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‘ग्रामिक’ के फाउंडर राज यादव की कंपनी ऑनलाइन खाद-बीज पहुंचाने का काम करती है, उन्होंने चाय बेचते हुए की पढाई पूरी

मैं ‘ग्रामिक’ के फाउंडर राज यादव से मिलने आया हूं। औपचारिकता के बाद राज से मैं कहता हूं, ‘आपने तो कहा था कि किसानों के लिए काम करते हैं। उन्हें खाद-बीज, खेती में इस्तेमाल होने वाले इक्विपमेंट्स पहुंचाते हैं, लेकिन यहां तो नजारा ही कुछ और है।’

राज मुस्कुराने लगते हैं। वो कहते हैं, ‘किसानों का नाम सुनते ही लोगों को लगता है कि कोई धोती-गमछा में बैठा, फटेहाल सा होगा। आप मेरे ऑफिस को देख रहे हैं। 200 से अधिक लोग किसानों के लिए ही काम कर रहे हैं।

‘ग्रामिक’ के फाउंडर राज यादव की कंपनी ऑनलाइन खाद-बीज पहुंचाने का काम करती है, उन्होंने चाय बेचते हुए की पढाई पूरी 

आज के दौर में जिस तरह अलग-अलग ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए हम घर बैठे ऑनलाइन सब कुछ मंगवाते हैं। उसी तरह से हमारी कंपनी 'ग्रामिक' किसानों को ऑनलाइन खाद-बीज, बायो फर्टिलाइजर, केमिकल फर्टिलाइजर, कीटनाशक दवा समेत अलग-अलग तरह की सुविधाएं पहुंचाती है।

इन्हीं किसानों की बदौलत मेरी कंपनी का पिछले साल टर्नओवर 83 करोड़ था। इस साल पहले 4 महीने में ही 100 करोड़ का बिजनेस कर चुका हूं। प्रोजेक्शन 300 करोड़ से अधिक का है।’

राज के साथ उनके साथी गौरव भी बैठे हुए हैं। गौरव पहले अडाणी ग्रुप के साथ काम कर रहे थे। कंपनी में उनकी भी हिस्सेदारी है।

राज के ऑफिस के एक सेक्शन में किसी कॉल सेंटर की तरह कुछ लोग किसानों से बातचीत कर रहे हैं। उन्हें खेती-बाड़ी को लेकर सजेशन, खाद-बीज की जानकारी दे रहे हैं।

राज कहते हैं, ‘आइए आपको जल्दी-जल्दी में सबसे एक बार मिलवा देते हैं। मेरी कंपनी में लड़कों के बराबर लड़कियां आपको मिलेंगी। ये सभी लड़कियां गांव-देहात की रहने वाली हैं। वहां से निकलकर यहां तक पहुंची हैं। किसान परिवार से हैं।

मेरी दो बहनें हैं। दोनों में से किसी ने पढ़ाई नहीं की। अब गांव में तो आज भी यही कहा जाता है कि बेटी जात है, पढ़-लिखकर क्या करेगी। इस दर्द को मैं समझता हूं, मैंने गरीबी की वजह से अपने घर में इसे देखा है। इसलिए कंपनी में हमेशा लड़कियों को वरीयता देता हूं।’

अब मैं राज के साथ किसानों से मिलने के लिए रायबरेली के हरचंदपुर गांव की ओर निकल पड़ता हूं।

इस दौरान राज अपने शुरुआती दिनों के बारे में बताते हैं। कहते हैं, ‘घर की स्थिति बहुत ज्यादा खराब थी। दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो पाती थी। 90 के दशक की बात है। पापा मुंबई के एक कपड़ा मिल में दिहाड़ी मजदूर थे। कपड़ों का गठिया ढोते थे।

उस वक्त मैं अकेला था। जब परिवार बढ़ा, हम चार भाई-बहन, मम्मी-पापा… मुंबई जैसे शहर में गुजारा कर पाना मुश्किल हो चला था। पापा मुंबई छोड़ गांव वापस आ गए। खेती के लिए बमुश्किल कुछ जमीन थी। घर खर्च चलाने के लिए पापा ने एक चाय-पान की दुकान खोल ली। गांव में कम पूंजी में कमाने का मात्र यही एक जरिया है।

मैं उस वक्त स्कूल जाने लगा था। हर रोज मेरा एक ही रूटीन होता, सुबह-शाम दुकान पर बैठना, चाय-पान बनाना, लोगों को चाय देना। अगल-बगल की दुकानों में भी जाकर मैं चाय पहुंचाता था। लकड़ी की दुकान थी, इसी में सो भी जाता था।

हमेशा ताक में रहता था कि कोई भोज का न्योता दे, ताकि कुछ अच्छा खाने को मिले। घर में तो रोटी-चटनी यही सब नसीब हो जाए, तो बड़ी बात। कोई गरीब जानकर किसी फंक्शन में बुलाता भी नहीं था।

