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मौत के कुएं में बुलेट दौड़ाती हैं सोमा बसु, इनाम के पैसे से खरीदी है बुलेट, इनाम देने के बहाने करते हैं छेड़छाड़, नए बाप को लड़का चाहिए था, शराब पीकर मारता था

मैं सोमा बसु, अभी 25 साल की हूं और मौत के कुएं में बुलेट चलाती हूं। लकड़ी की दीवार पर 120 की स्पीड से सबसे भारी गाड़ी चलाना यानी हर पल मौत के मुंह में जाकर निकलना, पर मुझे डर नहीं लगता। मेरे लिए यह सिर्फ पेशा नहीं है, जिंदगी की धुरी है।


मैं कोलकाता से हूं। एडवेंचर राइडिंग की दुनिया में आए दस साल हुए हैं। मैं चार माह की थी, तो असली पिता की मौत हो गई। मां ने दूसरी शादी कर ली। नए बाप को लड़का चाहिए था, लेकिन एक के बाद एक मां को दो बेटियां और हो गईं। अब उस मर्द को मारने-पीटने के लिए तीन लड़कियां थीं।

वो दिन भर शराब पीता था, पैसे न हों तो मां को मारता। मुझे मारता। यहां तक कि अपनी सगी बेटियों को भी बेरहमी से मारता। इससे आप समझ सकते हैं कि मेरा बचपन किन हालातों में बीता होगा।

मां दिन भर काम करती थीं, बाप शराब पीता। घर के हालात से मैं इस कदर परेशान थी कि स्कूल से मेरा घर आने का मन ही नहीं करता। कभी मन करता कि कहीं और चली जाऊं तो कभी घर आने में तीन-चार घंटे देर कर देती थी। हर पल घुट-घुट कर जीना पड़ता था।

फ्रस्ट्रेशन के चलते एक बार स्कूल की छत से कूद गई थी। तब स्कूल में निर्माण का काम चल रहा था। जहां मैं कूदी वहां बालू रखा था, लिहाजा मुझे ज्यादा चोट नहीं आई।

मैं 10 साल से मौत के कुएं में बाइक राइड कर रही हूं। ये बुलेट इनाम के पैसे से खरीदी हूं।

कोलकाता में मैं जहां रहती थी, वहां से कुछ दूरी पर नवरात्रि का मेला लगता था। मम्मी अक्सर हमें मेला दिखाने से मना कर देती थीं, क्योंकि एक साथ बेटियों को संभालना उनके लिए आसान नहीं था। इसलिए वे हमेशा बहाना बना देती थीं।

मां कहतीं थीं कि मेले में चोर आते हैं, वे बच्चों को चुरा ले जाते हैं। कभी वो कहतीं कि मेले में ऊंचे-ऊंचे कुएं हैं, उसमें बच्चों को बंद कर दिया जाता है। ऐसा कहकर वो हमें डराना चाहतीं थीं कि हम मेला जाने के लिए जिद न करें।

एक दिन मौका देखकर मैं मेले में चली गई। तब मैं आठवीं में थी। मौत के कुएं के पास गई, तो पता चला कि इसकी दीवार पर गाड़ी चलती है। मुझे यकीन ही नहीं हुआ। मैं इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थी। मैं अपनी आंखों से देखना चाहती थी कि कैसे इस पर कोई गाड़ी चलाता है, लेकिन मेरे पास टिकट के पैसे नहीं थे।

मुझे बाहर से गाड़ी चलने की आवाज सुनाई पड़ रही थी, लेकिन बिना टिकट के मुझे अंदर नहीं जाने दिया जा रहा था। बहुत मिन्नतें करने के बाद मैं जैसे-तैसे अंदर पहुंच गई। वहां जब मैंने कुएं की दीवार पर गाड़ी चलाते देखा तो मुझे बहुत ज्यादा सरप्राइज नहीं लगा। मुझे तो लगा कि ये काम मैं भी कर सकती हूं।

