बच्चे ने कहा बड़ा होकर यूट्यूबर बनना चाहता है, साइकोलॉजिस्ट को बताया उसका मन पढ़ाई में नहीं लगता, यह स्थिति गलत पेरेंटिंग के कारण हुई, अच्छी परवरिश के 10 मंत्र
नई दिल्ली/ ‘कोलकाता का रहनेवाला 9वीं क्लास का स्टूडेंट शौमिक मोबाइल में हमेशा खोया रहता। कभी गेम्स, कभी दोस्तों के साथ चैट तो कभी यूट्यूब, उसकी उंगलियां मोबाइल पर तेजी से स्क्रॉल करतीं। पेरेंट्स टोकते तो वो अनसुना कर देता।
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| क्या करें पेरेंट्स |
पेरेंट्स की चिंता अगले साल होने वाले बोर्ड की परीक्षा को लेकर थी। तब वे चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट के पास गए। शौमिक ने बताया कि उसका मन पढ़ाई में नहीं लगता। वह बड़ा होकर यूट्यूबर बनना चाहता है। वह ऑनलाइन गेम्स खेलता है जिसमें उसे चैलेंजिंग टास्क मिलता है। एक यूट्यूबर को वह फॉलो करता है। और उसकी तरह मशहूर होना चाहता है।’
कोलकाता में सीनियर कंसल्टेंट क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. इंद्राणी दत्ता बताती हैं कि बच्चों के दिमाग में ये चीजें बैठ जाती हैं कि चाहे कुछ भी हो, उसे मशहूर होना है। तब उसे सही-गलत का फर्क नजर नहीं आता।
- शौमिक के साथ यह स्थिति गलत पेरेंटिंग के कारण हुई।
अगर बच्चा कहता है कि मुझे यूट्यूबर बनना है तो उसे डांट या फटकार कर चुप नहीं करा सकते। उसे समझने और उससे बात करने की जरूरत है।
उसे यूट्यबूर बनने के लिए मना नहीं करें। उसे बताना चाहिए कि यूट्यूबर बनकर लंबे समय तक आप मशहूर नहीं रह सकते क्योंकि जानकारियों और ज्ञान की कमी होने पर आप अपने दर्शकों को ज्यादा दिन तक अपने से बांधकर नहीं रख पाओगे।
आज किसी के पास हजारों सब्सक्राइबर्स हो सकते हैं, लेकिन ये सब्सक्राइबर्स तभी टिकेंगे जब आपके पास उन्हें बताने के लिए हमेशा कुछ नया होगा।
पेरेंट्स को चिंता रहती है कि उनके बच्चे कहीं बिगड़ न जाएं। लेकिन जाने-अनजाने बच्चे की परवरिश को लेकर कमियां रह जाती हैं-
पेरेंट्स और बच्चे के बीच कम्यूनिकेशन नहीं होता
पेरेंट्स को बताना चाहिए कि पहले फाउंडेशन को मजबूत करो, फिर जो कंटेंट लोगों के सामने लाना चाहते हो ले आओ।
अगर बच्चे को पहली बार में ही साफ मना कर दिया जाए तो उसे लगता है कि फेमस होने के लिए जितनी मेहनत की है उस सब पर पेरेंट्स ने पानी फेर दिया।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पेरेंट्स और बच्चे के बीच कम्युनिकेशन गैप हो जाता है। पढ़ाई करो, ये सब नहीं करना है। पेरेंट्स इससे आगे कुछ नहीं बोलते। यानी वे बच्चों के मन में दबी उसकी इच्छा का जानने की कोशिश नहीं करते। बच्चा जो सपने बुन रहा होता है उसकी तह तक जाने, बच्चे से बात करने और बच्चे को सही गलत सही बताने की इस प्रक्रिया में पेरेंट्स सब्र से काम नहीं लेते।
पेरेंट्स सोचते हैं-बच्चों की लाइफ वे डिजाइन कर रहे हैं
पेरेंटिंग क्या है? क्या गुड या बैड पेरेंटिंग हो सकती है? इस सवाल के जवाब पर डॉ. इंद्राणी कहती हैं कि पेरेंटिंग अपने आप में पॉजिटिव शब्द है। एक गुण है, एक कला है। जिसे हर पेरेंट्स को सीखने की जरूरत है।
अपने देश में यह धारणा है कि बच्चे का जन्म हो गया तो कोई मां बन गई या किसी को पिता का दर्जा मिल गया। यानी लोगों को लगता है कि लालन-पालन में सीखने जैसी कोई चीज नहीं होती है। यह अपने आप आ जाती है। जब बच्चा दुनिया में आ गया तो पल भी जाएगा। साथ ही पेरेंट्स को ये भी लगता है कि बच्चे की लाइफ को वो डिजाइन करेंगे और सही डिजाइन करेंगे।
भोपाल में पेरेंटिंग कोच पल्लवी राव चतुर्वेदी के अनुसार, पेरेंट्स अपनी उम्मीदें बच्चों पर थोपते हैं। उन्हें लगता है कि इससे बच्चे का फ्यूचर सिक्योर होगा।
