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तथागत अवतार तुलसी IIT बॉम्बे में 21की उम्र में मुकाम हासिल करने के बाद हो गए फिर बेरोजगार, जानें उन्ही की जुबानी जिसकी वजह से वे ठगा सा महसूस कर रहे

मेरा नाम तथागत अवतार तुलसी है। IIT बॉम्बे में असिस्टेंट प्रोफेसर था। 2019 से बेरोजगार हूं। दरअसल जुलाई 2010 में IIT बॉम्बे में फिजिक्स के प्रोफेसर के तौर पर नौकरी शुरू की। 2013 से समंदर की हवा से एलर्जी की शिकायत होने लगी। इस वजह से मुंबई छोड़ना पड़ा। चार साल छुट्टी पर रहा। उसके बाद भी मुंबई नहीं जा सका। 31 जुलाई 2019 को IIT बॉम्बे ने नौकरी से निकाल दिया।

एकदम शुरू से अपनी कहानी सुनाता हूं। जब मैं छह साल का था तो 10वीं-12वीं की फिजिक्स के सवाल हल कर लेता था। पिताजी पढ़ाई- लिखाई को लेकर बहुत गंभीर थे। वो खुद एलएलबी थे और मां शिक्षिका थीं तो घर में पढ़ाई का माहौल था। पिताजी ने एक दिन मेरा टेस्ट लिया, गणित के कुछ सवाल पूछे और मैंने तुरंत हल बता दिया। उस दिन उन्हें लगा कि लड़के में कुछ बात है तो उन्होंने लोकल मीडिया वालों से संपर्क किया।

तथागत मानते हैं कि किसी बच्चे का मैथ्स-फिजिक्स में तेज होना अजूबा नहीं। दिमाग के एक विशेष हिस्से में ब्लड फ्लो ज्यादा होने से ऐसी एबिलिटी आ सकती है।

यह बात धीरे-धीरे फैलने लगी। लोग घर पर आते मेरा टेस्ट लेते। 1994 में जनसत्ता में पहले पेज पर खबर छपी ... ‘बिहार के कोख में पल रहा एक और विलक्षण गणितज्ञ’ इस खबर के छपने के एक सप्ताह के भीतर लालू जी ने पटना अपने घर बुलाया। तब मेरी उम्र छह साल थी। मुझसे मिलने के बाद लालू जी ने ऐलान किया कि वो मुझे 80 हजार रुपए का चेक देंगे।

मैंने अपने पापा से वहीं कहा कि मुझे पैसे नहीं चाहिए, कम्प्यूटर चाहिए। तब कम्प्यूटर 56 हजार का आता था। लालू जी ने यह सुन लिया और उन्होंने अपने साथ के अधिकारियों को कहा कि इन्हें एक कम्प्यूटर और बाकी के 24 हजार रुपए भी दे दिए जाएं।

तथागत को कम उम्र में ही लालू प्रसाद यादव ही नहीं अब्दुल कलाम, नीतीश कुमार, प्रकाश झा से मिलने का मौका मिला। उन्हें सम्मानित किया गया। लालू जी से मिलने के दो महीने के बाद एक दिन मेरे घर दो लोग आए। उन्होंने मेरे मम्मी-पापा और मुझे पटना आने का न्योता दिया। ये लोग सुलभ इंटरनेशनल संस्था से आए थे। दरअसल सुलभ इंटरनेशनल के फाउंडर बिंदेश्वरी पाठक जी ने मेरी पढ़ाई-लिखाई का जिम्मा लेने का मन बना लिया था। पटना में पापा को सुलभ की तरफ से दो लाख रुपए कैश दिए गए। बिंदेश्वरी जी ने उस दिन के बाद से मेरी पढ़ाई का सारा खर्च उठाया।

