कल 5 अगस्त को ‘लेडी लॉयर्स डे’ था। वकालत के पेशे में और ज्यूडिशियरी में महिलाओं की मौजूदगी को सेलिब्रेट करने वाला एक दिन था। इस दिन के सारे उत्सव एक तरफ और ये हकीकत एक तरफ कि भारत में आज भी वकालत के पेशे में महिलाओं की संख्या महज 15 फीसदी है। हर 100 वकील में से 85 वकील अभी भी मर्द हैं। सिर्फ 15 ही महिलाएं हैं।
यह संख्या सुनने में तब तक इतनी अजीब नहीं लगती, जब तक हमें ये नहीं पता चलता कि वकील बनाने वाले स्कूल-कॉलेजों यानी लॉ स्कूलों की कक्षाओं में लड़कियों की संख्या 50 फीसदी है। कुछ-कुछ कॉलेजों में तो लड़कियां लड़कों को भी आउटनंबर कर दे रही हैं यानी कक्षा में उनकी संख्या लड़कों से भी ज्यादा है।
अब इसके बाद कॉलेज में टॉप करने, कक्षा में सबसे अधिक अंक लाने वाले छात्र-छात्राओं का आंकड़ा देखेंगे तो पाएंगे कि लड़कियों ने यहां भी इतनी तेज दौड़ लगाई है कि लड़कों को थोड़ा-बहुत नहीं, बल्कि बहुत-बहुत पीछे छोड़ रखा है।
तैयारी सारी लड़कियों की बेहतर है, लेकिन जीत का सेहरा लड़कों के सिर बंधा है। कक्षा में लड़कियां ज्यादा हैं, लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मर्द वकील ज्यादा। ऐसा क्या होता है कि इन लड़कियों के स्त्री बनते-बनते और लड़कों के पुरुष बनते-बनते पुरुष, महिलाओं के हिस्से की सफलता का एक बड़ा हिस्सा अकेले ही डकार जाते हैं।
शुरुआत तो बराबरी से होती है, लेकिन रेस में कुछ ही देर दौड़ने के बाद लड़कियां कहीं बहुत पीछे छूट जाती हैं और लड़के रेस की सबसे आखिरी लाइन पर खड़े न सिर्फ अपनी जीत का जश्न मना रहे होते हैं, बल्कि हमें पीछे से मुंह भी चिढ़ा रहे होते हैं।
इस गैरबराबरी की खानापूर्ति वाली भरपाई करने और औरतों के हाथों में झुनझुना पकड़ाने की सी शक्ल में हम साल का एक दिन उनके सेलिब्रेशन में मुकर्रर कर देते हैं। अपने देश में और दुनिया के तमाम देशों में डे तो बहुत सारे हैं और उसमें भी महिला अधिकारों और बराबरी का झंडा उठाए उसे सेलिब्रेट करने वाले दिनों की तो मानो बाढ़ ही आई हुई है।
महिला वकीलों की संख्या कम है, जजों की संख्या उससे भी ज्यादा कम है, कानून के ऊंचे फैसलाकुन पदों पर बैठी महिलाओं की संख्या उससे भी ज्यादा कम, लेकिन हमारे नाम एक डे मुकर्रर है। जिनको पद, सत्ता, अधिकार मिला हुआ है, उसे डे की कोई जरूरत ही नहीं।
लेकिन इस सारी आपाधापी के बीच असली सवाल तो यही है कि इस गैरबराबरी की और झूठे सेलिब्रेशन की जड़ें कहां हैं। 2013 में जब सुप्रीम कोर्ट ने पांच महिला वकीलों को सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया था तो खुद सुप्रीम कोर्ट के तब तक के 63 सालों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि एक साथ तीन महिला वकीलों को सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया गया था।
इसके पहले 1977 में पहली बार विख्यात लेखक विक्रम सेठ की मां एडवोकेट लीला सेठ के हिस्से में यह उपलब्धि दर्ज हुई थी। सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के 73 सालों बाद भी इन महिलाओं की संख्या बढ़कर सिर्फ 18 हुई है, जबकि पुरुषों की संख्या 500 से भी ज्यादा है।
देश के हर तबके, हर समूह, हर जाति-धर्म-संप्रदाय के व्यक्ति के लिए न्याय और बराबरी को सुनिश्चित करने वाली देश की न्यायपालिका का रवैया महिलाओं के लिए बहुत न्यायपूर्ण नहीं है। जो पितृसत्त्ता समाज में है, परिवारों में है, इस देश की सार्वजनिक जगहों और सरकारी-गैरसरकारी दफ्तरों में है, वही पितृसत्ता न्यायपालिका के भीतर काम कर रहे लोगों के भीतर भी है।
