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4000 लोगों का अंतिम संस्कार करा चुके पांडुरंग नामदेव को पड़ोसी से मदद मांगने पर कहा था- भिखारी

मेरा नाम पांडुरंग नामदेव केवाले है। भोपाल के न्यू मार्केट में मेरी पूजा-पाठ सामग्री की दुकान है। एक दिन मेरी दुकान पर एक 14-15 साल का लड़का आया। फटेहाल था और मुंह में गुटखा दबा रखा था। आंखें उसकी लाल थी तो मुझे लगा कि नशे करता होगा, झूठ ही बोलेगा। मैंने अपने अंदाज में उससे पूछा, ‘बताओ भाई, क्या सेवा कर सकता हूं?’

वो बोला, ‘अंकल जी, मेरी मां मर गई है। अंतिम संस्कार का सामान चाहिए, पैसे नहीं है।’

मैंने इतने धोखे खाए हैं कि उसकी बातों पर एक बार में भरोसा नहीं हुआ। मैंने उससे कहा-तुम अपना नाम-पता डायरी में लिखवाओ और मेरे साथ चलो। मैंने पहले अंत्योष्टि का सामान पैक किया। उस लड़के को स्कूटी पर बैठाकर अपने घर ले गया। वहां से कुछ और जरूरी सामान लेकर लड़के के साथ उसके घर पहुंचा।

झुग्गी बस्ती में उसका घर था। उसके घर के रास्ते में इतनी बदबू थी कि पूरे रास्ते मुझे नाक पर रूमाल रखना पड़ा। झुग्गी बस्ती के दोनों तरफ नालियां बह रही थीं। उसके घर के बाहर चार-पांच औरतें बैठ कर रो रही थीं। तीन छोटी-छोटी बच्चियां उन औरतों की गोदी में थीं। पता चला कि वो महिला सुबह तक ठीक थी। अचानक ही सब्जी बनाते-बनाते मुंह के बल लुढ़क गई। मेरी दुकान पर जो लड़का आया था वो उस महिला का सबसे बड़ा बेटा था। तीन बेटियां भी हैं। एक बेटी तो दुधमुंही है। महिला का पति कोरोना में चल बसा था, तब से जैसे-तैसे घर चल रहा था।

ये सब देखकर मैं खुद को मन ही मन कोसने लगा। मैंने उस लड़के पर शक किया, इस बात का अफसोस हो रहा था। मुझसे जितना हो सका, उस लड़के के लिए किया।

उसके साथ उसकी मां को कंधा देने वाले लोग नहीं थे, मैंने कंधा दिया। घाट पर लेकर गया, लकड़ी की व्यवस्था कराई। यह सब करते वक्त जब लड़के की तरफ मैंने देखा। उसके चेहरे पर सुकून साफ दिख रहा था। मुझे भी अच्छा लगा यह सोचकर कि किसी के अंतिम समय में काम आ जाना ही तो इंसान होने का मतलब है।

सबसे ज्यादा खुशी तब होती है जब मैं किसी की मदद करता हूं। 1978 का वो दिन याद आ जाता है जब मैंने पहली बार किसी की मदद की थी। तब भी मेरी पूजन सामग्री की दुकान फुटपाथ पर थी। उस समय रोज की कमाई थी यही कोई 10-12 रुपया।

एक छोटी-सी बच्ची रोती हुई बगल के हनुमान मंदिर आई। मैंने उसे देखा और अपने पास बुलाया। मेरे पास आते ही उसका रोना तेज हो गया। मैंने पूछा क्या हुआ। वो बोली कि उसकी मां का देहांत हो गया है। उसके पास क्रिया-कर्म करने के पैसे नहीं है। मुझे लगा कि इस बच्ची की मदद करनी चाहिए। मैं उसे अपने साथ लेकर बगल की दुकान पर गया।

उन्होंने मेरी सारी बातें सुनीं। फिर उसने पैसे की तंगी बताकर आगे बढ़ा दिया। ऐसे करते-करते मैं चौथे दुकानदार के पास गया तो उसने मेरी सारी बातें सुनकर कहा- अरे नामदेव जी! आप भीख कब से मांगने लगे?’

उसकी बातें मुझे चुभ गईं। अब मैं ठहरा स्वाभिमानी आदमी। मैंने उससे कुछ कहा नहीं, चुपचाप अपनी दुकान पर लौट आया। उस वक्त मेरे पास जो भी 14-15 रुपए थे, मैंने उस लड़की को दे दिया। इसके बाद तय किया कि हर रोज कुछ पैसे इस तरह के लोगों की मदद करने के लिए अलग से निकालूंगा।

2008 तक मैं खुद के पैसे से मदद करता था। मेरे काम को देखते हुए बीच में कुछ सरकारी मदद भी मिली। कभी नगर निगम वाले मदद कर देते हैं, तो कभी कोई समाजसेवी पैसे दे जाता है। इसके बाद मैंने एक समिति बना दी। सारा हिसाब-किताब उसमें दर्ज होता है। हम लोग भी ब्योरा लिखते हैं। बस ऐसे ही चल रहा है।

इस दुकान से जो कमाई होती है वो घर चलाने और लोगों की मदद करने के लिए पर्याप्त है। मेरी बेटी लंदन में रहती है। एक बेटा इंजीनियर है। घर सुखी है और क्या चाहिए। मेरे घर वालों ने आज तक मुझसे ये नहीं कहा कि आप ये मदद क्यों करते हो। या मेरी पत्नी ने भी कभी मना नहीं किया। ऐसा नहीं है कि पैसे का अभाव या कमी नहीं हुई। तीन बच्चे पढ़ाना-लिखाना, उनका पालन-पोषण बहुत मुश्किल था, लेकिन धीरे-धीरे सब हो गया।

