विटिलिगो यानी सफेद दाग होने पर पिलाया गौमूत्र, चेहरे पर दाग की वजह से नौकरी के लिए योग्यता रखने पर भी रिजेक्ट कर दिया गया, लोगों ने कहा कला जादू करती है
हमारे समाज में कोई व्यक्ति सुंदर है या नहीं, इसे मापने का तरीका उसे देखकर बताना तय है। तभी तो जब उस मापदंड पर वो व्यक्ति खरा नहीं उतरता तो उसके प्रति समाज का रुख और रवैया बदल जाता है। उसे समाज से बाहर कर दिया जाता है।
ऐसी ही कुछ महिलाओं से हमारी मुलाकात हुई जिन्हें विटिलिगो यानी सफेद दाग हैं। विटिलिगो एक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें शरीर के मेलनिन सेल्स के विरोध में एंटीबॉडीज बन जाती हैं। यानी हमारी इम्यूनिटी शरीर के रंग बनाने वाले सेल्स को रोकने का काम करने लगती है। इस वजह से शरीर के कुछ हिस्सों का नॉर्मल रंग चला जाता है।
पहली किरदार अनमाेल... इनके चेहरे के सफेद दागों में दुनिया की स्याह हकीकत नजर आती है। नोएडा के डीएलएफ मॉल के पास वो बेहद चहकते हुए मुझसे मिलीं। मिलते ही उन्होंने पहला वाक्य यह कहा- ‘अब इस बारे में कोई नकारात्मक बात नहीं करूंगी। मैंने अपनी जिंदगी का एक बहुत लंबा अरसा नकारात्मक होकर गुजारा है। दिल बहुत दुखता है।’
25 साल की अनमोल के शब्द उनके चमकते चेहरे पर नजर आ रहे थे। वो एक चुलबुली और हंसमुख लड़की हैं। कहती हैं, ‘खुद को पॉजिटिव बनाने के लिए मैंने लंबा सफर तय किया है। छह साल की डरी-सहमी बच्ची की यादों को मारने में वक्त लगा। पलक पर आए एक सफेद दाग की वजह से उस बच्ची की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई थी। उसे रिजेक्शन, अवसाद और घृणा के एक लंबे दौर में धकेल दिया गया था।’
मैं अनमोल से कहती हूं कि हर लड़की में आपकी तरह हिम्मत नहीं आती। अगर आपकी कहानी सुनकर दो-चार लड़कियां भी खुद के बारे में पॉजिटिव सोचने लगे तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।
यह सुनकर अनमोल मुस्कुराती हैं। कुछ सोचकर कहती हैं, ‘मुझे लिखना पसंद है। मैं कविताएं लिखती हूं। स्टेज पर डांस करती हूं। समाज को यह नजर कभी नहीं आया। मेरे शरीर के सफेद दाग सबको दिखाई दिए।
ये कोई बीमारी नहीं है। ये छूने, साथ रहने या साथ खाना खाने से नहीं फैलती है। इसके बावजूद समाज में इसे लेकर कई धारणाएं और पूर्वाग्रह हैं। अक्सर लोग हम जैसों के साथ रहने से बचते हैं। हमारे साथ भेदभाव करते हैं।’
जब अनमोल छह साल की थीं, तब उनकी बाईं पलक पर पहला दाग आया था। वक्त के साथ ये फैलता ही चला गया और अब उनके शरीर का अधिकतर हिस्सा सफेद है।
कहती हैं, ‘सबसे पहले मेरी बहन ने ये देखा। वो मेरे परिवार के लिए एक मनहूस दिन था। उसके बाद अगले पंद्रह सालों तक मेरा हर तरह से इलाज कराया गया। अलग-अलग शहरों में अलग-अलग डॉक्टरों के पास ले जाया गया। कई तरह के परहेज किए। इन सबका कोई असर नहीं हुआ।’
चेहरे पर आए इन सफेद दागों ने अनमोल के जेहन में कई बुरी यादें जोड़ दीं। वो कहती हैं, ‘हम जब किसी गुरुद्वारे या मंदिर में जाते थे तो मेरी मां कहती थी कि प्रार्थना कर ले ताकि तू जल्दी ठीक हो जाए। छोटी थी उस समय फिर भी सोचती थी, मैं ठीक ही तो हूं। ऐसा कौन सा काम है जो दूसरे कर सकते हैं और मैं नहीं। बचपन के कई साल तो यह समझने में बीत गए कि दुनिया के लोग मुझे अलग-सा महसूस क्यों करवा रहे थे।’
स्कूल में किस तरह का भेदभाव होता था?
