सांसे थम जाने के बाद अंतिम संस्कार के वक्त, बेटा सीने से लिपटा:कहा- पापा पहले ही जा चुके हैं, मां आप मत जाओ; माँ तुरंत उठ खड़ी हुई
नई दिल्ली/ वह पढ़-लिखकर करियर बनाने के सपने देख रही थीं, लेकिन हालात ऐसे बने कि 18 साल की उम्र में शादी करनी पड़ी। खुशहाल जिंदगी बीत रही थी कि पति बीमार रहने लगे। जांच से पता चला कि वह एचआईवी संक्रमित हो गए हैं। उनका छोटा बेटा और वह खुद भी इस वायरस की चपेट में आ चुकी थीं। पति के इलाज के लिए उन्होंने घर तक बेच दिया, लेकिन उन्हें बचा नहीं सकीं। बेटे को भी टीबी ने छीन लिया।
वह खुद इस कदर बीमार पड़ीं कि डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। लेकिन, मौत को मात देकर वह लौट आईं। अब वह दूसरों को बचाने और एचआईवी संक्रमितों की जिंदगी संवारने के लिए देशभर में मुहिम चला रही हैं। इस दौरान उन्हें कदम-कदम पर भेदभाव झेलने पड़े, अपनों का साथ छूटा, लेकिन वह आज भी डटी हुई हैं।
मेरे जन्म से पहले मेरी फैमिली मथुरा से जयपुर से शिफ्ट हो गई थी। मैं वहीं पली-बढ़ी। 16-17 साल की उम्र तक मेरा पूरा ध्यान पढ़ाई पर रहा। छत से गिरने से मैंने अपना भाई भी खोया। जिसके बाद मां मेंटल ट्रॉमा में चली गईं। पापा को बिजनेस में घाटा हुआ।
घर में मैं बहुत अकेलापन महसूस करती। पढ़ाई और करियर पर फोकस नहीं कर पा रही थी। लगता कि सबसे भागकर कहीं दूर चली जाऊं, लेकिन इतनी कम उम्र में अकेले रहने का कॉन्फिडेंस भी नहीं था।
10 साल तक पति से नहीं मिले पेरेंट्स
मैंने सोचा कि शादी कर लूंगी तो कोई ऐसा मिलेगा, जो मुझे समझ सके। मेरे पति उस वक्त जयपुर के महारानी कॉलेज में पढ़ते थे। कॉलेज आते-जाते उनसे मुलाकात हुई और 2-3 महीने की दोस्ती के बाद 1993 में उन्हीं से शादी कर ली। उस समय मैं सिर्फ 18 साल की थी। इस तरह, एक ऐसा शख्स मेरी जिंदगी में आया, जो मुझे प्यार करता था, मेरा ख्याल रखता था।
हम दोनों अलग-अलग जाति से थे। दूसरी जाति में शादी करने का बहुत विरोध हुआ। मेरे परिवार में इस शादी से कोई राजी नहीं था। मम्मी-पापा इतने नाराज हुए कि 10 साल तक मेरे पति की शक्ल तक नहीं देखी।
HIV ने छीन ली परिवार की खुशियां
शादी के बाद 3 साल बाद 1996 में मैं मां बनी। हम खुशहाल जिंदगी जी रहे थे। फिर 1998 में दूसरा बेटा हुआ। उन दिनों पति अक्सर बीमार रहने लगे। कई-कई दिन जुकाम-बुखार में पड़े रहते। बार-बार डायरिया और टाइफाइड होने लगा।
1999 में फैमिली डॉक्टर ने एचआईवी टेस्ट कराया। रिपोर्ट आई तो पता चला कि पति एचआईवी पॉजिटिव हैं। मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। पति डिप्रेशन में चले गए। छोटे देवर और ननदों की शादी करवानी थी। उन्हें हर वक्त यह डर सताता कि उनके बाद परिवार का क्या होगा।
जांच में मेरी एचआईवी रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई थी। उसी दौरान सरकार ने हर एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को 20 हजार की रकम देकर मदद की, ताकि वे अपना इलाज करा सकें। मुझे और मेरे पति को भी मदद मिली, लेकिन मुझे कोई परेशानी नहीं थी और नॉर्मल लाइफ जी रही थी। इसलिए मैंने दवाएं खानी नहीं शुरू की और उस पैसे से पति के लिए दवाएं खरीदीं, ताकि उन्हें ज्यादा दिन तक इलाज मिल सके।
टीबी ने ली छोटे बेटे की जान
जब छोटा बेटा 10-11 महीने का हुआ तो वह भी बीमार रहने लगा। उसे लगातार डायरिया, उल्टी, दस्त और पेट दर्द होता। डॉक्टरों को दिखाते तो सब अंदाज से दवाएं देते और तरह-तरह की जांच कराते रहे, लेकिन बीमारी पता नहीं चली।
मैं और पति उस समय इतने ट्रॉमा में थे कि कभी ख्याल ही नहीं आया कि बच्चे की एचआईवी जांच भी करा लेनी चाहिए। किसी डॉक्टर ने भी नहीं बताया कि बच्चे को भी इंफेक्शन हो सकता है।
