SBI की नौकरी छोड़, बने किसान, अब लोग कहते हैं हेलिकॉप्टर वाला किसान; कंपनी का सालाना टर्नओवर 25 करोड़ से अधिक
एक व्यक्ति हैं, जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया यानी SBI में बड़े पद पर काम करते थे। अच्छी-भली नौकरी छोड़कर किसान बन गए। वह हैं राजाराम त्रिपाठी, अब काली मिर्च और हर्बल प्रोडक्ट की खेती करते हैं। उन्होंने खेती-किसानी के लिए 7 करोड़ का हेलिकॉप्टर भी खरीदा है। लोग उन्हें 'हेलिकॉप्टर वाले किसान' के नाम से जानते हैं। बाकायदा उन्होंने एक कंपनी बना रखी है, जिसका सालाना टर्नओवर 25 करोड़ से अधिक है। बस्तर संभाग का जिला है कोंडागांव, जो जंगल और जमीन के बीच नक्सलियों के लिए जाना जाता है। यही वो जगह है, जहां 2013 में कांग्रेस के बड़े नेताओं समेत कुल 32 लोगों को नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया था।
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| SBI की नौकरी छोड़, बने किसान, अब लोग कहते हैं हेलिकॉप्टर वाला किसान; कंपनी का सालाना टर्नओवर 25 करोड़ से अधिक |
जिला मुख्यालय से तकरीबन 4 किलोमीटर दूर ‘मां दन्तेश्वरी देवी हर्बल ग्रुप’ का ऑफिस है। अंदर घुसते ही मेरी मुलाकात 50 साल के डॉ. राजाराम त्रिपाठी से होती है। राजाराम त्रिपाठी ही हेलिकॉप्टर वाले किसान हैं.
‘किसान का नाम सुनते ही लोगों को लगता है कि कोई फटेहाल मिलेगा, जिसके पजामे में दो-चार पैबंद लगे होंगे। साथ में खुरपी, कुदाल रखा होगा। जब लोग मुझसे मिलते हैं, तो चौंक जाते हैं।’
राजाराम त्रिपाठी कहते हैं, ‘डॉक्यूमेंटेशन प्रोसेस लगभग पूरा हो चुका है। हेलिकॉप्टर को आने में अभी 22 महीने लगेंगे। दिल्ली की एक कंपनी इसे डिजाइन कर रही है। हम कोई चुनाव लड़ने के लिए नहीं, खेती करने के लिए इसे ले रहे हैं। इसलिए हेलिकॉप्टर के मूल स्ट्रक्चर में थोड़ा-बहुत बदलाव करना होगा। इसमें 7 करोड़ की लागत आई है। अब 300 फीट ऊपर से दवा छिड़कना है, तो कैसे होगा। उसके लिए तो हेलिकॉप्टर चाहिए ही…। ये इंडिया के लिए नई बात हो सकती है, विदेशों में तो पुराना ट्रेंड है। आप ही बताएं। क्यों, कोई किसान हेलिकॉप्टर नहीं खरीद सकता है।
2008-09 की बात है। कई देशों में ऑर्गेनिक फार्मिंग पर लेक्चर देने के लिए जाता रहता हूं। इसी सिलसिले में हॉलैंड गया था। वहां मैंने पहली बार हेलिकॉप्टर से खेती करते हुए किसानों को देखा। वहां से लौटकर आने के बाद मुझे लगा कि हेलिकॉप्टर से खेती अपने यहां भी होनी चाहिए। कैसे इसे संभव कर पाऊं, मैं इसकी प्लानिंग करने लगा।
आपने तो PhD भी की है?
'हां, बिल्कुल। कोई PhD होल्डर किसान नहीं हो सकता है क्या?
आप बस्तर से हैं?
