1991 में राजेश खन्ना की फिल्म घर-परिवार आई थी। इस फिल्म में अभिनेत्री लोगों के कपड़े सिला करती थी। उससे जो कमाई होती वह वह अपने बच्चों की स्कूल फीस भरती थी। इस फिल्म का प्रयागराज की अफसाना पर गहरा असर पड़ा। पति साईकिल रिपेयरिंग से इतना नहीं कमा पाते थे कि परिवार के खर्च के साथ बच्चों को पढ़ाया जा सके। इसलिए अफसाना ने सिलाई का काम शुरू किया। जो पैसे आए उससे अपने बच्चों को पढ़ाया।
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| अहद अपने पिता के साथ |
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| अहद की माँ |
अफसाना का समर्पण और बेटे की मेहनत रंग लाई। बेटे ने पहले ही प्रयास में PCS-J की परीक्षा पास कर ली। रिजल्ट आया तो उसने मां से कहा- ‘मां, मैं जज बन गया।’ मां के दिमाग में एकबारगी बचपन से लेकर अब तक का वक्त घूम गया। उन्होंने जो सोचा था हकीकत हो गया। खुशी में जो आंसू निकले वह लंबे वक्त तक थमे ही नहीं।
35 साल से घर में साईकिल रिपेयरिंग की दुकान
प्रयागराज जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी दूरी पर बरई हरख गांव है। यहां शहजाद अहमद अपनी पत्नी अफसाना और तीन बच्चों के साथ रहते हैं। घर के बगल ही उनकी साईकिल रिपेयरिंग की दुकान है। यह दुकान उनके पिता ने 1985 के आस-पास खोली थी।
शहजाद का मन पढ़ाई में नहीं लगा और वह 10वीं में फेल हो गए। इसके बाद वह पिता के साथ रहकर साईकिल रिपेयरिंग का काम सीखा और दुकान पर बैठने लगे। कुछ वक्त के बाद बगल में ही छोटे भाई को जनरल स्टोर की दुकान खुलवा दी। अब दोनों भाई दिनभर अपनी दुकान पर काम करने लगे।
साईकिल रिपेयरिंग की दुकान से जो कमाई होती उससे परिवार का खर्च तो चल जाता लेकिन तीन बच्चों की पढ़ाई का खर्च निकालना मुश्किल था। ऐसे कठिन वक्त में शहजाद की पत्नी अफसाना ने बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा संभाला। उन्होंने पैसे इकट्ठा करके किसी तरह सिलाई मशीन खरीदा और फिर गांव की ही महिलाओं का कपड़ा सिलने लगीं। इससे जो कमाई होती वह उससे अपने बच्चों की फीस जमा करती थीं। बड़े बेटे ने पढ़ाई करके प्राइवेट नौकरी ज्वॉइन कर ली।
8वीं के बाद अहद ने घर छोड़ दिया
अफसाना ने अपने दूसरे नंबर के बेटे अहद अहमद का नाम गांव के ही स्कूल में लिखवाया था। 8वीं तक पढ़ाई के बाद अहद ने कहा कि उन्हें पढ़ाई के लिए प्रयागराज जाना है। परिवार की स्थिति ऐसी नहीं थी कि उन्हें भेज सकें। लेकिन अफसाना पढ़ाई का महत्व जानती थीं। उन्होंने बेटे को प्रयागराज भेज दिया। अहद ने वहां गवर्नमेंट इंटर कॉलेज में अपना नाम लिखवाया। 12वीं तक की पढ़ाई के बाद अहद ने कानून की पढ़ाई करने की इच्छा जताई। 2014 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में BA LLB का इंट्रेंस भी दे दिया।
अहद के नंबर तो इतना आ गए कि उनका सिलेक्शन हो जाएगा। लेकिन, हर साल लगने वाली 38 हजार फीस का बंदोबस्त नहीं हो पाया। हमने शहजाद से पूछा कि फीस का इंतजाम कैसे किया? वह कहते हैं, “एक साल की फीस 38 हजार रुपए बहुत होती है। एक बार एडमिशन हुआ, तो 5 साल लगातार देना होगा। इसलिए पहले तो हिचके, लेकिन बेटे के मन को देखते हुए कर्ज लेकर दे दिया। अहद ने मन लगाकर पढ़ाई की और पूरा कर लिया।”
आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं इसलिए घर वापस चले आए
BA LLB करने के बाद अहद प्रयागराज से वापस अपने घर आ गए। एक सीनियर के जरिए कभी-कभी इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने जाते थे। घर से जाने के लिए रोज 100 रुपए मिलते थे। कोविड आया तो कोर्ट बंद हो गया।
अहद ने घर पर ही रहकर पीसीएस-जे की तैयारी शुरू कर दी। पैसे नहीं थे इसलिए कोचिंग नहीं की। अहद बताते हैं, “प्री परीक्षा बहुत अच्छी हुई। घर आकर जब सवालों को मिलाया तो करीब 320 नंबर से ज्यादा सही दिखे। जबकि मेरिट 280 के आसपास रहती है। उसी दिन से मैं मेंस की परीक्षा तैयारी में जुट गया।”
