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कोई भी अच्छा काम शुरू करने से पहले दही खाया जाता है, लेकिन यह दही कितने लम्बे सफ़र के बाद आपके कटोरी तक पहुंचा? भारत को अखंड बनाता है दही

जिस दही को खाकर हम सब अपना सफर शुरू करते है, वह खुद एक लंबी यात्रा करके हमारी कटोरी तक पहुंचा है। भारतीय खानपान का ही नहीं, बल्कि पूजा-पाठ का अभिन्न हिस्सा बन चुके दही की पैदाइशी हिंदुस्तानी है या नहीं, इसका कोई ठोस सबूत नहीं मिलता।

फूड हिस्टोरियन केटी अचाया दही को विशुद्ध भारतीय मानते हैं, लेकिन विज्ञान की दुनिया में इसका जन्मस्थान बुल्गारिया बताया जाता है। कुछ इसे टर्किश लोगों की देन भी मानते हैं।

भारत को अखंड बनाता है दही

बहरहाल, दक्षिण भारत में जिस दही को हिंदी में लिखने पर विवाद हुआ, वही दही भारत को अखंड बनाता है। वह अपने स्वाद और सेहत के रुतबे से उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम भारत तक बराबर का दखल रखता है।

अगर एक उत्तर भारतीय को लस्सी और रायता पसंद है तो एक साउथ इंडियन को कर्ड-राइस मिल जाए तो खुशी से कहेगा- ‘नानरी’ यानी थैंक यू…। गुजरात में बिना दही के ‘खमन-ढोकला’ की कल्पना नामुमकिन है जबकि उड़िया लोगों में ‘पखाल’ और ‘दही-बैगन’ की सब्जी बेहद लोकप्रिय है।

पारंपरिक उड़िया व्यंजन पखाल को चावल, दही, खीरा, जीरा, तले हुए प्याज और पुदीने की पत्तियों से तैयार किया जाता है। गर्म जलवायु वाले ओडिशा के लोगों को पखाल खाने से पोषक तत्व मिल जाते हैं।

मुगलों ने भारतीयों को मैरिनेशन सिखाया?

भारत में लगभग सभी समुदायों में नॉनवेज व्यंजनों को दही में मैरिनेट करने का चलन है। कई लोग मानते हैं कि मैरिनेशन की कला हमने मुगलई रसोई से सीखी, लेकिन फूड हिस्टोरियन केटी अचाया बताते हैं कि मैरिनेशन की चर्चा ‘अर्थशास्त्र’ में भी है, जो ईसा मसीह और पैंगबर मोहम्मद के जन्म से काफी पहले लिखा गया।

भारतीय व्यंजनों में दही का खट्टापन, भारत जितना प्राचीन

केटी अचाया कहते हैं- भारतीय व्यंजनों में दही का इस्तेमाल इतिहास लिखने से भी पहले से हो रहा है। ऋग्वेद में दही चावल के व्यंजन का उल्लेख है। वैदिक काल में, चावल के साथ दही खाया जाता था।

श्रीखंड का पहला संदर्भ लगभग 500 ईसा पूर्व (या बुद्ध के जन्म से पहले भी) आया है। 1000 ईस्वी तक, दही का नियमित रूप से खाना पकाने में उपयोग होने लगा था। मसालों और दही में पकाई गई सब्जियों के व्यंजनों का वर्णन मिलता है। हालांकि दही-वड़े का पहला संदर्भ 12वीं शताब्दी में सामने आया है। माना जाता है कि दही-वड़े इससे पहले से बनने लगे होंगे।

खान-पान विशेषज्ञ वीर सांघवी दही के मामले में केटी अचाया के दावों से सहमत है। लेकिन आलू, मिर्च, टमाटर और यहां तक कि मैदा पर उनकी राय अलग है। उनका कहना है कि ये चीजें आधुनिक काल तक भारत में नहीं आई थीं, लेकिन दही लगभग भारत जितना ही पुराना है।