2013 में सीनियर एडवोकेट बनीं सुप्रीम कोर्ट की वकील किरण सूरी ने कहा था कि स्टीरियोटाइपिंग तो यहां भी होती है। अगर एक मर्द वकील के कोर्ट के कागजों पर अचार का मसाला लग जाए तो वह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन एक महिला वकील के दफ्तर के कागजों पर लग जाए तो वह मजाक का मुद्दा बन जाता है।
हमें मर्दों से कहीं ज्यादा इस बात को लेकर फिक्रमंद रहना पड़ता है कि हमारा घर, परिवार, बच्चे और हम पर लगा औरत होने और गृहस्थी का ठप्पा कहीं गलती से भी हमारे काम के बीच न आ जाए।
जाहिर है, पुरुष को इस बात की फिक्र नहीं होती कि वह अपने पुरुष होने को लेकर चिंतित या शर्मिंदा हो या फिर उस पहचान से मुंह छिपाता फिरे। वह तो अपनी मर्दानगी के हर पहलू को अपनी छाती पर मेडल की तरह सजाकर घूमता है। यह औरतें हैं, जिन्हें हर घड़ी, हर कदम पर जज किया जाता है। वो साड़ी पहनती है तो कहते हैं ट्रेडिशनल है।
वो पैंट पहनकर जाती है तो कहते हैं, कुछ ज्यादा ही मॉडर्न है। 2013 में ही सीनियर एडवोकेट बनी एक महिला वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा था कि जब मैंने ट्राउजर और शर्ट पहनकर कोर्ट जाना शुरू किया तो साथ के मर्द वकील मुझे तिरछी नजरों से देखने लगे। सबने मुझे आगाह करने की कोशिश की कि तुम्हारी प्रैक्टिस तो शुरू होने से पहले ही बंद हो जाएगी क्योंकि पैंट पहनने वाली औरतों पर मर्द भरोसा नहीं करते।
मर्द तो औरतों पर किसी चीज के लिए भरोसा नहीं करते। या शायद दिक्कत भरोसे की नहीं है। दिक्कत उनकी सत्ता के किले ढह जाने की है। उनकी श्रेष्ठता के महल टूट जाने की। शिक्षा पर उनका नियंत्रण नहीं तो शिक्षा के क्षेत्र में लड़कियों ने लड़कों को पीछे छोड़ दिया है।
लेकिन उससे इतर इन संस्थाओं पर तो उनका पूरा नियंत्रण है। बाहर की दुनिया में तो अब भी मर्दों का एकछत्र साम्राज्य है। और उस साम्राज्य की मर्दों की पहरेदारी इतना कठोर है कि उस दुनिया में अपनी जगह बनाने और उसमें अपना हिस्सा मांगने के लिए औरतों को कमर तोड़ मेहनत करनी पड़ती है।
लेडी लॉयर्स डे के सेलिब्रेशन में जस्टिस प्रतिभा एम सिंह ने कहा था कि अपनी काबिलियत साबित करने के लिए 15 फीसदी महिला वकीलों को 120 फीसदी मेहनत करनी पड़ती है तब भी उन्हें वह जगह नहीं मिलती, जो मर्दों ने इसकी आधी मेहनत और काबिलियत से कब्जा कर रखी है।
इस अपराध में एक और पक्ष भी भागीदार है, हमारा समाज और परिवार। शादी और परिवार संस्था मर्द की महानता और उपलब्धियों की राह में दीवार नहीं है, लेकिन मर्द की उपलब्धियों की राह में बहुत बड़ी दीवार है।
इसलिए तो करियर के रास्ते पर चल पड़ी लड़कियां अब परिवार और शादी के रास्ते पर चलने से इनकार कर रही हैं और लोग नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं। उसी न्यायपालिका की ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोग अकसर इस चिंता में भी हलकान मिल जाते हैं कि बेलगाम आजादी से तो विवाह संस्था की बड़ी हानि होगी।
हानि विवाह संस्था की नहीं, बल्कि उनकी सत्ता की होगी। असली तिलमिलाहट की वजह कुछ और ही है।
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