दुर्ग/ छत्तीसगढ़ के दुर्ग का डुमरडीह गांव। इन दिनों यहां तेज बारिश हो रही है। उतई ब्लॉक से गांव की ओर मैं बढ़ रहा हूं। कंक्रीट सड़क के दोनों तरफ गिने-चुने घर दिखाई दे रहे हैं।
कुछ दूर आगे बढ़ने पर एक घर दिखाई देता है। एक कोने में भगवान शिव का मंदिर, ईंट की थाक लगाकर सड़क किनारे बनी हुई कच्ची दीवार। दूसरे कोने में ईंट की दो भट्ठियां। गरजते बादल, बरसते पानी में इन भट्ठियों से निकलता धुआं।
कतार में थाक लगाकर हजारों ईंटें रखी हुई हैं। 22 साल की यमुना चक्रधारी जल्दी-जल्दी ईंट के सांचे में गीली मिट्टी डालकर ईंट बना रही हैं। मैं यमुना से ही मिलने आया हूं। वहीं यमुना जिन्होंने चौथे अटैंप्ट में NEET एग्जाम क्वालिफाई किया है।
मुझे देखते ही वो मुस्कुराने लगती हैं। मेरे पैर को छूकर प्रणाम करने के लिए वो आगे बढ़ती है। मैं उन्हें रोकते हुए हाथ मिलाकर कहता हूं- बहुत-बहुत बधाई !
यमुना थैंक्स कहते हुए कहती हैं, 'सर बाहर रहेंगे तो भीग जाइएगा, अंदर आ जाइए।'
मैं घर के अंदर दाखिल होता हूं। दो कमरों का मकान है, जिसमें यमुना अपने तीन बहन, एक भाई और मम्मी-पापा के साथ रहती हैं। किचन के ठीक बगल में गाय का बछड़ा बंधा हुआ है।
इतने में यमुना के पापा बैजनाथ चक्रधारी आ जाते हैं। इनके चेहरे पर खुशी देखते ही बन रही है। आंखों में पूरे होते ख्वाब लिए वो खाट पर बैठ जाते हैं।
यमुना अपने पापा के बगल में बैठते हुए कहती हैं, 'लगातार 4 साल से कोशिश कर रही थी। हर बार कुछ नंबर से एग्जाम पास नहीं कर पा रही थी। पापा ने सख्त लहजे में कहा था कि यदि मैं इस बार NEET क्वालिफाई नहीं कर पाई, तो अब आगे पढ़ाई बंद। लेकिन इतने सालों की मेहनत रंग लाई। NEET एग्जाम में 516 नंबर मिले हैं। ऑल इंडिया रैंक 92 हजार के करीब है, जबकि कैटेगरी रैंक 42 हजार है। MBBS तो मिल ही जाएगा!'
'हालांकि चिंता अभी भी है कि पढ़ाई का खर्च कैसे पूरा होगा? क्योंकि MBBS करने में तो लाखों रुपए लग जाते हैं।'
यमुना के पापा उन्हें रोकते हुए कहते हैं, 'जिले के सांसद, राज्य के मंत्री ने भरोसा दिया है कि पूरा खर्च वो देंगे। हम गरीब आदमी कहां से इतने पैसे लाएंगे। हम पूरे परिवार मिलकर दिन रात ईंट बनाते हैं, तब दो रुपए होते हैं, जिससे घर भी बमुश्किल से चल पाता है।'
… तो यमुना भी ईंट बनाती हैं? मैं पूछता हूं।
इसका जवाब खुद यमुना देती हैं। वो कहती हैं, 'पापा अपने बचपन से ईंट बना रहे हैं और हम अपने बचपन से। छोटी-सी उम्र से एक हाथ में कुदाल और दूसरे में ईंट का सांचा (लकड़ी का बना फ्रेम, जिसमें कच्चा ईंट तैयार होता है।) पकड़ रही हूं। हर रोज 6 घंटे ईंट बनाती हूं।
कई बार हम लोग थक जाते हैं, तो थोड़ी देर रुकने के बाद फिर से ईंट बनाना शुरू करते हैं। हमें हमेशा से यह बात पता है कि अभी ईंट नहीं बनाएंगे, तो रात में क्या खाएंगे। कल को क्या खाएंगे। ईंट बनेगा, बिकेगा, तभी तो घर का चूल्हा जलेगा।
थकावट की वजह से पढ़ने का भी मन नहीं होता था। मैं अपने सपने को मरने नहीं दे सकती थी। खुद को हिम्मत देती और तैयारी में लग जाती। बस यह सोचती कि किसी भी तरह से डॉक्टर बन जाऊं।'
यमुना के पापा अपनी बेबसी को बयां करते हुए दो चीजें कहते हैं, 'जब से इसने (यमुना ने) 10वीं की परीक्षा पास की है, हम लोगों ने अपने खाने-पीने में भी कटौती कर दी है। आप तो जानते ही हैं, पढ़ाई में कितना खर्च लगता है। किताब-कॉपी खरीदने, कोचिंग का फीस देने में ही आंखें निकल आती है।'
'आप यकीन नहीं करेंगे, इस घर को बनाने में मुझे 10-12 साल लगे हैं। अभी तक लकड़ी का किवाड़ नहीं लगवा पाया हूं। कोयला न होने की वजह से 80 हजार ईंट खराब हो गए हैं। पैसे ही नहीं हैं, तो कहां से किवाड़, कहां से कोयला। अब जब बिटिया डॉक्टर बन जाएगी, तो सब ठीक हो जाएगा।'
यह कहकर यमुना के पापा ठहाके लगाकर हंसने लगते हैं, लेकिन उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही है।
हमारी बातचीत के बीच यमुना की दो और बहनें आ जाती हैं। यमुना कहती हैं कि उनकी बड़ी बहन ने उनका बहुत सपोर्ट किया है।
वो बताती हैं, 'घर का पूरा काम हम बहनों को ही करना पड़ता है। ईंट बनाने से लेकर चूल्हा-चौका करने तक... अब बेटी हैं, तो ये तो करना ही पड़ेगा। मेरी बड़ी बहन मेरे हिस्से का पूरा काम कर देती थी, ताकि मैं पढ़ पाऊं। घरवालों को कोई ऐतराज न हो कि मेरी पढ़ाई की वजह से घर का काम नहीं हो पा रहा है, मैं कोई काम नहीं कर पा रही हूं। जब NEET का रिजल्ट आया, तो मैं रोने लगी। यकीन नहीं हो पा रहा था कि मैं पास हो गई हूं।'
यमुना की बातों को उनकी मां दरवाजे पर खड़ी होकर सुन रही हैं। कुछ देर बाद वो भी आकर बैठ जाती हैं।
मैं उनसे यमुना के बारे में कुछ बताने को कहता हूं। कहने लगी, 'मैं अनपढ़ हूं। मुझे तो पेंसिल भी पकड़ना नहीं आता। ब्याह कर जब ससुराल आई, तो ये भी (यमुना के पापा) मुझे ताना मारा करते थे। तब मुझे लगा कि पढ़ना कितना जरूरी है। शुरू से इस बात को सोच चुकी थी कि अपने बच्चों के सामने ऐसी नौबत नहीं ही आने दूंगी।'
मैं यमुना के पापा से पूछता हूं। आपने कहां तक पढ़ाई की है?