आखिर में एक डॉक्टर ने टीबी की आशंका जताई और अल्ट्रासाउंड कराने के लिए कहा। जब पता चला कि उसकी किडनी में टीबी है तो दवाएं शुरू हुईं, लेकिन बमुश्किल 20 दिन ही उसने दवा खाई होगी और सवा दो साल की उम्र में वह इस दुनिया से चला गया।
इलाज करने वाले ही चरित्र पर उठाते सवाल
एचआईवी इंफेक्शन का पता चलने में काफी देर गई और एड्स की स्टेज आ गई। पति को बार-बार अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता। वह लंग्स टीबी, बोन टीबी और मेनिनजाइटिस की चपेट में आ गए।
बेटे के गुजरने के बाद उनकी तबीयत और खराब रहने लगी। हर 10 दिन में उन्हें अस्पताल ले जाती और वहां भेदभाव भी झेलती। सबको लगता कि पति का कैरेक्टर ठीक नहीं है, इसीलिए एचआईवी पॉजिटिव हो गए। काउंसलर से लेकर डॉक्टर तक पूछते कि इतनी कम उम्र में संक्रमण कैसे हो गया, क्या आप ट्रक ड्राइवर हैं, कहीं इधर-उधर तो नहीं गए थे। मुझे और मेरे पति को बार-बार ऐसे सवालों का सामना करना पड़ता।
डॉक्टर-नर्स दूर से बात करते, फेंक कर देते दवाएं
पति जिस अस्पताल में भर्ती होते, नर्सिंग स्टाफ उन्हें छूने से डरता। दो-दो ग्लव्स पहनकर उनके पास आते कि कहीं वे भी वायरस की चपेट में न आ जाएं। कोई भी चीज देनी होती तो दूर से फेंक कर देते। हम किसी चीज को छू लेते, तो वे उसे हाथ भी नहीं लगाते थे। दूसरे मरीज पति के बेड से कई फिट दूर रखते। डॉक्टर कभी नब्ज छूकर नहीं देखते थे और दूर बैठाकर बात करते।
यह सब देखती तो लगता कि हमने ऐसा क्या गुनाह कर दिया, जिसकी वजह से से हमारे साथ ऐसा व्यवहार हो रहा है। सेंटर पर एचआईवी की दवा लेने के लिए दूसरे मरीज भी मुंह ढंककर आते कि कहीं कोई उन्हें पहचान न ले। सब बहुत तकलीफ में जी रहे थे।
घर बेचकर इलाज कराया, नहीं बचे पति
पति अकेले कमाने वाले थे। इलाज और दवाओं का खर्च बढ़ता जा रहा था। सरकारी अस्पताल से मिलने वाली टीबी की दवाओं से पति के यूरिन का रंग लाल हो जाता, लाल रंग की उल्टी आती तो वह और डर जाते। इसलिए उनके लिए बाहर से महंगी दवाएं खरीदनी शुरू की।
हमारी आर्थिक स्थिति खराब हो गई। सारी जमा-पूंजी खत्म हो गई। इलाज कराने के लिए घर तक बेचना पड़ा। जब पति आखिरी सांसें ले रहे थे, तब पहली बार पापा उनसे मिले। उन्होंने पापा से माफी मांगी और उनके प्राण निकल गए।
पति के जाने के बाद मेरी दुनिया सूनी हो गई। एचआईवी का पता चलने के बाद से ही लोग दूरी बरतने लगे। जिस घर में त्योहारों पर मेला लगता, वहां अब 24 घंटे सन्नाटा रहने लगा। बेटा बाहर खेलने जाता, तो लोग अपने बच्चों को बुला लेते। बेटे को इसकी वजह तो नहीं समझ आती थी, लेकिन उसके साथ होता भेदभाव मुझे तकलीफ पहुंचाता। यह समझने को कोई राजी नहीं होता कि छूने से कोई बीमारी नहीं लगेगी।
डॉक्टर ने दे दिया जवाब, बेटे की पुकार मौत के मुंह से छीन लाई
साल 2006 में मुझे दूसरी बार टीबी हुई। मेरा वजन घटकर 30 किलो रह गया। मैं हड्डियों का ढांचा भर रह गई। खड़े होने तक की हिम्मत नहीं रही। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया, कहा घर जाकर प्रार्थना करो। डॉट सेंटर से दवा लेकर लौटते समय मैं बेहोश होकर गिर पड़ी। मेरे पापा को पड़ोसियों ने बुलाया और उन्हें बताया कि डॉक्टर ने जवाब दे दिया है।
मैं फर्श पर लिटा दी गई। घर में सबको लगा अब मैं जाने वाली हूं। मेरा हाथ लगाकर दीपदान, अन्नदान करवाने लगे। गीता पाठ शुरू हो गया। तभी मेरा बच्चा आया और मेरे सीने पर सिर रखकर बोलने लगा कि पापा तो पहले ही छोड़कर चले गए, मम्मी अब आप मत जाना।