वो कहती हैं, ‘स्कूल में बच्चे मुझसे बात नहीं करते थे। मुझे स्टेज पर जाकर बोलने का शौक था, लेकिन टीचर ने कभी जाने ही नहीं दिया। उनकी गुड लुकिंग स्टूडेंट्स की एक अपनी परिभाषा थी जिसमें शायद मैं फिट नहीं बैठती थी। मेरी मां ने इस बारे में शिकायत की कि कभी इसे मौका नहीं मिलता है। उन्हें सामने से जवाब मिला- स्टेज पर जाने के लिए ये गुड लुकिंग नहीं है।’
पब्लिक प्लेस पर अनमोल को कई कड़वे अनुभवों से गुजरना पड़ा। ऐसे ही एक किस्से को याद कर उनके हंसमुख चेहरे पर उदासी छा जाती है। वो कहती हैं , ‘मैं एक बार गुरुद्वारे गई थी। बहुत भीड़ थी, एक महिला के पैर पर मेरा पैर लग गया, उन्होंने मुझे इतनी जोर से धक्का मारा कि मैं गिर गई। फिर उन्होंने कहा कि तू काले जादू से अपनी बीमारी मुझे देना चाहती है।
मैंने उनसे कहा कि पहली बात तो ये बीमारी नहीं है और दूसरा मैं कोई काला जादू नहीं करती हूं। मैं एक बहुत पवित्र जगह पर बहुत उम्मीद से और सुकून लेने गई थी। ऐसी जगह पर मेरे साथ ऐसा बर्ताव हुआ। इससे मुझे बहुत झटका लगा। इस घटना के बाद मैं लंबे समय तक गुरुद्वारे नहीं गई।’
गुरुद्वारे में हुई इसी घटना ने अनमोल का नजरिया भी बदल दिया। उन्होंने तय किया कि वो अपनी इस स्किन कंडीशन को स्वीकार करेंगी। इसके बारे में लोगों को जागरूक करेंगी। इसके बाद उन्हें जब भी और जहां भी मौका मिला, उन्होंने खुलकर इस स्किन कंडीशन पर बात की।
लोगों ने आपको अजीबोगरीब उपाय और टोटके नहीं बताए? वे हंसते हुए कहती हैं, ‘जीवन का एक लंबा अरसा इस कंडीशन से निजात पाने की कोशिशों में बिताया है। मैं कभी अपनी मर्जी की चीजें तक नहीं खा पाई। आप यकीन नहीं करेंगीं, लेकिन मैंने कभी गोलगप्पे नहीं खाए। खट्टी चीजें खाने से मना किया गया था। इसकी वजह से कोई भी सफेद चीज मुझे खाने नहीं दी जाती। अलग-अलग तरह के कड़वे काढ़े मुझे पिलाए जाते थे। मैं बहुत छोटी बच्ची थी, समझ नहीं पाती थी कि इतनी कड़वी चीजें मुझे क्यों खिलाई जा रही हैं।
गाय का मूत्र तक मुझे पिलाया गया। आज भी कई तरह की मान्यताएं हैं। मैं किसी से ये नहीं कहूंगी कि अपना इलाज कराओ या मत कराओ, लेकिन अगर अपने अनुभव से कहूं तो मुझे किसी भी इलाज से कोई फायदा नहीं हुआ। इलाज करने से ये और बढ़ा ही है। मैं बस एक ही बात कहूंगी, न कोई टेंशन लो, न इलाज लो, अपने में मस्त रहो और जीवन को अच्छे से जियो।’
जॉब-इंटरव्यू में किस तरह से अनुभव रहा?