सुबह-शाम दुकान पर बैठना, चाय-पान बनाना। दिन में स्कूल जाना। कई बार ऐसा भी होता कि जो लोग दुकान पर चाय पीने के लिए आते, हमेशा गाली देकर या छोटू कहकर बुलाते। अब कोई चाय बेचने वाले का नाम राज कैसे हो सकता है, इसलिए लोगों ने मुझे राज से राजू कहकर बुलाना शुरू कर दिया। ऐ राजू, दो चाय ला...।'

वो कहते हैं, 'मैं हमेशा सोचता कि काश ! कोई मुझे भी तो मेरे नाम से बुला ले। हालांकि दुकान पर कुछ अच्छे लोग भी आते थे, जो मुझे पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। मैं चाय-पान बनाने के साथ-साथ पढ़ता भी रहता था।

जैसे-तैसे करके कंप्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग की। 2007 में पास आउट होने के साथ ही दिल्ली में 3 हजार महीने की सैलरी पर एक जॉब मिली। अब जिसके पास दो रुपए भी न हो, उसके लिए 3 हजार बड़ी बात थी। मुझे याद है- दिल्ली के जनकपुरी इलाके की एक स्लम बस्ती में एक सीढ़ी के नीचे छोटे से बने कमरे में रहता था।

तकरीबन 5 साल प्राइवेट सेक्टर में जॉब करने के बाद मैंने खुद का वेब डेवलपिंग का काम शुरू कर दिया। 2021 की बात है। मूल रूप से मैं जौनपुर का रहने वाला हूं। जब मेरी फाइनेंशियल कंडीशन ठीक हुई, तो गांव में एक स्कूल बनवाया।

इसके कैंपस की गार्डनिंग के लिए कैंची की जरूरत थी। एक रोज मैंने अपने पापा को फोन कर कहा- लखनऊ से घर आ रहा हूं, रास्ते में कैंची ले लूंगा।

पापा बोले- मंगवा लिया हूं। अब जरूरत नहीं है।

मैंने पूछा- कहां से?

उन्होंने कहा- ऑनलाइन

सुनते ही मैं चौंक गया कि जिस व्यक्ति ने कभी स्मार्ट फोन नहीं चलाया, वो खेती-किसानी से रिलेटेड प्रोडक्ट ऑनलाइन मंगवा रहा है। मुझे हैरानी हुई। तभी मुझे लगा कि देश में 15 करोड़ से ज्यादा किसान हैं, इस तरह की दिक्कतें तो हर किसी के साथ होती होंगी।

क्यों न इन किसानों तक खेती से रिलेटेड हर तरह के प्रोडक्ट को ऑनलाइन पहुंचाया जाए। यहीं से ‘ग्रामिक’ का जन्म हुआ।’

बातचीत करते-करते हम रायबरेली के हरचंदपुर गांव पहुंच चुके हैं। खराब मौसम, ईंट की बनी सड़कें, दोनों तरफ लहलहाते खेत… सामने एक घर के बरामदे में दर्जनभर से अधिक किसान जुटे हुए हैं।

हम लोग भी इन्हीं किसानों के बीच बैठ जाते हैं।

राज कहते हैं, ‘पहले इन किसानों को रायबरेली या नजदीक में लखनऊ है, तो वहां जो खाद-बीज मिलता था, वही ये खेत में लगा पाते थे, उपजाते थे। अब मान लीजिए कि इन्हें यदि धान की कोई ऐसी वैराइटी उपजानी है, जिसका बीज साउथ में या दूसरे स्टेट में उपलब्ध है, तो इन्हें बीज कैसे मिलेगा।

मैंने इसी प्रॉब्लम को सॉल्व किया। इन्हें खाद-बीज समेत जो भी खेती-किसानी से रिलेटेड प्रोडक्ट हैं, जिस कैटेगरी की चाहिए, हमारे प्लेटफॉर्म के जरिए इन तक पहुंच जाता है। 'ग्रामिक' से पहले भी कई कंपनियां किसानों को लेकर काम कर रही थीं, लेकिन ये डायरेक्ट किसानों तक नहीं जुड़ी थीं, हम डायरेक्ट किसानों से कनेक्ट होकर काम करते हैं।'

इन किसानों के झुंड में कुछ महिला किसान भी बैठी हुई हैं। इनमें से एक महिला कहती हैं, ‘किसानों के साथ दिक्कत है कि जो खाद-बीज उसके शहर में उपलब्ध होगा, वही उसे खरीदना पड़ेगा, क्योंकि उस दुकानदार के पास वही प्रोडक्ट है, लेकिन अब ऐसा नहीं है।’

