CID सीरियल देखकर डॉ. महालक्ष्मी कारलावाड़ बनी फॉरेंसिक एक्सपर्ट, लड़कियां पोस्टमार्टम नहीं कर सकतीं, इस मिथ को दी चुनौती; बेस्ट फैकल्टी का अवॉर्ड भी मिला
नई दिल्ली/ मोर्चरी हाउस यानी मुर्दाघर, जिसका नाम सुनते ही लोगों के पांव ठिठक जाते हैं। वैसे तो मोर्चरी के बाहर सन्नाटा रहता है, लेकिन समय-समय पर चीखने-चिल्लाने, बिलखने की आवाजें इस सन्नाटे को चीरती हैं। जिनके अपने किसी घटना-दुर्घटना में चल बसते हैं उनके कराहने की आवाजें मन को विचलित करती हैं।
स्वस्थ या बीमार लोगों को देखना नॉर्मल है लेकिन जले-कटे, एक्सीडेंट में अंग-भंग हुए शरीर, पानी में डूबकर फूले हुए शरीर को देखना नॉर्मल नहीं होता। जहर से नीले पड़े या सुसाइड से अकड़े शरीर को देखना तो और भी दुखदायी है।
मैं डॉ. महालक्ष्मी कारलावाड़ कर्नाटक के कारवाड़ में फॉरेंसिक एक्सपर्ट हूं। दैनिक भास्कर के ‘ये मैं हूं’ में मेरे बारे में जानिए कि कैसे मेल डोमिनेटेड प्रोफेशन में मैंने खुद के लिए जगह बनाई। कर्नाटक के धारवाड़ जिले में हुबली एक शहर है जो मेरा होमटाउन है। प्राइमरी तक की पढ़ाई बेलगाम में हुई। मगर आगे सेकेंडरी और कॉलेज तक मैं हुबली से पढ़ी।
2007 से 2013 के बीच बेलगाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। एक साल तक रूरल सर्विस की। एमडी इन फॉरेंसिक कर्नाटक इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (KIMS) हुबली से किया।
आज उत्तर कन्नड़ जिले के कारवाड़ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हूं।
2020 में मैंने फॉरेंसिक डिपार्टमेंट जॉइन किया। तब से कई इन्वेस्टिगेशन में फॉरेंसिक एक्सपर्ट की टीम के साथ काम किया है। साथ ही फॉरेंसिक साइंस की क्लासेज भी लेती हूं। फॉरेंसिक में मैं गोल्ड मेडलिस्ट रही हूं।
डॉ. महालक्ष्मी कारलावाड़ कारवाड़ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।पहले इस फील्ड में कम लड़कियां थीं लेकिन अब वो इस सब्जेक्ट में इंटरेस्ट ले रही हैं।
पांच बहनों में से तीन डॉक्टर, स्कूल के दिनों में ही देखा सपना
मेरे परिवार में माता-पिता और पांच बहनें हैं। एक बहन डेंटिस्ट तो दूसरी आयुर्वेद की डॉक्टर हैं।
जो आयुर्वेद की डॉक्टर हैं वो पहले फॉरेंसिक में जाना चाहती थीं। जब मैं फॉरेंसिक में आई तो इसके पीछे बहन ही प्रेरणा बनीं।
मेरे पिता बसवन्नपा कारलावाड़ एक इंश्योरेंस कंपनी में सीनियर डिवीजनल मैनेजर रहे। उनका हर तीन-चार साल में ट्रांसफर हो जाता। मां संगम्मा कारलावाड़ हाउस वाइफ रही हैं।
घर में पढ़ाई-लिखाई पर हमेशा जोर रहा। पेरेंट्स को कभी इस बात की चाह नहीं रही कि हमें लड़का हो। हम सभी बहनों को एजुकेशन मिली।
सेंट माइकल कॉन्वेंट स्कूल से मेरी स्कूलिंग हुई जबकि हुबली के ही चेतन कॉलेज से प्री यूनिवर्सिटी (PU) की पढ़ाई पूरी की।
