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पेट की बात सुनेंगे तो रहोगे हेल्दी, दिमाग और पेट आपस में बात कर बीमारी से सावधान रहने को कहते हैं

नई दिल्ली/ जब व्यक्ति किसी बात को लेकर परेशान या स्ट्रेस महसूस करता है जैसे एग्जाम या इंटरव्यू के लिए जाना हो, तो अक्सर पेट खराब हो जाता है। पेट में दर्द या मरोड़ महसूस होता है। समझने के लिए अगर आसान भाषा में कहें तो यही दिमाग और पेट की दोस्ती कहलाती है। दिमाग और पेट के बीच होने वाली बातें भी यही हैं।

दिमाग और पेट के बीच ऐसी बातचीत रोज की रुटीन है। मूड अच्छा है, कोई टेंशन नहीं है तो जब दिमाग सिग्नल देता है तो पेट खाने को तैयारी हो जाता है। जब दिल और दिमाग परेशान हैं सामने खाने को कुछ अच्छा रखा भी हो तो पेट खाना नहीं चाहता। क्योंकि पेट की चाहत ब्रेन की स्थिति पर निर्भर है। टेंशन में पेट दर्द होना और टेंशन फ्री होने पर जमकर खाना, यही पेट और दिमाग का रिश्ता कहलाता है। इसे मेडिकल भाषा में गट-ब्रेन कनेक्शन कहते हैं।

पेट की बात सुनेंगे तो रहोगे हेल्दी, दिमाग और पेट आपस में बात कर बीमारी से सावधान रहने को कहते हैं 

सर गंगाराम अस्पताल, दिल्ली में न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अंशु रस्तोगी बताते हैं कि इस कम्युनिकेशन सिस्टम को मेडिकल साइंस में गट-ब्रेन एक्सिस (Gut-Brain Axis) कहते हैं। स्टडीज में पाया गया है कि दिमाग पेट को और पेट मेंटल हेल्थ यानी दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

दिमाग-पेट के बीच का कम्युनिकेशन नेटवर्क कैसे करता काम

गट-ब्रेन एक्सिस पेट और दिमाग को एक-दूसरे से जोड़ने वाला नेटवर्क है। दिमाग फिजिकली और बायोकेमिकली रूप से पेट से जुड़ा हुआ है।

ब्रेन में न्यूरॉन सेल्स और सेंट्रल नर्वस सिस्टम होता है, जो शरीर को बताता है कि कैसे काम करना है? ह्यूमन ब्रेन में 10 हजार करोड़ न्यूरॉन्स होते हैं। यह एक तरह से शरीर में पोस्टमैन की भूमिका निभाते हैं। यह ब्रेन से शरीर के बाकी हिस्सों तक सूचनाएं पहुंचाते हैं।


वेगस नर्वः दिमाग और पेट के बीच का पुल

मजेदार बात है कि आंत में भी 50 करोड़ न्यूरॉन्स होते हैं जो दिमाग के नर्वस सिस्टम से जुड़े हैं। वेगस नर्व सबसे बड़ी नर्व है जो दिमाग को पेट से जोड़ती है। यह एक केबल वायर या पुल के माफिक काम करता है। वेगस नर्व के जरिए ब्रेन और पेट के बीच सिग्नल आते-जाते हैं।

व्यक्ति का पेट और दिगाम तमाम तरह के केमिकल्स के जरिये भी जुड़े हुए होते हैं जिन्हें न्यूरोट्रांसमीटर्स कहा जाता है। न्यूरोट्रांसमीटर्स दिमाग में पैदा होते हैं। व्यक्ति की फीलिंग्स इन्हीं से कंट्रोल होती हैं। जैसे सेरोटोनिन नाम का न्यूरोट्रांसमीटर इंसान को खुश बनाता है। यह बॉडी क्लॉक को भी कंट्रोल करता है।

दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई न्यूरोट्रांसमीटर आंत की कोशिकाओं और वहां रहने वाले खरबों माइक्रोब्स से बनते हैं। सेरोटोनिन हॉर्मोन का एक बड़ा हिस्सा आंत में बनता है।

पेट व्यक्ति को कैसे तनावग्रस्त होने से बचाता है

गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. अनिल अरोड़ा ने बताया कि पेट में माइक्रोब्स गामा-एमिनोब्यूरिक एसिड (GABA) नाम के न्यूरो ट्रांसमीटर बनते हैं जो डर और डिप्रेशन को कंट्रोल करते हैं।

चूहों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि कुछ प्रोब्योटिक्स गामा-एमिनोब्यूरिक एसिड का प्रोडक्शन बढ़ा देते हैं। जिससे एंग्जाइटी और डिप्रेशन कम होने लगता है।

इंसान के पेट में खरबों की संख्या में माइक्रोब्स होते हैं, जिनसे अन्य केमिकल्स बनते हैं और इससे इंसान का दिमाग प्रभावित होता है।

गट माइक्रोब्स से बहुत से शॉर्ट-चेन फैटी एसिड्स (SCFA) पैदा होते हैं। यह डाइजेस्टिंग फाइबर से बने होते हैं। भूख कम करके ये एसिड दिमाग को प्रभावित कर सकते हैं।

मेडिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर व्यक्ति किसी तनाव का सामना कर रहा है तो वो वेगस नर्व के जरिए आने-जाने वाले सिग्नल में बाधा पैदा करता है। यही गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट यानी पेट की बीमारियों की वजह बनता है।

सेंटर फॉर न्यूरोइंटेस्टाइनल, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने आंत-मस्तिष्क के कनेक्शन को समझने की कोशिश की।

मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल (एमजीएच) में सेंटर फॉर न्यूरोइंटेस्टाइनल हेल्थ के सह-कार्यकारी निदेशक और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में मेडिसिन के असिस्टेंट प्रोफेसर ब्रैडेन कुओ कहते हैं, ‘ पेट और दिमाग के इन दो बड़े नर्व सेंटरों के बीच खूब बात होती है। दोनों अंगों के बीच इन्हीं बातचीत में बाधा आने की वजह से व्यक्ति गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल लक्षणों को महसूस करता है।’

पेट सेकेंड ब्रेन लेकिन फैसला दिमाग लेता है

डॉ. अंशु रस्तोगी कहते हैं कि सेकेंड ब्रेन कहा जाने वाला पेट सूचनाओं को प्रोसेस नहीं करता। वह सिर्फ अपनी बात दिमाग तक पहुंचा देता है। उस पर एक्शन लेने का काम ब्रेन करता है।

जैसे मान लीजिए हमने किसी दुकान पर समोसा खा लिया और उससे पेट खराब हो गया तो, दिमाग यह फैसला करता है कि अब हमें अमुक दुकान से समोसा नहीं खाना है या आगे से समोसा नहीं खाएंगे।

मतलब जब भी हम कुछ खाकर बीमार पड़ते हैं तो परहेज करने का फैसला दिमाग करता है।

याद रहे सोच समझकर सही खाना है और दिमाग की परेशानियों को पेट तक नहीं पहुंचाना है। यानी जैसा खाएं अन्न, वैसा होए मन।

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