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टी-सीरीज चर्चा में क्योंकि टी-सीरीज प्रोडक्शन हाउस में बनी एनिमल ने 4 दिनों के भीतर 400 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई कर तोड़ा रिकॉर्ड, जूस से शुरू होती है टी-सीरीज की कहानी

भारत-पाकिस्तान का बंटवारा होता है और करोड़ों लोगों में एक पंजाबी परिवार भी दिल्ली आ जाता है। घर चलाने के लिए परिवार के मुखिया ने फल और जूस का बिजनेस शुरू कर दिया। काफी सालों बाद में इस घर में जन्मा एक बच्चा कैसेट बेचने लगाता है। इस बच्चे की शुरू की कंपनी आज इंडिया का लीडिंग म्यूजिक लेबल 'टी-सीरीज' है।

दरअसल, एक्टर रणबीर कपूर और रश्मिका मंधाना स्टारर मूवी एनिमल 1 दिसंबर को रिलीज हुई। एनिमल ने बॉक्स ऑफिस के रिकॉर्ड्स को धराशाई करते हुए 4 दिनों के भीतर 400 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई। एनिमल मूवी को बनाने वाला प्रोडक्शन हाउस टी-सीरीज है। इसके बाद से टी-सीरीज चर्चा में आ गई है।

  • पाकिस्तान से आए पंजाबी परिवार ने शुरू की दुकान

15 अगस्त 1947। देश आजाद होता है, बंटवारे का दंश सहन करते हुए। भारत-पाकिस्तान में दंगे शुरू होते हैं और लोग इधर-उधर जान बचाने के लिए भागने लगते हैं। पाकिस्तान के वेस्ट पंजाब के झांग प्रोविंस में चल रहे हिंदू-विरोधी दंगों की मार एक पंजाबी परिवार भी झेलता है। ये परिवार अपना घर-कारोबार छोड़ दिल्ली आ जाता है। परिवार के मुखिया का नाम था- चंद्रभान कुमार दुआ।

दिल्ली के दरियागंज इलाके में चंद्रभान सड़क पर चादर बिछाकर फल बेचना शुरू कर देते हैं। चंद्रभान दिन में जिस चादर को बिछाकर दिन में फल बेचते थे, उसी को रात में ओढ़ते थे। 5 मई 1956 को दुआ परिवार में एक बच्चा का जन्म होता है और नाम रखा जाता है- गुलशन कुमार दुआ। गुलशन भी आम छोटे व्यापारियों के बच्चों के जैसे ही बड़े होते हैं।

भाई और पिता को मना कैसेट्स का बिजनेस किया

गुलशन को गाना सुनना पसंद था। वो अपने पैसे बचा-बचाकर कैसेट्स खरीदते थे। वो अपने इस शौक को व्यापार में बदलने की सोचने लगे। गुलशन के पिता चंद्रभान म्यूजिक कैसेट्स के बिजनेस के लिए मान जाते हैं। इस काम में उनके छोटे भाई कृष्ण कुमार मदद करते हैं। इस तरह 23 साल के गुलशन अपने पिता की मदद से दरियागंज में रिकॉर्ड्स और ऑडियो कैसेट्स की दुकान खोलते हैं। धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगता है।

सरकार ने इंपोर्ट पॉलिसी बदली और गुलशन का व्यापार बढ़ा

1970 के दशक में टेप रिकॉर्डर को विदेश से लाना पड़ता था। साथ ही रिकॉर्ड्स बहुत मंहगे होते थे। इन दोनों ही कारणों से हिंदुस्तान में गानों का शौक केवल अमीरों तक ही रहा। लोअर और मिडिल क्लास इस शौक को करने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी।

सरकार की ओर से इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट के नियमों में बदलाव होते हैं। इसके बाद भारत में टेप रिकॉर्डर की आने लगते हैं और आम आदमी की बीच इनकी डिमांड बढ़ जाती है। अब जब टेप रिकॉर्डर देश आ गया उसे चलाने के लिए कैसेट की जरूरत होगी ही। गुलशन को ये बात समझ आ चुकी थी कि ​​​​​कैसेट्स को हर घर तक पहुंचाना फायदेमंद होगा। उन्होंने ग्राहक डिमांड के मुताबिक गानों की कैसेट बेचना शुरू किया।

गानों की पायरेसी कर कैसेट बेच मार्केट में जमाया सिक्का

1980 के दौर में देश में कॉपीराइट कानून में कुछ खामियां थीं। इन खामियों का फायदा उठाते हुए गुलशन ने फिल्मी गानों और भजनों की पायरेसी शुरू कर दी। इसके लिए वो गानों को अपने लिए रिकॉर्डिंग करते थे। इस तरह वो एक कैसेट से कॉपी कर कई कैसेट बना लेते थे।