स्कूल में मेरी टीचर्स हमेशा पढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने के लिए मोटिवेट करतीं। हम टीचर्स को सिस्टर्स बुलाते। सिस्टर विजयलक्ष्मी और सिस्टर सुनीता यही कहतीं कि खूब पढ़ो और अपने इंटरेस्ट का पढ़ो। मैं पढ़ाई में अच्छी रही। स्कूल में टॉप 3 में रही। स्कूल के दिनों में ही मैंने तय कर लिया था कि डॉक्टर ही बनना है।
CID सीरियल देखकर फॉरेंसिक में जाने का मन बना लिया
एमबीबीएस करने के दौरान ही फॉरेंसिक में मेरी रुचि जागी। जब सेकेंड ईयर में थी तब फॉरेंसिक पढ़ाया जाता। जो टीचर थे, वो तरह-तरह की क्राइम स्टोरी सुनाते, इन्वेस्टिगेशन के बारे में बताते। तब क्राइम के कई नॉवल्स पढ़ती। उन दिनों CID सीरियल खूब देखती। उसमें होने वाले इन्वेस्टिगेशन और फॉरेंसिक एक्सपर्ट की भूमिका को देखकर मुझे अच्छा लगता।
इस फील्ड में ज्यादा चैलेंज है, मैं कुछ कर सकती हूं ऐसा सोचकर मैंने फॉरेंसिक में जाने का मन बना लिया।
दोस्त बोले-फॉरेंसिक ही क्यों, कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ेंगे
एमबीबीएस के दौरान जो मेरे बैचमेंट्स थे, उनमें से कई ने रोका कि फॉरेंसिक में क्यों जा रही हो? तुम्हें बाद में प्रॉब्लम हो सकती है।
केवल मोर्चरी की बात नहीं है, कोर्ट-कचहरी जाना पड़ेगा। विटनेस बॉक्स में खड़ा होना पड़ेगा, पुलिस के साथ काम करना होगा। रात हो या दिन जब भी जरूरत होगी, एक्टिव रहना होगा। इतना आसान नहीं है।
वे कहते कि रात में कैसे-कैसे लोग आते हैं, कैसे तुम काम कर पाओगी?
तुम कोई दूसरा स्ट्रीम चुन लो।
ये कहकर डराते कि जब शादी होगी तब ट्रेडिशनल ऑर्थोडॉक्स फैमिली को दिक्कत होगी। वो तुम्हारी पढ़ाई पचा नहीं पाएंगे।
पापा ने भी जब सुना तो वो भी फॉरेंसिक के पक्ष में नहीं थे। वो भी कहते कि कोई दूसरा ऑप्शन चुन लो।
हालांकि ऐसे समय में मेरी कुछ फीमेल फ्रेंड्स ने मोटिवेट किया कि दूसरे डॉक्टर भी तो कोर्ट जाते हैं। एक मिथ बना दिया गया है कि लड़के अच्छी सर्जरी करते हैं, लड़के ऑर्थोपेडिक करते हैं जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। हमने पांच साल की पढ़ाई में सबकुछ सीखा है जो लड़के सीखते हैं। लड़कियां सबकुछ कर सकती हैं। इस तरह किसी ने रोका तो किसी ने मोटिवेट किया।
दिलचस्प यह है कि आज जब मैं फॉरेंसिक एक्सपर्ट के रूप में काम कर रही तो वही दोस्त मेरे फैसले को सही ठहराते हैं।
अब जब उनको कभी लीगल कंसल्टेशन चाहिए होता है तो सबसे पहले वो मुझे ही फोन लगाते हैं।
मैं जस्टिस का पार्ट होना चाहती थी, इसलिए इस पेशे को चुना
जब तय कर लिया कि एमडी इन फॉरेंसिक करना है तो सबसे पहले मैंने परफेक्ट टीचर खोजना शुरू किया। काफी सोच-समझकर KIMS हुबली की सीट चुनी क्योंकि वहां के फॉरेंसिक एक्सपर्ट डॉ. गजानंद नायक थे। वो स्टूडेंट फ्रेंडली और कर्नाटक के ही नहीं, देश के मशहूर फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स में एक रहे हैं।