अनमोल कहने लगीं कि सफेद दाग की वजह से नौकरी नहीं मिली। मैं इंग्लिश लिटरेचर में मास्टर्स हूं। एक चर्चित इंस्टीट्यूट में मैंने जॉब के लिए अप्लाई किया था। सभी राउंड पास करने के बाद मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। जब मैं वहां गई, तब बहुत अच्छे साक्षात्कार के बाद उन्होंने कहा कि आपको काफी यंग बच्चों को पढ़ाना है। हमें लगता है कि वो आपके साथ सहज नहीं होंगे।
इस रिजेक्शन ने मुझे पूरी तरह से तोड़ दिया। मैंने उनसे ये जरूर कहा कि युवा बच्चों को भी इसके बारे में बताना जरूरी है ताकि वो आगे चलकर किसी के साथ ऐसे भेदभाव न करें जैसा आप कर रहे हैं।’
आज अनमोल हर उम्र के बच्चों को पढ़ाती हैं। उनका मानना है कि जागरूकता से विटिलिगो को लेकर लोगों का नजरिया बदल सकता है।
आज 25 साल की हूं। छह साल की उम्र से मैं रिजेक्शन झेल रही हूं। बचपन से ही मेरा कोई खास दोस्त नहीं रहा है। कभी-कभी दुख तो होता है, इसके बावजूद मैं जैसी हूं वैसा खुद को स्वीकार कर लिया है। दुनिया को जो दाग दिख रहा है मेरे लिए वो ग्लो है। इसके साथ मैं बहुत खूबसूरत महसूस करती हूं।’
अनमोल से मिलने के बाद मैं खुशबू अख्तर से मिली। खुशबू पत्रकार हैं और अपना यूट्यूब चैनल चलाती हैं। एक दौर ऐसा था जब वो गहरे अवसाद में थीं। उनके जेहन में बार-बार आत्महत्या का ख्याल आता था।
वो अपने पापा से मुझे मिलाती हैं। कहती हैं, ‘मुझे लगता है कि मेरी हिम्मत मेरे पापा ही हैं। अम्मा के जाने के बाद पापा ही मेरी अम्मा हो गए। उन्होंने मुझे संभाला है। हर किसी की जिंदगी में ऐसा पिता होना चाहिए जो आपको अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए दुनिया से लड़ जाए। मैं समाज से इसलिए लड़ पाई क्योंकि मुझे घर में किसी से नहीं लड़ना पड़ा।’
खुशबू फेसबुक और इंस्टाग्राम पर रील्स पोस्ट करती हैं। जब कभी बिना मेकअप की फोटो पोस्ट करती हैं, ट्रोलर उन्हें बेहद भद्दे कमेंट करते हैं।
खुशबू कहती हैं, ‘सोशल मीडिया पर अक्सर लोग मुझे ट्रोल करते हैं। जितना अधिक मुझे ट्रोल किया जाता है, मैं उतनी ही अपनी तस्वीरें पोस्ट करती हूं। ट्रोलर को जवाब मैं अपनी नई तस्वीर पोस्ट करने के साथ देती हूं ताकि वाे समझ जाएं कि मुझे अब कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। मैं इन सबसे बहुत आगे निकल चुकी हूं।
आपको पता है मैं बहुत से बुरे कमेंट पर स्माइली सेंड करती हूं। मुझे लगता है कि लोगों को आपका गुस्सा, आपकी परेशानी, आपका फ्रस्ट्रेशन और आपकी घुटन देखनी है। अगर उन सबके सामने आप मुस्कुरा के निकल जाते हैं तो उनके पास कुछ बचता नहीं है। मेरा जो गुस्सा है वो मेरी मुस्कान में चला जाता है।’
विटिलिगो ने खुशबू को कड़वे अनुभव दिए हैं। वो एक लाइन में अपने इस दर्द को बयां करती हैं। कहती हैं, ‘जिंदगी की सच्चाई ये है कि लोग दो रंग का कुत्ता पाल लेंगे, लेकिन दो रंग के इंसान को वो साथ बिठाना भी पसंद नहीं करते हैं।’
आपने शादी क्यों नहीं की? मेरे इतना पूछने पर कहती हैं, ‘23 साल की उम्र में शादी तय हो गई थी। तब दाग इतने जाहिर भी नहीं थे। सिर्फ होंठ पर थे। लड़के वालों ने यह कहते हुए रिश्ता तोड़ दिया कि तुमसे शादी करके हमारी आने वाली नस्ल खराब हो जाएगी। अब लगता है कि अच्छा ही हुआ मेरी शादी नहीं हुई। अगर उस वक्त शादी हो गई होती तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाती।’
खुशबू कहती हैं, ‘अफसोस तो इसी बात का है कि ताने मारने वालों में अपने लोग भी थे। मेरी नानी हमेशा हाथ पकड़कर कहती थीं कि देखना इसकी शादी नहीं होगी। हुई भी तो किसी इस जैसे से ही होगी। उस समय अहसास होता था कि आप एक कूड़ा हो जिसे किसी के भी साथ बांधकर फेंक दिया जाएगा।
