किसानों की आमदनी न बढ़ने का एक मुख्य कारण सही खाद का न मिलना है, इसी सोच के साथ किसान के बेटे ने 50 करोड़ की कंपनी स्थापित कर डाली राज यादव ने
‘कम ही लोग ये जानते होंगे कि एक किसान के बेटे की स्कूल- कॉलेज की फीस उसके खेत की फसल पर निर्भर करती है। फसल अच्छी होगी, तभी फीस जमा होगी, नहीं तो नहीं। अगला त्योहार कैसे मनाया जाएगा, यह भी फसल पर ही निर्भर करता है।
आज भी याद है कि मैं 8वीं क्लास में था। उस साल भयंकर सूखा पड़ा था। गेहूं की फसल पूरी तरह से खराब हो गई थी। इस वजह से कोचिंग की फीस नहीं भर पाया। कोचिंग वालों ने मुझे क्लास से निकाल दिया।
आर्थिक तंगी देखते हुए बड़ा हुआ हूं। गोरखपुर से जब केमिकल इंजीनियरिंग कर रहा था, तो समझ में आया कि किसानों की आमदनी न बढ़ने का एक मुख्य कारण सही खाद का न मिलना है। खेत में बायो फर्टिलाइजर के इस्तेमाल के बाद भी किसान केमिकल फर्टिलाइजर खाद डालने के लिए मजबूर हैं।’
25 साल के अक्षय श्रीवास्तव अक्षय बायो फर्टिलाइजर बनाने वाली कंपनी ‘LCB फर्टिलाइजर’ के फाउंडर हैं। तीन साल में उनकी कंपनी का टर्नओवर एक करोड़ से अधिक पहुंच चुका है।
अक्षय कहते हैं, ‘2020 में घर के आंगन से 5 हजार की लागत से बायो फर्टिलाइजर बनाना शुरू किया था। पास में न पैसा था और न सपोर्ट। इस बात की उम्मीद भी नहीं थी कि 3 साल में ही हमारी कंपनी की वैल्यूएशन 50 करोड़ से अधिक हो जाएगी।’
अक्षय के साथ मैं कुशीनगर स्थित उनके गांव बसडीला जा रहा हूं, जहां वो बायो फर्टिलाइजर बनाने का काम करते हैं। गांव में ही पूरा प्रोसेस होता है। संकीर्ण गलियों के बीच होते हुए मैं गांव में पहुंचता हूं। सड़क से सटे हुए पक्के मकान, किनारे मवेशी बंधे हुए हैं।
अक्षय के घर पहुंचते ही सबसे पहले मेरी मुलाकात बरामदे में बैठे उनके पेरेंट्स से होती है। सामने एक स्टोर के पास कुछ स्टाफ बायो फर्टिलाइजर खाद बना रहे हैं। गोबर में अलग-अलग तरह की चीजें मिला रहे हैं। कुदाल से फर्टिलाइजर को बोरी में भरा जा रहा है।
इसके बाद अक्षय मुझे अपने आंगन में लेकर चलते हैं। कहते हैं, ‘ये जो ईंट का बना चौकोरनुमा बॉक्स देख रहे हैं। इसी में 2 किलोग्राम खाद बनाने से मैंने शुरुआत की थी। करीब 3 साल में ही अब हम हर महीने 500 टन बायो फर्टिलाइजर बना रहे हैं।’
अक्षय जिस कॉन्फिडेंस के साथ सारी बातें बता रहे हैं, लग नहीं रहा है कि मैं किसी 25 साल के व्यक्ति से बात कर रहा हूं। उनका तजुर्बा 50 साल के किसान की तरह लग रहा है।
‘बचपन से गांव के किसानों की परेशानियों को देखते हुए बड़ा हुआ। पापा भी किसान हैं। बड़ी मुश्किल से दो-दो रुपए जमा करके उन्होंने हम लोगों को पढ़ाया। हम लोग चार-भाई बहन हैं।
घर की परिस्थितियों को देखता था, तो सोचता था कि आगे चलकर मैं भी कुछ ऐसा करूं कि ये मुश्किलें दूर हो सकें। उधार-कर्ज लेकर पूरी पढ़ाई हुई। घर के हालात का एक उदाहरण आपको देता हूं।
किसी रिश्तेदार के यहां हम लोग इसलिए भी नहीं जाते थे, क्योंकि हमारे पास पहनकर जाने के लिए अच्छे कपड़े नहीं होते थे। आपको भी पता ही होगा, यदि आप किसी के फंक्शन में जाएंगे, तो गिफ्ट लेकर जाना होगा। यदि गिफ्ट सस्ता है, तो फिर आपकी खातिरदारी भी उसी तरह से होगी। इसलिए मैं खासतौर से कहीं नहीं जाता था।
