झीलों की नगरी उदयपुर इन दिनों राघव-परिणीति की रॉयल वेडिंग में मेहमानों का स्वागत करने में जुटी है। जितना खूबसूरत ये शहर है, उससे कहीं ज्यादा स्वादिष्ट यहां के जायके हैं, जो मेहमानों का दिल जीत लेते हैं।
झकोलमा पूरी, जिसे कभी राजा-महाराजा खाते थे, चार घंटे में तैयार होती है। मेवाड़ की सबसे बड़ी 5 किलो की बाटी, 100 उकाले की कढ़ी, जो 8 घंटे में तैयार होती है। लीलवे की चक्की, जाजरिया, सांठे की रोटी, धुंगारी छाछ, दिलजानी।
ये सब वो ट्रेडिशनल मेवाड़ी डिशेज हैं, जो थाली से गायब हो चुकी हैं। शायद कुछ लोगों ने तो इनके नाम भी नहीं सुने होंगे। तो चलिए जायका की इस कड़ी में चखते हैं उदयपुर का बेहतरीन स्वाद…
शहर के पंचवटी सर्कल पर स्थित ट्रेडिशनल खाना रेस्टोरेंट राजस्थानी कुजिन के लिए मशहूर है। एक से बढ़कर एक ट्रेडिशनल डिश जो आजकल घरों में बनना बंद हो चुकी हैं, ऐसे जायकों के लिए ये रेस्टोरेंट किसी खजाने से कम नहीं। खास बात यह है कि मेहमानों को खाना थाली में नहीं बल्कि पत्तल व दोने में परोसा जाता है।
यहां की दो थालियां हैं- ट्रेडिशनल रॉयल थाली और राजस्थानी देसी भोज। इन थालियों में इतने आइटम परोसे जाते हैं कि खुद वेटर आकर उनके नाम और विशेषता बताते हैं। पहले कौनसी आइटम खानी है और इसके बाद क्या चखना है, यह भी वेटर ही बताते हैं, ताकि पूरी थाली की एक-एक आइटम का स्वाद चख सकें।
संचालक त्रिभुवन सिंह कोठारी बताते हैं कि सबसे पहले यहां स्वागत के रूप में गुलाब का शरबत पिलाया जाता है। ये शरबत भी वह स्वयं तैयार करते हैं, इसके साथ ही दावत का आगाज हो जाता है।
झकोलमा पूरी : कभी राजघरानों की थाली का हिस्सा थी
यहां की सबसे खास डिश है झकोलमा पूरी जो इनकी थाली की विशेष पहचान है। संचालक त्रिभुवन बताते हैं कि देश में एकमात्र उदयपुर ही वो जगह है जहां सबसे स्वादिष्ट झकोलमा पूरी बनती है। इस पूरी को तैयार करने वाला एक्सपर्ट शैफ रोजाना उदयपुर से 70 किलोमीटर दूर भींडर के पास केदारिया से आता है। कभी ये पूरी पूर्व मेवाड़ राजघराने के शाही भोज का हिस्सा होती थी।
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| 5 किलो की बाटी। |
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| झकोलमा पूरी |
लहराते हुए खौलते घी में पकाते हैं ये पूरी
शेफ ने बताया कि झकोलमा पूरी के लिए स्पेशल मोटे गेहूं का चयन होता है। इस गेहूं के पिसे आटे का गर्म पानी में घोल तैयार करते हैं जैसे हलवा होता है। इसको बनाने में आटे में नमक के साथ हल्दी भी डालते हैं। थोड़ी देर ठंडा होने के लिए रख देते हैं। अब एक फिक्स क्वांटिटी में लेकर लकड़ी के पट्टे पर हाथ से बिछाकर इसे बड़ा करते जाते हैं।
लगभग बड़े तवे जितना साइज होने पर शेफ इसे अपनी विशेष शैली में लहराते हुए खौलते हुए देसी घी में डालते हैं। अच्छी तरह सिकने के बाद इसे लकड़ी के डंडे से बाहर निकालते और एक-एक पीस करके परोसते हैं।
कोठारी बताते हैं कि यह कोई आम डिश नहीं। पूर्व राजघरानों के राजा-महाराजा खाते थे। इसे साथ चने की सब्जी, अमचूर की चटनी के साथ चटकारे लेकर खाया जाता है।
100 उकाले की कढ़ी, 8 घंटे में तैयार होती है
आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि यहां जो कढ़ी बनती है, उसे बनाने में करीब आठ घंटे लगते हैं। शेफ 8 घंटे तक उकालते रहते हैं। रेस्टोरेंट के मालिक कोठारी बताते हैं कि इस अवधि में 100 के करीब उकाले (ऊबाल) आ जाते हैं, यहीं से इसका नाम 100 उकाले की कढ़ी रखा। उकलती कढ़ी से आती बेसन की महक खाने के शौकीनों का दिल जीत लेती है।
