मां-बाप से बिछड़ने का अनुभव आज तक नहीं भूल पाईं डॉ. किरण मोदी की 15 हजार से ज्यादा लड़कियों को पढ़ाया, सभी हैं आत्मनिर्भर
नई दिल्ली/ एक बच्चे का मां-बाप से बिछड़ने का दर्द, वही शख्स समझ सकता है जिसने इस खौफनाक घटना को झेला हो। गुरुग्राम की रहने वालीं डॉ. किरण मोदी के अतीत में भी कुछ ऐसा हादसा हुआ था जिसमें कुछ घंटों के लिए वह अपने मां-बाबूजी से बिछड़ गई हैं और उस अनुभव को वो आज तक नहीं भूल पाईं।
बचपन की उस घटना ने उन्हें इतना डरा दिया कि उनकी रातों की नींद तक उड़ गई। जब किरण बड़ी हुईं, तब उन्होंने ऐसे ही माता-पिता से बिछड़े बच्चों के लिए ‘उदयन केयर’ ट्रस्ट बनाई जिसके तहत 14 उदयन होम, 4 राज्यों में 4 आफ्टर होम और 13 राज्यों के 34 शहरों में उदयन शालिनी प्रोग्राम चल रहा है। बच्चे उन्हें प्यार से ‘बुआ’ पुकारते हैं।
हुगली में गंगा किनारे बिछड़ी माँ बाप से
मेरा बचपन कोलकाता में बीता। हम अक्सर शाम को हुगली में गंगा किनारे घूमने निकल जाते। वहां भीड़ भी बहुत होती। जब मैं 8 साल की थी, तब एक बार उसी जगह भीड़ के कारण मेरा हाथ मां-बाबूजी से छूट गया और मैं उनसे बिछड़ गई। मैं खूब रो रही थी, लोगों से डर रही थी। मां-बाबूजी पुकार रही थी लेकिन मेरी आवाज उन तक नहीं पहुंच रही थी। आखिरकार पुलिस ने मुझे अकेला देखा और अपने साथ पुलिस स्टेशन ले गई ताकि अगर पेरेंट्स ढूंढने आएंगे तो वो मुझे उन्हें सौंप देंगे।
हुआ भी कुछ ऐसा ही। मैं बहुत खुशनसीब हूं कि मेरे पेरेंट्स 1 घंटे के बाद मुझे ढूंढते हुए पुलिस स्टेशन पहुंचे। मैं उनके गले ऐसे लगी जैसे मुझे मेरे भगवान मिल गए हों लेकिन जिंदगी का वो 1 घंटा मेरे लिए किसी भयानक सपने से कम नहीं था। उस घटना ने मेरे दिलों-दिमाग पर ऐसा असर डाला था कि मैं रात को सोते हुए अचानक जग जाती। मुझे घबराहट होती कि कहीं पेरेंट्स मुझसे कहीं दोबारा न बिछड़ जाएं।
युद्ध पीड़ितों के लिए जुटाया फंड
मैंने 8 से 15 साल की उम्र ऐसे कई काम किए जिससे दूसरों का भला कर सकूं। मुझे सोशल वर्क के बारे में उस समय कुछ पता नहीं था लेकिन देश के लिए बहुत कुछ करना चाहती थी।
जब भारत का पाकिस्तान और चीन के साथ युद्ध हुआ तो उस समय बाकी देशवासियों की तरह मैं भी वहां की पल-पल की जानकारी रखती थी। मेरे मन में आया कि मैं युद्ध से प्रभावित हुए इलाकों में रहने वाले लोगों की मदद करूं। तो मैंने लॉटरी सिस्टम से फंड जुटाया और उन पैसों को पं.बंगाल के मुख्यमंत्री तक पहुंचाया।
खोली लाइब्रेरी
हमारे घर पर एक होम हेल्प थी जिसकी बेटियां थीं। मैं तब सिर्फ 9 साल की थी औऱ उस उम्र में भी मुझे ये बुरा लगता कि मैं पढ़ती हूं और वो बच्चियां नहीं पढ़ सकती हैं। ये देखकर मैंने पेरेंट्स से कहा कि मैं चाहती हूं कि ये बच्चियां भी मेरी तरह पढ़ें।