उनकी नजर में मैं कूड़ा ही तो थी जिसे कोई लेकर नहीं जाने वाला था। लोगों के तानों की वजह से मैं डिप्रेशन में रहने लगी। हमेशा ये सोचती थी कि मेरी शादी क्यों टूटी, जबकि मेरी कोई गलती नहीं थी। उस घटना के बाद मैंने अपनी जान लेने का फैसला तक कर लिया था।’
खुशबू जब घर से बाहर निकलतीं तो उन्हें लोगों की नजरों और तानों का सामना करना पड़ता। वो खुद को, अपने शरीर के दाग को छुपाने की कोशिश करतीं। हाथों पर मेहंदी लगाती ताकि दाग ढंक जाए। आज यही खुशबू न ऐसे तानों की परवाह करती हैं और न ही दाग छुपाने के लिए मेहंदी लगाती हैं।
खुशबू कहती हैं, ‘मैं जिंदगी में अपनी स्किन के वजह से बहुत रोई हूं। स्कूल, जॉब, शादी, हर जगह लोगों का बर्ताव एक जैसा ही रहता है। जब तक आप इन चीजों को नहीं समझ पाते आप खुद को ही दोष देते हैं।
रिजेक्शन के दौर में जो आपके दोस्त बनते हैं, उनका नजरिया भी वही होता है। लोग आपको अपना दोस्त और प्रेमी बताते हैं, लेकिन उनकी आंखों में आप उनकी सोच को देख पाते हैं। वो बहुत खटकता है। लोग बोल रहे होते हैं और सोच कुछ और रहे होते हैं। उनकी वो नजर बहुत खटकती है। ऐसी चीजें इंसान को भीतर से खाती जाती हैं।’
खुशबू को अब इस बात का बहुत अफसोस है कि उन्होंने अपनी जिंदगी का एक लंबा अरसा खुद को धिक्कारते हुए बिताया। वो कहती हैं, ‘मैंने कभी खुद को स्वीकार ही नहीं किया था बल्कि खुद को धिक्कारा ही था।
मैंने स्वयं को कभी पसंद ही नहीं किया था। जब दसवीं क्लास की बच्ची को ये होता है तब वो समझ नहीं पाती है कि वो क्या करेगी। जब भी मेरे साथ कुछ गलत हुआ, मैंने स्वयं को ही दोष दिया कि मेरी ही गलती है, मैंने ही कुछ किया होगा। दस, पंद्रह साल तक मेरी यही सोच रही।’
आज खुशबू कामयाब हैं और अपनी जिंदगी में खुश भी। फिर भी लोग उन्हें शादी न होने, इस कंडीशन के साथ जीने की मुश्किलों का ताना मार ही देते हैं।
खुशबू को सैकड़ों लोग संपर्क करते हैं और विटिलिगो से कैसे निपटें, ये पूछते हैं। वो सबसे बस यही कहती हैं, ‘अपने आप को स्वीकार करो, खुद को पसंद करो और अपने साथ खुश रहो।’
स्वर्णकांता एक कामयाब पत्रकार हैं और मुंबई में अपने फिल्ममेकर पति के साथ रहती हैं। उनकी एक बेटी है। वो अपने फेसबुक पर मुस्कुराते हुए तस्वीरें पोस्ट करती हैं। उन्हें अपने चेहरे के सफेद दागों को लेकर अब कोई झिझक नहीं है।
चार साल पहले उनके शरीर पर पहले दाग दिखने शुरू हुए थे। शुरुआत में इसे लेकर उनके मन में वो सभी डर और आशंकाएं थीं जो बाकी लोगों को होती हैं।
स्वर्णकांता कहती हैं, ‘सबसे पहले मेरे कोहनी में हल्का सफेद दाग आया तो मैंने इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। मैं अपने लुक को लेकर कभी सचेत नहीं रही, कभी कहीं निकलना हुआ भी तो ऐसे ही रफली बाल बनाकर निकल जाती थी।
मुझे विटिलिगो होने का पता चलने पर मेरे पति की कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। उनका कहना था कि कुछ नहीं हुआ है। उन्होंने हमेशा यही कहा कि तुम इतना परेशान क्यों होती हो, इट्स ओके। जबकि मेरे बहन और भाई चिंता करते थे कि ये ठीक कराओ, उनकी चिंता थी कि ये ठीक हो जाए।’
स्वर्णकांता एक सशक्त महिला रही हैं। इसके बावजूद शरीर पर आ रहे शुरुआती दागों ने उन्हें भी डिप्रेशन और गिल्ट में डाल दिया था।
उस वक्त को याद करके वो कहती हैं, पहली बार महसूस हुआ कि विटिलिगो हुआ है तो मैं डिप्रेशन में जा रही थी।’
उस समय बारह साल की रही उनकी बेटी ने बहुत हिम्मत दी।
स्वर्णकांता बताती हैं, ‘मेरी बेटी सोशल मीडिया पर एक्टिव थी। उसने बताया कि मम्मा इंस्टाग्राम पर एक लेडी विनी हार्लो बड़ी माॅडल हैं और उन्हें भी विटिलिगो है। मैंने इंस्टा पर विनी हार्लो को देखा और मुझे बड़ी हिम्मत मिली। इतनी बड़ी माॅडल, जिसके शरीर पर कई दाग थे, इतनी कॉन्फिडेंट और खूबसूरत लग रही थीं। उन्हें देखकर मुझे बहुत हिम्मत मिली।’
सफेद दाग को लेकर आपको लोगों ने क्या-क्या ताना दिया है?