मेरे बीबी-बच्चों का सहयोग न होता, तो क्या इस तरह का काम कर पाता। संभव ही नही था। आपको पता है मेरे घर पर अंत्येष्टि सामग्री और अंतिम क्रिया से जुड़े सामान हर वक्त रहते हैं। आप खुद सोचो क्या कोई नॉर्मल परिवार इस तरह का सामान घर पर रखेगा। लोग इन चीजों को अपशकुन, अछूत, सूतक आदि से जोड़कर देखते हैं। मैं नसीब वाला हूं कि मेरे परिवार ने इस तरह नहीं सोचा। इस वजह से मैं लोगों की मदद कर पा रहा हूं।

मैं जब तक जीवित हूं, इसी काम में खुद को बिजी रखना चाहता हूं। महीने में 12-15 लोगों की मदद करता हूं। लोग आते हैं, मदद मांगते हैं। मेरा काम बस इतना है कि बिना परखे और संशय किए उनके दुख में थोड़ी देर के लिए शरीक हो जाना। अब तक मैं करीब 4000 लोगों का अंतिम संस्कार करा चुका हूं।

कई बार लोग पूछते हैं कि इस तरह के काम में ज्यादा लोग क्यों नहीं आते। पहले मैं भी ऐसा ही सोचता था। उम्र के साथ अब समझ गया हूं कि जब तक आपके मन में किसी की मदद करने की भावना नहीं आएगी, आप आगे नहीं बढ़ सकते।

दूसरी मजबूरी पैसे की होती है। एक इंसान की मदद में अगर केवल अंत्येष्टि की सामग्री दी जाए तो 2000-2500 का खर्च आता है। अगर लकड़ी की व्यवस्था करनी हो तो फिर लकड़ी 4000-4500 की पड़ती है। ऐसे में एक गरीब इंसान की मदद में 6000-7000 रुपए खर्च होते हैं।

मैं खर्च नहीं देखता। सब चल ही रहा है। दो हजार- पच्चीस सौ की कोई कीमत नहीं है। क्या जाता है, लेकिन कोई सम्मान के साथ परलोक जाए यही तो भगवान की भी इच्छा होती है। वर्ना वो ये सब क्यों बनाते। आप मुझसे 500 रुपए मांगे तो शायद मैं मना कर दूं, लेकिन किसी की मदद करने को कहेंगी तो कर्ज लेकर भी उसका साथ दूंगा।

मेरे इस नेचर का लोगों ने फायदा भी उठाया है। पिछले महीने की ही बात है। भोपाल के एक जाने-माने सामाजिक व्यक्ति का फोन आया। कहने लगे एक व्यक्ति को आपकी दुकान पर भेजा है उसकी मदद कर दीजिएगा। मैंने कहा ठीक है। जब वो आदमी आया, देखने में जरूरतमंद नहीं लगा। चूंकि फोन आ गया था तो मैंने उसकी मदद कर दी। उससे कोई सवाल भी नहीं किया। मैंने उसे अंत्येष्टि की सामग्री दी। लकड़ी का बंदोबस्त कराया।

पिछले कुछ दिनों से मेरी आदत है कि मैं शाम को भोपाल के भदभदा श्मशान घाट की तरफ चला जाता हूं। उस दिन मैंने यह सोचा कि क्यों न देखता चलूं कि जो सज्जन सुबह मदद मांगने आए थे उनका क्या हुआ यह देख लूं। कमाल देखिए कि जब मैं घाट पर पहुंचा तो उस व्यक्ति के साथ तकरीबन 150 लोग दिखे। अब मैं सोच में पड़ गया। जिसके साथ घाट पर 150 लोग आ जाएं, वो कैसे गरीब आदमी होगा? और अगर वो गरीब है भी तो इतने सारे लोग 50-50 रुपया भी दें तो काम हो जाए। ऐसी स्थिति में मुझे बहुत बुरा लगता है। दिल को ठेस पहुंचती है। बताइए, अगर मैं अपनी कमाई से मदद करने के लिए तैयार हूं तो लोगों को कम से कम मेरा फायदा नहीं उठाना चाहिए।

मेरी मदद करने वाले भी बहुत लोग आते हैं। आपको इससे जुड़ी एक बेहतरीन कहानी सुनाता हूं। मैं अपने दुकान के काम से नागपुर गया था। वहां से भोपाल आना था मगर ट्रेन लेट थी। मैं वेटिंग रूम में बैठा था। बगल में एक सज्जन आकर बैठे और थोड़ी देर में बातचीत शुरू हो गई। मैंने उन्हें बताया कि मैं छोटी-सी दुकान चलाता हूं और लोगों की ये मदद भी कर देता हूं। वो सज्जन ठहरे बिजनेसमैन। उन्होंने अपना बैग खोला। चेकबुक निकाली और 50,000 का चेक काटकर मुझे दे दिया। उन्होंने न क्रॉस चेक किया और न ही कोई सवाल पूछा। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। मैंने मना भी किया, मगर उन्होंने वो चेक समिति के नाम से काट दिया।

मैं सोचता हूं कि उस आदमी को क्या पड़ी थी जो मेरी मदद कर रहा था। मैं उस इंसान को नारायण का रूप ही मानता हूं। मैं सोचता हूं कि देश में लाखों लोग दुकान चलाते हैं। एक मैं भी उन्हीं में हूं, लेकिन मुझे महीने में कम से कम 12-15 बार लोग आशीर्वाद देकर जाते हैं। रोते हुए मुझे दुआएं देते हैं। और क्या चाहिए? आप अगर किसी के दुख के क्षण में भी काम आ जाते हैं तो इंसान होने का यही तो फायदा है न?

पांडुरंग नामदेव ने अपने जज्बात साझा किए

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