खैर, मैंने वहां बाइक चलाने वाले से कहा कि मुझे भी सिखाओ। उसने हां या ना, कुछ नहीं कहा। वह मुझे देखकर हंसने लगा। मुझे बहुत खराब लगा। फिर मैं मौत का कुआं चलाने वाले मैनेजर हरीश चौधरी से मिली। मैं उन्हें बाबूजी कहती थी। वो सेना से रिटायर हुए थे।

लोग मेरा मजाक उड़ाते थे कि तुम लड़की हो, तुमसे नहीं हो पाएगा। बाइक चलाना मर्दों का काम है, पर मेरी भी जिद थी कि मैं बाइक चलाकर ही मानूंगी।

उन्होंने मुझसे कहा कि तुम बंगाली हो और एक लड़की हो। तुमसे नहीं हो पाएगा। मैंने कहा आप मौका तो दीजिए। इस पर उन्होंने नाराज होकर कहा- तुमको अगर बाइक चलानी है तो एक सप्ताह बाद दमदम आओ।

मैं घर आई और मम्मी को सारी बात बताई। मम्मी ने साफ मना कर दिया। वो रोने लगीं, लेकिन मैं अपनी जिद पर कायम रही। मन ही मन जाने की तैयारी करती रही। एक-एक करके अपने सामान पैक करती रही। इस तरह चार दिन गुजर गए। पांचवें दिन मैं अपना सामान लेकर रात को घर से निकल गई।

अगले दिन मैं दमदम पहुंच गई। वहां बाबूजी मुझे देखकर मुस्कुराए। उनसे मैंने बता दिया कि घर से भागकर आई हूं। इसके बाद उन्होंने मां तक मेरी खबर पहुंचवाई। मां को जब पता चला तो फौरन दमदम आ गईं।

वे मुझे साथ ले जाने की बात कहने लगीं, लेकिन मैंने साफ मना कर दिया। उनके बार-बार समझाने के बाद भी मैं वापस नहीं गई। इसके बाद मां ने मुझे 600 रुपए दिए और वो घर लौट गईं। उसके बाद मेरी असली दुनिया शुरू हुई।

तब मैं बाइक चलाना नहीं जानती थी। सबसे पहले मुझे बाइक चलाने की ट्रेनिंग दी गई। पहले प्लेन सड़क पर, ब्रेकर पर फिर भीड़ में। उसके बाद एक दिन मुझे रिंग में उतारा गया। तब मौत के कुएं में मारुति 800 चलाई जाती थी।

ट्रेनिंग के दौरान शुरुआत में मुझे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, लेकिन फिर मैं बाइक चलाने में माहिर हो गई। अब बहुत दूर-दूर से लोग मेरी राइड देखने आते हैं।

पहले दिन मुझे एक घंटे तक उल्टी होती रही। गाड़ी को गोल-गोल घुमाने के कारण रातभर मुझे चक्कर आता रहा, लेकिन बाद में जैसे-जैसे वक्त गुजरा मुझे आदत हो गई। करीब एक महीने तक मुझे मारुति 800 के अंदर बैठाकर ट्रेनिंग दी गई।

एक महीने में मैं ट्रेंड हो चुकी थी, लेकिन मुझे दीवार पर ऊपर गाड़ी ले जाने नहीं दिया जाता था। लोग मेरा मजाक भी उड़ाते थे। कई बार तो लोग लड़की हो बोलकर डांट देते थे, चुप करा देते थे। मैं छोटी थी और नई-नई थी, तो डरकर चुप हो जाती थी। खैर मैं डटी रही। जब बाबूजी रहते तो मुझे भरपूर मौका मिलता। वे लोग बाबूजी के सामने मना नहीं कर पाते थे। इस तरह धीरे-धीरे मैं मैच्योर हो गई।

एक दिन की बात है। सभी लोग बाहर गए थे। रिंग में केवल एक लड़का था, जो वहां साफ-सफाई का काम देखता था। मैंने बाइक उठाई और दीवार पर दौड़ा दी। पहली बार में मुझे ऐसा लगा कि मैंने कुछ जीत लिया है। मैं 10 मिनट तक बाइक चलाती रही।