राज कहते हैं कि पिछले डेढ़ साल में उनकी कंपनी के साथ साढ़े 3 लाख से अधिक किसान जुड़ चुके हैं, लेकिन उन्होंने कंपनी की शुरुआत 5 लोगों की टीम और एक गांव के किसानों से की थी।

इसी बीच एक किसान कहता है- चलिए आपको हम अपना खेत दिखाते हैं। हम लोगों ने अभी धान की बुआई की है।

मैं राज के साथ ईंट की बनी सड़क और खेत के बीच खोदे हुए गहरे गड्ढे को बिजली के खंभे के सहारे पार करते हुए खेत की मेड़ से आगे बढ़ता हूं।

इस दौरान मैं फिर से राज को पुराने दिनों में लेकर चलता हूं।

राज कहते हैं, ‘ये भी लंबी कहानी है। हाई स्कूल में टॉप करने के बाद गांव में मेरी चर्चा शुरू हो गई कि पान बेचने वाले का बेटा टॉप किया है। उस वक्त बहुत कम बच्चे ही पास हो पाते थे, टॉप करना तो दूर की बात है, आज वाली बात भी नहीं थी।

साथ में चाय-पान का दुकान चल ही रहा था। मैंने तो बस सोचा था कि चाय और समोसे की बड़ी सी दुकान करूंगा। पैसे जमा करने के लिए मैंने शादी-ब्याह में चाय-पान, समोसे के स्टॉल भी लगाए हैं।

2002-03 की बात है। 12वीं में मैंने साइंस ले लिया था। किसी तरह से 12वीं पास करने के बाद घरवालों को इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एडमिशन दिलवाने के लिए कहने लगा। अब चिंता रहने-खाने के खर्च को लेकर थी।

अब एक-दो महीने की बात हो, तब तो। यहां 3 साल हर महीने पैसों का बंदोबस्त कैसे हो पाएगा। पापा ने मना कर दिया, लेकिन मैं किसी तरह से उन्हें कंविंस करने में लगा रहा। पड़ोस में रहने वाले एक अंकल के जानने वाले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। उन्होंने कहा- राज को जाने दीजिए। रहने-खाने का बंदोबस्त हो जाएगा।

मैं यूनिवर्सिटी आ गया। पड़ोसी अंकल के उस जानने वाले के यहां रहने लगा। जैसे-तैसे एक साल बीता, तभी उनके घरवालों ने उन्हें बुला लिया। अब फिर से मुसीबत रहने खाने की…। आखिर में मुझे गांव वापस आ जाना पड़ा। फिर से चाय-पान बेचने लगा।’

राज एक वाकये का जिक्र करते हैं, जो उनकी लाइफ का टर्निंग पॉइंट रहा। कहते हैं, ‘इसी दौरान पड़ोस के एक लड़के का इंजीनियरिंग में एडमिशन हुआ था, वो भी डोनेशन से। गांव में तो जानते ही हैं कि लोग एक-दूसरे को ताने भी मारने लगते हैं।

उस लड़के की मां एक रोज आकर मेरी मम्मी से जौनपुरी लहजे में बोली- तोहार बेटा भी त पढ़त रहलू ह… (तुम्हारा बेटा भी तो पढ़ रहा था), अब हमार बेटा त इंजीनियर बनबू (मेरा बेटा तो अब इंजीनियर बनेगा)।

ये बात मम्मी ने मुझसे कहा- ऐ राज, तोहो त पढ़त रहलू ह…। तू इंजीनियर न बन सकेलू का (तुम भी तो पढ़ रहे थे, इंजीनियर नहीं बन सकते हो क्या।)’

राज कहते हैं, ‘मम्मी का ये दर्द मेरे दिमाग में बैठ गया। वो चेहरा मैं अभी भी याद कर पा रहा हूं। मैंने ठान लिया कि अगले साल इंजीनियरिंग का एंट्रेंस दूंगा और अब तो इंजीनियरिंग ही करूंगा। अगले साल ठीक ऐसा ही हुआ।’

इंजीनियरिंग करके एग्रीकल्चर की समझ?

राज कहते हैं, ‘पूरी लाइफ तो मैंने गांव में ही बिताई। इंजीनियरिंग करने के बाद कई वेंचर्स के साथ वेब डेवलपिंग और डिजाइनिंग को लेकर काम किया, अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी बनाई। 2017-18 में दिल्ली से वापस लखनऊ आकर वेबसाइट, टेक पार्ट डेवलप करने का काम करने लगा।

इस दौरान कई बार ऐसा भी लग रहा था कि जो काम मैं करना चाह रहा हूं, सोसाइटी को देना चाह रहा हूं, वो दे नहीं पा रहा हूं। जब 'ग्रामिक' का आइडिया आया, तब लगा कि अब सही समय है कुछ करने का।