बाटी नहीं, ये है 5 किलो का मेवाड़ी बाटा
राजस्थान की सिग्नेचर डिश दाल-बाटी-चूरमा की शुरुआत भी करीब 1300 वर्ष पहले यहीं से हुई थी। हर जगह आपने छोटे-छोटे साइज की बाटियां ही खाई होंगी, लेकिन मेवाड़ में सबसे बड़ी बाटी भी तैयार होता है। असल में ये साइज में बाटी से कई गुना बड़ी होती है। बाद में इसके पीस कर परोसा जाता है। इसमें भी 2 साइज होती है। छोटी बाटी करीब ढाई किलो व सबसे बड़ी बाटी करीब पांच किलो वजन की होती है।
5 किलो की बाटी।
इतनी बड़ी बाटियों की सिकाई गोबर से बने कंडों पर की जाती है। मेकिंग तो सबसे अलग है। गेहूं के आटे में अजवाइन, सौंफ, जीरा, हल्दी, नमक और साबुत धनिये का मिश्रण डालकर तेल का मोयन डाला जाता है। इसको हल्का गुनगुना पानी देते हैं। करीब तीन घंटे तक पानी में उबालते हैं। इसके बाद गोबर के कंडों पर सेंकते हैं। करीब 4 घंटे की मेहनत से ये बाटे तैयार होते हैं जिन्हें निकालकर देसी घी में डुबो देते हैं। मेहमानों को इसके टुकड़े कर परोसा जाता है।
रेस्टोरेंट के संचालक हर्षित सिंह कोठारी बताते है कि उनके यहां जायकों का स्वाद चखने संजीव कपूर से लेकर कई मशहूर शेफ आ चुके है। दुनिया के बेस्ट होटल में शुमार उदयपुर के नामी होटलों के मेहमान भी भोजन के लिए यहां आते हैं।
बाटी को इस तरह से सेकते हैं कि अंदर से जरा भी कच्चापन नहीं रहता।
ट्रेडिशनल रॉयल थाली
वेलकम ड्रिंक गुलाब शरबत से शुरुआत करते हैं। इस थाली में मूंग की दाल का पकोड़ा, मक्की के सलेवड़े, बाफला बाटी, झकोलमा पूरी, चक्की की सब्जी, गोविंद गट्टे की सब्जी, केर सांगरी, हांडी की उड़द दाल, कढ़ाई की चना दाल व 100 उकाले की कढ़ी। पकोड़े की खिचड़ी या बाजरी की खिचड़ी सीजन के हिसाब से। चूरमा लड्डू, बेसन की चक्की, लहसुन की चटनी, अमचूर की चटनी, सोंठ की चटनी व धनिया की चटनी। धुंगारी हुई छाछ व मिर्ची के टिपोरे मिलते हैं।
ये भी स्वाद बढ़ाते यहां की थाली का
लीलवा की चक्की : ये मिठाई भी सीजनल है। इसको यहां पर जब भी देसी लीलवा ( हरे चने) आते हैं तब ही बनाया जाता है। इसका स्वाद भी उसी सीजन में आता है। इसे लीलवे के दाने की घिसाई की जाती है। उसको बूरा चीनी के साथ सेंका जाता है, इसके बाद इस चक्की तैयार करते हैं।
जाजरिया : ये मक्के से बनाया जाता है, हरे भुट्टे के दाने को पीसकर उसे देसी घी में सेंका जाता है। इसके बाद दूध में उबालकर जाजरिया तैयार किया जाता है।
सांठे की रोटी : ये रोटी बिल्कुल लच्छा परांठा की तरह तैयार होती है। इसे तवे पर ही अच्छे से सेंका जाता है। यह रोटी बहुत ही खस्ता व एकदम मुलायम बनती है।
केर सांगरी : जैसलमेर की केर सांगरी से बनी सब्जी यहां तैयार की जाती है।
बाजरे का खिचड़ा : ये बाजरा से बनाया जाता है, थाली में एक डिश के रूप में रखा जाता है।
धुंगारी छाछ : यहां छाछ को पहले ढुंगारा/धुंगारा (छौंक) जाता है। यानी हींग और घी से छौंक लगाकर उसके धुएं से छाछ (Smoked buttermilk) तैयार की जाती है। इस छाछ मिट्टी के सिकोरे में पिलाई जाती है।
चने की दाल : लोहे की कढ़ाई में बनाई जाती है, इससे इसका स्वाद बना रहता है।
उड़द की दाल : ये पूरी मेवाड़ी अंदाज में तैयार की जाती है। मतलब की इसे काली हाड़ी में ही बनाते हैं।