स्वर्णकांता कहती हैं, ‘ हां लोग कहते हैं, ये कोई बुरे कर्मों का फल है। कुछ लोग इसे पितृ दोष भी मानते हैं। एक बार जब मैंने आटो वाले को किराया देने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया तो पैसे लेते समय वो मेरा हाथ देखकर बोला- अरे मैडम ये आपको कब हुआ? आपके घर का तो कोई पानी भी नहीं पीता होगा। ये पहली बार था जब मैंने अपने भीतर हीन भावना महसूस की।’
स्वर्णकांता को जब विटिलिगो हुआ तब वो मुंबई में ही रह रहीं थीं। यहां माहौल भारत के गांवों या छोटे शहरों के मुकाबले काफी खुला है। बावजूद इसके कई बार उन्हें भी बेहद असहज स्थिति का सामना करना पड़ा।
वो बताती हैं, “पहले जब मैं वाॅक पर जाती थी तो पूरे कपड़े पहनकर जाती थी। फिर भी लोग खुली जगह पर दाग देखते और नजरें घुमा लेते थे। एक दिन मैंने सोचा कि मैं तो बहुत हिम्मती हूं। मैंने हाफ पैंट पहनना शुरू कर दिया। इससे लोगों को मेरे दाग को देखने में परेशानी नहीं होगी। अब आराम से वाक पर हाफ पैंट पहनकर जाती हूं। मुझे लगता है ये सोसाइटी जितना इन चीजों को देखेगी, उसके साथ एडजस्ट करने की उनकी आदत बनेगी।’
शहर के लोगों का यह हाल है, कभी गांव के लोगों का रिएक्शन झेला है? स्वर्णकांता कहती हैं, ‘गांव में एक शादी थी। पहले मैंने उसमें जाने की पूरी तैयारी कर ली थी। बाद में हिम्मत नहीं कर पाई और मना कर दिया। जब मेरी बेटी ने पूछा तो मुझे रोना आ गया। मैंने उससे बोला कि आपकी मम्मा कमजोर है। वहां किसी को कोई जवाब नहीं दे पाएगी।’
आपने इसका इलाज नहीं कराया? वो कहती हैं, ‘कराया, लेकिन अब छोड़ दिया है। किसी इलाज का कोई नतीजा नहीं निकला। एक साल लाइट थैरेपी भी कराई। इसमें एक केबिन के अंदर सारे कपड़े उतारकर बैठना होता है। उस लाइट थैरेपी से दाग दिखते नहीं है, लेकिन खत्म नहीं होते हैं।
अब मैंने इलाज कराना बंद कर दिया है। सोशल मीडिया पर मैं अपनी तस्वीरें डालती हूं तो लोग मुझे सलाह देते हैं कि यहां इलाज कराओ वहां इलाज कराओ, लेकिन अब मैं इस परिस्थिति से बाहर निकल गई हूं।’
विटिलिगो को लेकर सबसे बड़ा डर क्या है? वैसे तो मैंने खुद को इस दाग के साथ एक्सेप्ट कर लिया है। अपने जैसे दूसरे लोगों को भी इससे निकालने की कोशिश करती हूं। इसके बावजूद कई बार एक ऐसा नाजुक पल आता है जहां मैं आईने में अपना चेहरा देखकर डर जाती हूं, बाहर जाने में डर लगता है।
सबसे बड़ा डर ये रहा कि कहीं ये मेरी बेटी को न हो जाए। खुद के साथ कुछ भी हो जाए मंजूर है, लेकिन बच्चों के साथ कुछ हो, ये मंजूर नहीं होता है।

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