सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हलीम रेहड़ी लगाने वाला मोहम्मद कासिम बन गया जज, न्याय के लिए लोगों को गिड़गिड़ाते देख आया ख्याल

उत्तर प्रदेश के संभल में पिछले दिनों एक खबर पढ़ी थी कि इस इलाके में एक हलीम बेचने वाले का बेटा जज बन गया है। लड़के की उम्र 29 साल है।

इस इलाके की आबादी घनी है, लेकिन गरीबी और मूल सुविधाओं की कमी। ईंट की बनी पतली-सी सड़क है, जिसके दोनों तरफ खुली नाली बह रही है। कुछ किलोमीटर अंदर बढ़ने पर एक घर दिखता है, जो मोहम्मद कासिम का है। घर के भीतर से लजीज खाने की खुशबू आ रही है। अंदर का नजारा बिल्कुल अलग दिखता है। मो. कासिम के पिता चूल्हे पर एक हांडी चढ़ा रहे हैं। कासिम उनका हाथ बटा रहे हैं। वो मिर्च-प्याज काट रहे हैं।

हलीम अपने परिवार के साथ 

कासिम कहते हैं, 'हलीम'।

कासिम कहते हैं, ‘हलीम वेज और नॉनवेज दोनों तरह का होता है। यह सभी तरह के दाल, जौ, गेहूं, चावल और छोले से मिलकर बनता है। इसमें कई तरह के मसालों का भी इस्तेमाल होता है।’ मोहम्मद कासिम के अब्बू मोहम्मद वाली के मुताबिक हलीम को धीमी आंच पर करीब 7-8 घंटे तक पकाया जाता है।

पुराना वाला ढहा हुआ घर में 8 भाई-बहन पले-बढ़े हैं।3 भाई और 5 बहन हैं। कासिम के जज बनने की खबर जब से आई है, इनके घर के बाहर लोगों का जमावड़ा लगा रहता है। दूर-दूर से युवा इनसे मिलने आ रहे हैं।

जब पूरे घर का खर्च इसी पर टिका हुआ था, तो काम तो करना पड़ेगा न। कभी-कभी पापा की उम्र देख सोचता था कि इतने बुजुर्ग होकर भी पापा सुबह 3 बजे से हलीम बनाना शुरू कर देते हैं। पूरा परिवार उनके साथ इसी काम में लगता है, तब जाकर हमारा गुजारा हो पाता है।’

वो कहते हैं, ‘हां इसके पीछे कहीं न कहीं समाज ही तो है। मेरे इलाके की आबादी तकरीबन 10 हजार से अधिक है, जो एक विशेष समुदाय की है। अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूर हैं। पढ़े-लिखे भी बहुत कम यहां मिलेंगे। कई बार ऐसा हुआ कि फर्जी मामले में इलाके के लोगों को जान-बूझकर फंसाया गया। यही सब देख मुझे लगता था कि इन असहाय लोगों के लिए कोर्ट ही एक अंतिम सहारा होता है। वकालत की पढ़ाई शुरू की, तब पता चला कि पुलिस 24 घंटे से ज्यादा कस्टडी में किसी को नहीं रख सकती है। उसे कोर्ट में पेश करना होता है, लेकिन हमारे यहां तो अलग ही कानून चलता है।’

कासिम कहते हैं उस वक्त खाना बनाना तो आता नहीं था। मैं कप-प्लेट धोता था, कस्टमर को हलीम परोसता था। जब थोड़ा बड़ा हुआ, तो अपनी रेहड़ी लगानी शुरू कर दी। दिल्ली में रहने की जगह नहीं थी, तो कब्रिस्तान के पास झोपड़ी बनाकर रहता था। अक्सर ऐसा होता था कि पुलिस रेहड़ी उठाकर फेंक देती या तोड़ देती।’

कासिम कहते हैं, ‘अब आप ही बताइए, जितने की रेहड़ी नहीं, उससे अधिक का तो चालान। कोई गरीब दिहाड़ी करने वाला आदमी कहां से ये रकम चुकाएगा।

1994 की बात है। पापा दिल्ली से वापस संभल आ गए। यहीं पर हलीम बेचने लगे। जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ, तो मैं भी पापा की मदद करने लगा। वो हलीम बेचते, मैं कस्टमर को परोसता। उनके जूठे कप-प्लेट धोता। आप यह कह सकते हैं कि मेरे और पापा के शुरुआती जीवन में ज्यादा अंतर नहीं रहा।

कई बार ऐसा भी होता कि लोग मुझे गाली देने लगते। अपशब्द बोल बैठते। मैं चुपचाप सुनता रहता। एक बार तो मैं पेट्रोल पंप पर पानी भरने गया था। उसके मालिक ने मेरी पिटाई कर दी। बहुत बुरा-भला कहा।’

वो कहते हैं, ‘कभी सोचा नहीं था कि जज बनूंगा या एडवोकेट…। जिस इलाके में पानी-बिजली न हो। रास्ते न हो। पढ़ने-लिखने का माहौल न हो। हर दिन लड़ाई-झगड़ा। पुलिस का डंडा...। वहां से निकलकर यहां तक आना बहुत मुश्किल है।

इसके बावजूद मैं पढ़ने-लिखने के लिए हमेशा से समय निकाल लेता था। सुबह रेहड़ी पर हलीम बेचता, फिर स्कूल चला जाता। स्कूल भी क्या, सरकारी स्कूल। पेड़ के नीचे पढ़ाई होती थी। बोरी पर बैठता था। 10वीं में तो फेल भी हो गया था।

