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मॉर्चुरी कर्मचारियों को परिवार, रिश्तेदार समझते है अछूत, मॉर्चुरी में रहना भूतों पर यकीन खत्म कर देता है, खाना पीना हो जाता है मुश्किल

दिल्ली के एक सरकारी हॉस्पिटल पहुंचने पर मॉर्चुरी कर्मचारी मुझसे बात करने से मना कर देते हैं। वो कैमरे पर आना नहीं चाहते। एक कर्मचारी ने यह तक कहा कि मेरी बच्ची अभी छोटी है, उसे नहीं पता कि उसका बाप क्या करता है। आपके माध्यम से मैं उसे बताना भी नहीं चाहता। जब लोग जान जानते हैं कि मैं क्या करता हूं तो दूरी बना लेते हैं। मैं अपनी बेटी का बचपन खराब नहीं कर सकता।

दूसरे ने जवाब दिया- ‘मैडम समाज हमारे काम को सही नहीं समझता। हमसे रिश्ता नहीं रखना चाहता। मेरी उम्र देखकर आपको अंदाजा हो गया होगा कि न जाने कितनी लाशें इन हाथों से गुजरी हैं। मुर्दा बोल नहीं सकता है, लेकिन जो सबूत उसके शव से जुटाए जाते हैं वो अदालत में गवाही देते हैं।

पोस्टमॉर्टम से ही पता चलता है कि घाव कैसा है, मौत के वक्त विक्टिम की हालत क्या थी, उसे किस तरह मारा गया।

ऐसे में आप समझ सकती हैं कि मेरे जैसे लोग कितना जरूरी काम कर रहे हैं। इसके बाद भी हमारे साथ कोई उठना-बैठना नहीं चाहता। कुछ लोगों को यह डर रहता है कि हमारे साथ रहने से वो बीमार हो जाएंगे।’

मॉर्चुरी वो जगह है जहां पोस्टमॉर्टम होता है। ये क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की एक अहम प्रक्रिया है। इसके आधार पर ही धाराएं तय होती हैं, फोरेंसिक सबूत जुटाए जाते हैं, जो अदालत में विक्टिम को इंसाफ दिलाने के लिए जरूरी हैं।


एक छोटे कमरे में फ्रीजर रखा है। कमरे में स्ट्रेचर पर सफेद चादर में लिपटी दो लाशें भी रखी हैं। उन्हें देखकर एक बार तो मुझे अंदर जाने में अजीब-सा महसूस होता है। राजपाल चौहान को यहां काम करते हुए 25 साल हो गए हैं। वो मुझे एकदम सहज दिखते हैं।

अंदर जाने की इजाजत किसी को नहीं है। दरवाजे से आती ठंडक से एहसास होता है कि अंदर का तापमान शरीर को जमा देने वाला है। पूछने पर पता चलता है कि इस कमरे में हमेशा औसतन चार-पांच डिग्री टेंप्रेचर मेंटेन किया जाता है।

यहां की गंध बाहर से बिल्कुल अलग थी। सड़क पर जैसे मरे हुए जानवर की गंध आती है, वैसी ही गंध आ रही है। मैं देख रही हूं कि यहां बार-बार सैनिटाइजर का इस्तेमाल किया जा रहा है।

‘हर पोस्टमॉर्टम के बाद मॉर्चुरी को पूरी तरह साफ किया जाता है। इसके बावजूद खून और लाश की गंध यहां रह ही जाती है।

हमारे पास अक्सर सड़ी-गली बॉडी आती है। कई शव इस हालत में होते हैं कि खाल हमारे हाथों से चिपक जाती है।

दस बार हाथ धोने के बाद भी ऐसा लगता है कि कुछ चिपका रह गया है।

इस गंध की वजह से खाना तो दूर, कई रोज पानी भी गले से नीचे नहीं उतरता। नींद में भी वो गंध पीछा करती रहती है। मैं अपने बच्चों को गले तक नहीं लगा पाता।'

राजपाल मॉर्चुरी में काम करने से पहले ट्रांसपोर्ट का कारोबार करते थे। वो काम नहीं चला तो अस्पताल में आ गए। पहले नौकरी ऑपरेशन थिएटर में लगी। फिर मॉर्चुरी में तबादला। तब से यह काम कर रहे हैं।

राजपाल

अपने जीवन में बीस हजार से ज्यादा लाशें देख चुके राजपाल ने जब पहली बॉडी देखी थी तब वो अंदर से हिल गए थे। उनके सामने लाश पड़ी थी। वो कांप रहे थे। कहते हैं, 'मुर्दाघर में काम करना, रोज एक नए हादसे को जीना है। पहले से भी ज्यादा खौफनाक। कभी जली हुई लाश आती है, तो कभी पानी में डूबकर फूली हुई।

जब स्ट्रेचर पर कोई बच्चा लेटा होता है तब मेरे लिए काम सबसे मुश्किल होता है। फूल-सी नाजुक देह पर एक खरोंच भी लगाने की हिम्मत नहीं होती।

बच्चे की लाश काे सामने देखकर दिमाग सुन्न हो जाता है। हाथ कांपने लगते हैं। खुद को संभालना पड़ता है। आप यह समझ लीजिए कि हमारे जैसे पक्के दिल के लोग भी सुध-बुध खो देते हैं।’

क्या यहां जो देखा, किया उसे यहीं छोड़ कर घर जाना आसान होता है?