त्रिपाठी कहते हैं, ‘नहीं नहीं, हम लोग तो उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के रहने वाले हैं, लेकिन अब आप बस्तर का ही मान सकते हैं। हम तीन पीढ़ी से यहां हैं।’
डॉ. त्रिपाठी परिवार के प्रतापगढ़ से बस्तर शिफ्ट होने का दिलचस्प किस्सा बताते हैं। कहते हैं, ‘वर्ल्ड वॉर-2 की बात है। दादा एक छोटे किसान थे। लड़ाई लड़ रही फौज के खाने के लिए सब्जी का प्लांट अंग्रेजों ने फैजाबाद में लगाया था। दादा को अंग्रेजों ने उन्नत किस्म के बीज देकर खेती करने को कहा। उन्होंने खेती की। फसल अच्छी हुई।
जब अंग्रेज ये जंग जीत गए, तो उन्होंने कलकत्ता (अब कोलकाता) में सम्मान के लिए दादा को भी बुलाया। इसी दौरान बस्तर के राजा से दादा की मुलाकात हुई। उन्होंने दादा को बस्तर बुला लिया। पहले दादा ने 5 एकड़ जमीन खरीदकर खेती करनी शुरू की। फिर यहां से हमारे खेती करने की शुरुआत हुई।’
अब हम लोग फार्म हाउस की तरफ बढ़ रहे हैं। रास्ते में त्रिपाठी अपनी कहानी सुनाते जा रहे हैं। कहते हैं, ‘बड़ी फैमिली थी। पापा टीचर होने के साथ-साथ खेती करते थे, लेकिन फिर भी आर्थिक तंगी बनी रहती थी। सबसे ज्यादा दिक्कत हमारे यहां पानी की थी। सात किलोमीटर दूर पैदल चलकर पानी लाने जाते थे।
7 साल की उम्र से ही मैं खेती में घरवालों का हाथ बंटाने लगा था। इसके साथ-साथ 26 किलोमीटर साइकिल चलाकर स्कूल-कॉलेज भी जाता था। अभी आप मुझसे PhD करने के बारे में पूछ रहे थे न !
यदि मुझे स्कूलिंग के दौरान 100 रुपए की स्कॉलरशिप नहीं मिलती, तो मेरी आगे की पढ़ाई ही छूट जाती। शायद मैं डॉक्टर नहीं कहलाता। PhD नहीं कर पाता। बाद में पढ़ाई के पैसे के लिए ट्यूशन पढ़ाना भी शुरू कर दिया।
एक चीज मुझे अक्सर परेशान करती थी। वो ये कि घर में हमेशा से देखता था कि अच्छी-खासी खेती हो रही है, फिर भी कर्ज चुकाने के लिए एक और कर्ज लेना पड़ रहा है। मैं हमेशा सोचता था कि इतनी अच्छी खेती होने के बावजूद भी हम क्यों नहीं ग्रो कर पा रहे हैं।
बाद में इसकी वजह पता चली कि हमें वो खेती नहीं करनी चाहिए, जो पूरी दुनिया कर रही है। आप ही बताइए न ! यदि टमाटर का सीजन होगा, तो पूरे खेत में और मार्केट में टमाटर, टमाटर ही दिखेगा। गोभी का सीजन होगा, तो भी यही हाल… तो फिर कहां से किसानों को मुनाफा होगा।
जो खेती हम कर रहे हैं, वही बाकी किसान भी कर रहे हैं। जो प्रोडक्ट लेकर हम मार्केट में जा रहे हैं, वही प्रोडक्ट लेकर बाकी किसान भी आ रहे हैं। रेट तो जमीन पर आ ही जाएगा।’
डॉ. त्रिपाठी के 9 फार्म हाउस हैं। ये करीब 40 एकड़ का फार्म हाउस है। पूरा इलाका किसी जंगल की तरह लग रहा है। त्रिपाठी कहते हैं, ‘ये डेवलप किया हुआ जंगल है। एक समय यहां पानी नहीं था। अब आप सोचिए जहां पीने का पानी नहीं था, वहां जंगल उगाना किसी पत्थर को तोड़ने से कम नहीं। इसमें जो कुछ भी आप देख रहे हैं, सब दुर्लभ जड़ी-बूटियां हैं। साल 2000 में इसे देश के पहले सर्टिफाइड ऑर्गेनिक फार्म का दर्जा मिला था।
त्रिपाठी कहते हैं, 'मैं तो आदिवासी किसान भाइयों को कहता हूं कि ये लताएं या हरे पत्ते नहीं, पांच-पांच सौ के नोट लटके हुए हैं। आज आप किसी भी आदिवासी परिवार में चले जाइए। उनके घर के पीछे 25-50 काली मिर्च के पेड़ मिल ही जाएंगे। जिस पेड़ पर लटकी काली मिर्च से 5 हजार रुपए की आमद हो रही है, वो 1200 रुपए के लिए पेड़ क्यों काटेंगे। देखिए कि एक फीट में एक किलोग्राम काली मिर्च निकलती है, तो ऊपर तक आप गिनते जाइए कि कितने किलोग्राम काली मिर्च निकलेगी। ये नोट ही तो हैं।’
बैंकिंग के पेशे में कैसे आए?