बुल्गारिया ने दही जमाना और कुकिंग में उसका इस्तेमाल करना सिखाया

भारत में दही के ईजाद को लेकर अपने दावे चाहे जो हों, लेकिन माना जाता है कि किसी जमाने में मिडिल-ईस्ट और सेंट्रल एशिया में दही जमाने का रिवाज शुरू हुआ। लेकिन दही को सेहत का साथी बनाने का श्रेय बुल्गारिया को जाता है। 4 हजार साल पहले दही का ईजाद बुल्गारिया में हुआ। कोई साढ़े 3 हजार साल पहले लिखे गए ऋग्वेद में प्रसाद के लिए ‘पंचगव्य’ बनाने का जिक्र है। इसी ‘पंचगव्य’ का अहम हिस्सा दही है। एक्सपर्ट्स भी पेट की सेहत के लिए दही को उत्तम मानते हैं।

मुंबई के नामी फाइव स्टार होटल में चीफ शेफ रहे विनय कुमार बताते हैं कि बुल्गारिया के लोगों ने दुनिया को न सिर्फ दही जमाना सिखाया बल्कि कुकिंग में उसका इस्तेमाल करना भी बताया। उन्होंने मीट से बनी डिश 'शावरमा' में दही डालकर उसे और जायकेदार और लजीज बनाया। बुल्गारिया के कबायलियों ने ही सलाद में दही मिक्स कर उसे और सेहतमंद बना दिया।

शेफ विनय कुमार इतिहास के पन्नों के हवाले से बताते हैं कि असल में, बुल्गारिया के कबायली समाज जानवर पालता था और जानवरों के दूध के कई इस्तेमाल भी सीखे। वो अपने मवेशियों के साथ यूरोप के विभिन्न हिस्सों में घूमते।

मवेशियों की संख्या बढ़ी तो दूध में भी इजाफा हुआ। चूंकि उनके पास दूध को प्रिजर्व करने का कोई तौर-तरीका नहीं था, इसलिए उन्होंने इसे जानवरों की खाल में ही स्टोर करने का तरीका ढूंढा। मगर एक तापमान पर जाकर दूध में लैक्टोबैसिलस बैक्टीरिया पनपने लगे। नतीजा यह हुआ कि दूध दही बन गया। ऐसा बार-बार होने पर खानाबदोश लोगों ने संयोग से दही जमाना सीख लिया।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि दही जमाने के लिए दूध की खातिर एक आदर्श तापमान अहम है। भोजन की तलाश में भटक रहे बुल्गारिया के कबायली लोग इस जमे दूध को फेंकने के बजाए खाने लगे। दही को किन चीजों के साथ नहीं खाना चाहिए, इस ग्रैफिक से जान सकते हैं।

डॉक्टर स्टैमेन ग्रिगोरोव ने दही में बैक्टीरिया की खोज की

बुल्गारिया को दही का जन्मस्थान होने का श्रेय बुल्गेरियाई वैज्ञानिक डॉ. स्टैमेन ग्रिगोरोव को भी जाता है। उन्होंने दही जमने के लिए जिम्मेदार सूक्ष्मजीवों (microorganism) को पहचाना। इन सूक्ष्मजीवों को खोजने की कहानी भी दिलचस्प है।

माइक्रोबॉयोलॉजिस्ट डॉ. स्टैमेन जिनेवा की मेडिकल यूनिवर्सिटी में रिसर्च असिस्टेंट हुआ करते थे। हर चीज के पीछे की वजह जानने का उन्हें 'दिमागी खलल' था।

1904 में अपनी शादी के कुछ दिनों बाद डॉ. स्टैमेन अपने काम पर लौटे तो उनकी नई-नवेली दुल्हन डारिंका ग्रिगोरोवा ने रास्ते में खाने के साथ थोड़ा सा दही भी पैक कर दिया। डॉ. स्टैमेन ने रास्ते में दही तो खाया लेकिन उसमें से थोड़ा सा बचा भी लिया। और डॉ. स्टैमेन महीनों तक लैब में यह जानने के लिए जूझते रहे कि आखिर वो कौन सी चीज है जो दूध को दही में तब्दील कर देती है?

