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डॉ. ताबिश एजाज खान का वेस्ट से बेस्ट बनाने के लिए एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ नाम

नई दिल्ली/ इंसान अगर हुनरमंद हो तो वो मिट्टी को भी छूकर सोना बना दें। रद्दी को भी खूबसूरत बना दें। ताबिश एजाज खान पेशे से डॉक्टर हैं और कश्मीर में रहती हैं। लेकिन इससे इतर उनकी एक पहचान है। ऐसी डॉक्टर जो ‘वेस्ट को वंडर’ में बदलने का हुनर रखती है। यानी कि रद्दी को भी खूबसूरत बना देती है।

डॉ. ताबिश एजाज खान का वेस्ट से बेस्ट बनाने के लिए एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ नाम

ताबिश बतौर आर्टिस्ट कमाल का काम कर रही और रिकॉर्ड बना रही हैं। ताबिश का मानना है कि टूटी हुई चीजें, सूखे पत्ते, पक्षियों के पंख और तो और अखबार की रद्दी हमेशा बेकार नहीं होती। बस उसे देखने और पहचान के लिए अलग एक नजर चाहिए। आज के ‘ये मैं हूं’ में जानिए डॉक्टर ताबिश एजाज खान की इस खूबसूरत कला की यात्रा के बारे में…

हम बहनों पर अब्बू-अम्मी को हमेशा से है नाज

मैं साउथ कश्मीर के अनंतनाग जिले से हूं। घर में अम्मी-अब्बू, दादी के अलावा हम तीन बहने हैं। नौंवीं तक की पढ़ाई मैंने कश्मीर से ही की। फिर दिल्ली चली गई। मेरे पापा बैंक में एग्जीक्यूटिव मैनेजर हैं और मां सरकारी स्कूल में टीचर हैं। हम बहनों को लेकर पेरेंट्स ने कभी सोसाइटी की बातें नहीं सुनीं। उन्हें पता था कि उनकी तीन बेटियां हैं और उन्हें हम तीनों पर हमेशा से गर्व रहा। सोसायटी चाहे जो सोचे मेरे पेरेंट्स हमेशा हमारे साथ खड़े रहे हैं।

परफेक्ट नहीं थी, तब भी रंगों का साथ नहीं छोड़ा

मैंने पेंटिंग की कोई क्लास नहीं ली। किसी से या कहीं से कुछ नहीं सीखा। नर्सरी से पेंटिंग बना रही हूं। प्रकृति को निहारना और उसे कागज पर उतारना बचपन से ही पसंद रहा है। वो अलग बात है कि तब हाथों में कभी ग्रिप तो कभी पेंटिंग अच्छी नहीं बनती थी, लेकिन मैं फिर भी पेंटिंग करती रही। मैंने हार नहीं मानी। मैं नई-नई चीजें बनाती रही। सालों मेहनत करने के बाद मेरी पेंटिंग में परफेक्शन आने लगा और ब्रश पर मेरी पकड़ भी मजबूत बनने लगी।

आर्टिस्ट बनना शौक था लेकिन डॉक्टर बनना सपना

पेंटिग मेरा शौक था लेकिन डॉक्टर बनना मेरा सपना। मैं हमेशा से लोगों की सेवा करना चाहती थी। दिल्ली में स्कूलिंग खत्म करने के बाद मैं एमबीबीएस की पढ़ाई करने बांग्लादेश चली गई। मैंने नीट का एग्जाम भी दिया और क्लियर भी हो गया लेकिन कुछ वजहों से एडमिशन नहीं ले पाई।

प्राइवेट कॉलेज की फीस इतनी ज्यादा थी कि वो हम अफोर्ड नहीं कर सकते थे। ऐसे में कम खर्च पर मैं बांग्लादेश चली गई। नए देश में भी मैंने पढ़ाई के साथ पेंटिंग का शौक जारी रखा। पिछले साल मैंने मेडिकल की पढ़ाई पूरी की है। फिलहाल मैं अनंतनाग के सरकारी मेडिकल कॉलेज में इंटर्नशिप कर रही हूं। आगे सर्जन गायनेकोलॉजिस्ट बनना चाहती हूं।

लोगों के ताने को मैंने सकारात्मक तरीके से लिया

मैं पेंटिंग बनाकर उन्हें सहेजती रही। फिर 2016 में मैंने अपनी पेंटिंग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डालना शुरू किया। हालांकि, उस वक्त सोशल मीडिया का इतना चलन नहीं था। सोशल मीडिया पर डालने के बाद तारीफ कम ताने ज्यादा मिले। आसपास वाले कहते कि जब परफेक्ट नहीं हो तो क्यों अपना तमाशा बना रही हो। बेकार का काम करने से बेहतर है कि पढ़ाई कर लो। क्यों टाइम बर्बाद कर रही हो? मैंने किसी को जबाव नहीं दिया। मैं पढ़ाई में भी अच्छी रही हूं और पेंटिंग में भी बेहतर होती गई।