वो कहते हैं, ‘90 के दशक की बात है। स्टडी कम्प्लीट करने के बाद मेरी नौकरी पहले एक कॉलेज में बतौर प्रोफेसर और फिर बाद में SBI के जरिए ग्रामीण बैंक में मैनेजर के पद पर लग गई। बड़ी पोस्ट पर था। करीब 7-8 साल तक मैंने नौकरी की।
इसी दौरान देखा कि जो किसान खेती कर रहे हैं, बैंक से कर्ज ले रहे हैं, उनकी जमीन नीलाम होती जा रही है। मैं भी एक किसान था। एक रोज मैंने रिजाइन कर दिया। रेजिग्नेशन लेटर एक्सेप्ट होने में दो साल का समय लग गया।
उस वक्त तक मेरी शादी हो चुकी थी। दो बच्चे भी थे। जब ये बात घरवालों को पता चली, सभी शॉक्ड हो गए। ससुराल वालों के मन में था कि उन्होंने तो अपनी बेटी की शादी एक बैंक कर्मी से की थी, किसान से तो नहीं।
उस वक्त महाराष्ट्र से हर रोज किसानों की आत्महत्या करने की खबरें आती थीं। मेरे निर्णय से सभी का गला सूखा हुआ था। सबको ये लग रहा था कि कहीं मैं एक सेटल्ड जॉब छोड़कर सड़क पर तो नहीं आ जाऊंगा।’
ये काली मिर्च और हर्बल खेती करने की वजह… जैसे सभी किसान टमाटर, गोभी की खेती कर रहे थे। मैं भी करता था। दो-तीन साल ये क्रम चलता रहा। देखा कि हाल वही है।
तब मुझे लगा कि कोई ऐसी खेती करो, जो कोई न करता हो। साउथ में काली मिर्च की खेती होती है और जंगल में जड़ी-बूटी। मुझे इसमें पैसा दिखा, क्योंकि किसी सब्जी का अधिकतम कॉस्ट 100-200 रुपए होता है। जबकि जड़ी-बूटी की शुरुआती कीमत ही 200-400 रुपए प्रति किलो से होती है।
शुरुआत में तो कोई एक्सेप्ट करने को तैयार नहीं था। लोग मुझे पढ़ा-लिखा पागल भी कहते थे, लेकिन धीरे-धीरे सभी ने इस बात को समझना शुरू कर किया।
मैंने काली मिर्च, सफेद मूसली, अश्वगंधा, कालमेघ, इंसुलिन ट्री, स्टीविया, ऑस्ट्रेलियन टीक, पिपली... इस तरह की 22 जड़ी-बूटियों की खेती शुरू की। खेती के लिए पहली बार बैंक से 22 लाख का लोन लिया।'
डॉ. राजाराम त्रिपाठी को यहां तक पहुंचने में तकरीबन 35 साल लग गए। वो कहते हैं, ‘एक समय ऐसा भी आया कि मेरी खुद की जमीन नीलाम हो गई। दरअसल उस साल फसल अच्छी हुई थी, पैदावार ज्यादा होने की वजह से मार्केट रेट डाउन हो गया।
बैंक का खेल ऐसा है, जैसे बारिश होते ही आपसे कोई छतरी छीन ले। इसलिए मैं किसानों से कहता हूं कि कभी कर्ज लेकर खेती न करें। उसके बाद से मैंने आज तक कोई कर्ज नहीं लिया।’
बेचते कहां हैं?
राजाराम कहते हैं, ‘मैं तो मानता हूं कि जहां फसल है, वहीं बाजार है। हमारे साथ 400 किसानों का समूह जुड़ा हुआ है। हम एडवांस मार्केटिंग करते हैं। मान लीजिए कि हम सफेद मुसली की खेती कर रहे हैं, तो कंपनी को रॉ मटेरियल बल्क में चाहिए। हम खेती करने से पहले कंपनियों के साथ एग्रीमेंट कर लेते हैं कि इस रेट पर अगले साल वो मेरी फसल खरीदेंगे।
अगले साल मार्केट रेट यदि 1400 रुपए प्रति क्विंटल है, फिर भी यदि हमारा एग्रीमेंट हजार रुपए का है, तो हम इसी रेट में देंगे। ऐसे में मार्केट में हमने ट्रस्ट डेवलप किया। हर्बल प्रोडक्ट की विदेश में भी ज्यादा डिमांड है। हम इसे एक्सपोर्ट भी करते हैं।’
आपके ऑफिस के बाहर गेट पर डिस्प्ले में कुछ प्रोडक्ट के पैकेट भी रखे हुए थे, वो कहां बनते हैं?
डॉ. त्रिपाठी कहते हैं, अब मेरी नई जनरेशन यानी मेरी बेटी ने इसके प्रोडक्ट को ब्रांडिंग के साथ ऑनलाइन सेल करना शुरू किया है। हम 10 से ज्यादा देशों में हर्बल हल्दी पाउडर, आंवला समेत अलग-अलग तरह के हर्बल प्रोडक्ट की प्रोसेसिंग करके सेल कर रहे हैं।

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