वहीं जब मैं छोटी थी तो ना टीवी था और ना पेरेंट्स बच्चों को खिलौने दिलाते थे। उस जमाने में एंटरटेनमेंट का कोई साधन नहीं होता था तो मैंने सोचा कि क्यों ना मैं अपनी ही बिल्डिंग में एक लाइब्रेरी बनाऊं। मैंने पापा से एक रूम मांगा, जहां मैं किताबें रखूं और जो बच्चे किताबें नहीं खरीद सकते, वो वहां आकर किताबें पढ़ें।
पापा ने रूम दिया तो मैंने लाइब्रेरी बना ली जिसे रोज शाम 2 घंटे तक खोलती थी। मुझे यह देख बहुत खुशी मिलती थी कि मेरी मेहनत रंग लाई और पूरी बिल्डिंग के बच्चों को एक लाइब्रेरी मिली जहां उन्हें किताबें पढ़ने का मौका मिला।
अखबार शुरू कर उठाए कम्युनिटी के मुद्दे
शादी के बाद मैं हाउसवाइफ थी लेकिन मेरी पढ़ाई लगातार जारी रही। मैंने आईआईटी दिल्ली से अमेरिकन लिट्रेचर में पीएचडी की है। कुछ समय के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी के अरबिंदो कॉलेज में बतौर इंग्लिश प्रोफेसर काम भी किया। लेकिन टीचिंग में मुझे मजा नहीं आया। तभी अखबार का ख्याल आया क्योंकि उस समय ऐसा कोई अखबार नहीं था जो अपने आस-पड़ोस की खबरों को छापता हो।
1983 में ‘नेबरहुड स्टार’ नाम से अखबार शुरू किया। दरअसल यह एक तरह की कम्युनिटी सर्विस थी। इसमें मैं दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में उनकी लोकल समस्याएं बतातीं। कहां लाइट नहीं है, कहां सड़क टूटी है, कहां नई दुकान खुली है?
मैं सोचती थी कि लोगों को अपने इलाके के बारे में जानकारी होनी चाहिए। वह भी इस बारे में सोचें कि उन्हें अपना पड़ोस कैसे अच्छा और सेफ बनाना है। इसकी करीब 10 हजार कॉपी छपती थीं। लेकिन 1994 में जब मैंने ‘उदयन केयर’ शुरू किया तो उसके साथ अखबार को जारी रखना मुश्किल था इसलिए मैंने उसे बंद कर दिया।
बेटे के नाम पर खोली एनजीओ
मैंने अपने 21 साल के बेटे को खोने के बाद ही एनजीओ खोली। वह स्टूडेंट था, साथ में पार्ट टाइम जो कमाता था, उन पैसों में से कुछ हिस्सा अफ्रीका में जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई के लिए डोनेट करता था। मुझे यह बात एक डॉक्यूमेंट पढ़ने के बाद पता चली। मैं उस समय हैरान हो गई और सोच रही थी कि उसने इतनी कम उम्र में इतनी बड़ी सोच रखी, मैं ऐसा क्यों नहीं सोच पाई।
मैंने बेटे के नाम पर तुरंत उदयन केयर ट्रस्ट बनाई। लेकिन मैं बच्चों के लिए क्या कर पाऊंगी, मुझे यह समझने में 1 साल लग गया। मैं कई एनजीओ गई, कई तरह के नोबल कॉज देखे लेकिन हर बार मुझे अपने माता-पिता से अलगाव याद आता था।
लगा कि मुझे पेरेंट्स से बिछड़े बच्चों के लिए ही काम करना चाहिए, क्योंकि उनके जैसा दर्द मैं महसूस कर चुकी हूं। मैंने खुद अनाथ आश्रमों के चक्कर लगाए। एक आश्रम में एक बच्चे ने मेरे कपड़े पकड़े और कहा मुझे अपने साथ ले चलो। उस पल को मैं भूल नहीं सकती।
मेंटर मदर बनकर बच्चों को दिया आशियाना
मैंने 1996 में उदयन होम की शुरुआत की जिसमें पेरेंट्स से बिछड़े या जिनके पेरेंट्स नहीं हैं, उन बच्चों को रखा जाता है। इसमें बच्चों की हर जरूरत को पूरा किया जाता है। इसमें वॉर्डन, सुप्रीडेंटेंट, काउंसलर के साथ ही मेंटर मदर और मेंटर फादर भी हैं जो वॉलंटियर करते हैं। ये 29 लोग 52 से 85 उम्र के हैं जो इन बच्चों के लिए जीवनभर के लिए पेरेंट्स बनकर उनसे जुड़ते हैं। अब तक इसमें 2 हजार बच्चे आ चुके हैं।