पढ़ने में ठीक-ठाक था, तो गोरखपुर की एक यूनिवर्सिटी में केमिकल इंजीनियरिंग में एडमिशन हो गया। यहां स्कॉलरशिप मिली थी, इसलिए घरवालों पर फीस का बोझ नहीं आया।
पहले साल से ही मैं सोचने लगा कि क्या करना है? केमिकल इंजीनियरिंग करने के दौरान कई तरह की दिक्कतें आने लगीं। मुझे कई सारी चीजें समझ में भी नहीं आ रही थीं। अब गांव से गया हुआ किसान परिवार का लड़का…।
मैं रिसर्च और प्रैक्टिकल पर फोकस करने लगा। यहां भी मुझे भेदभाव का सामना करना पड़ा। प्रोफेसर कपड़ा और बोलचाल की भाषा को देखकर जज करते थे। उन्हें लगता था कि गांव से उठकर आ गया है, दो-चार महीने में कुछ नया करने की सारी खुमारी उतर जाएगी।
मुझे तो कुछ करना था। किसानों की परेशानियों को देखते हुए लैब में मैं बायो फर्टिलाइजर को बनाने वाले कल्चर पर रिसर्च करने लगा। जीवाणु को स्टडी करने लगा। दरअसल यदि मिट्टी खुश है, तभी किसान भी खुश है और देश भी…।
जैसे दही तैयार करने के लिए हमें दही की ही जरूरत होती है, उसी तरह से बायो फर्टिलाइजर तैयार करने के लिए कल्चर की जरूरत होती है।
मान लीजिए कि किसी किसान ने अपने एक खेत में गेहूं की बुआई की और दूसरे खेत में किसी और फसल की। तो आमतौर पर किसान दोनों फसल में एक ही तरह का फर्टिलाइजर यूज करता है। यही सबसे बड़ा घातक है, फसल और मिट्टी को बर्बाद करने का।
मैंने हर तरह के अलग-अलग फसल के मुताबिक बायो फर्टिलाइजर तैयार करना शुरू किया। जो फर्टिलाइजर अमरूद के पौधे में डाले जाएंगे, जरूरी नहीं है कि वो किसी दूसरे फ्रूट्स में भी डाले जाएंगे। आप कह सकते हैं कि हम कस्टमाइज तरीके से बायो फर्टिलाइजर तैयार करते हैं, जो हमारी USP भी है।
अक्षय के साथ मैं नजदीक के खेतों की तरफ बढ़ रहा हूं। यहां कुछ किसान खेत में काम कर रहे हैं। अभी धान की फसल है।
वे कहते हैं, ‘इस गांव के भी अधिकांश किसान मुझसे ही बायो फर्टिलाइजर खरीदते हैं। फसल की उपज में कितना फर्क पड़ा है, इन्हीं लोगों से आप पूछ सकते हैं। जब मैंने बायो फर्टिलाइजर बनाना शुरू किया था, तो IIT कानपुर, BHU समेत देश के अलग-अलग संस्थानों ने मेरे आइडिया को लेकर मदद की।
IIT कानपुर इनक्यूबेशन सेंटर के प्रोफेसर अमिताभ बंदोपाध्याय और विप्लव केतन पॉल हमें गाइड कर रहे हैं।
लेकिन कोरोना आते-आते सब कुछ चौपट हो गया। रिश्तेदार, गांव के लोगों का फिर से ताना मिलने लगा।
अक्षय अपनी जर्नी विस्तार में बताते हैं। कहते हैं, ‘फरवरी 2020 में मैंने बायो फर्टिलाइजर तैयार करने के लिए लैब में कल्चर बनाना शुरू किया था, लेकिन तभी कोरोना ने दस्तक दे दी। तीन-चार महीने के लिए हम सभी घर में बंद हो गए। जो कल्चर तैयार हुआ था, वो मर गया। जीवाणु नष्ट हो गए।
इधर गांव के लोग, रिश्तेदार कहने लगे- जब गोबर ही उठाना था, तो फिर इंजीनियरिंग क्यों की। मां-बाप ने पेट काटकर इंजीनियरिंग कराया, बेटा गोबर उठा रहा है। मेरे दोस्तों का बड़ी-बड़ी कंपनियों में प्लेसमेंट हो चुका था।
घरवाले भी परेशान थे कि आखिर मैं कर क्या रहा हूं। मैं भी डिप्रेशन में जा रहा था। जब मैंने पहली बार खाद बनाई और उसका सैंपल अपने ग्रुप में भेजा, तो एडवांस में ऑर्डर आने शुरू हो गए।
पेमेंट भी एडवांस में आने लगे, जिससे मेरी गाड़ी चल पड़ी। प्रोडक्शन और टीम बढ़ने लगी। सबसे पहले हमने पूरे उत्तर प्रदेश में काम करना शुरू किया।
कॉलेज से पासआउट हुआ लड़का, किसानों के बीच दिक्कतें नहीं आईं?
