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राम भजन ने 8वें अटेम्प्ट में क्रैक की UPSC, माँ के साथ 10 रुपए के लिए 25 टोकरी पत्थर तोड़ने पड़ते थे

2022 UPSC सिविल सर्विसेज एग्जाम में राम भजन को 667वीं रैंक मिली है। ये उनका 8वां अटेम्प्ट था। दिल्ली पुलिस में हेड कॉन्स्टेबल के पद पर रहते हुए राम भजन ने यह सफलता हासिल की है।


राम भजन हंसते हुए कहते हैं, ‘आप ऑनलाइन पेमेंट और कैब सर्विस की बात कर रहे हैं। अभी भी ये इलाका थोड़ा पिछड़ा हुआ है। अब तो हालात ठीक हुए हैं, नहीं तो पहले पीने का पानी भी नहीं था। कोसों दूर से पानी लाना पड़ता था।'

आपके गांव में पहले भी किसी ने UPSC निकाला है?

राम भजन जवाब देते हैं- 'नहीं सर। मैं इस गांव का इकलौता हूं, जिसने सिविल सर्विसेज एग्जाम क्रैक किया है। अपने परिवार में भी मैं पहला था, जिसकी सरकारी नौकरी लगी थी। UPSC रैंक के मुताबिक इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट सर्विस की पोस्ट मिली है। ट्रेनिंग के लिए कुछ दिन बाद ही लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी जाना है। आपका जब कॉल आया था, तो उसी की पैकिंग कर रहा था।’

घर के दरवाजे के एक तरफ कुछ बकरियां और दूसरी तरफ भैंस बंधी हुई है। घास काट कर रखी हुई है। जब मैं पहुंचा तो राम भजन की मां बकरी को चारा खिला रही थीं।

राम भजन कहते हैं, ‘दूसरों के लिए ये मवेशी है, कहने को बकरी है, लेकिन ये हमारी जिंदगी है। लाइफ लाइन… पापा पहले बकरी चराने ही जाते थे। अब खरीदकर दूध खाने के पैसे हों, तब तो दूध-दही खाएं। बकरी का दूध पीकर ही बड़ा हुआ। पापा तो अब इस दुनिया में नहीं रहे। उन्हें अस्थमा था। कोरोना के दौरान उनकी मौत हो गई।

उनके जाने के बाद काफी टूट गया था। एक ही बात दिमाग में बैठ गई थी कि अब तो सब कुछ खत्म हो गया। UPSC क्रैक करके क्या कर लूंगा। यही सोचकर कि सपना तो कुछ बचा ही नहीं, कई महीने डिप्रेशन में रहा...।’

मैं और राम भजन, दोनों खाट पर बैठे हुए हैं। सामने उनकी मां बैठी हैं। कुछ देर बाद मैं राम भजन से गांव और वो जगह, जहां वो कभी पत्थर तोड़ा करते थे, दिखाने के लिए कहता हूं।

हम दोनों बाइक से गांव की ओर निकल पड़ते हैं। राम भजन के घर से ही इस बापी गांव की शुरुआत होती है। करीब 5 हजार घरों की आबादी वाले गांव में 200 से अधिक घर कुम्हार जाति के हैं।

राम भजन मुझे 90 के दशक में लेकर चलते हैं। कहते हैं, ‘4 भाई-बहन हूं। जब बकरी-मवेशी चराने से घर का गुजारा नहीं हो रहा था, तो पापा शहर से आईस्क्रीम खरीदकर गांव में बेचने लगे, लेकिन इससे भी सारी चीजों की पूर्ति हो पाना मुश्किल था।

बापी में इंडस्ट्रियल एरिया है, जहां पत्थर तोड़ने की मशीनें लगी हुई हैं। चूना-पत्थर तोड़ा जाता है। बाद में पापा पत्थर तोड़ने लगे। मैं उस समय बहुत छोटा था। तकरीबन 5-6 साल उम्र रही होगी।