दरअसल, पेरेंटिंग एक दिन का काम नहीं है। अगर आप 1 बार बच्चे के साथ जुड़ते हैं तो यह रिश्ता ताउम्र निभाना पड़ता है। उद्यम होम में 18 साल की उम्र तक के बच्चे रहते हैं। बच्चा कभी अलगाव महसूस ना करे और उसके पालन-पोषण में कोई कमी ना रह जाए इसलिए मैंने मेंटर पेरेंट्स का कॉन्सेप्ट शुरू किया ताकि उन्हें पर्सनल केयर मिले।
बेघर बच्चों के मन को छुएं
मैंने टीम के सहयोग से उद्यम होम तैयार किया लेकिन कुछ समय तक हमें कोई बच्चा नहीं मिला। उस जमाने में चाइल्ड वेलफेयर कमिटी थी लेकिन पुलिस भी बेसहारा बच्चे को एनजीओ में सौंप सकती थी।
एक रात करीब 8 बजे रेलवे पुलिस का मेरे पास फोन आया कि उन्हें रेलवे स्टेशन पर 8 साल की बच्ची मिली है। आप इसको लेकर जाइए। उस दिन मैं बहुत एक्साइटेड थी कि उदयन केयर को अपना पहला बच्चा मिलेगा।
उस लड़की का नाम बबली था। मैं उसका चेहरा कभी नहीं भूल सकती। उसके चेहरे पर धूल लगी हुई थी और आंखों से आंसू बह रहे थे। आंसू बहने से उसके गालों पर अलग से निशान पड़ गए थे। उसे देखते ही मैंने कसकर गले लगा लिया लेकिन उसने मुझे तेजी से धक्का दिया और चिल्लाने लगी। मुझे समझ ही नहीं आया कि इसे क्या हुआ है। मैं उसे अपने साथ लेकर तो आ गई लेकिन वह किसी से बात नहीं कर रही थी।
मैंने इस घटना का जिक्र मनोचिकित्सक से किया तो उन्होंने मुझे बताया कि आप ये सोचिए कि इस बच्ची को किस-किस तरह के धोखे मिले होंगे। वह किन हालातों का सामना करते हुए यहां तक पहुंची होगी। ट्रेन में वह बच्ची घबराई होगी, कुछ लोगों ने उसके साथ गलत भी किया होगा तो वह कैसे आपका विश्वास करेगी?
तब मुझे समझ आया कि ऐसे बच्चे को तुरंत नहीं छूना चाहिए। सबसे पहले उनका विश्वास जीतना चाहिए। यह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक था।
लड़कियों के एजुकेशन पर दिया ध्यान
हमारे उदयन होम में एक महिला काम करती थी। उन्होंने एक दिन मुझसे कहा कि ‘काश मैं मर ही जाती। मैंने कहा कि ऐसा क्यों कह रही हैं? इस पर उनके जवाब ने मुझे हैरान कर दिया।
उनका कहना था कि अगर मैं मर जाती हूं तो मेरे बच्चों को उदयन केयर ले लेगा और वो पढ़-लिखकर कुछ बन जाएंगे। मैं तो उनके लिए कुछ कर नहीं पा रही हूं।’ उनकी बात सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ।
तब मैंने सोचा कि जिन बच्चों के पेरेंट्स हैं लेकिन वह उनके लिए कुछ कर नहीं पा रहे हैं तो मुझे ऐसे बच्चों की एजुकेशन के लिए कुछ करना चाहिए।
हमने गर्ल एजुकेशन को बढ़ावा देने के लिए 2002 में उदयन शालिनी फेलोशिप प्रोग्राम बनाया। पूरे भारत से इस प्रोग्राम में 15 हजार से ज्यादा लड़कियों को पढ़ाया जा रहा है। हमारी बच्चियां आज हर फील्ड में काम कर रही हैं।

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