राजपाल कहते हैं, ‘मैडम, शुरुआत में तो वाकई दिक्कतें थीं। अब थोड़ी कम होती है। बच्चे बड़े हो गए हैं, वो इस काम को समझते हैं लेकिन पसंद नहीं करते।

रिश्ते-नातेदार सब इस काम को छोड़ने को कहते थे। समाज वाले हमारे घर में रिश्ता करने से मना कर देते थे।

लोग हमें अछूत समझते हैं।'

वो कुछ सोचते हैं फिर कहते हैं, 'हर तरह की लाश आती हैं, कई बार बॉडी बहुत डी-कंपोज होती है, उसमें कीड़े होते हैं। ज्यादा दिन हो जाने की वजह से खून सूख चुका होता है। ऐसी बॉडी से सैंपल जुटाना बहुत मुश्किल होता है। जब बड़े- बड़े डॉक्टर उस बॉडी से डील कर रहे होते हैं तो हम तो सिर्फ मॉर्चुरी के कर्मचारी हैं। मना नहीं कर सकते, उसे हाथ लगाना ही पड़ता है। आखिरकार इस काम की सैलरी मिलती है।’

क्या कभी किसी जान-पहचान के व्यक्ति का शव आपकी मॉर्च्युरी में आया है?

राजपाल मौन हो जाते हैं। कुछ सोचने लगते हैं। फिर कहते हैं, ‘हां। एक बार एक ऐसे व्यक्ति की लाश पोस्टमॉर्टम के लिए पहुंची जिनके साथ मेरा उठना-बैठना था। उन्होंने लटक कर आत्महत्या कर ली थी। दो दिन पहले ही मैं उनसे मिला था।

जब मुझे पता चला कि उनकी लाश आई है तो मैं उस दिन मॉर्चुरी में नहीं घुस पाया था। जो इंसान आपके साथ हंसता-बोलता रहा हो, उसके शव को देखना आसान नहीं होता। उसका चीरफाड़ करना और भी मुश्किल काम है।’

राजपाल कहते हैं, ‘यहां कोई भी ज्यादा वक्त बिताना नहीं चाहता। सभी को अपने परिवार वालों की लाश ले जाने की जल्दी होती है। पोस्टमॉर्टम की एक तय प्रक्रिया है। एक्सपर्ट डॉक्टर या कई बार डॉक्टरों की टीम मौके पर मौजूद होती है। डॉक्टर जैसे-जैसे निर्देश देते हैं, कर्मचारी उनका पालन करते हैं। शव से सभी फोरेंसिक सबूत जुटाने के बाद उनके सैंपल प्रिजर्व और सील कर दिए जाते हैं। पोस्टमॉर्टम पूरा हो जाने के बाद शव को सिलकर परिजनों को सौंपा जाता है।

शव सिलकर परिजन को सौंपना भी आसान नहीं है। पोस्टमॉर्टम में दो बड़े कट लगते हैं, एक पेट से सीने तक, दूसरा सिर के आरपार। चीर फाड़ के बाद अगर हम भद्दी सिलाई करके बॉडी छोड़ दें तो घरवालों की तकलीफ और बढ़ जाती है। हम कोशिश करते हैं कि मुर्दा शरीर भी एकदम जिंदा-जैसा दिखे। बेहद बारीक सिलाई करते हैं। खून साफ करते हैं। बालों को भी सहेज देते हैं। सब कुछ जोड़-जोड़कर बॉडी को उन्हें सौंपते हैं।'

मॉर्चुरी में किसी का ट्रांसफर होता है तो उसे हॉस्पिटल में सजा के तौर पर देखा जाता है। आपस में सारे स्टाफ कहते हैं कि इसे मुर्दों के बीच भेज दिया गया। धर्मेंद्र भी मॉर्चुरी बॉय हैं और तीन साल पहले उनका यहां ट्रांसफर हुआ है। शुरू में उनके लिए काम करना मुश्किल था, लेकिन अब उन्हें भी लाशों के बीच रहने की आदत हो गई है।

शर्मीले स्वभाव के धर्मेंद्र कम ही बात करते हैं। वे कहते हैं, ‘कई बार ऐसी लाश आती है, जिसे देखकर दिल दहल जाता है। लोग पैदा हुए बच्चे को डस्टबिन में फेंक देते हैं। चीटियां-कुत्ते उन्हें नोंच देते हैं। ऐसे नाजुक शरीर का जब पोस्टमॉर्टम करना होता है तो हाथ कांपते हैं। खून जमाने वाली ठंड में भी पसीना आ जाता है। बस, ऐसे मामलों में डर लगता है।'

धर्मेंद्र के मुताबिक मॉर्चुरी में रहना भूतों पर यकीन खत्म कर देता है। मुर्दा बेचारा अपनी मर्जी से अपनी उंगली तक नहीं हिला पाता। वो भला किसी को कैसे डराएगा!