दही में ऐसा क्या है जो पेट को ठंडक देने के साथ भोजन को पचाने में भी मदद करता है।

वह पत्नी के दिए हुए दही को लैब में घंटों माइक्रोस्कोप से निहारते रहते। सालभर की कड़ी मशक्कत के बाद 1905 में उन्होंने पाया कि एक सूक्ष्मजीव दूध को दही में बदलने का काम करता है।

1945 में डॉ. स्टैमेन की मृत्यु के बाद इस सूक्ष्मजीव को ‘लैक्टोबैसिलस बल्गारिकस’ नाम दिया गया। अगर कभी आप बुल्गारिया जाएं तो डॉ. स्टैमेन ग्रिगोरोव के गृहनगर ट्रून में बने दुनिया के एकमात्र दही संग्रहालय (म्यूजियम ऑफ योगर्ट) को देखना न भूलें।

दही खाएं, लंबा जीवन पाएं

दही का राज जानने की डॉ. स्टैन की कामयाबी के बाद बॉयोलॉजिस्ट्स बुल्गारिया के किसानों की लंबी उम्र का रहस्य जानने में जुटे रहे।

रिसर्च से उन्होंने जाना कि बुल्गारिया के किसान अच्छी मात्रा में दही खाते हैं, इसलिए वो ज्यादा दिन जीते हैं।

बुल्गारिया के ही वैज्ञानिकों ने दुनिया को बताया कि दही जमाने के लिए दूध को 32-35 डिग्री पर गर्म करना चाहिए। दही का पेटेंट बुल्गारिया के पास है।

भारतीय किचन और कुकिंग में दही ने कैसे राज जमाया

शेफ विनय कुमार कहते हैं कि बुल्गारिया या मिडिल ईस्ट या फिर भारत में ऐसा अचानक नहीं हुआ कि कुकिंग में दही का इस्तेमाल शुरू हो गया।

ये वो दौर था जब इंसान अपनी भूख मिटाने के लिए लगातार एक्सपेरिमेंट कर रहा था। रेसिपी में टेंडरनेस और टेस्ट लाने के लिए दही का कुकिंग में इस्तेमाल हुआ। दही ग्रेवी को गाढ़ा बनाता है और टमाटर की कमी भी पूरी करता है।

शेफ विनय कुमार ने भी वीर सांघवी की तरह ही केटी अचाया के दावों से अलग बात बताई। उन्होंने बताया कि अकबर के जमाने में भारतीय समाज मुगलों से काफी घुला-मिला। इस तरह खानपान की साझेदारी और खाना पकाने का तौर-तरीका भी एक-दूसरे के बीच साझा हुआ। शाहजहां के दौर में शाही रसोई ने भारतीय व्यंजनों को और समृद्ध बनाया।

सीनियर जर्नलिस्ट शबनम मीनावाला बताती हैं कि चंगेज खान अपने सैनिकों को दही, जिसे कुमिज (kumis) कहा जाता था, खिलाता था ताकि वो मजबूत और बहादुर बने रहें।

दही ने पूरी दुनिया में फैला दिया ‘रायता’, लेकिन इसके इतिहास का अता-पता नहीं

वीर सांघवी कहते हैं कि उत्तर भारत में लगभग हर दावत में दही से बना रायता ‘मूक अतिथि’ होता है। मूक अतिथि इसलिए, क्योंकि वह मौन रहता है। इसके चलते कभी थाली में उसे वह ‘इज्जत’ नहीं मिली जिसका दही हकदार है।

हम इसे एंजॉय जरूर करते हैं, लेकिन हम इसके बारे में ज्यादा बात नहीं करते। रायता कहां से आया, इसका भी जिक्र नहीं होता। लेकिन जब किसी गलत हरकत और उसके नतीजों की बात करनी हो तो बेचारे रायते का ही नाम आता है… ‘अरे उसने रायता फैला दिया’

इतना तो हम जानते ही हैं कि रायता उत्तर भारतीय व्यंजन है। लेकिन इसे बंगाल या ओडिशा में नहीं परोसा जाता। पश्चिम में भी यह भोजन का हिस्सा नहीं है। दक्षिण भारत में भी रायता नहीं बनता। और अगर देश के किसी अन्य हिस्से में रायता मिलता है तो यह मानना चाहिए कि वहां जरूर उत्तर भारतीय रह रहे होंगे।