चिनार के पत्ते से मिला रद्दी से पेंटिंग बनाने का आइडिया

एक बार मैं अपने काम से बाहर जा रही थी, तभी मेरी नजर चिनार के पत्ते पर गई। वैसे तो चिनार मेरे लिए कोई नई बात नहीं थी। कश्मीरी होने के वजह से चिनार के पेड़ और पत्तों को भी बचपन से देखती आ रही हूं। लेकिन उस पत्ते में और उस समय कुछ तो अलग था, जिनसे मुझे बांध लिया। मैं कुछ मिनट तक रूककर पत्ते को निहारती रही और सोचती रही कि इससे मैं क्या कर सकती हूं। तभी मुझे स्क्रैप यानी कि रद्दी से पेंटिंग बनाने का आइडिया आया। मैं उस पत्ते को घर लेकर आई। उसे प्रिज्व किया और उस पर पेंटिंग बनाई।


चिनार के पत्तों ने मुझे और मेरी पेंटिंग को दिलाई पहचान

मैंने जब उस चिनार के पत्ते पर पेंटिंग बनाई तो पेरेंट्स को बहुत पसंद आई। उन्होंने मुझे कहा कि ये कुछ अलग और खूबसूरत है। उनसे मिली तारीफों से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। फिर मैंने फेदर (पंख) से एक पेंटिंग बनाई। चिनार पत्तों की पेंटिंग धीरे-धीरे मेरी पहचान बन गई। मेरी फेदर पेंटिंग को भी हर इवेंट में सराहा गया। मैं सिर्फ स्क्रैप को ही नहीं सहेजती, बल्कि अपने आर्ट के जरिए कश्मीरी कल्चर को संजो रही हूं। चिनार के पत्तों पर मैं कश्मीर का कल्चर, पहनावा, यहां की अच्छी बातों और खूबसूरती को दर्शाती हूं। मेरी बाकी पेंटिंग भी कश्मीर से ही जुड़ी होती है। मैं अपनी पेंटिंग्स के लिए चिनार पत्ते के अलावा बुर्जा पेपर, फेदर, स्टोन, सीड्स, टूटा हुआ कप-प्लेट जैसी कई फालूत चीजों का इस्तेमाल करती हूं।


कोविड के दौरान इतनी पेंटिंग बनाई कि बना रिकॉर्ड

मैं अपनी पढ़ाई और इंटर्नशिप में बहुत बिजी हूं इसलिए अपनी पेंटिग्स के लिए एग्जीबिशन नहीं कर पाती। मैं अब तक चार-पांच ही एग्जीबिशन में शामिल हुई हूं और वहां मेरे चिनार पेंटिंग्स सबसे ज्यादा बिकते हैं। मुझे चिनार पेंटिंग के लिए कई अवॉर्ड्स मिले हैं। इनमें ‘वुमन आइकॉन अवॉर्ड्स’, ‘कश्मीर एम्पावरमेंट अवॉर्ड’, ‘इंडियन बुक ऑफ रिकॉर्ड’, ‘एशिया वर्ल्ड ऑफ रिकॉर्ड्स’ जैसे सम्मान शामिल हैं। मैं पेंटिंग तो बचपन से कर रही थी, लेकिन कोविड के दौरान मेरे काम को पहचान मिली।

कोविड के दौर में हमारी क्लास ऑनलाइन हो गई तो मैं बांग्लादेश से घर वापस आ गई। मैं घर पर पढ़ाई करते-करते बोर हो गई। फिर मैं पेंटिंग्स की तरफ मुड़ी। उस वक्त मैंने चिनार के पत्तों से २५० पेंटिंग्स बनाई। ये अपने आप में रिकॉर्ड रहा। मेरी मेहनत ने मुझे एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक्स ऑफ रिकॉर्ड तक पहुंचाया। रिकॉर्ड बुक में नाम शामिल होने के पहले तीन महीने तक मेरी पेंटिंग्स की जांच हुई। फिर मुझे रिकॉर्ड बुक में शामिल किया गया।

सपना कोई छोटा-बड़ा नहीं होता है। मेरा डॉक्टर बनने का सपना जहां इतना बड़ा था, वही पेंटिंग एक हॉबी थी। लेकिन सपने मैं दोनों ही कामों के देखती और दोनों में सफलता पाई। मैं चाहूंगी कि लड़कियां अपने प्रोफेशन के साथ अपने पैशन की कामयाबी के भी सपने देखें। औरत को कुदरत ने मल्टी टास्कर बनाया है। तो हमें रंग-बिरंगे सपने देखने का भी हक दिया है।

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