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करंट लगने के कारण काटने पड़े दोनों हाथ; परिवार वाले बोले- इससे अच्छा मर जाता, आज नारायण यादव हैं शिक्षक

नारायण यादव बता रहे अपनी कहानी:-

‘पापा का परिवार बहुत बड़ा था। वो सात भाई-बहन। सभी एक साथ एक ही घर में रहते थे। उस समय मेरी उम्र तकरीबन 12 साल रही होगी। घर में चाचा की बेटी की शादी थी। शादी-ब्याह का माहौल था। घर के पास ही एक ट्यूबवेल था, जिससे खेत में पानी डालकर सिंचाई का काम होता था।

मैं उस ट्यूबवेल से नहाने के लिए चला गया। पंप का तार टूटा हुआ था। मैं कुर्सी पर चढ़कर बिजली के तार को ठीक करने लगा। तभी मुझे तेज झटका लगा और मैं कुर्सी से नीचे धड़ाम से गिर गया।

इसी बीच पेड़ से सटा 11 हजार वोल्ट का तार भी टूटकर गिर गया। मेरे पूरे शरीर में करंट दौड़ रहा था। लोग बताते हैं कि मैं तो मरने जैसी स्थिति में पहुंच चुका था। पास के एक लड़के को जब पता चला कि मुझे करंट लग गया है, तो दौड़ता हुआ आया। लकड़ी से मारकर मुझे तार से छुड़ाया।’

45 साल के नारायण यादव अपनी कहानी सुना रहे हैं। कंधे के सहारे उन्होंने सफेद गमछा ओढ़ रखा है। उसे हटाते हुए दोनों हाथ निकालते हैं। दोनों हाथ सिर्फ कोहनी तक ही है। कोहनी भी इस तरह से सिकुड़ी हुई है, जैसे उसे जला दिया गया हो।

नारायण यादव उत्तर प्रदेश सरकार में शिक्षक हैं। वो अभी प्रतापगढ़ के प्रयास अक्षम विद्यालय में पढ़ते हैं। नारायण शुरुआत में उन बच्चों को भी पढ़ाते थे, जो देख नहीं सकते हैं।

नारायण गमछे को फिर से ओढ़ते हुए कहते हैं, ‘लोगों को लगता होगा कि मैं कैसे बच्चों को पढ़ाता हूं। कैसे अपना सारा काम करता हूं, लेकिन आप यकीन नहीं करेंगे- मैं वो सारे काम करता हूं जो आप करते होंगे। 2011 से बच्चों को पढ़ा रहा हूं।’

मेरी मुलाकात नारायण से दिल्ली के मूलचंद इलाके में होती है। दिल्ली के एक स्कूली कार्यक्रम में शामिल होने के लिए नारायण प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) से दिल्ली आए हुए हैं।

कार्यक्रम शुरू होने के कुछ देर बाद हम दोनों एक क्लास की तरफ बढ़ रहे हैं। साथ में नारायण अपनी कहानी बता रहे हैं। वो कहते हैं, ‘गरीब परिवार। पापा मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में कोयला के खदान से कोयला निकालने का काम करते थे।

खदान से कोयला निकालना, जान हथेली पर रखकर काम करने के बराबर है। एक-एक दिन गिनकर गुजारना पड़ता था। कब मौत आ जाए, किसी को कानों-कान भी खबर नहीं होती। परिवार को पालने के लिए पापा अपनी जान की परवाह नहीं करते थे। आखिर उनके पैसे पर ही हमारा खर्च टिका हुआ था।




जब मुझे बिजली के झटके लगे, तो पूरे घर में मातम पसर गया। शादी-ब्याह का जो खुशनुमा माहौल था, वो गम में बदल गया। सबसे पहले अपने शहर मऊ, फिर बनारस, छिंदवाड़ा, भोपाल, नागपुर… ऐसे करके एक साल तक अलग-अलग हॉस्पिटल में, अलग-अलग डॉक्टर से मेरा इलाज चलता रहा।

जब स्थिति विकट होती गई। मेरे दोनों हाथ ऐसे सूखते जा रहे थे, जैसे किसी ने कच्ची सब्जी को धूप में सूखने के लिए रख दिया हो। आखिर में डॉक्टर ने कहा कि मेरे दोनों हाथ काटने पड़ेंगे, नहीं तो पूरा शरीर खराब हो जाएगा और बात जान पर आ जाएगी।’

नारायण हंसने लगते हैं। कहते हैं, ‘तस्वीर रहती तो जरूर दिखाता। 1990 के आसपास की बात है, जब ये घटना घटी। घर की आर्थिक स्थिति इतनी बुरी थी कि खाना-पीना, रहना-सहना ठीक से हो जाए, यही बड़ी बात थी।

अब मेरे मां-बाप, घरवालों ने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि बिना हाथ-पैर का भी कोई आदमी हो सकता है। उनका सोचना था कि दोनों हाथ ही नहीं होंगे, तो कैसे कोई जी सकता है। वैसे भी गांव में जिनके बच्चे दिव्यांग होते थे, वो उन्हें बाहर ही नहीं निकलने देते थे। मेरे बारे में भी तरह-तरह की बातें होने लगी। लोग यह तक कहते कि जब हाथ ही नहीं रहेगा, तो ये जिंदा रहकर क्या करेगा। मम्मी-पापा का भी सोचना था कि अपाहिज होने से अच्छा था कि मैं मर जाता।

