नई दिल्ली/ शेरवानी पहने, सिर पर सेहरा बांधे, घोड़े पर सवार होकर निकला युवकों का काफिला। सजे-धजे घोड़े और साथ में बैंड बाजा पर यह बारात नहीं है। ये ‘बैचलर्स मार्च’ है जो महाराष्ट्र के सोलापुर के कुंवारों ने निकला। जिसने यह जुलूस देखा वो अचरज में पड़ गया।
काफिले में शामिल 50 लड़के कोल्हापुर कलेक्ट्रेट में यह अर्जी देने पहुंचे थे कि उनकी शादी नहीं हो रही है क्योंकि शादी के लिए लड़कियां नहीं मिल रहीं। कई लड़कों की यह शिकायत भी थी कि लड़कियां उन्हें रेजेक्ट कर दे रही हैं।
इसी तरह कर्नाटक के मांड्या जिले में मार्च 2023 में 'ब्रह्मचारीगलु पदयात्रा' निकाली गई। 60 युवक 120 किमी की पैदल यात्रा करके महादेश्वर मंदिर पहुंचे यह कामना करने के लिए कि उन्हें लाइफ पार्टनर मिल जाए। मांड्या जिले में दिसंबर में फिर से 'ब्रह्मचारीगलु पदयात्रा' निकालने की तैयारी चल रही है।
बिना नौकरी लड़की क्यों ब्याहेगा कोई
इस यात्रा के निकालने के पीछे क्या पब्लिशिटी स्टंट है या इसके गहरे सामाजिक आर्थिक पहलू भी हैं? कर्नाटक यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और सेंटर फॉर वुमन स्टडीज की डायरेक्टर डॉ. संगीता माने बताती हैं कि ऐसी घटनाएं केवल मांड्या और सोलापुर में ही नहीं हो रही हैं।
देश के अलग-अलग इलाकों में बैचलर्स मार्च निकलते हैं। इसका कारण यह है कि शादी योग्य लड़कों के पास ढंग की नौकरी नहीं है। मांड्या जिले में गन्ने की भरपूर खेती होती है। यहां की मिट्टी काफी उपजाऊ है। लेकिन खेती-किसानी घाटे का सौदा बन चुका है।
किसानों को गन्ने का सही रेट नहीं मिल रहा। लड़कियों के माता-पिता खेती करने वाले लड़कों को अपनी बेटी नहीं देना चाहते। क्योंकि खेती की कमाई से गृहस्थी चलाना मुश्किल है।
30 लड़कियों ने किया मना
मांड्या में बैचलर्स मार्च में शामिल रहे कृष्णा बताते हैं कि शादी के लिए उन्होंने कई बार प्रयास किया। पिछले कुछ सालों में 30 लड़कियों ने उन्हें रेजेक्ट कर चुकी हैं।
लड़कियों के पेरेंट्स घर परिवार देखते हैं। मेरे पास खेती-बाड़ी की जमीन कम है। फसलें अधिक नहीं होतीं इसलिए कमाई भी कम होती है।
मांड्या के एक्टिविस्ट नागरेवक्का बताते हैं कि लड़कियां पढ़-लिख रही हैं। अपना सुख-दुख जानती, समझती हैं। वो मांड्या में एक गांव से दूसरे गांव ब्याहता के रूप में नहीं जाना चाहतीं।
दरअसल, पढ़ी लिखीं लड़कियां किसान नौजवानों से शादी करने से हिचकिचाती हैं। देश के किसानों के हालात इन लड़कियों से छिपे नहीं हैं और पढ़ने लिखने के लिए खेती-किसानी में रुचि नहीं रखते।
बीए-एमए करने के बाद भी लड़के भटक रहे
महाराष्ट्र के सोलापुर में कुंवारों लड़कों का जुलूस निकालने वाले ‘ज्योति क्रांति परिषद’ के प्रदेश अध्यक्ष रमेश बरासकर बताते हैं कि लड़के ग्रेजुएएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद भी बेरोजगार रहते हैं।
महाराष्ट्र के किसी गांव में चले जाएं तो वहां 25-30 वर्ष के लड़के शादी की बाट जोहते मिल जाएंगे। हर गांव में 100 से 150 लड़के अविवाहित हैं।
शादी के लिए वे कई बार दलालों के चंगुल में भी फंस जाते हैं। दलाल उन्हें झूठा आश्वासन देकर पैसे ऐंठ लेते हैं लेकिन दुल्हन नहीं मिलती।