उन्होंने मेरे पिता जी को भी सुलभ इंटरनेशनल का लीगल एडवाइजर बना कर दिल्ली बुला लिया। दिल्ली के स्कूल हॉली हर्ट पब्लिक स्कूल में एडमिशन करा दिया। रहने के लिए फ्लैट मिला। इस तरह मेरी पढ़ाई और लड़ाई दोनों शुरू हो गई। सही पढ़ा आपने लड़ाई ही कहा मैंने। धीरे-धीरे बताता हूं कि मैं किस लड़ाई की बात कर रहा हूं। 1995 में दिल्ली पहुंच गया था। तब मेरी उम्र थी सात साल। उस समय मेरा एडमिशन छठी क्लास में हुआ। स्कूल प्रशासन ने यह कहा कि वो सीबीएसई से बात करके मुझे अगले साल बोर्ड का एग्जाम दिला देंगे।

स्कूल ने अपनी तरफ से सीबीएसई को चिट्ठी लिखी। सीबीएसई ने साफ मना कर दिया कि ऐसा नहीं हो सकता। मुझे पता नहीं क्यों, लेकिन स्कूल ने मेरा छठी क्लास का रिजल्ट रोक दिया। एनुअल फंक्शन के दिन मैं पूरे दिन रोता रहा।

क्लास के बच्चे मेरे से उम्र में बड़े थे, इस वजह से स्कूल में कोई दोस्त नहीं था। इन सब चीजों से मैं दुखी रहने लगा। उसी साल मेरी तबीयत बिगड़ गई। अब मैं पहले जैसा उत्साही बच्चा नहीं रहा। चुप रहने लगा। सिर्फ पढ़ने लगा। पापा भी सब काम छोड़कर नेताओं से मिलते कि मैं बोर्ड की परीक्षा दे सकूं।

स्वतंत्रता दिवस पर दूरदर्शन पर रिलीज सॉन्ग 'विजयी विश्व तिरंगा' में शोभना नारायण, सचिन तेंदुलकर जैसे दिग्गजों के साथ तथागत को भी फीचर किया गया।

1996 में लोकसभा का चुनाव हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी जी पीएम बने। उनसे मिलने की भी कहानी है। पापा ने करीब पांच-सात बार उनके पीए से भेंट की। फिर उन्होंने सितंबर 1996 में हमारी अटल जी से मुलाकात कराई। मुझे याद है मैं जब अटल जी के ऑफिस में पहुंचा तो वो सफेद कुर्ता-धोती में बैठे थे। मुझे पास बुलाया और नाम वगैरह पूछा। फिर पापा से कहा, ‘देखते हैं, हम क्या कर सकते हैं।’

इसके कुछ समय बाद दिल्ली के उपराज्यपाल और शिक्षा मंत्री ने मुझे एज रिलैक्सेशन दे दिया। इसके बाद भी सीबीएसई ने कुछ रिप्लाई नहीं दिया। पापा फिर राम जेठमलानी से मिले। उन्होंने सीबीएसई के खिलाफ कोर्ट केस फाइल किया। जनवरी 1998 में मुझे हाईकोर्ट से ऑर्डर मिला कि मैं 10वीं की बोर्ड परीक्षा दे सकता हूं।

हालांकि मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में गया और सीबीएसई ने आपत्ति जताई। सुप्रीम कोर्ट में सीबीएसई की अपील खारिज हो गई। कोर्ट का यही आदेश दिखाकर मैंने 10वीं करने के अगले ही साल 12वीं की। तब मेरी उम्र 11 साल थी।

इसी कोर्ट आदेश को दिखाकर मैंने पटना विश्वविद्यालय के साइंस कॉलेज में बीएससी में एडमिशन लिया और 12 साल की उम्र में मैंने बीएससी और एमएससी पास कर ली। यानी पांच साल की पढ़ाई एक साल में मैंने पूरी कर ली।

बीएससी-एमएससी 12 साल की उम्र में पास तो मैंने कर लिया था, लेकिन तब तक मैं एक भी दोस्त नहीं बना पाया था। आप यह भी कह सकते हैं कि किसी ने मेरे सामने दोस्ती का हाथ ही नहीं बढ़ाया था। इसके पीछे शायद मेरा स्वभाव था। मैं वीडियो गेम और बाकी के खेल नहीं खेलता था। उस समय मुझे अपने साथ के बच्चों की बात भी नहीं समझ आती थी।

