‘इंटरनेशनल डॉग डे’ स्पेशल - इंसानों का सबसे वफादार जानवर 'भेड़िया' है। आपको ये बेतुका लगेगा, लेकिन आंशिक रूप से सच है। दरअसल, आपके आस-पास मौजूद कुत्ते पहले कभी भेड़िया थे। करीब 20 हजार साल पहले ये इंसानों के सबसे बड़े दुश्मन माने जाते थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि हमारे सबसे बड़े दोस्त और वफादार बन गए।
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करीब 30 हजार से 10 हजार साल पुरानी बात है। आइस एज यानी बर्फ से ढंकी धरती का आखिरी दौर चल रहा था। इंसानों की आबादी धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। साथ ही पेड़-पौधे और तमाम जानवर सतह पर आने लगे थे। वैज्ञानिकों ने इस समय को नाम दिया है प्लेस्टोसीन।
प्लेस्टोसीन के दौर में प्राचीन भेड़िए भी फले-फूले। इन भेड़ियों को खाने के लिए मांस की तलाश रहती थी, लेकिन धरती अब भी ठंडी थी तो शिकार के लिए छोटे जानवरों को ढूंढना मुश्किल होता था।
वैज्ञानिकों का दावा है कि इसी में से कुछ भेड़िए जो कम डरपोक थे, इंसानों की बस्ती के पास जाने लगे। वहां इंसानों के इस्तेमाल के बाद बची हुई हड्डियां और मांस इन भेड़ियों को आसानी से मिल जाते। यहीं से इंसानों से इनका शुरुआती संपर्क हुआ।
सराह मार्शल, पेसकिनी और जुलिअन कमिन्स्की के रिसर्च पेपर ‘द सोशल डॅाग एंड इवोल्यूशन’ के मुताबिक जब इंसान होमो सेपियन्स बने तो एक जगह रहने लगे। झुंड में घूमते और एक जगह पर ही खाते-पीते थे।
दूसरी तरफ, भेड़िए काफी फुर्तीले थे। उनकी सुनने और सूंघने की क्षमता बाकी जानवरों से कहीं बेहतर थी। कई बार ऐसा भी होता कि इंसानों और भेड़ियों के बीच शिकार को लेकर मुठभेड़ हो जाती। इस दौरान इंसान और भेड़िया एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गए।
रिसर्च के मुताबिक भेड़ियों के शरीर में स्ट्रेस हार्मोन ज्यादा होते हैं। यह स्ट्रेस हार्मोन ही उन्हें चिड़चिड़ा बनाता था और इंसानी बस्तियों में जाने से रोकता था, लेकिन कुछ भेड़ियों में यह स्ट्रेस हार्मोन नैचुरली कम था।
स्ट्रेस हार्मोन कम होने की वजह से ऐसे भेड़िए इंसान के करीब जाने की कोशिश करने लगे। इंसानों ने भी इन्हें अपने खाने में बची हुई हड्डियां डालनी शुरू कर दीं। यहीं से इंसान और शांत भेड़ियों की दोस्ती शुरू हो गई।
आने वाले कुछ सालों में इंसानों ने इन भेड़ियों के साथ कई प्रयोग किए। इसमें उनके प्रजनन से लेकर उनके बर्ताव में बदलाव लाने की कोशिश करना शामिल था। यही वह दौर था जहां से भेड़ियों का कुत्तों के रूप में बदलाव शुरू हुआ। उनके DNA में स्ट्रेस हार्मोन्स गिरने लगा।
इसके बाद उन भेड़ियों का DNA इवोल्यूशन की स्टेज में आ गया। इससे उनके दांतों का नुकीलापन कम होने लगा। जबड़े और दूसरी हड्डियों में फर्क दिखने लगा। इंसानों के साथ रहते-रहते उनका स्वभाव इंसानों के लिए दोस्ताना होने लगा। एशिया में कुत्तों की प्रजाति ‘ग्रे वुल्फ’ से निकली है, जबकि अफ्रीका में ‘सियार’ की प्रजाति से कुत्ते बने हैं।
पहला कुत्ता कहां मिला
इंसान ने सबसे पहले भेड़िए को पालतू कहां बनाया? इस पर कोई एक राय नहीं है। नेचर्स कम्युनिकेशन रिसर्च पेपर का दावा है कि कुत्तों या उस समय के नॉन-एग्रेसिव भेडियों को साउथ चीन से मंगोल और यूरोप के कई देशों में लगभग एक ही समय पर पालतू बनाया गया था।
चीन में 16 हजार साल पहले और भारत में करीब 12 से 14 हजार साल पहले भेड़िए पाले जाने लगे थे। वहीं अमेरिका में करीब 10 हजार साल पहले इन्हें पालना शुरू किया गया था।
भेड़ियों से अलग कुत्तों की प्रजाति कहां से आई?