मैंने सॉफ्टवेयर डेवलप किया, जिसके जरिए कोई भी दुकानदार ऑनलाइन खेती-किसानी से रिलेटेड प्रोडक्ट को बेच सकता था और किसान घर बैठे मंगवा सकता था। किसानों के बीच जाने लगा। उनसे बातचीत करने पर वही परेशानी सामने आई, जो शुरुआत में किसानों ने आपको बताई।’

राज ने 'ग्रामिक' को शुरू करने में 70 लाख रुपए का इन्वेस्टमेंट किया था। वो कहते हैं, ‘मेरी एक आईटी कंपनी भी है, इसी के प्रॉफिट को मैंने इस कंपनी में लगाया। बीज-खाद बनाने वाले देश के बड़े ब्रांड के साथ टाइ-अप किया।’

शुरुआत में दिक्कत नहीं आई?

राज कहते हैं, ‘आप दिक्कत की बात कर रहे हैं, कोई बैठने तक नहीं देता था। न मिलना चाहता था, न अपना समय देना चाहता था। आज आप मेरे ऑफिस में देखेंगे कि मेडिकल फर्म के MR की तरह लोग अपना प्रोडक्ट दिखाने, बेचने के लिए बैठे होते हैं।

जो छोटे दुकानदार थे, वो ऑनलाइन प्रोडक्ट बेचने से डरते थे। जो खाद-बीज बनाने वाली बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां थीं, वो नई कंपनी के साथ नहीं जुड़ना चाह रही थीं। काफी मशक्कत, जान-पहचान के कई लोगों से कहने-सुनने के बाद इन कंपनियों ने हम पर ट्रस्ट करना शुरू किया।

हम लखनऊ के अलावा पुणे में भी काम कर रहे हैं। यहां हमारा कॉर्पोरेट ऑफिस और लखनऊ में रीजनल ऑफिस है।'

राज मार्केटिंग स्ट्रैटजी को लेकर दिलचस्प वाकया बताते हैं। कहते हैं, ‘यदि हमें किसानों के बीच या लोकल लेवल पर बिजनेस करना है, तो वहां के किसी लोकल को ही लीडर बनाना होगा।

हम दो-तीन लेवल पर काम करते हैं। एक डिस्ट्रिक्ट लेवल पर और दूसरा ब्लॉक लेवल पर। कोई किसान मुझसे ज्यादा अपने गांव के ही किसी व्यक्ति पर विश्वास करता है। हम ऐसे ही लोगों को अपनी टीम में शामिल करते हैं, वो हमारे प्रोडक्ट को प्रमोट करते हैं, बेचते हैं।

इसके बदले उन्हें फिक्स सैलरी भी मिलती है। इसके अलावा गांव की महिलाओं को भी हम टीम में शामिल करते हैं, जो हमारे प्रोडक्ट को टारगेट बेसिस पर बेचती हैं, हर महीने घर बैठे 5 हजार तक कमाती हैं।

दरअसल, छोटे लेवल पर खेती-किसानी से रिलेटेड प्रोडक्ट को ऑनलाइन सेल करना आसान है। मान लीजिए कि आपको गेंदा के फूल का बीज मंगवाना है, तो यह तो आसानी से आ जाएगा, लेकिन किसी को 2 क्विंटल गेंहू का बीज या 5 क्विंटल खाद मंगवाना है, तो जितने का सामान नहीं होगा उससे ज्यादा लॉजिटिक कॉस्ट लग जाएगी।

इसलिए हम ब्लॉक और डिस्ट्रिक्ट लेवल पर अपना स्टोर ओपन करते हैं। ग्रामिक सेवा केंद्र खोलते हैं। जहां से किसान सीजन के हिसाब से बीज-खाद समेत अलग-अलग तरह के प्रोडक्ट खरीदते हैं। हम किसानों को फ्री में खेती से रिलेटेड जानकारी भी देते हैं। अभी 30 से अधिक एग्री-इकोनॉमिस्ट काम करते हैं।’

राज कहते हैं कि जब उन्होंने शुरुआत की थी तो महज 23 हजार किसान थे। आज उनके साथ साढ़े तीन लाख से अधिक किसान जुड़े हुए हैं। पहले बी टू बी (बिजनेस टू बिजनेस) में मुश्किल से 2-3 कस्टमर थे, आज साढ़े तीन हजार से अधिक क्लाइंट्स हैं।

2021-22 में राज की कंपनी ने 3 करोड़ का बिजनेस किया था, लेकिन 2022-23 में 83 करोड़ का और इस फाइनेंशियल ईयर का प्रोजेक्शन 300 करोड़ का है। पिछले 4 महीने में ही 100 करोड़ का बिजनेस हो चुका है। राज कहते हैं, 'हमारा 5-10% का मार्जिन है।'

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