अब लगता है कि समझ कैसे आती। समय से पहले सब कुछ करने के चक्कर में बचपन कहीं खो गया था। मेरे बचपने के साथ खिलवाड़ हो रहा था। साथ के बच्चे चिढ़ाते थे कि कुछ खेलो-कूदो। मैं उनकी बात सुन कर चुप ही रहता था। मैं खेलना चाहता था। आम बच्चों की तरह रहना चाहता था। कम उम्र में ज्यादा नाम हो जाने की वजह से सोसाइटी का प्रेशर मेरे पर था। मेरे मन पर भी एक अलग किस्म का दबाव था।

मुझे IIT में पढ़ने का मन था, लेकिन मेरी केमिस्ट्री कमजोर थी। इधर मुझे फिजिक्स का नशा हो गया था तो मैं दिन भर उसी सब्जेक्ट को पढ़ता था। मैं बेहद कन्फ्यूज था। इस बीच डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की तरफ से मुझे जर्मनी भेजे जाने का प्रस्ताव आया। यहां नोबेल प्राइज विनर के साथ एक कॉन्फ्रेंस थी। भारत से कुल 17 स्कॉलर जा रहे थे। मैं वहां सबसे कम उम्र का फिजिक्स का स्टूडेंट था। मेरी उम्र उस समय 14-15 साल थी। यहां लगभग दो सप्ताह रह कर मुझे समझ आया कि सिर्फ फिजिक्स ही पढ़ कर काम चल सकता है, IIT ही दुनिया नहीं है। मैंने तय कर लिया कि इसी में आगे जाऊंगा और फिजिक्स की दुनिया में काम करूंगा।

जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब बिहार में हुई एक रैली में अपने भाषण में तथागत की तारीफ की थी। उन्हें स्टेज पर बुलाकर सम्मानित किया था। जर्मनी से लौटने के बाद भागादौड़ी शुरू की। इसके बाद जैसे-तैसे मेरा अप्रैल 2002 में आईआईएससी बैंगलोर में पीएचडी में एडमिशन हो गया। मैं क्वांटम कम्प्यूटर पर रिसर्च करने लगा। यहां बिल्कुल मजा नहीं आया। दरअसल वो कैंपस एकदम सीनियर्स के लिए था, 13-14 साल के बच्चे के लिए तो वहां बिल्कुल भी माहौल नहीं था।

मुझे घर की बहुत याद आती थी। सब 25 साल से ऊपर के थे तो किसी से बात भी नहीं होती थी। मुझे दिन भर रोना आता था। बहुत अकेलापन लगता था। दो साल के भीतर रिसर्च छोड़ने का मन बना लिया। और एक दिन तो यह इरादा और मजबूत हो गया जब मेरे रिसर्च गाइड ने मुझे उलाहना दे दिया। मेरा मन लगता नहीं था इसलिए मैं बहुत ढंग से काम नहीं कर पाता था। मुझे एक दिन अपने चैंबर में बुला कर उन्होंने कह दिया, ‘तुम्हारे ऊपर जनता का पैसा खर्च हो रहा है, तुम लोगों से पैसा ले रहे हो और फिर तुम्हारा ऐसा हाल है।’

मुझे बहुत बुरा लगा। लगा कि जिम्मेदारी ज्यादा है, लेकिन उम्र तो कम है। यहां मुझसे कभी किसी ने यह तक नहीं पूछा कि कैसा लग रहा है। मेरी उम्र कम है और मुझे मम्मी-पापा या भइया की याद आ सकती है। खैर, मैंने जैसे-तैसे वहां काम जारी रखा। मैंने कुछ पेपर्स लिखे जिनकी चर्चा दुनिया भर में हुई। आज भी कुछ पेपर्स मेरे नाम से हैं जो सबसे अधिक पढ़े गए हैं। यहां पीएचडी के दौरान मुझे लग गया था कि मैं जो करना चाहता हूं वो प्रोफेसर या रिसर्च साइंटिस्ट बनकर ही हो सकेगा। मैंने फॉर्म भरना शुरू कर दिया।