मैं उनसे पूछती हूं- इस नौकरी की वजह से क्या रिश्तेदार दूर हुए। लोगों ने शादी-ब्याह में बुलाना बंद तो नहीं किया।

जवाब में वो खामोश ही रहते हैं। मानो कहना चाह रहे हों, ‘आपको सब पता है, मैं क्या ही बोलूं।’

रमेश चंद हाल ही में मॉर्चुरी में 27 साल नौकरी करने के बाद रिटायर हुए हैं। उनके अनुभव भी बिल्कुल राजपाल चौहान जैसे हैं।

कुख्यात तंदूर कांड की पीड़िता नैना साहनी की बॉडी के पोस्टमॉर्टम में वो शामिल थे। उस केस को याद करते हुए रमेश चंद कहते हैं, ‘पूरी बॉडी जली हुई थी। उसे देखना और सैंपल लेना बहुत मुश्किल था। बहुत मुश्किल के साथ अपना काम किया।

काम के बाद गल्व्स उतारे। खूब रगड़-रगड़कर साबुन से हाथ धोए। फिर भी लगा, जैसे हाथों में कुछ चिपक गया हो। सूंघकर देखा। कोई गंध नहीं थी। तब भी मिचली आने लगी। उस रोज मैंने पानी भी नहीं पिया।

आम तौर भी सड़ी-गली लाशों का पोस्टमॉर्टम करते हुए इंफेक्शन का डर रहता है। वैसे पूरी सेफ्टी रखी जाती है, तब भी डर तो रहता है।'

रमेश चंद्र अब रिटायर हो चुके हैं। मर्डर केस, हादसे, सुसाइड हर तरह के मामलों में लाश का पोस्टमॉर्टम उन्होंने किया है। युवा लोगों की बॉडी ने उन्हें हमेशा ही विचलित किया है।

रमेश चंद के लिए भी इस काम की शुरुआत मुश्किल भरी थी। उन दिनों अपना डर वो किसी को जाहिर नहीं होने देते थे। वो बताते हैं, ‘हादसे के केस, बुरी तरह से डैमेज लाशें, आतंकवादी हमलों में मारे गए लोगों की लाशें सब हमने देखे हैं। दिल दहलता था तब भी खुद को संभाला। धीरे-धीरे आदत पड़ती गई। हमने ये सोच लिया था, यही काम है, करना है ही, उस पर से सरकारी नौकरी है छोड़कर नहीं भाग सकते।’

एक युवा कर्मचारी कहता है, ‘जब इस काम को शुरू किया तो अपनों ने ही मुंह मोड़ लिया। शादी के लिए पापा जब लड़की देखने गए थे तब मैं ऑपरेशन थिएटर में काम करता था। शादी के दो महीने के बाद मेरा ट्रांसफर मॉर्चुरी में हो गया। कुछ दिन तक मैंने यह बात पत्नी से छुपा कर रखी। जिस दिन पत्नी को ये बात चली वो मुझे छोड़कर मायके चली गई। बहुत मुश्किल से मना कर लाया हूं। अब भी उसकी जिद है कि मैं ये नौकरी छोड़ दूं। उसे मुझसे घिन आती है।’

बड़े अस्पतालों की मॉर्चुरी में कई कर्मचारी ये काम ठेके पर करते हैं। इनकी सैलरी 15 से 17 हजार रुपए महीना के बीच होती है। लाशों को लाने और ले जाने के अलावा ये साफ-सफाई करते हैं।

ठेके पर काम कर रहा एक नौजवान कहता है, ‘जो काम हम करते हैं, कोई उसे करना नहीं चाहता, फिर भी आप देखिए, पूरा दिन काम करने के बाद हमें मिलता क्या है? नफरत। ’

एक आम धारणा ये भी है कि मॉर्चुरी में काम करने वाले कर्मचारी शराब पीकर ये काम करते हैं। माना जाता है कि बिना नशे में रहे ये काम नहीं किया जा सकता। मैंने दिल्ली में जिन कर्मचारियों से बात की, उन सबने इससे इनकार किया।

दिल्ली के बाहर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक मॉर्चुरी में पोस्टमॉर्टम करने वाले एक युवा कर्मचारी से भी मैंने बात करने की कोशिश की।

उसने कैमरे पर आने से इनकार करते हुए कहा, ‘शराब पीनी पड़ती है, लेकिन हर कोई पीता है यह मैं नहीं कह सकता। 

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