केटी आचाया को संगम साहित्य में रायता का कोई संदर्भ नहीं मिला, और न ही शाहजहां की शाही रसोई पर सलमा युसूफ हुसैन की लिखी किताब ‘द मुगल फीस्ट’ में रायते का जिक्र है।

मिडिल-ईस्ट में रायते कैसे-कैसे

अब मध्य पूर्व के देशों में भी रायता तलाश लेते हैं। जिस तरह भारत में दही को ठंडक देने वाले भोजन के तौर पर खाया जाता है, उसी तरह अरब में भी दही और खीरे से बने आइटम को ठंडक देने वाला भोजन माना जाता है।

मिडिल ईस्ट में मिलने वाले व्यजनों पर काम कर चुकीं लंदन की मशहूर शेफ अनीसा हेलो बताती हैं कि मध्य पूर्व में ठंडे दही और सब्जियों को मिलाकर भी व्यंजन बनते हैं, जो रायते की तरह ही होते हैं।

तुर्किये में डिल (Dill) यानी सौंफ जैसे पौधे की पत्ती और सीरिया और लेबनान में पुदीने और ईरान में दही को लहसुन के साथ खाते हैं। इसे ‘मस्त-ओ-मुसिर’ कहा जाता है।

वीर सांघवी कहते हैं कि पूरी दुनिया में किसी न किसी रूप में रायता मिलता ही है। लेकिन इसकी सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं कि वास्तव में रायता पहली बार कहां के लोगों ने बनाया। शायद यह आइडिया भारतीय है और पश्चिम एशिया तक पहुंच गया। मगर यह दिलचस्प है कि रायते के सभी अवतार केवल उत्तर भारत से पश्चिम की ओर जाने पर ही मिलते हैं।

रायता काफी हद तक ग्रीक डिश ‘ज़त्ज़िकी’ से मिलता है। मशहूर ब्रिटिश शेफ हेस्टन ब्लुमेंथल अपनी नई किताब ‘इज़ दिस ए कुकबुक’ में कहते हैं कि रायता और ग्रीक ज़त्ज़िकी (Greek tzatziki) में बहुत बारीक अंतर है।

एक भारत से है, दूसरा ग्रीस से है। लेकिन दोनों जगहों के रायते में एक चीज कॉमन है वह है-दही।

ओमान के मस्कट में एक मशहूर होटल की शेफ पल्लवी निगम भी बताती हैं कि तुर्किये के लगभग हर व्यंजन में दही शामिल है। वहां वेज-नॉनवेज और सलाद से लेकर हर तरह के व्यंजन में दही का अहम रोल है।

शेफ पल्लवी निगम ने दही के इस्तेमाल को लेकर काम के कुछ टिप्स भी शेयर किए।

दही से कैसे बनाएं डिप

डिप बनाने के लिए हंग कर्ड चाहिए। एक पाव दही को सूती कपड़े में बांधकर रातभर के लिए टांग दें। पानी निकल जाने पर वो हंग कर्ड हो जाता है।

इसमें 1 चम्मच नींबू का रस, 1 चम्मच हरी मिर्च कटी हुई, 2 चम्मच हनी, 1 कली ब्राउन गार्लिक, स्वादानुसार नमक, 1/4 चम्मच काली मिर्च पाउडर, 2 चम्मच बारीक कटी हुई धनिया पत्ती, 2 चम्मच ओलिव ऑयल चाहिए।

सबको एक बॉउल में मिला लें और सॉल्टेड बिस्किट, नाचोज, चिप्स या फ्रेश ग्रीन सलाद के साथ एन्जॉय करें।

आयुर्वेद में दही के पांच भेद बताए गए हैं। 

तो ये थी आज 'फुरसत का रविवार' में दही की कहानी। सच कहें तो दूध को जमाना और दही का अच्छा जमना भी एक कला है।

दूध ज्यादातर घरों में रात को जमाया जाता है, इसलिए दूध जमाने को लेकर कहते हैं, Milk goes to sleep at night, wakes up in the morning tight यानी ‘दूध रात को सोने जाता है और सुबह उठने पर टाइट होता है।’

सो आप भी दही जमाएं और सेहत को चमकाएं।

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