1998 की बात है। कुछ महीने बाद पापा को अस्थमा हो गया। सांस में बढ़ती तकलीफ की वजह से उन्होंने बिछावन (बिस्तर) पकड़ लिया। पत्थर तोड़ने का काम छोड़ना पड़ा। अब घर चलाने के लिए किसी को तो काम करना ही था। फिर मां पत्थर तोड़ने के लिए जाने लगी। मैं भी मां के साथ पत्थर तोड़ने के लिए जाने लगा।’

बातचीत करते-करते हम दोनों उस जगह पहुंच जाते हैं, जहां राम भजन पत्थर तोड़ते थे। यहां बड़े-बड़े आकार के पत्थरों के ढेर लगे हुए हैं। कुछ मजदूर पत्थर तोड़कर सामने गोलाकार बनी भट्ठी में डाल रहे हैं।

राम भजन पत्थर तोड़कर भी दिखाते हैं। कहते हैं, ‘कैसे उस दिन को भूल सकता हूं। मां के साथ मैं पत्थर तोड़ने, चुनने के लिए आता था। जब थोड़ा बड़ा हुआ, तो मां को साइकिल पर बैठाकर लाता था। पत्थर तोड़ना भी एक कला है, नहीं तो आप जैसे ही हथौड़ा मारेंगे, पत्थर शरीर के किसी भी हिस्से में उड़कर लग सकता है। चोटिल कर सकता है।'

वो बताते हैं, 'जब मुझे पत्थर तोड़ना नहीं आता था, तो हर जगह चोट लग जाती थी। खून निकल आता था। हाथों में छाले पड़ जाते थे। धीरे-धीरे पत्थर तोड़ना सीख गया। मां पत्थर को टोकरी में रखकर ढोती, मैं पत्थर तोड़ता। पढ़ाई के साथ-साथ पत्थर तोड़ने का सिलसिला कई सालों तक चलता रहा।

हर रोज 25 टोकरी पत्थर तोड़कर भरता। इसके बदले मुझे 10 रुपए मिलते। शरीर थककर चकनाचूर हो जाता, लेकिन मजबूरी भी थी। ये भी पता था कि यदि नहीं करूंगा तो घर कैसे चलेगा। पढ़ाई का खर्च कैसे निकलेगा।

हर वक्त यही सोचता था कि घर की स्थिति क्या हमेशा ऐसी ही रहेगी। जैसे जी रहे हैं, जैसे पैदा हुए, वैसे ही मर जाएंगे?’

राम भजन के साथ मैं भट्ठी के निचले हिस्से में पहुंचता हूं। ऊपर से पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़ों को डाला जा रहा है। नीचे से पके हुए पत्थर को निकाला जा रहा है। दूसरी जगह के मुकाबले इस लोकेशन का टेम्प्रेचर काफी ज्यादा है।

पसीने से शरीर तरबतर हो रहा है। सामने एक महिला पत्थर निकाल रही है, इसे टोकरी में भर रही है। राम भजन कहते हैं, ‘हम सिर्फ यहां खड़े हैं, तब इतना पसीना...। आप समझ सकते हैं कि इन महिलाओं का क्या हाल होता होगा। मैं अपनी मां के साथ इसी तरह से काम करता था।’

अब मैं राम भजन से उनके पुराने घर चलने के लिए कहता हूं। इस दौरान उन्हें कुछ और पुरानी बातें याद आ रही हैं। वो कहते हैं, 'इसी गांव में मैं भूसा ढोता था। लोग कई-कई घंटे काम करवाते थे, फिर उसके बदले 5-10 रुपए देते थे। यहां तक कि दूसरे के यहां टीवी देखने जाता था, तो उसके बदले भी वो मुझसे कोई काम करवा लेता था।'

घर का आंगन कांटेदार झाड़ियों के सहारे घेरा हुआ है। वे बताते हैं, ‘एक कमरा, चार भाई-बहन, मम्मी-पापा… आप अंदाजा लगाइए कि हम लोग कैसे एक ही कमरे में गुजारा करते रहे होंगे।

