिया जाता है। तीसरे दिन लाल जब पट खुलता है तब कपड़ा लाल हो जाता है। इस लाल कपड़े के एक धागे को लेने के लिए भक्तों की भीड़ लगती है।

कहते हैं कि जिसे भी यह लाल कपड़ा हासिल हो जाता है उसकी बिगड़ी बन जाती है।

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