सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बाल रंगने वाली डाई में उपयोग होने वाले केमिकल्स का यूज़ करते हैं मैदे को सफ़ेद बनाने के लिए, मैदे से बनी चीजे खाने से दिल होता बीमार और हडि्डयां कमजोर

नई दिल्ली/ समोसे, भटूरे, मोमोज, नान, तंदूरी रोटी से लेकर पिज्जा और नूडल्स तक का स्वाद मैदे से आता है। मैदा न होता तो लोग जाने कितने लजीज व्यंजनों का स्वाद ही न चख पाते। हालांकि, हजारों साल की मेहनत के बाद इंसान ने मैदा बनाना तो सीख लिया, लेकिन आज उसे इस सफलता की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।


मैदे को 'सफेद जहर' क्यों बोला जाता है और सेहत के लिए इसे खतरनाक क्यों माना जाता है...

प्राचीन इजिप्ट में शुरू हुई मैदा बनाने की कोशिश

करीब 32 हजार साल पहले इटली में इंसानों ने अनाज को पीसकर मैदा बनाना शुरू किया। पत्थरों से बने मूसल और चकिया की मदद से पिसा यह अनाज दरदरा होता था। टाइम के साथ इसे और महीन करने की कोशिशें होती रहीं।

5 हजार साल पहले प्राचीन इजिप्ट में मोटे पिसे आटे को और बारीक करने की कोशिश की गई। इसके लिए वे पहले अनाज को पीसते, फिर उसे छानकर महीन और मोटे हिस्से को अलग-अलग कर लेते। इस तरह दुनिया ने मैदे का पहला रूप देखा। लेकिन, इसे बनाने में बहुत वक्त लगता था, जिसकी वजह से यह महंगा भी होता था। सिर्फ शाही परिवार की रसोई में ही इसका इस्तेमाल होता था।

स्टेटस सिंबल था मैदा, आम लोग नहीं कर सकते थे इस्तेमाल

अगले हजारों साल तक दुनिया में महीन आटा तैयार करने के लिए तरह-तरह के जतन होते रहे। एक हजार साल पहले इंग्लैंड में गेहूं को पीसने के बाद उसे कई लेवल पर कपड़े से छानकर रिफाइंड आटा यानी मैदा बनाने की शुरुआत हुई, जो सामान्य आटे की तुलना में ज्यादा सफेद, ज्यादा हल्का और ज्यादा महीन था।

मैदा जल्द ही स्टेटस सिंबल का हिस्सा बन गया। अमीर लोग मैदा खाते और आम आदमी पत्थरों की चक्की से तैयार हुआ मोटा आटा खाकर पेट भरता।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कसावा से बने मैदे ने भरा पेट

फिर 1870 में मशीनों की मदद से गेहूं की पिसाई शुरू हुई। मैदा बनाने की फैक्ट्रियां लगने लगीं। ये मशीनें गेहूं को सीधे पीसने की बजाए उसके हर दाने के अलग-अलग हिस्से कर देतीं, फिर बीच में बचे स्टार्च वाले हिस्से को पीसकर मैदा बना देतीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गेहूं की किल्लत बढ़ी तो तमिलनाडु में गेहूं की जगह कसावा की जड़ पीसकर मैदा बनाया गया। इसी कसावा से साबूदाना भी बनता है।

जिन हिस्सों में पोषक तत्व, उन्हीं हिस्से को हटाकर बनाते हैं मैदा

नोएडा स्थित डाइट मंत्रा में डाइटीशियन कामिनी सिन्हा बताती हैं कि गेहूं के दानों में सबसे ज्यादा पोषक तत्व उसकी भूसी और जर्म लेयर में पाए जाते हैं। फाइबर, विटामिन, आयरन, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस जैसे ढेरों पोषक तत्व इन्हीं दोनों हिस्सों में होते हैं और मैदा बनाने के लिए ये दोनों परत हटा दी जाती हैं। इन दोनों परत के हटने के साथ ही ये सारे पोषक तत्व भी निकल जाते हैं। इसीलिए आटे की तुलना में मैदा में 80 फीसदी तक कम फाइबर होता है।