जब बाबूजी वापस आए, तो उस लड़के ने उन्हें सारी बात बता दी। मुझे लगा कि अब तो मेरी छुट्टी हो जाएगी, लेकिन बाबूजी नाराज नहीं हुए। उन्होंने कहा कि अगर इसने गाड़ी चलाई है तो फिर मिठाई लाओ। उस दिन पांच किलो मिठाई आई।

उसी दिन बाबूजी ने बताया कि हम लोग अब राजगीर जाने वाले हैं। मैंने पहला शो इसी राजगीर में किया। बाबूजी उसी मारुति 800 में बिठाकर मुझे राजगीर लाए थे। मैं कभी घर से बाहर नहीं निकली थी, मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं विदेश जा रही हूं। रास्ते में मैं पूरी रात खिड़की के बाहर देखती रही। चाहे अंधेरा दिखे या कुछ रोशनी, मैं बस बाहर ही देखती रही। रास्ते में कभी-कभी मां की याद आती रही।

भले ही मैंने अपनी जिद से राइडिंग का फैसला किया, लेकिन मुझे मुकाम तक पहुंचाने में मेरी मां का सबसे बड़ा योगदान है।

मुझे आज भी मां की याद आती है। वह सुपर मॉम हैं। उन्होंने तीन बच्चों को पाला। कभी किसी के साथ भेद नहीं किया। अभी मैं मौत के कुएं के लिए राजगीर आई हूं, तो मां ने मुझे 10 हजार रुपए दिए हैं। मैं इससे कैमरा खरीदूंगी।

आज मैं बाइक राइडिंग के साथ ही यूट्यूबर भी हूं। इसका क्रेडिट भी मां को ही जाता है। उनके कहने पर ही मैंने यूट्यूब पर वीडियो बनाना शुरू किया। मैं जल्द ही कश्मीर से कन्याकुमारी तक बुलेट से जाने का प्लान कर रही हूं।

मैंने नई बुलेट भी खरीद ली है। ये बुलेट मैंने इनाम के पैसे से खरीदा है। जब हम लोग गाड़ी चलाते हुए कुएं की दीवार पर ऊपर जाते हैं, तो देखनेवाले पैसा पकड़ाते हैं। मैं ड्राइव करते हुए पैसे लेने में एक्सपर्ट हूं। ड्राइव करते वक्त मेरी पॉकेट और मुंह पैसों से भर जाता है। कई बार इसमें एक्सीडेंट भी होता है। तीन बार मैं हादसे का शिकार भी हुई हूं, पर क्या करें, पैसे लेना बंद तो नहीं कर सकते। उसी से तो जिंदगी चलती है।

एक बार पैसा लेते वक्त मेरी बाइक दूसरे बाइक से टकरा गई। तब मैं बुलेट खरीदने के लिए पैसे जुटा रही थी। मुझे लगा कि अब जो कुछ पैसे मैंने बचाए, वो सब इलाज में खर्च हो जाएंगे। पर मैंने हिम्मत की और अगले दिन गर्म पट्टी बांधकर रिंग में आ गई।

इस वीडियो में देखिए कैसे मौत के कुएं में बाइक चलाते हुए मैं लोगों के हाथ से इनाम ले रही हूं।

मुझसे चला नहीं जाता था, तो शो में ऐसा होता था कि मैं कुर्सी लगाकर बैठ जाती थी। पब्लिक आती थी। एक लड़का मुझे बाइक स्टार्ट करके देता था। फिर मैं बाइक लेकर शो करती थी। नीचे आती थी और कुर्सी पर बैठ जाती थी। मुझे दर्द से ज्यादा मजा उसमें गाड़ी चलाने पर आता था।

मेरा सेना में जाने का सपना था, पर हाइट कम होने की वजह से नहीं जा सकी। मुझे पुलिस के लोग बुलाते हैं। मुझसे शो करवाते हैं। मैंने 26 जनवरी-15 अगस्त पर दिल्ली में पुलिस और सेना के लोगों के साथ स्टंट किया है। इस साल 15 अगस्त को भी मैंने स्टंट किया था।

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