अक्षय कहते हैं, ‘जब इस कंपनी की शुरुआत हुई, तो किसान हमसे बात भी नहीं करना चाहते थे, क्योंकि हम उनके मुताबिक बात नहीं कर पा रहे थे। उनकी तरह नहीं बोल पा रहे थे।
तब मैंने उन गांवों के किसी एक पढ़े-लिखे किसान को टारगेट करना शुरू किया। उन्हें सबसे पहले अपना प्रोडक्ट फ्री में देता, फिर वो इसका अपने खेत में इस्तेमाल करते। फायदा देख वह किसान दूसरे किसानों को सजेस्ट करता।
दरअसल, मैं किसी किसान को कहूंगा कि वो हमारा प्रोडक्ट खरीदे, तो शायद नहीं खरीद सकते हैं, लेकिन यदि वो किसान उस किसान से कहेगा, तो शायद वो खरीद सकता है। हमने यही स्ट्रैटजी अपनाई।
सबसे पहले हम उन इलाकों का सर्वे करते हैं। किसानों से बातचीत करते हैं। उन्हीं किसानों में से किसी एक किसान को फ्री में बायो फर्टिलाइजर देते हैं। फिर वह किसान हमारा डीलर बन जाता है। इस तरह से हम किसानों तक बायो फर्टिलाइजर की सप्लाई करते हैं।
अभी मेरे साथ 30 हजार से अधिक किसान जुड़े हुए हैं। 9 राज्यों के 95 शहरों में हम काम कर रहे हैं। महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हमने दूसरा प्लांट लगाया है।’
अक्षय जहां पर बायो फर्टिलाइजर बनाते हैं, वहां गोबर का ढे़र लगा हुआ है। कुछ किसान गोबर को उठाकर ईंट से बने एक टैंक के पास रख रहे हैं।
अक्षय कहते हैं, ‘गोबर में हम बेसन, गुड़, कल्चर समेत अलग-अलग तरीके की चीजें मिलाते हैं। फिर इसे 7 दिनों के लिए ईंट के बने टैंक में रखा जाता है, ताकि यह पूरी तरह से सड़ जाए।
उसके बाद इसे जाली की मदद से छाना जाता है। फिर पैकेट और बोरी में पैकेजिंग होती है। हम इसे अपने डीलर्स की मदद से या ऑनलाइन ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए सेल करते हैं।'
पूरी स्टोरी में आपने 'कल्चर' शब्द बार-बार पढ़ा। दरअसल जमीन, पानी और हवा को प्रदूषित किए बिना कृषि उत्पादन के लेवल में एक स्टैंडर्ड लाते हैं, इसे जैव कल्चर कहते हैं।
बायो फर्टिलाइजर बनाने के लिए कल्चर तैयार करने की तीन टेक्नोलॉजी
बायो टेक्नोलॉजी
नैनो टेक्नोलॉजी
केमिकल इंजीनियरिंग
1. बायो टेक्नोलॉजी
अलग-अलग जीवाणु अलग-अलग तरह के तत्व बनाते हैं। जैसे कोई जीवाणु नाइट्रोजन बनाता है, तो कोई फास्फोरस। फसल पर यह निर्भर करता है कि उसे किस तरह का जीवाणु चाहिए।
जीवाणुओं को सबसे पहले इकठ्ठा किया जाता है। जैसे ये सड़े हुए पेड़ से भी मिल सकता है या जंगल-नदी, काई से भी।
फिर लैब में इनकी टेस्टिंग की जाती है कि क्या एक जीवाणु दूसरे जीवाणु के साथ रह सकता है?
टेस्टिंग के बाद माइक्रो ऑर्गेनिज्म का कॉम्बिनेशन बनता है। फिर सिलेक्ट करते हैं कि यह जीवाणु किन चीजों पर जीवित रह सकता है (इसे बायोमास कहा जाता है)। इसके बाद फर्टिलाइजर डेवलप किया जाता है।
2. नैनो टेक्नोलॉजी
खेत में सामान्य तौर पर जैविक खाद डालने पर इसके जीवाणु 27 डिग्री सेल्सियस के बाद मरने लगते हैं। इस वजह से इसका असर फसल पर उतना नहीं हो पाता है, जितना होना चाहिए।
इसलिए जीवाणु के साथ धान की पराली से बना हुआ नैनो पार्टिकल्स मिलाया जाता है। जिससे इसकी गर्मी झेलने की क्षमता बढ़ जाती है। जो बायोमास का टाइम पीरियड 15-20 दिन होता है, वो घटकर 7-8 दिन हो जाता है।
3. केमिकल इंजीनियरिंग
पानी को सोखने वाला पॉलीमर, जो पुआल से बनता है, उसे कल्चर के साथ मिलाया जाता है। फिर अलग-अलग अनुपात में इसे गोबर और शुगर मिल से निकलने वाले गन्ने के कूड़े के साथ मिलाया जाता है।
2 हजार किलोग्राम बायो फर्टिलाइजर तैयार करने में एक किलोग्राम जीवाणु और कल्चर का इस्तेमाल होता है। एक हजार किलोग्राम गोबर और 800 किलोग्राम गन्ने के कूड़े को मिलाया जाता है। इसके साथ कई और दूसरी चीजें मिलाकर रिएक्टर में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है।



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