बरसात के दिनों में तो बमुश्किल ही हम लोगों में से कोई सो पाता था। कहां सोते, खाट बिछाने की भी जगह होनी चाहिए...।

बिजली नहीं थी तो दवा की बॉटल को ढिबरी बनाकर पढ़ता था। पता भी नहीं था कि रोटी और सब्जी भी एक टाइम का खाना होता है। घर में रोटी के साथ कुछ चटनी वगैरह बन गई, मतलब खाना बन गया। अपनी जमीन भी नहीं कि खेती-बाड़ी कर लो। बाजार से खाना खरीदने के पैसे नहीं थे।

स्कूल जाने के लिए भी कपड़े नहीं होते थे, जो घर में पहना, वही पहनकर स्कूल जाना पड़ता था। पूरा पैंट ही सिलाई से भरा होता था। हर जगह धागे टांके होते थे।

मां भी खुद के लिए कई-कई सालों बाद नए कपड़े खरीदती थी। पुराने कपड़े से ही वो अपना गुजारा करती थी। कई बार ऐसा भी होता था कि कोई दूसरा अपना पुराना कपड़ा दे देता था, तो वो भी हमारे लिए नया लगता था। दूसरों का दिया हुआ कपड़ा भी खुशी-खुशी पहन लेता था।

मुझे याद है- बाद में एक सेट कपड़ा कहीं आने-जाने के लिए खरीदा गया था। इसे हम आने-जाने का कपड़ा कहते थे। साल में एक-दो बार पहन लिए, बस हो गया। घर के हालात ऐसे थे कि बहन की शादी में भी मेरा कपड़ा बहुत मुश्किल से खरीदा गया।’

गांव से गुजरने पर भी हर दूसरा व्यक्ति राम भजन को टोक रहा है। सलाम-नमस्ते कर रहा है। वो कहते हैं, ‘आज मैं गांव के बच्चों के लिए रोल मॉडल बन गया हूं। लोग गर्व कर रहे हैं। अब तक इस गांव से किसी ने UPSC तो छोड़िए, ढंग की कोई सरकारी नौकरी तक नहीं की थी। घर से तो मैं पहला हूं ही। यहां तक कि 10वीं-12वीं से कोई आगे नहीं पढ़ पाया। मेरे भाई ने 12वीं की है, जबकि दोनों बहनें पढ़ी-लिखी नहीं हैं।’

दोपहर हो चली है। राम भजन के साथ मैं उनके नए घर लौट आता हूं। कुछ साल पहले ही इन्होंने इसे बनाया है। वो कहते हैं, ‘अब 14 साल दिल्ली पुलिस में नौकरी किया है, तो रहने का एक ठिकाना भी नहीं बनाता क्या। यही नौकरी मेरी सक्सेस की पहली सीढ़ी है।

वो कहते हैं, '2008-09 का साल बीत रहा था। दौसा में रहकर पढ़ रहा था। फीस के पैसे नहीं होते थे, तो कर्ज भी लेना पड़ता था। कॉलेज चल रहा था। कहते हैं न कि गरीब का बच्चा उम्र से पहले बड़ा हो जाता है। ऐसे हालात अपने सामने देख रहा था कि मैं अपनी उम्र से ज्यादा सोच पा रहा था।

दो रुपए बचाने के लिए 10-10 किलोमीटर पैदल चलता था। ग्रेजुएशन में एडमिशन लेते ही ठान लिया था कि सरकारी नौकरी की तैयारी करनी है। बहुत दुबला-पतला था, तो फिजिकल फिटनेस पर ध्यान देने लगा। पुलिस में जाने का मन था।

एक साथ चार एग्जाम के फॉर्म मैंने भर दिए। दिल्ली पुलिस कॉन्स्टेबल में सिलेक्शन हो गया। मेरे पास इंटरव्यू में पहनकर जाने के लिए भी कपड़े नहीं थे। जो कपड़ा हर रोज पहनता था, वही पहनकर इंटरव्यू देने गया। ये भी कई जगह से फटा और सिला हुआ था।’