गोविंद गट्टे की सब्जी और 100 उकाले की कढ़ी मेहमानों की खास पसंद बन गई है।
गोविंद गट्टे की सब्जी और 100 उकाले की कढ़ी मेहमानों की खास पसंद बन गई है।
दिलजानी : यह पारंपरिक और सीजनल मिठाई है। इस मिठाई को संतरे के जूस से तैयार किया जाता है।
ऐसे हुई रेस्टोरेंट की शुरुआत
त्रिभुवन सिंह कोठारी कहते हैं कि मेरे दादा गिरधारी सिंह कोठारी व परदादा बलवंत सिंह कोठारी पूर्व मेवाड़ राजपरिवार से जुड़े थे। हमारी ओल्ड सिटी में हवेली भी है। मेरे मन में था कि राजस्थान आने वालों को मेवाड़ का वही पारंपरिक भोजन परोसा जाए जो यहां की परंपरा में रहा है। हमने मेवाड़ की उन डिशेज पर रिसर्च की जो मेवाड़ की सबसे ट्रेडिशनल हैं और आम तौर पर घरों में आसानी से नहीं बनती।
इसी सोच से 2016 में इस रेस्टोरेंट की शुरुआत की। तब झकोलमा पूरी ही बनाते थे। यहां खाने वालों की इतनी भीड़ लगती थी। इसके बाद हम एक के बाद एक मेवाड़ की ट्रेडिशनल डिश लेकर आए। आज जो भी मेहमान इनका स्वाद चखता है, यही कहता है कि पेट भर गया, लेकिन मन नहीं भरा।
त्रिभुवन सिंह कोठारी बताते हैं कि उन्होंने ट्रेडिशन खाने पर काफी रिसर्च की थी।
नोएड़ा से उदयपुर आईं मेधा बताती हैं कि यहां खाना लगाने से पहले उसकी महक से ही मन भर गया। जब खाना शुरू किया तो लगा कि यह टेस्ट तो पहली बार ही मिला है। मैं यहां पहली बार आई हूं। बाटी की साइज देखकर लगा कि ये कैसे बनती होगी, लेकिन पीस देकर खिलाया तो क्या स्वाद था! हलवे से लेकर चक्की व केर सांगरी की सब्जी के साथ खाने का मजा आ गया।
मूल भोपाल के रहने वाले, लेकिन दिल्ली से आए एक मेहमान ने बताया कि यह बहुत ही अमेजिंग खाना है। पूरी थाली में राजस्थान की अलग-अलग डिश का स्वाद यहां मिला। घी की शुद्धता ने डिश का स्वाद कई गुना बढ़ा दिया।
प्रिजर्वेटिव, केमिकल, कलर व कोल्ड ड्रिंक नहीं
कोठारी बताते हैं कि उनके यहां रेस्टोरेंट में प्रिजर्वेटिव, केमिकल, कलर व कोल्ड ड्रिंक अलाऊ नहीं है। इनका उपयोग कभी नहीं किया जाता। मेहमानों का स्वागत गुलाब के शरबत से होता है और इसके अलावा कोल्ड ड्रिंक के विकल्प के तौर पर उनके ही अलग-अलग शरबत उपलब्ध रहते हैं।
घी खुद का, हींग अफगानिस्तान से
कोठारी बताते हैं कि हर डिश देसी घी में तैयार होती है। यह घी भी उनका ही ब्रांड है लाचोला। वह खुद देसी नस्ल की गायों से मिलने वाले दूध का घी तैयार करते हैं। इसकी बिक्री के लिए रेस्टोरेंट के बाहर आउटलेट भी खोल रखा है। हींग अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान से मंगवाते हैं। बाकी मसाले खुद पीसकर तैयार करते हैं।
ये है कोटा की प्रसिद्ध शंभू जी की रबड़ी गुलाब जामुन। पहलवानी और फिल्मी दुनिया के मशहूर सितारे रहे दारा सिंह को राजस्थान का यह जायका कोटा तक खींच लाया था।
दरअसल, कोटा के पहलवान भाइयों ने बंबई (अब मुंबई) जाकर अपनी कुश्ती के दांव-पेच से दारा सिंह का दिल जीत लिया था। उन्होंने जब भाइयों से उनकी ताकत का राज का राज पूछा तो उनका जवाब था मां के हाथ से तैयार रबड़ी।
इसी रबड़ी को खाने वे कोटा आए। जिसके बाद ये जायका इतना मशहूर हो गया कि दूर-दूर से लोग आने लगे। आज शंभु पहलवान की वही रबड़ी कोचिंग सिटी में रबड़ी-गुलाब जामुन और रबड़ी-जलेबी के कॉम्बिनेशन में खाई जाती है.




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