उसके बाद मन किया कि अब पढ़ाई छोड़कर हलीम ही बेचूंगा, जैसे अब्बू या मेरे दोनों भाई बेचते हैं। फिर मां की एक लाइन याद आई। वो ये कि- ‘पूरी जिंदगी क्या हलीम ही बेचते रहोगे। कब तक हम इस तरह से रहने को मजबूर होंगे।

यह लाइन हमेशा ही मुझे झकझोर देती थी। उनके आंसू मैं देख नहीं पाता था। वो आंसू ही मुझे परिवार से अलग कुछ करने की हिम्मत देते थे। इसके बाद मैंने अपना फोकस फिर से पढ़ाई पर किया।’

कासिम कुछ देर चुप रहते हैं। मैं उनसे पूछता हूं, सब ठीक है न। जवाब में कहते हैं, ‘5 बहनें हैं। हर बहन की शादी में लाख रुपए से ज्यादा का कर्ज हो जाता था। एक का कर्ज अब्बू चुकाते, तब तक दूसरा कर्ज सिर पर सवार हो जाता।

बड़ी दुविधा थी। 12वीं के बाद मैं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) चला गया। यदि नहीं जाता, तो शायद आज भी हलीम ही बेच रहा होता। मैं अपने एरिया में जिस तरह से लोगों को न्याय के लिए गिड़गिड़ाते हुए देखता था, वहीं से एडवोकेट बनने का ख्याल आया।

मेहनत की बदौलत BA LLB में एडमिशन हो गया। अब हिंदी मीडियम का छात्र, सारी किताबें अंग्रेजी में, तो क्या समझ आएगा। मैं परेशान रहने लगा। एक रोज मेरे एक प्रोफेसर ने समझाया कि यदि मैं वाकई में कुछ करना चाहता हूं, तो अंग्रेजी पढ़ना पड़ेगा। दो साल में मैंने अपनी अंग्रेजी ठीक कर ली।

बैचलर कम्प्लीट करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन हो गया। एंट्रेंस एग्जाम में पहला रैंक आया था। मास्टर के दौरान पता चला कि जो लोग वकालत करते हैं, वह ही जज भी बनते हैं। आप मेरी बातों पर यकीन नहीं करेंगे, लेकिन मुझे यह बात बहुत देर से पता चली। इसके बाद मैंने जज बनने का सपना देखना शुरू किया, लेकिन सच कहूं तो ये सपना 2012 से देख रहा था।

जब मैं गांव आता, तो यहां के लोग भी ताने मारते थे। जज साहब जा रहे हैं, ये कहकर मुझे चिढ़ाते थे।’

कासिम अब मुझे अपनी रेहड़ी दिखाने के लिए लेकर चलते हैं। कहते हैं- चलिए मैं आपको वो जगह दिखाता हूं जहां मैं और पापा अलग-अलग रेहड़ी लगाते थे। कुछ देर बाद मैं और कासिम उस जगह पर पहुंच जाते हैं।

जगह दिखाने के बाद कासिम फिर से अपने कॉलेज के दिनों की कहानी सुनाते हैं। कहते हैं, ‘जब अलीगढ़ यूनिवर्सिटी गया, तो कपड़े भी ज्यादा नहीं थे। दूसरे बच्चों की तरह मैं ब्रांडेड कपड़े नहीं पहन सकता था। वो तो अच्छा था कि कॉलेज में यूनिफॉर्म था, नहीं तो पता नहीं क्या होता।

जब मेरी फोन पर मां से बात होती थी, तो वो यही कहती थी- तुम जज कब बनोगे। मेरे पास शायद ये आखिरी मौका था, हालांकि पहला अटेम्प्ट था, लेकिन यदि मैं इस बार यूपी लोक सेवा आयोग का एग्जाम क्रैक नहीं कर पाता, तो हो सकता था कि मां को खो बैठता।’

कासिम अपने रिजल्ट वाले दिन का हाल सुनाते हैं।

कासिम कहते हैं, ‘रिजल्ट वाले दिन मैं अलीगढ़ में ही था। जब रिजल्ट आया, तो मैंने तय किया कि नाम सर्च करके रिजल्ट नहीं देखूंगा। मैंने एक-एक करके सारे नाम पढ़ने लगा। 135वें नंबर पर नाम दिखते ही, मैं कांपने लगा।

आप यकीन नहीं करेंगे, मेरे हाथ-पैर कंपकंपा रहे थे। मैंने पहले अपने कुछ दोस्तों से कहा कि जरा चेक करो, तो कि मैं ही हूं न इस लिस्ट में। कन्फर्म होने के बाद मैंने सबसे पहले अपने छोटे भाई कादिर को फोन किया।

जैसे ही कहा कि मैं सिविल जज बन गया हूं। भाई फोन पर ही जोर-जोर से चिल्लाते हुए घर से बाहर निकला और फिर ये बात पूरी इलाके को पता चल गई। फिर इलाके से बाहर बात गई और इस तरह आप तक भी…।'

कासिम और मैं दोनों मुस्कुरा देते हैं। रात हो चली है, मुझे अब दिल्ली के लिए निकलना है। कासिम के अब्बू अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखते हुए कहते हैं- ‘मैं तो बस इतना चाह रहा था कि ये कहीं सेटल हो जाए, ताकि एक बूढ़े बाप को सहारा मिले।

उमर से ज्यादा आग की लपटों के बीच रहने से इन चमड़ियों पर झुर्रियां पड़ गई हैं। अब अल्लाह ने तो छप्पर फाड़कर रहमत बरसा दी।’

टिप्पणियाँ