मैं डॉक्टर नहीं बन पाया पर बेटे को डॉक्टर बनाऊंगा। यह उम्मीद पालने से बच्चे पर प्रेशर बढ़ता जाता है। बच्चा अपनी पहचान खोने लगता है और उसकी पर्सनैलिटी डेवलप नहीं हो पाती। इस तरह बच्चों की लाइफ बनाने के चक्कर में वे उनकी लाइफ बर्बाद कर देते हैं।
पेरेंट्स घिसी-पिटी सोच में डूबते-उतराते हैं, अपडेट नहीं होते
पेरेंट्स अक्सर कहते हैं कि ‘मैं क्या अपने बच्चे के लिए खराब सोचूंगा?’ यह सही है कि माता-पिता अपने बच्चे की भलाई के लिए ही फैसले लेते हैं। लेकिन उनका फैसला सही है या गलत ये वो नहीं जानते।
अधिकतर पेरेंट्स खुद को वक्त के साथ अपडेट नहीं करते।
आज टेक्नोलॉजी बहुत एडवांस्ड है। AI का जमाना है। हर तरफ चीजें तेजी से बदल रही हैं। पेरेंट्स अगर खुद को अपडेट नहीं करेंगे तो बच्चे के लिए अच्छे और बुरे का फैसला करने में पिछड़ जाएंगे।
इसलिए बच्चे से कई बार पेरेंट्स सुन लेते हैं कि आपको कुछ नहीं पता।
पल्लवी बताती हैं कि अगर बदलते जमाने के साथ पेरेंटिंग नहीं सीखेंगे तो बच्चे भी आपकी बातों को फॉलो नहीं करेंगे। क्योंकि उन्हें लगेगा कि पेरेंट्स पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। उन्हें लगेगा कि पेरेंट्स से सही इंफॉर्मेशन नहीं मिल रही। वो आपकी बात क्यों सुनें, यूट्यूब और गूगल पर जाकर नई चीजें देखें और जानें।
बच्चों को इंटेलिजेंट बनाने में परवरिश की बड़ी भूमिका होती है। थोड़ी सख्ती चल सकती है पर माता-पिता की समझदारी बच्चों को बेहतर बनाती है-
मम्मी की चिंता, हम इतनी मेहनत करते हैं फिर भी बच्चा रिजल्ट नहीं देता
‘मैं तो अपने बच्चे को लेकर बहुत मेहनत करती हूं। उसे जो चाहिए देती हूं। रात-दिन एक करके काम कर रहे। लेकिन उसका रिजल्ट अच्छा नहीं है’
डॉ. इंद्राणी दत्ता बताती हैं कि कई मदर्स का यह बहुत बड़ा दर्द है।
सवाल यह है कि पेरेंट्स जिस मेहनत की दुहाई देते हैं क्या वह वाकई में मेहनत सही दिशा में कर रहे हैं?
बच्चा पढ़ाई में फोकस नहीं कर रहा, याद करने के बाद भी भूल जाता है या दूसरे बच्चों से पिछड़ रहा तो क्या कोई पेरेंट्स बच्चे की परेशानी जानने की कोशिश करता है?
हकीकत यह है कि पेरेंट्स बच्चे की क्षमता को आंक नहीं पाते। उसकी क्वालिटी या उसकी कमी को पकड़ नहीं पाते।
बच्चा स्लो लर्नर है या चीजों को याद नहीं कर पाता तो इस कमी को दूर करने के लिए पेरेंट्स को सोचना चाहिए। न कि बच्चों को पीटना या उसे डांटना, फटकारना चाहिए।
एक फॉर्मूले से बच्चों की पेरेंटिंग नहीं हो सकती
पेरेंटिंग किसी खास फॉर्मूले पर नहीं टिकी होती है। हर बच्चा अलग होता है और उसका ट्रीटमेंट भी अलग होना चाहिए।
किसी को प्लेयर बनना है, किसी को सिंगर, किसी को डॉक्टर। पेरेंट्स पहले बच्चे के मन को पहचानें, जानें। वो क्या सपना देखता है और यह कितना रियलिस्टक है या नहीं और उसकी डिमांड कितनी रियलिस्टिक है। यह जानना जरूरी है।
बच्चों को सिखाएं, बैलेंस कैसे बनाना है
बच्चों के मन में सपने पलते हैं और समय के साथ खिलते हैं मुरझाते हैं। पेरेंट्स को यह जानना चाहिए कि बच्चों के सपने को खत्म करने की बात सीधा उसके मुंह पर कहना गलत होगा।
डॉ. इंद्राणी बताती हैं कि ऐसे समय में पेरेंट्स को अपने बच्चे को शौक और बेसिक पढ़ाई में बैलेंस करना सिखाना होगा।
बच्चे को बताना चाहिए कि तुम पहले पढ़ाई को सीरियसली लो और फिर तुम्हारे शौक पर भी ध्यान दिया जाएगा। इस तरह गाइड करने से ही बच्चा फ्यूचर में बेहतर कर पाएगा।
पेरेंटिंग एक आर्ट है। जो माता-पिता पेरेंटिंग जानते हैं वो बच्चे का वर्तमान और भविष्य दोनों बेहतर बनाते हैं-
मैंने अपने बच्चे बड़े किए, आप मुझे सिखाएंगे पेरेंटिंग क्या है?