रमेश बताते हैं कि लड़कों के कुंवारे रहने के साइड इफेक्ट भी देखने को मिल रहे हैं। कई लड़के ड्रग्स लेने के आदी हो जाते हैं। शादी नहीं होने से फैमिली नहीं बनती। जिम्मेदारियां नहीं होंती और कई गलत रास्तों पर भी निकल जाते हैं।
हरियाणा की तरह इन इलाकों में भी लिंगानुपात कम
हरियाणा में स्त्री-पुरुष अनुपात कम होने के कारण ही वहां कई लोग शादी करने के लिए लड़कियां खरीदते हैं। बिहार-झारखंड, बंगाल और नेपाल से लड़कियों की तस्करी की मुख्य वजह यही है।
अब तो हरियाणा के कुंवारे लड़के 3,000 किमी दूर केरल में अपनी दुल्हनियां तलाश रहे हैं। केरल के पयानुर की 100 से अधिक लड़कियों की शादी हरियाणा के हिसार के परिवारों के लड़कों से हुई है।
पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के वुमंस स्टडीज एंड डेवलपमेंट डिपार्टमेंट की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अमीर सुलताना बताती हैं कि ये लड़के भाषा, जाति, संस्कृति के बंधनों को तोड़ रहे हैं। लेकिन इस समस्या की जड़ लिंगानुपात है।
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और देश के कई इलाके ऐसे हैं जहां हरियाणा की तरह ही सेक्स रेशियो कम है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS)-5 की रिपोर्ट (2019-21) के अनुसार, 1,000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या 1,024 हो गई है लेकिन कुछ राज्यों की स्थिति में बहुत सुधार देखने को नहीं मिला।
महाराष्ट्र में 2015 में लिंगानुपात 924 था जो घटकर 2021 में 913 रह गया है। वहीं हरियाणा में 893, कर्नाटक में 978, आंध्र प्रदेश में 934, राजस्थान में 891, तेलंगाना में 894 है।
यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद में सेंटर फॉर वुमंस स्टडीज की प्रोफेसर के सुनीता रानी भी डॉ. सुल्ताना की राय से सहमत हैं।
वह बताती हैं कि घटते लिंगानुपात की वजह से लड़कों को शादी के लिए लड़कियां नहीं मिल रही। लिंगानुपात के सुधार की बात करने के बावजूद किसी जिले या किसी खास इलाके में सेक्स रेशियो अगर डगमगाया हुआ है तो यह उस इलाके लड़कों के समस्या है।
1994 में लिंग परीक्षण को बैन किया गया जिससे गर्भ में पल रही लाखों लड़कियों को बचाया जा सका। लेकिन दुर्भाग्य से कानून बनने के बाद आज भी कुछ लोग यह जानना चाहते हैं कि गर्भ में पल रहा बच्चा लड़का है या लड़की?
1996 में पहली बार प्री नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक (रेगुलेशन एंड प्रिवेंशन ऑफ मिसयूज) एक्ट को लागू किया गया। 2003 में PC-PNDT एक्ट यानी Prohibition of Sex Selection एक्ट लागू होने के बाद यह कानून और सख्त बनाया गया।
इसके बावजूद लिंग परीक्षण अभी भी जारी है। PC-PNDT में दोषी पाए जाने के कारण 2003 से 2014 के बीच 206 डॉक्टरों को कोर्ट से सजा मिली।
इसमें सबसे अधिक 96 डॉक्टर महाराष्ट्र के हैं। इसके बाद राजस्थान, पंजाब और हरियाणा के डॉक्टर आते हैं। ये वही राज्य हैं जहां लिंगानुपात कम हैं और जहां शादी योग्य लड़कों को लड़कियां नहीं मिल रहीं।

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