इस काम में लगभग 7 रुपए लागत आती थी और मार्केट में ये कैसेट्स 25 रुपए तक बिकते थे। गुलशन की कैसेट्स की बंपर बिक्री हुई। मार्केट में गुलशन पर आरोप भी लगा कि वो गाने चोरी कर बेच रहे हैं, लेकिन गुलशन ने इस आरोप से इनकार कर दिया। गुलशन की कैसेट्स की बंपर बिक्री हुई। मार्केट में गुलशन पर आरोप भी लगा कि वो गाने चोरी कर बेच रहे हैं, लेकिन गुलशन ने इस आरोप से इनकार कर दिया।

गुलशन ने दुकान से आगे बढ़ कंपनी शुरू की और बस-ट्रेन में बिकने लगे कैसेट

साल 1983। 28 साल के यंग बिजनेसमैन गुलशन कुमार को लगने लगा था कि अब कैसेट रिकॉर्ड कर बेचने से आगे का सोचना चाहिए। उन्होंने अपनी कंपनी शुरू करने की सोची। इस तरह 11 जुलाई 1983 को सुपर कैसेट्स इंडस्ट्री नाम से कंपनी गुलशन शुरू कर दी। वो अपने कैसेट्स को बड़े स्तर पर मार्केट में उतारते हैं। सुपर कैसेट्स का नाम टी-सीरीज हो जाता है।

म्यूजिक इंडिया और ग्रामोफोन कंपनी ऑफ इंडिया जैसी कैसेट्स निर्माता कंपनियों के नियम का भी टी सीरीज कंपनी को बहुत फायदा हुआ। नियम मुताबिक यदि एक बार कैसेट्स रिटेलर या दुकानदार को बेच दिया गया तो उसके बाद कंपनी और कैसेट का कोई नाता नहीं होता था।

दरअसल, उस वक्त तक कैसेट्स को ट्रक और मैनुअली एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता था। इसके कारण कैसेट्स खराब और टूट जाते थे। साथ ही रील्स निकलकर उलझ जाती थी। इस वजह से टी-सीरीज ने रिटेलर्स और दुकानदारों को ऑफर दिया कि आप हमसे कैसेट्स ले जाइए, जितने बिकते हैं बेचिए, खराब हो जाए, तो वापस हमारा पास ले आइए। फायदा आपका, नुकसान हमारा।

  • गुलशन की यह ट्रिक काम कर गई और कंपनी ने सस्ते कैसेट बनाना शुरू कर दिया।

टी-सीरीज के इस जीरो लायबिलिटी मॉडल ने मार्केट में क्रांति ला दी। अब कंपनी ने अपने कैसेट्स किराने की दुकान से लेकर रेहड़ी-ठेले पर बेचना शुरू कर दिया। ट्रेन-बस और सड़क किनारे भी कंपनी के कैसेट्स बिकने लगे थे।

  • टी-सीरीज ने साउंडट्रैक रिकॉर्डिंग और प्रोडक्शन शुरू किया

कैसेट के बाद टी-सीरीज म्यूजिक प्रोडक्शन और रिकॉर्डिंग के बिजनेस में उतरी। कंपनी ने सबसे पहले 1984 में 'लल्लू राम' मूवी के लिए साउंड ट्रैक बनाए, जिसमें रवींद्र जैन ने संगीत दिया। इसके बाद टी-सीरीज ने 1988 में एक्टर आमिर खान और जूही चावला की 'कयामत से कयामत तक' मूवी के लिए साउंडट्रैक रिकॉर्ड किया। इस साउंडट्रैक के 80 लाख से ज्यादा कैसेट्स बिके, जो उस वक्त रिकॉर्ड बना।

1990 में महेश भट्ट के डायरेक्शन में 'आशिकी' मूवी बनती है। इसके लिए टी-सीरीज गाने रिकॉर्ड करती है। फिल्म के गानों ने मार्केट ने धूम माचा दी और इसके 2 करोड़ से ज्यादा कैसेट्स बिक गए।

कंपनी देशभर में सबसे ज्यादा साउंडट्रैक कैसेट्स का रिकॉर्ड बनाती है। इस समय के सबसे बड़े म्यूजिक लेबल सारेगामा को पीछे छोड़ आगे बढ़ जाती है। गुलशन 1992-93 में बॉलीवुड में सबसे ज्यादा टैक्स देने वाले व्यक्ति बन जाते हैं।

  • म्यूजिक रिकॉर्डिंग के साथ-साथ फिल्में बनाई

अब तक टी-सीरीज का म्यूजिक प्रोडक्शन हाउस इंडस्ट्री में बड़ा नाम बन चुका था। कंपनी ने फिल्म प्रोडक्शन में हाथ आजमाया। 1989 में टी-सीरीज अपने प्रोडक्शन हाउस की पहली फिल्म 'लाल दुपट्टा मलमल का' प्रोड्यूस करती है।

इसके बाद टी-सीरीज महेश भट्ट के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया। 1990 में आई फिल्म 'आशिकी' को टी-सीरीज को-प्रोड्यूस करती है। महेश भट्ट के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म बॉक्स ऑफिस में अच्छी कमाई की।