भारत में पेरेंटिंग को लेकर लोग एक-दूसरे पर खूब दोष मढ़ते हैं। जिन घरों में बुजुर्ग हैं या ग्रैंड पेरेंट्स हैं वो अक्सर कहते हैं कि मैंने अपने बच्चे बड़े किए, वो आज इतने कामयाब हैं तो उन्हें कोई पेरेंटिंग सिखाएगा?
इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स दिल्ली चैप्टर के प्रेसिडेंट और मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में कंसल्टेंडट पीडियाट्रिशयन डॉ. अनुराग अग्रवाल कहते हैं कि माता-पिता पेरेंटिंग स्किल को सीखना नहीं चाहते। वो ट्रेडिशनल पेरेंटिंग को ढोना चाहते हैं जो उन्होंने अपने माता-पिता से से सीखी है।
इसमें गलत कुछ नहीं है लेकिन समय के साथ बदलना भी जरूरी है।
वो कभी बच्चे की इमोशनल डेवलपमेंट पर ध्यान नहीं देते। यही कारण है कि भारतीय बच्चे मेंटल हेल्थ के मामले में कमजोर पड़ रहे हैं।
डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि अगर सोसाइटी बेहतर चाहते हैं तो पेरेंटिंग पर ध्यान देना जरूरी है। यही बच्चों में सुसाइड के मामलों में कमी लाएगा।
पेरेंटिंग का मतलब यही है अच्छा बच्चा, एक वेल डेवलप्ड, इमोशनली साउंड, और मेंटली हेल्दी बच्चा जो सोसाइटी के लिए कुछ कर सके, जो खुद के लिए भी सिक्योर बन सके।
बैड पेरेंटिंग का असर माहौल में दिखता है
बैड पैरेंटिंग के कई उदाहरण सोसाइटी में देखने को मिल रहे हैं। खाने-पीने, पार्क में घूमने, पब्लिक प्लेस में खराब बर्ताव तो रोजमर्रा की बातें हैं।
कई बच्चे चिप्स खाने के बाद खाली पैकेट पार्क में फेंक देते हैं। ये बैड पेरेंटिंग का उदाहरण है। प्लेन में ट्रेवल करते समय कई बच्चे सीट पर ठीक से नहीं बैठते। वो चीखते-चिल्लाते हैं, दूसरे पैसेंजर्स को परेशान करते हैं। ये भी बैड पैरेंटिंग है।
बैड पैरेंटिंग ही नमूना है कि स्कूल कॉलेज में रैगिंग के बुरे मामले देखने को मिलते हैं। डॉ. इंद्राणी कहती हैं कि हाल में जाधवपुर यूनिवर्सिटी में रैगिंग का मामला देखने को मिला। वहां फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट को सीनियर्स ने 'गे' कहकर पुकारा। उसका सेक्शुअल एब्यूज किया गया। बाद में उस स्टूडेंट बिल्डिंग से कूद कर जान दे दी।
डॉ. इंद्राणी बताती हैं कि किसी को गे कहकर चिढ़ाना, सेक्शुअल एब्यूज करना, गाली-गलौच करना, जेंडर एब्यूज करना ये सब बैड पैरेंटिंग का ही उदाहरण है।
बच्चा अपने घर-परिवार और सोसाइटी से ही सबकुछ सीखता है
मम्मी-पापा वर्किंग हैं तो वो बच्चा बाहर से सीखेगा।
अगर पिता घर में हाथापाई करता है तो बच्चा वही सीखेगा। वह अपनी मां को पिता के सामने कमजोर पाता है। उसे लगने लगता है कि औरतें कमजोर होती हैं। वह किसी भी महिला को कमजोर ही देखेगा। इससे उसकी पर्सनैलिटी पर बुरा असर पड़ेगा। अगर घर में लड़की ये सब देखती है तो उसके मन में गुस्सा भरता है। ये गुस्सा धीरे-धीरे जेंडर बेस्ड हो जाता है। कुल मिलाकर कहें तो नेगेटिव पेरेंटिंग का असर पूरे समाज पर पड़ता है।
निगेटिव पेरेंटिंग कोई बीमारी नहीं है। कमी काउंसिलिंग की है। पश्चिमी देशों की तरह भारत में पेरेंट्स काउंसिलिंग के लिए नहीं जाते। हालांकि कुछ बदलाव जरूर आया है। पहले पेरेंट्स जुकाम, खांसी, उल्टी को लेकर बात करते थे अब वे हाईट, वेट पर भी बात करते हैं।
इसलिए देश के बड़े शहरों में अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट (ECD) का भी कांसेप्ट पॉपुलर हो रहा है। यानी बच्चे को सही न्यूट्रिशन मिले, मेंटल हेल्थ, सोशल डेवलपमेंट को लेकर अधिक अलर्ट हो रहे। बावजूद ब्रेन ओरिएंटेड और बिहेवियरल डेवलपमेंट अभी भी मीसिंग है।

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