तथागत अपनी नौकरी वापस चाहते हैं, कहते हैं कि उनकी लड़ाई अभी जारी है। वो कोर्ट जाने की सोच रहे हैं। फिर वो दिन भी आ गया जब मुझे मेरे सपने जैसी नौकरी मिली। साल 2010 में मुझे आईआईटी बॉम्बे से जॉइनिंग लेटर आया। मुझे लगा कि बस, सारी लड़ाई जीत ली। सारा बचपना जो मैंने नहीं जिया है, यहां काम करके उसकी कसर पूरी करूंगा। उस वक्त मैं 21 साल का था।

यहां 2010 में जॉइन करने के बाद मैंने काम शुरू किया। दो साल के अंदर मुझे सांस लेने में दिक्कत होने लगी। मुझे लगा फ्लू है, फिर नहीं ठीक हुआ तो डॉक्टर को दिखाया। पता चला कि सारा खेल इम्यून सिस्टम का है।

10वीं की परीक्षा की वजह से बचपन में लिया गया स्ट्रेस मेरे दिमाग पर ऐसा असर कर गया था कि मेरा इम्यून सिस्टम कमजोर हो चुका था। इस वजह से मैं ज्यादा ह्यूमिडिटी बर्दाश्त नहीं कर पाता। बेहोश होने की नौबत आ जाती है। आप कह सकते हैं कि ईश्वर ने कुछ दिया है तो उसके बदले में कुछ लिया भी है मुझसे।

डॉक्टर ने कहा कि आप साल भर और यहां रह कर देखें, अगर आपका शरीर एडजेस्ट कर लेगा तो ठीक, वर्ना आप धीरे-धीरे बीमार होते जाएंगे। आपको यह शहर ही छोड़ना होगा।

आईआईटी में ट्रांसफर का कोई नियम नहीं है। जहां नौकरी लग गई, जीवन वहीं बिताना है। मैं बीमारी की हालत में भी यहां लगातार रिसर्च में लगा रहा। मैंने 9 पेपर लिखे जिनमें से 5 पब्लिश हुए। चार अभी भी रखे हुए हैं। नियम मैं जानता था इसके बावजूद मैंने अपने डायरेक्टर से बात की। उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। बस ये कहा कि आप चाहें तो अपनी छुट्टियां यूज कर लें, ट्रांसफर तो नहीं हो सकता।

हेल्थ इश्यू भी ऐसा था कि सांस की दिक्कत का कागज नहीं बनता। और अगर आप इसी को आधार बना कर ट्रांसफर के लिए कोर्ट भी जाएंगे तो मामला खारिज ही होगा। मैंने 2013 में बिना इस्तीफा दिए छुट्टी ले ली। मैं बिहार आ गया और 2014 से 2017 तक छुट्टी पर रहा। इस दौरान मुझे सैलरी नहीं मिलती थी।

2019 में IIT ने मुझे नौकरी से निकाल दिया। मेरा रिसर्च वर्क नहीं हो सका। मैं नोबेल प्राइज जीतने की सोच रहा था और घर आकर बैठ गया। इस बारे में मैंने कोविड के दौरान राष्ट्रपति जी को चिट्ठी लिखी। उन्होंने उसे खारिज कर दी।

पता है दुख मुझे सिर्फ नौकरी जाने का नहीं होता। इस बात का भी होता है कि मैंने बचपन में प्रसिद्धि पा ली। पढ़ने और देश के लिए कुछ करने के लिए मां-बाप से दूर हो गया। आज जब पे बैक का वक्त आया है तो मैं अपनी मां को रोते हुए देखता हूं। उनका 35 साल का ब्रिलिएंट लड़का, बेरोजगार है। उसके पास न सेविंग्स है, न घर और न ही सम्मानजनक नौकरी।

मैं खुद भी आज ठगा हुआ महसूस करता हूं। पढ़ाई में तेज होने का फायदा हुआ या नुकसान, समझ नहीं पा रहा। हर दिन सिर्फ इसी रिग्रेट में बीतता है कि काश फिजिक्स में कुछ कर लेता। देश के लिए कुछ नहीं कर पाया। रिसर्च नहीं कर पाया। नोबेल नहीं ला पाया।

 तथागत अवतार तुलसी ने अपने जज्बात सांझा किए

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