जब डॉ. नायक से मिली तो उन्होंने कहा कि इस प्रोफेशन में लड़कियां काफी कम हैं। बेहद कठिनाई और चुनौती वाला काम है।
तब मेरा यही कहना था कि मैं लोगों को अपनी पढ़ाई के जरिए न्याय दिलवाने में मदद करना चाहती हूं।
हर किसी की मृत्यु के बाद भी एक कहानी होती है और न्याय दिलवाने का सिलसिला शुरु होता है।
जिनकी मृत्यु बेहद दुख और तकलीफ में होती है उनकी फैमिली को जस्टिस मिलनी ही चाहिए। सुसाइड, एक्सीडेंट, बर्न जैसी घटनाएं आम नहीं हैं। कोई भी परिवार बेइंतहा पीड़ा से गुजरता है।
यानी मेरा यकीन है कि लाइफ ऑफ्टर डेथ में जस्टिस होना चाहिए। रेप केसेज में न्याय होना चाहिए। मेरे इस विश्वास को डॉ. नायक ने पुख्ता किया। जिसके अनुसार, जीते जी, मरने के बाद और जीवन यात्रा से जुड़े न्याय का हकदार व्यक्ति है।
डॉ. गजानन नायक कारवाड़ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के डीन और डायरेक्टर हैं। डॉ. महालक्ष्मी डॉ. नायक को अपना गॉडफादर मानती हैं। हैं।
मेरे जुटाए साक्ष्यों के आधार पर रेप के आरोपितों को सजा हुई
उत्तर कन्नड़ जिले के सारे पॉक्सो केस मेरे पास आते हैं। 18 वर्ष से नीचे के केस को एक्जामिन करती हूं। जो रेप पीड़िता आती हैं वो अधिकतर 12-14 वर्ष की उम्र की होती हैं।
उन बच्चियों को यह पता नहीं होता कि उनके साथ क्या गलत हुआ है। जब प्रेग्नेंट होती हैं तब पता चलता है कि सेक्शुअल वॉयलेंस हुआ है।
ये बच्चियां पूछती हैं कि हॉस्पिटल लेकर क्यों आए हैं। कई तो बोलने की स्थिति में भी नहीं रहतीं।
तब मेरे लिए बहुत चुनौती होती है कि उनसे कैसे सवाल करूं। कैसे कहूं कि तुम्हारे साथ क्या हुआ है।
तब लड़कियों को कॉन्फिडेंस में लेती हूं। मैं बताती हूं कि उन्हें मेडिकल ट्रीटमेंट चाहिए। तुम्हारी डॉक्टर हूं, मैं किसी को नहीं बताऊंगी कि क्या हुआ है। तब जाकर सारी हिस्ट्री पता चलती है।
लड़कियां दोहरी मार झलेती हैं। अधिकतर आरोपित दबंग होते हैं वे लड़कियों के परिवार को धमकाते हैं। जान से मारने की धमकी देते हैं।
लड़कियां ट्रॉमा में होती हैं। उनकी मानसिक स्थिति ऐसी नहीं रहती कि वो कुछ बोल सकें। तब मैं उनकी काउंसिलिंग भी करती हूं। समझाती हूं कि तुमने कुछ भी गलत नहीं किया है।
अब तक रेप के 70-75 केस आए हैं। इनमें से 20-25 में समन हुआ है। 5-6 में आरोपितों को सजा भी हुई है।
मैं इन मामलों में फॉलोअप भी करती हूं। मुझे खुशी है कि इनमें से कुछ लड़कियों की शादी भी हो गई है।
चर्चित कलबुर्गी केस में फॉरेंसिक टीम से जुड़ी
कर्नाटक में कई हाई प्रोफाइल केस की फॉरेंसिक जांच टीम के साथ काम किया है। स्कॉलर और एपिग्राफिस्ट एमएम कलबुर्गी की हत्या के बाद बनी फॉरेंसिक टीम का भी हिस्सा रही हूं। उनकी ऑटोप्सी रिपोर्ट भी तैयार की है।
कई हाई प्रोफाइल केस संभाल चुकी हूं।
वॉल्वो बस में लगी आग से जले लोगों को पहचानने में करनी पड़ी मशक्कत