मुझे यह सब बातें आज भी याद है। सोचता था कि एक बच्चा जिसका हाथ कट गया है। लोग, परिवार वाले उसके बारे में क्या सोच रहे हैं।'  कहानी में आगे बढ़ते हैं, ‘कुछ सालों तक तो स्कूल भी छूट गया। पढ़ना-लिखना सब बंद। जब अपने साथ के बच्चों को स्कूल जाते देखता, तो मैं मां से कहता कि मुझे भी स्कूल जाना है। मां और मैं, दोनों रोने लगते।

जब मुझे लगा कि गांव में मैं नहीं पढ़ सकता हूं, तब एक रोज दिल्ली के लिए अकेले निकल पड़ा। इसी दौरान मेरी कुछ ऐसे लोगों से मुलाकात हुई, जो हमारी तरह के दिव्यांग बच्चों के लिए काम कर रहे थे।

उस दिन लगा कि दुनिया में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो हम जैसे बच्चों के बारे में अच्छा सोचते हैं। नहीं तो, पहले ऐसा लगता था कि यह दुनिया दिव्यांगों के लिए है ही नहीं। एक व्यक्ति की मदद से स्पेशल स्कूल में पढ़ने लगा। सारा काम खुद से करता। झाड़ू, पोंछा, खाना बनाना, लिखना-पढ़ना… सब कुछ। सारे काम को सीखने में एक-दो साल का समय लगा। इसी दौरान एक ऐसी लत लगी, जो आज तक है।'

मेरा मानना था कि यदि आज मैं किसी की चाय पीता हूं, तो कल को मुझे भी पिलाना पड़ेगी। नहीं तो वो उलाहना देगा। आप समझ सकते हैं कि 14 साल का लड़का 24 घंटे में एक बार खाता था, लेकिन आज मैं बड़े आनंद के साथ एक वक्त ही खाता हूं।’

नारायण कुछ देर रुकने के बाद कहते हैं, 'एक वाकया याद आ गया है। जानते हैं हाथ कटे होने की वजह से मुझे अपनी सगी बहन की शादी में नहीं ले जाया गया था।’

नारायण बताते हैं, ‘उस वक्त मैं दिल्ली से इलाहाबाद बैचलर की स्टडी के लिए शिफ्ट हो गया था। सगी बहन की शादी थी। तिलक का दिन, मुझे बोला गया कि शादी है। घर आ जाना। मैं गया। सभी लोग तिलक में जाने के लिए तैयार हो रहे थे, लेकिन मैं किसी भी बहाने न जाऊं, सभी लोग इसकी जुगत में थे।

अंत में मुझे समझ में आ गया कि ये सारे लोग बहाना बना रहे हैं कि मैं किसी भी तरह से तिलक में न जाऊं। मां से जब पूछा, तो वो फफक-फफककर रोने लगी। कहने लगी- सभी को डर है कि तुम्हारे दोनों हाथ न देखकर लड़के वाले रिश्ता करने से मना न कर दें।

फिर मां से कहा- 'जब नहीं ले जाना था तिलक में, शादी में, तो बुलाया ही क्यों था। मैं बैग उठाकर उसी वक्त यूनिवर्सिटी के लिए निकल पड़ा।’

कहां तक आपने पढ़ाई की?

नारायण के हाथ की उंगलियां भले न हो, लेकिन वो ऐसे अपनी डिग्री गिना रहे हैं, जैसे वो मुझे उंगली से गिनने के लिए कह रहे हों। वो कहते हैं, ‘मैं अच्छा खासा पढ़ा-लिखा हूं। बैचलर, मास्टर, डबल BEd, LLB… सब मैंने किया है।

मुझे लगा कि जब मेरे मां-बाप मुझे लेकर इतना सोच सकते हैं। मैं मर जाता, वो उनके लिए बेहतर होता, तो फिर अपने दम पर कुछ करना है, तो इसके लिए पढ़ना पड़ेगा।

2011 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित होने वाले 16 स्पेशल स्कूल में से एक में मुझे बतौर शिक्षक नियुक्त किया गया। मैं सोशल एक्टिविटी में भी हिस्सा लेने लगा। पढ़ाने के साथ-साथ दिव्यांग बच्चों के अधिकार लिए भी काम करने लगा।’

आपने शादी नहीं की?

‘की न, वो भी लव मैरिज। मैं दिव्यांग हूं, लेकिन मेरी पत्नी नॉर्मल है। दरअसल, 1999 से हम दोनों एक दूसरे को जानते हैं। 2004 के आसपास हमने शादी कर ली। इसमें भी घरवालों को एतराज था। लोगों का कहना था- अरे दिव्यांग होकर, दोनों हाथ नहीं है, फिर भी शादी कर रहा है।

मैं दिव्यांग बच्चों की शादी को लेकर भी कार्यक्रम करवाता हूं। दरअसल मैंने कई ऐसे मामले देखे हैं, जिसमें यदि किसी घर में दिव्यांग बच्चा पैदा हो जाता है, तो उसे बाहरी दुनिया दिखाया ही नहीं जाता है। पढ़े-लिखे लोग भी ऐसा करते हैं।’

कहते हैं, ‘एक एडवोकेट के घर में दिव्यांग बच्चा पैदा हुआ था। कई सालों तक तो किसी को पता भी नहीं चला कि उसके घर में कोई बच्चा है। एक बार मुझे सूचना मिली की उनके घर में एक बच्चा कैद है।

जब मैं वहां गया, तो जो उन्होंने बताया, वो शॉकिंग था। एडवोकेट का कहना था- मैं एडवोकेट हूं। इस तरह के बच्चे की वजह से मेरी छवि खराब हो जाएगी, इसलिए मैंने इसे कैद कर रखा था।

अब आप समझ सकते हैं कि दिव्यांग को लेकर सोसाइटी की क्या सोच है। मैंने एक ऐसे ही बच्चे को गोद ले रखा है।’

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