वो कहते हैं- 5वीं तक।
वो बताते हैं, 'हम लोग मूल रूप से मध्यप्रदेश के रीवा जिले से हैं। पापा मजदूरी करने के लिए शहर-शहर जाया करते थे। इसी दौरान वो दुर्ग आए और तब से यहीं बस गए। मेरी उमर उस वक्त 6 साल रही होगी। हमारे पास एक धुर जमीन भी नहीं। जो है, बस यही घर इतना। बचपन से जो मैंने ईंट बनाना शुरू किया, वह अभी भी चला आ रहा है। पहले ये घर झोपड़ी का था। जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ, तो मेरे भाइयों ने मुझे घर से अलग कर दिया। अब ऐसे हालात में पढ़ाई कहां से हो पाती।'
कहते-कहते यमुना के पापा ठहर जाते हैं। यमुना उन्हें ढांढस बंधाने लगती हैं।
फिर मुझ से कहती हैं, 'बरसात के दिनों में बाहर से ज्यादा घर के भीतर पानी बरसता था। पूरी रात हम लोग जागकर गुजार देते थे। जलावन भीग जाता था। कई-कई दिनों तक खाना भी ठीक ढंग से नहीं बन पाता था। अब गैस चूल्हा लग गया है, तो इस पर चाय-पानी बन जाता है। खाना आज भी चूल्हा पर ही बनता है। इतने पैसे नहीं होते हैं कि हर महीने गैस भरवा पाएं।'
यमुना से गांव की कुछ महिलाएं मिलने के लिए आई हैं। उनकी तरफ देखकर यमुना के पापा कहते हैं, 'हमारे समाज की सोच है कि बेटी 17-18 साल की हुई नहीं कि शादी कर दो। मुझे यमुना को लेकर काफी कुछ सुनना पड़ा है। गांव के लोग कहते थे कि बेटी अब जवान हो गई है। इसकी शादी कर दो, नहीं तो कोई लड़का भी नहीं मिलेगा। रिश्ता भी नहीं आएगा।'
यमुना पापा की बातों को सुनकर हल्की मुस्कुराहट के साथ बोलती हैं, 'जब मैंने NEET की तैयारी शुरू की, तो गांव वाले, रिश्तेदार कहते थे कि अपनी हैसियत नहीं देखी है, चली है डॉक्टरनी बनने। मुंगेरीलाल के हसीन सपने…।'
'बाप के पास खाने को है नहीं, चला है बेटी को डॉक्टर बनाने। अरे ! तुम कितने साल से तैयारी कर रही हो। कुछ नहीं होने वाला है, कब तक तैयारी करती रहोगी। अब शादी-ब्याह कर लो। घर का बोझ टल जाएगा। मैंने जो बचपन में सपना देखा था, उसे पूरा करना था।'
मैंने पूछा- कब आपको लगा कि डॉक्टर बनना है?
यमुना एक किस्सा बताती हैं। वो कहती हैं- 'पड़ोस की एक महिला प्रेग्नेंट थी। समय से डॉक्टर के न मिलने और डिलीवरी न होने की वजह से पैदा होने वाले बच्चे का पैर टेढ़ा हो गया, जो आज भी है। मैं जब देखती थी कि गांव में कोई ढंग का डॉक्टर नहीं है। लोगों को छोटे-छोटे इलाज के लिए भी शहर जाना पड़ता है, फिर भी अच्छे डॉक्टर नहीं मिल पाते हैं। इन परेशानियों ने मुझे डॉक्टर बनने के लिए प्रेरित किया।'
'किताब मेरे टीचर मुझे देते थे। मेरे पास तो पहले मोबाइल भी नहीं था। ऑफलाइन मैंने पूरी तैयारी की है। ये जो फोन आप देख रहे हैं, मेरे स्कूल की एक टीचर ने बतौर गिफ्ट दिया है। अब बारी मेरी है। मैं सब लोगों को एक अच्छी डॉक्टर बनकर गर्व महसूस कराने का वादा करती हूं।'

.jpeg)
.jpeg)

टिप्पणियाँ