इस करियर की कई चुनौतियां हैं। एक वॉल्वो बस में लगी आग में जले पैसेंजरों को पहचानने में बहुत मशक्कत करनी पड़ी। इस माममे में दो शव आपस में चिपक भी गए थे।
मैंने भयानक रूप से सिर से पांव तक जले शवों को पोस्टमार्टम किया है। कई बार सुबह 7 बजे मोर्चरी आकर रात 9 बजे देर तक काम करना पड़ता है।
कई बार रात 12 बजे भी पोस्टमार्टम किया है।
क्राइम सीन पर पहुंचकर सैंपल लेना और लोगों का गुस्सा झेलना, मैं इन सबसे हर दिन गुजरती हूं।
एक पोस्टमार्टम में कम से कम एक घंटे लग जाते हैं। कई बार तो 2 से ढाई घंटे भी लग जाते हैं। 24 घंटे के अंदर रिपोर्ट डिस्पैच करना होता है।
मेडिको लीगल केसेज में कई तरह के सर्टिफिकेट भी देने होते हैं। एज प्रूफ सर्टिफिकेट, चाइल्ड लेबर, सेक्शुअल ऑफेसेंज के मामले भी होते हैं।
बच्चों का पोस्टमार्टम विचलित कर देता है
डेड बॉडी के साथ एक्सपोजर तो एमबीबीएस की शुरुआत में ही सिखा दिया जाता है। पहले तो 15 दिन या एक महीने तक डेड बॉडी के सामने ही बिठा दिया जाता है ऑब्जर्वेशन करने के लिए।
कभी-कभी बदबू मारती डिकंपोज्ड कीड़े लगी बॉडी तो कभी पानी से फुले शरीर का भी पोस्टमार्टम करना पड़ता है। लेकिन फॉरेंसिक एक्सपर्ट होने के नाते आप मुंह नहीं मोड़ सकते।
फॉरेंसिक की पढ़ाई के दौरान यह सिखाया जाता है कि ब्रीदिंग इन एंड ब्रीदिंग आउट। मुंह से सांस नहीं लेना है। आप शव के एग्जामिन करने के दौरान उसकी स्थिति देखकर पीछे नहीं हट सकते।
बच्चों का पोस्टमार्टम करना बहुत बुरा लगता है। अब तक एक हजार से अधिक पोस्टमार्टम खुद किया है। जबकि पीजी की पढ़ाई के दौरान हर साल 1500-2000 केस होते थे जिसमें मैं डॉक्टर को असिस्ट करती।
पीएम रिपोर्ट में नाम में छोटी गलती भी भारी पड़ सकती है
पोस्टमार्टम के बाद रिपोर्ट तैयार करना सबसे मुश्किल काम है।
ये डॉक्यूमेंट मेडिकल लीगल केस वाले होते हैं इसलिए बहुत सावधानी के साथ तैयार करने पड़ते हैं।
पोस्टमार्टम की कॉपी कोर्ट को भी जाती है। यहां कोई भी गलती की माफी नहीं होती। अगर नाम की स्पेलिंग की गलती भी परिवार को भारी पड़ सकती है।
अब क्रिमिनिलॉजी में नये-नये ब्रांच खुल रहे हैं। टॉक्सिकोलॉजी में काफी काम हो रहा है। अलग-अलग एप्लीकेशन ने केस डिस्पोजल को आसान बना दिया है। पहले जब पॉइजनिंग के केस आते थे, तब काफी समय लगता था। लेकिन अब जल्द रिजल्ट आ जाता है।
पढ़ाई-करियर पहले, शादी के लिए कभी सोचा नहीं
मैंने शादी नहीं की है। अपनी पढ़ाई, अपना करियर संवारने में ही पूरा समय लगा दिया। हालांकि अब मैं अपने पार्टनर की तलाश में हूं।
कई जर्नल्स में रिसर्च पब्लिश हुई
डॉ. महालक्ष्मी कारलावाड़ की कई रिसर्च नेशनल-इंटरनेशनल जर्नल्स में पब्लिश हुई हैं। ये रिसर्च हैंगिंग डेथ, जहर खाने से मौत, एक्सीडेंट, नवजात बच्चों की मृत्यु पर रही हैं। डॉ. कारलावाड़ को कर्नाटका स्टेट कॉन्फरेंस बेस्ट फैकल्टी का अवॉर्ड भी मिला है।
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