उसके शब्दों ने मेरे दिल और दिमाग को झिंझोड़ दिया। मैंने देखा कि चारों तरफ लोग मुंह ढंककर खड़े हैं। वह माहौल देखकर मुझे बहुत अजीब लगा। मैं एकदम से खड़ी हो गई और कहा कि यह सब हटाओ, मुझे कुछ नहीं हुआ है। उस दिन जब मैं खड़ी हुई, उसके बाद कभी कमजोर नहीं पड़ी और आज तक डटी हूं।
टीबी की दवा खाकर 6 महीने में मैंने काफी वेट गेन कर लिया था। मेरी जिंदगी पटरी पर लौट आई। कुछ समय तक एक फाइनेंस कंपनी में नौकरी करने के बाद मैं एक संस्था से जुड़ी, जो एचआईवी पॉजिटिव लोगों के लिए काम करती है। वहां मुझे ऐसे लोगों को खोजने की जिम्मेदारी दी गई, जिनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आती।
पैर में घाव हुआ तो नर्स ने इलाज करने से मना किया
किसी दवा के साइड इफेक्ट से पैरों में फफोले पड़ गए। सरकारी डिस्पेंसरी में ड्रेसिंग करवाने गई, तो नर्स नंगे हाथों से घाव साफ करने लगी। जब उसे रोका और बताया कि मैं एचआईवी पॉजिटिव हूं, ग्लव्स पहनकर पट्टी करो। उसने तुरंत कैंची-पट्टी फेंक दी और चिल्लाकर बोली कि यहां क्यों आई हो, जिला अस्पताल जाओ। मेरे पैर सूजे थे, पस बह रहा था। मैं खड़ी तक नहीं हो पा रही थी। इतनी तकलीफ में मुझे जिला अस्पताल जाना पड़ा।
कुछ ठीक हुई तो मेडिकल ऑफिसर से मिली। उन्हें सारी बात बताई और पूछा कि यह कहां लिखा है कि सावधानी बरतते हुए किसी एचआईवी पॉजिटिव मरीज का इलाज नहीं कर सकते? इसके बाद उन्होंने नर्स को बुलाकर डांटा और पूरे स्टाफ को समझाया।
इलाज के लिए समझाती तो लोग मारने दौड़ पड़ते
उस वक्त एचआईवी-एड्स का इतना डर था कि जांच कराने वाले अपने घर का पता और मोबाइल नंबर तक गलत लिखवाते थे। उन्हें खोजते हुए उनके घर पहुंच भी जाते तो वे घर से भाग जाते। परिवार वाले मानने से इंकार कर देते कि उनके घर में कोई एचआईवी संक्रमित है। कई बार तो लोग गालियां देने लगते और डंडा लेकर मारने के लिए बाहर आ जाते कि हमारे मोहल्ले में इस बीमारी का नाम लेने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई।
इतने सालों की मेहनत के बाद बदलाव दिखने लगा है। लोग जागरूक हुए हैं। लेकिन, भेदभाव पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। करीब 7 साल राजस्थान में काम करने के बाद 2013 में मैं दिल्ली आ गई और इंडिया एचआईवी/एड्स एलायंस के साथ काम करने लगी।
बच्चों, महिलाओं और सेक्स वर्कर्स की जिंदगी संवारने की मुहिम
भारत में 'नेशनल कोएलिशन ऑफ पीपल लिविंग विद एचआईवी इन इंडिया (NCPI+)' के नाम से एचआईवी पॉजिटिव लोगों का एक राष्ट्रीय स्तर का संगठन है। मैं इसमें बोर्ड मेंबर हूं। फ्रंटलाइन मेंबर्स को ट्रेनिंग देती हूं। उन्हें सिखाती हूं कि कैसे लोगों की काउंसिलिंग करें, कैसे सुविधाओं का लाभ दिलाएं। बच्चों, महिलाओं, सेक्स वर्कर्स और एलजीबीटी कम्यूनिटी के एचआईवी पॉजिटिव लोगों की जिंदगी संवारने की कोशिशों में जी-जान से जुटी हूं।
HIV के वायरस को मात देना हुआ आसान
जब मैंने और मेरे पति ने इलाज शुरू कराया, तब बहुत दवाएं खानी पड़ती थीं। उनके साइड इफेक्ट्स भी बहुत होते थे। लेकिन, अब बहुत अच्छी दवाएं आने लगी हैं। दिनभर में सिर्फ एक गोली लेनी पड़ती है। यह वायरस खून में रहता है और दवा न लेने पर बहुत तेजी से फैलता है। लेकिन, समय पर दवा शुरू करने से वायरस को बढ़ने से रोक सकते हैं। दूसरों संक्रमण का खतरा भी कम हो जाता है।
जैसे डायबिटीज और ब्लड प्रेशर की दवा खाते हैं, वैसे ही रोज नियम से एचआईवी की दवा खाकर हेल्दी लाइफ जी सकते हैं। नाको की तरफ से देशभर के सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर ये दवाएं फ्री में मिलती हैं। जांच भी फ्री में होती है।
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