सफलता के साथ-साथ टी-सीरीज को असफलता का मुंह भी देखना पड़ा। कंपनी लगातार दो फ्लॉप फिल्में प्रोड्यूस करती है। इसके बाद 1995 में कंपनी एक और फ्लॉप फिल्म बनाती है। फिल्म का नाम- बेवफा सनम। गुलशन अपने छोटे भाई कृष्ण को इस फिल्म से लॉन्च करते हैं। ये फिल्म फ्लॉप हो जाती है, लेकिन इसका साउंडट्रैक दर्शकों को पसंद आता है।

  • टी-सीरीज ने शुरू की आर्टिस्ट स्पेशल कैसेट और भजन-मंत्रों की रिकॉर्डिंग

ग्राहकों की डिमांड में लगातार बदलाव आ रहा था। टी-सीरीज ने अलग-अलग आर्टिस्ट्स के कैसेट्स मार्केट में उतारे।

इस प्रयोग से कंपनी को फायदा हुआ। सोनू निगम, कुमार शानू, उदित नारायण, अनुराधा पौडवाल जैसे आर्टिस्ट भी रातों रात सुपरस्टार बन गए।

दरअसल, गुलशन कुमार का मानना था कि हर टैलेंट को मौका मिलना चाहिए। इस वजह से वो नए आर्टिस्ट को मौका देते थे। जब उन्हें लगता कि वो आर्टिस्ट सुपरस्टार बन गया, तब वो उसे छोड़ नए टैलेंट को खोजने लगते थे।

इसके बाद टी-सीरीज के सामने एक दिक्कत आती है कि कब तक फिल्मी गानों के कैसेट बिकेंगे। कभी न कभी ग्राहक भी इससे ऊब जाएंगे। इस सोच के साथ गुलशन ने भजन, चालीसा, मंत्र, धार्मिक पाठ, जैसी चीजों की रिकॉर्डिंग शुरू की।

गुलशन भगवान शिव और मां वैष्णों के भक्त थे। इस वजह से उन्होंने अपने बिजनेस को आस्था के साथ जोड़ा, भजन और मंत्र कैसेट्स निकाले और मुनाफा कमाया।

गुलशन की हत्या के बाद बेटे भूषण ने कमान संभाली

12 अगस्त 1997। गुलशन कुमार रोज की तरह मुंबई के जितेश्वर मंदिर से पूजा कर घर की ओर जा रहे थे। तभी कुछ लोग उन्हें रोकते हैं और उन पर तबड़तोड़ गोलियां बरसाते हैं। गुलशन को 16 गोलियां लगती हैं और उनकी मौत हो जाती है।

गुलशन की हत्या के पीछे उस वक्त के मुंबई अंडरवर्ल्ड का नाम सामने आता है।

गुलशन की हत्या के बाद टी-सीरीज को संभालने के लिए उनके बेटे भूषण कुमार आगे आते हैं। हांलाकि, भूषण को बिजनेस में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन उन्हें गाने पसंद थे।

भूषण कंपनी की कमान संभालते हैं और उनके चाचा कृष्ण कुमार बिजनेस में उनकी मदद करते हैं। इस वक्त तक कंपनी की सालाना आय 500 करोड़ रुपए के पार होती है।

2006 में भूषण ने टी-सीरीज का यूट्यूब चैनल शुरू करते हैं। इसके बाद 2010 में अपना पहला वीडियो अपलोड करते हैं। 10 सालों के अंदर टी-सीरीज का यूट्यूब चैनल दुनिया का सबसे ज्यादा बड़ा चैनल बन जाता है।

  • म्यूजिक के साथ-साथ यूट्यूब किंग बनने के 4 फैक्टर

टी-सीरीज के सबसे बड़ा म्यूजिक लेबल बनने के साथ-साथ यूट्यूब का सबसे बड़ा चैनल चलाता है। इस टैग को कायम रखने के लिए टी-सीरीज किसी भी गाने को यूट्यूब पर लॉन्च करने के पहले और बाद 4 काम करता है।

  1. हम टेस्टिंग- किसी भी गाने को लॉन्च करने से पहले उसकी हम टेस्टिंग की जाती है। इसमें देखा जाता है क्या गाने को गुनगुनाया जा सकता है।
  2. मेलोडी- हम टेस्टिंग के बाद ये चेक किया जाता है कि क्या गाना लोगों को पसंद आएगा और उसकी मेलोडी यानी धुन लोगों को याद रहेगी।
  3. ट्रेंड ट्रेसिंग- किसी गाने को लॉन्च करने से पहले टी-सीरीज पिछले 3 महीने के ट्रेंड का एनालिसिस करता है। जो ट्रेंड उस वक्त चल रहा होता है। उसी के जैसा गाना लॉन्च किया जाता है।
  4. फीडबैक- गाने के लॉन्च होने के बाद कंपनी लोगों से फीडबैक लेती है। साथ ही फीडबैक के मुताबिक अगले प्रोडक्ट को इम्प्रोव करती है।

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