वॉशिंगटन/ नींद के दौरान कुछ सुगंधों के संपर्क में आने से मस्तिष्क की कार्यक्षमता में नाटकीय रूप से बढ़त होती है। यह दावा अमेरिका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी ने रिसर्च के आधार पर किया है। शोधकर्ताओं ने इसके पुख्ता सबूत पेश किए हैं कि सुगंधित हवा सोचने, समझने और याददाश्त से जुड़े मस्तिष्क के न्यूरोलॉजिकल क्षेत्रों को प्रभावित करती है।
इससे बौद्धिक क्षमता बढ़ती है। शोधकर्ताओं ने यह रिसर्च 60 से 85 साल के 43 महिला और पुरुषों पर किया। रिसर्च में पता चला कि हर रात सोने से पहले कमरे में तरह-तरह के इत्र को छिड़कने से सोचने, समझने की कमजोरी और डिमेंशिया जैसी बीमारियों की गति को धीमा किया जा सकता है।
बढ़ती उम्र के साथ बौद्धिक क्षमता को स्वस्थ रखने के लिए मस्तिष्क के ग्रे मैटर को सक्रिय रखना महत्वपूर्ण है। इसका मतलब रोज सिर्फ क्रॉसवर्ड हल करना नहीं है। बल्कि, दिमाग को उलझाने के लिए अपने आसपास हर तरह के दृश्यों और ध्वनियों से भरना भी है। यह मानना कोई बड़ी बात नहीं कि तरह-तरह की सुगंधों को अनुभव करने से मनुष्य को लाभ हो सकता है।
- सोचने-समझने की क्षमता से सूंघने की क्षमता भी कम होती है
शारीरिक तौर पर हमारी सोचने, समझने और याद करने की क्षमता कम होने से पहले हमारी सूंघने की क्षमता कम हो जाती है। सूंघने की क्षमता को खोना मस्तिष्क कोशिकाओं की हानि से भी जुड़ा है।
न्यूरोबायोलॉजिस्ट माइकल यासा कहते हैं- गंध से जुड़ी इंद्रियों का दिमाग के मेमोरी सर्किट से सीधे जुड़े होने का विशेष महत्व है। हमारी नजर कम हो जाए तो हम चश्मा लगा लेते हैं। सुनना कम हो जाए तो सुनने की मशीन लगा लेते हैं। लेकिन, सूंघ न पाने पर हम कुछ भी नहीं करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी उम्र कितनी है या मानसिक स्थिति कैसी है। रात में जब रोशनी बंद हो जाती है। सन्नाटा छा जाता है। ऐसे में अपनी नाक को कुछ करने देना दिमाग को व्यायाम करवाने का बहुत अच्छा तरीका है।
- दिमाग की सक्रियता में 226% का अंतर, याददाश्त में भी बदलाव दिखा
रिसर्च में एक समूह को गुलाब, रोजमेरी जैसी सुगंधों वाले प्राकृतिक तेल दिए गए। वहीं, दूसरे समूह को यही तेल नकली व कम सुगंध में दिया गया। दोनों समूहों को छह महीने तक हर रात सोने से दो घंटे पहले इन्हें अपने कमरे में छिड़कना था। छह महीने बाद जब दिमाग की सक्रियता का परीक्षण किया गया, तो पहले समूह के लोगों में 226% का अंतर सामने आया। इसके अलावा इस समूह के लोगों की सोचने की क्षमता और याददाश्त में भी बदलाव देखा गया।

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