बाल रंगने वाली डाई के केमिकल से बढ़ाते हैं मैदे की सफेदी

आटे को सफेद बनाने के लिए 'बेंजोइल पैरॉक्साइड' जैसे केमिकल्स से उसकी ब्लीचिंग की जाती है। यह केमिकल बाल रंगने वाली डाई में भी यूज होता है। कंपनियों पर आरोप लगते रहे हैं कि वे मैदा को ज्यादा मुलायम बनाने के लिए 'एलोक्सन' नाम का केमिकल भी यूज करती हैं। यह केमिकल कई देशों में बैन है। इसकी वजह से लिवर और किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।

इसीलिए मैदा को 'वाइट पॉइजन’' यानी सफेद जहर भी कहते हैं, जो स्वादिष्ट तो खूब होता है, लेकिन पोषक तत्व लगभग जीरो।

ज्यादा मैदा खाने से दिमाग और इम्यूनिटी कमजोर

खाने में पोषक तत्व होंगे, तभी तन और मन स्वस्थ रहेगा। लेकिन, लंबे समय तक मैदे से बनी चीजें खाने से शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। इसका सीधा असर इम्यूनिटी पर पड़ता है और रोगों से बचना शरीर के लिए मुश्किल हो जाता है। फास्ट फूड खाने वालों के बार-बार बीमार पड़ने की एक वजह यह भी है।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के मुताबिक रिफाइंड आटा यानी मैदा खाने से दिमाग की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है। सोचने-समझने की क्षमता कम होने लगती है और याददाश्त कमजोर हो जाती है। इससे डिमेंशिया भी हो सकता है।

दिल होता बीमार और हडि्डयां कमजोर

​​​​हडि्डयों की मजबूती के लिए कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्व जरूरी होते हैं। अगर अपने बच्चों को मैदे से बने नूडल्स, समोसे या दूसरी चीजें खिलाते हैं, तो उनकी हड्डियां कमजोर हो सकती हैं। मैदा खाने से शरीर में ब्लड शुगर, कार्बोहाइड्रेट और इंसुलिन की मात्रा बढ़ने लगती है। NCBI पर मौजूद एक रिपोर्ट के मुताबिक मैदे का इस्तेमाल डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ा देता है।

मुहांसे से परेशान हैं तो मैदा खाना बंद करें

अगर मुहांसों की समस्या से परेशान हैं, तो ध्यान दीजिए कि खाने में मैदे की मात्रा ज्यादा तो नहीं है। मैदा की वजह से इंफेक्शन का खतरा बढ़ता है, जिसकी वजह से बार-बार मुहांसे होने लगते हैं। यही नहीं, मैदे में मौजूद कार्बोहाइड्रेट की मात्रा शरीर में बढ़ने से हाइपरिन्सुलिनमिया कैंसर हो सकता है।

आंतों में चिपका मैदा बिगाड़े पेट की सेहत

पेट और पाचन क्षमता के लिए खाने में फाइबर जरूरी है, जो मैदा बनते वक्त बाहर निकल जाता है। ऐसे में मैदे से बनीं बिना फाइबर वाली चीजें खाने से कब्ज की समस्या हो सकती है। मैदा आसानी से नहीं पचता और आंतों में चिपक जाता है। जिसकी वजह से आंतों में सूजन, पेट फूलने, दर्द, अल्सर जैसी पेट की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

तोंद निकली है तो मैदे से रहें दूर

डाइटीशियन कामिनी सिन्हा बताती हैं कि मैदा और फास्ट फूड से जितना परहेज करें, उतना अच्छा है। फिर भी कभी मन करे तो सूजी और गेहूं के आटे से बने गोलगप्पे, पास्ता, नूडल्स खा सकते हैं। जिन लोगों का पेट निकल आया है या वे डायबिटीज, गैस्ट्रो और पेट से जुड़ी दूसरी समस्याओं के शिकार हैं, पाचन क्षमता कमजोर है, उन्हें मैदे का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

टिप्पणियाँ