राम भजन कहते हैं, 'हेड कॉन्स्टेबल तो 2022 में बना हूं। इससे पहले कॉन्स्टेबल ही था। जब दिल्ली पुलिस में भर्ती हुआ, तो बड़े अधिकारियों को देखकर इंस्पायर होता था। कोई भी आम व्यक्ति किसी बात पर सबसे पहले यही कहता- अपने साहब को बुलाकर लाओ।

मैं सोचता कि काम तो कॉन्स्टेबल ही करेगा, लेकिन हर किसी को बड़े अधिकारी से ही मिलना है। उनके काम करने का तरीका, रुतबा... हर चीज को मैं गौर से देखता था। 2012 से मैंने इस पर सोचना शुरू कर दिया। इसी बीच शादी हो गई। एक साल बाद एक बच्चा भी हो गया।

2015 से मैंने तैयारी करनी शुरू कर दी। एक कोचिंग संस्था में एडमिशन ले लिया। दरअसल, हुआ यूं कि मेरे मामा का बेटा स्टेट PSC की तैयारी करना चाहता था। वो किसी पार्टनर का साथ चाह रहा था, जो उसके साथ तैयारी करे। हम दोनों ने साथ में तैयारी शुरू कर दी।’

जॉब और पढ़ाई, दोनों साथ-साथ?

राम भजन कहते हैं, ‘मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन नहीं। आप बड़े अधिकारी हैं, तो ऑफिस, टाइम सब कुछ है, लेकिन कॉन्स्टेबल का क्या, आज यहां ड्यूटी लगी है, तो कल वहां। आज ये नेता आ रहे हैं, तो कल रैली हो रही है।

12-14 घंटे की लगातार ड्यूटी…। उसके बाद मैं अपने रूम पर जाकर पढ़ता। हालांकि, मेरे सीनियर ऑफिसर ने काफी मदद की। इसलिए बाद में मैंने साइबर डिपार्टमेंट में पोस्टिंग ले ली थी।

लगातार 3 साल तक तो प्रिलिम्स भी नहीं निकाल पाया। कुछ लोग तंज भी मारते थे। कहते थे- तुम UPSC निकालोगे, क्या ड्रामा लगा रखा है।

कोई गाइडेंस ही नहीं थी। 2018 में जब मैंने कुछ लोगों से बात करनी शुरू कर दी, जिसके बाद क्या पढ़ना है, क्या नहीं… इन चीजों के नोट्स बनाए। प्रयास करते-करते 2022 UPSC में सफल हो पाया। इसमें अंजली का भी बड़ा रोल है। वो हमेशा मुझे समझाती थी।’

 पत्नी अंजली की एजुकेशन 

राम भजन कहते हैं कि जब उनकी पत्नी ब्याहकर आई थी, तो 8वीं पास थी। आज वो मास्टर कम्प्लीट कर चुकी हैं। B Ed भी कर चुकी हैं। वो कहते हैं, 'जब मैंने UPSC की तैयारी शुरू की, तो सोचा कि यदि मैंने इस सफलता को हासिल कर लिया और अंजली 8वीं पास ही रह जाएगी, तो फिर शायद उसके साथ भेदभाव होगा।

यहां लोग बेटी को नहीं पढ़ाना चाहते हैं, तो बहू को पढ़ाना तो दूर की बात है। एक साल लग गया घरवालों को समझाने में। उन्हें डर था कि अंजली पढ़ने चली जाएगी, तो घर का काम कौन करेगा। दोनों बहनों की शादी तब तक हो चुकी थी।

मैं तो ड्यूटी पर रहता था, महीने में एक-आध बार घर चला आता था। अंजली घूंघट करके घर से स्कूल और फिर कॉलेज जाने लगी। मैं उसे फोन पर, वीडियो कॉल पर पढ़ाता। जो टॉपिक मुझे नहीं समझ आता, उसके लिए दोस्तों की मदद लेता। आज अच्छा लग रहा है कि हमारी मेहनत, संघर्ष के सामने इतनी सारी मुश्किलें भी बौनी पड़ गईं। ’

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