वैज्ञानिकों ने पाया कि कुत्तों के DNA में काफी असमानता है, इसी वजह से कुत्ते अलग-अलग नस्ल के होते हैं। इसके अलावा इंसानों ने ‘क्रॉस ब्रीडिंग’ यानी दो अलग-अलग प्रजाति के कुत्तों के मेल से नए और सामान्य कुत्तों से अलग नस्ल के कुत्ते बनाए।
ये पूरी प्रक्रिया कुत्तों के लिए दर्द भरी थी। इसकी वजह से उनके शरीर के स्ट्रक्चर में कई बदलाव आए। सांस लेने में तकलीफ के साथ कई प्रजाति के कुत्तों में तो आगे प्रजनन में दिक्कतें आने लगी। आज की तारीख में भेड़िए जैसे दिखने वाले 11 तरह के कुत्ते मौजूद हैं। जिसमें सबसे फेमस 'अलास्कन मलमूट' और 'साइबेरियन हस्की' है।
इंसानों और कुत्तों का हजारों साल पुराना अटूट रिश्ता
इतिहासकार और लेखक युवाल नोआह हरारी ने अपनी किताब 'सेपियन्स: अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ ह्यूमन काइंड' में लिखा है कि 15,000 साल पहले इंसानों ने सबसे पहले कुत्ते को पालतू बनाया था। इसके कई सबूत मौजूद हैं। इन भेड़ियों से बने कुत्तों का इस्तेमाल इंसान शिकार और लड़ाई लिए करता था।
घुसपैठियों से लड़ाई में भी ये इंसानों की मदद करते। जैसे-जैसे इंसान और कुत्तों की पीढ़िया गुजरती गईं, दोनों के बीच रिश्ता मजबूत होता गया। ये एक दूसरे से संवाद करने लगे।
कुत्तों को बाकी जानवरों से सुरक्षा और आसानी से खाना मिल जाता। कुत्ते इंसान के साथ अपनी जिंदगी को भी सुरक्षित देखने लगे। हजारों सालों में दोनों के बीच एक समझ विकसित हो गई। कई सभ्यताओं में तो इंसानों के साथ कुत्तों को पूरे विधि-विधान से दफनाने का साक्ष्य मिलता है।
कश्मीर के बुर्जहोम में एक नवपाषाण काल की साइट है। यहां खुदाई में इंसान के साथ दफन किया हुआ कुत्ता मिला। इसी तरह सिंधु सभ्यता की साइट पंजाब के रोपड़ में भी एक कब्र में इंसान के साथ कुत्ता मिला। यानी आज से करीब 10,000 साल पहले तक भारत में इंसान और कुत्ते का ये रिश्ता देखने को मिलता है।
हरारी किताब में उत्तरी इजराइल में 12,000 साल पुरानी एक कब्र का जिक्र करते हैं। इसमें एक 50 साल की महिला के कंकाल के साथ एक पिल्ले का कंकाल मिलता है। पिल्ले को महिला के सिर के पास दफनाया गया है। हरारी दावा करते हैं कि कब्र में महिला का बायां हाथ कुत्ते पर रखा है, इससे दोनों के बीच भावनात्मक रिश्ता लगता है।
इंसानों से हजार गुना अच्छी होती है कुत्तों के सूंघने की क्षमता
कुत्तों को पूरी दुनिया या तो हरी दिखती है या पीली। असल में कुत्ते इंसानों की तरह दुनिया को रंगीन नहीं देख पाते। उनके लिए हरा और पीला के अलावा किसी दूसरे रंग को पहचान पाना मुश्किल है।
हालांकि इंसानों की तुलना में कुत्ते अल्ट्रावॉयलेट लाइट्स को लेकर ज्यादा सेंसिटिव होते हैं। इसे लेकर 2014 में एक रिसर्च की गई। इस रिसर्च में यह भी बताया गया कि कुत्तों का विजन यानी देखने की क्षमता इंसानों से तीन गुना ज्यादा ब्लर होती है।
ये भी दिलचस्प है कि कुत्ते कम रोशनी में इंसानों से ज्यादा बेहतर देख सकते हैं। किसी हलचल वाली जगह पर भी उनकी निगाह तेजी से काम करती है। रात के अंधेरे में देखने पर कुत्तों की आंखें चमकती हैं। यह उनकी आंखों में पाए जाने वाले टेपेटम ल्यूसिडम नाम के रिफ्लेक्टिव लेयर की वजह से होता है।
मेर्क मैन्युअल फॉर वेट्रेनरी मेडिसिन की एक रिसर्च के मुताबिक कुत्तों की सबसे बड़ी खासियत उनकी सुनने और सूंघने की क्षमता है। वो इंसानों की तुलना में पांच गुना बेहतर सुन पाते हैं। वहीं सूंघने की बात आती है तो वह इंसानों से हजार गुना बेहतर होती है।
वो कई गंध को एक ही समय में बेहतर तरीके से अलग-अलग सेंस कर पाते हैं। यही वजह है कि क्राइम से लेकर आर्म्ड फोर्सेस में स्निफर यानी सूंघने वाले कुत्तों का इस्तेमाल किया जाता है।
यहां तक कि उनके सूंघने की क्षमता का इस्तेमाल इंसानों में बीमारी का पता लगाने में होने लगा है। साल 2000 में एक रिसर्च में पता चला कि कुत्ते कैंसर के शुरुआती स्टेज को सूंघकर बता सकते हैं। साल 2021 में वैज्ञानिकों को पता चला कि अगर कोई इंसान कोविड वायरस की चपेट में है तो कुत्ते उस इंसान की पेशाब की गंध से पहचान सकते हैं।
कुत्ते इंसान के हंसने से लेकर रोने तक को महसूस करते हैं
2014 में आई एक स्टडी के मुताबिक कुत्ते इंसान की भावनाओं को महसूस कर पाते हैं। इंसान जब हंसता है या रोता है तब कुत्ते का दिमाग उस पर प्रतिक्रिया देता है। शर्त बस इतनी होती है कि किसी भी इमोशन के लिए उनके कानों तक आवाज जानी चाहिए।
स्टडी की मानें तो इंसान भी कुत्तों के इमोशन को सेंस करता है। कुत्तों के रोने या उनकी अलग-अलग आवाज पर इंसान रिस्पॉन्ड करता है। अब तक कई रिसर्च से यह भी साफ हो चुका है कि कुत्ते भी इंसानों की तरह खुशी, दुख, घबराहट और डर जैसे इमोशन फील करते हैं।

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