अहद कहते हैं, "मैं मेंस के लिए कुछ कोचिंग में गया। क्योंकि मैं किसी तरह से रिस्क नहीं लेना चाहता था। कोचिंग वालों ने मना कर दिया। उनका कहना था कि हम बाहरी बच्चों का प्रैक्टिस पेपर नहीं करवाते। इसके बाद मैं मुजीब सिद्दीकी सर के पास गया। उनको पूरी बात बताई। उन्होंने मुझे भरोसा दिया कि तुम्हें इंटरव्यू तक पहुंचाऊंगा। जब पहले प्रैक्टिस पेपर लिखा तो 110 नंबर ही आया। मन थोड़ा सा डगमगाया लेकिन उन्होंने भरोसा दिया कि आगे बेहतर होगा। मैंने मेहनत की और दोबारा कॉपी लिखा। उस वक्त मुजीब सर ने कॉपी देखकर कहा था, ये एक जज की कॉपी है।"
अहद ने मेंस परीक्षा भी निकाल ली। अब उनके सामने इंटरव्यू था। कल्पराज सिंह के बोर्ड में अहद का इंटरव्यू होना था। इसमें दो रिटायर्ड जज और एक प्रतिष्ठित कॉलेज के डीन शामिल थे। इंटरव्यू में विषय से अधिक प्रैक्टिकल सवाल पूछे गए।
अहद कुछ का जवाब तो दे पाए लेकिन कुछ सवालों में वह असहज हो गए। बाहर निकले तो थोड़ा निराश थे। उन्हें लगा कि यहां अपना बेहतर नहीं दे पाए। मन में तमाम सवाल लेकर घर वापस आ गए। यह मान लिया था कि जब रिजल्ट आएगा तो खुद नहीं देखेंगे।
रिजल्ट आया तो मां से कहा- मां, मैं जज बन गया
30 अगस्त की शाम यूपी लोक सेवा आयोग ने रिजल्ट जारी कर दिया। अहद ने रिजल्ट नहीं देखा क्योंकि उन्होंने तय किया था कि जब पास हो जाऊंगा तो कोई न कोई दोस्त फोन जरूर करेगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही। एक दोस्त ने फोन किया और बताया कि तुम पास हो गए। तुम्हारी 157वीं रैंक आई है।
अहद को भरोसा नहीं हो रहा था। उन्होंने अपना रिजल्ट देखा। एक बार, दो बार, तीन बार, कुल मिलाकर पांच बार देखा। कभी रोल नंबर मिलाते तो कभी नाम की स्पेलिंग देखते। जब एकदम क्लियर हो गया कि मैं ही हूं तब वह सबसे पहले अपनी मां के पास पहुंचे और कहा- मां मैं जज बन गया।
मां ने अहद को गले से लगा लिया। आंखों से आंसू बह निकले। मानों वर्षों की तपस्या का सुखद फल मिल गया हो। बात पिता तक पहुंची। वह दुकान छोड़कर घर आ गए। इसके बाद तो पूरे इलाके में चर्चा हो गई कि शहजाद पंचर वाले का लड़का जज बन गया।
मैं सिलाई करती और अहद पेटीकोट सिलता था
हमने अहद की मां से पूछा, आपने यह सब कैसे किया? उन्होंने खुद के आंसू पोछे और कहती हैं, “मैंने कोई पढ़ाई नहीं की। अनपढ़ हूं। जब शादी हुई थी तब मैंने घर-परिवार फिल्म देखी थी। उसमें एक महिला सिलाई करके बच्चों को पढ़ाती थी। मैंने तभी सोच लिया था कि मैं भी ऐसा करूंगी। जब मैं सिलाई करती तो मेरे साथ अहद पेटीकोट सिलता था। 10 रुपए एक पेटीकोट के मिलते थे। उस वक्त दिनभर में 100-200 रुपए की कमाई हो जाती थी।”
अहद के पिता शहजाद कहते हैं, “अहद बहुत सीधा बेटा था। कोई जिद नहीं करता था। उसे हर परिस्थिति में रहना आता था। जब उसने वकालत की पढ़ाई की और प्रैक्टिस करने लगा तो हम सिर्फ उसे 100 रुपए किराए का देते थे। लोगों से सुना था कि 10-15 साल ऐसे ही गुजर जाते हैं, फिर कुछ कमाई होती है। हमें तो कभी लगा ही नहीं कि इन्हें इतनी बड़ी सर्विस मिल जाएगी। अब जज बन गए हैं तो देखकर बहुत अच्छा लगता है।”
शहजाद एक जरूरी बात करते हैं, वह कहते हैं- हमारे पास दुकान के अलावा कुछ है नहीं, इसमें रहेंगे तो खाएंगे क्या। इसलिए बच्चों को पढ़ाना बेहतर समझा। आज बेटा सफल हो गया तो अच्छा लगता है।
अहद की यह कहानी गांव के युवाओं में एक उम्मीद जगाती है। उन्हें यह प्रेरणा देती है कि परिस्थिति कैसी भी हो अगर मेहनत ईमानदारी से की जाए तो बड़े से बड़े लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

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