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मोहर्रम के मौके पर दो महीने आठ दिन तक मातम रहता है; छाती पीटकर रोती औरतें, मर्द जंजीर से खुद को करते लहूलुहान; जख्म पर नहीं लगाते मरहम

लखनऊ/ रात के लगभग 12 बज रहे हैं। मैं अदब के शहर लखनऊ में हूं। मौका बेशक मातम का है, लेकिन बड़ा इमामबाड़ा एलईडी लाइट और लड़ियों से रोशन है। रोशनी से नहाई इस इस्लामिक ऐतिहासिक इमारत में लाखों की तादाद में भीड़ जमा है। ठीक बीचों-बीच हरी घास का एक गोलाकार पार्क है। वहां लकड़ियां जल रही हैं।


मीडियावालों को पार्क के अंदर जाने के लिए कह दिया जाता है। मैं भी उस पार्क की तरफ बढ़ने लगती हूं। पार्क में कई घंटे से जल रही लकड़ियां अब कोयला होकर अंगारे में बदल चुकी हैं। इमामबाड़े के पार्क में लोग अंगारों का बिस्तर बना रहे हैं। बीच में अंगारे और आसपास रेत का बिस्तर।

जब सब कुछ तैयार हो जाता है तो हरे रंग की छतरियों तले तैनात काले और हरे रंग के कपड़ों में हर उम्र के लोग यहां आकर अंगारों पर चलने लगते हैं। कुछ लोगों ने तो गोद में छोटे बच्चों को भी लिया हुआ है। उन्हें फिक्र नहीं कि छोटा बच्चा अगर हाथ से फिसल कर अंगारों पर गिर जाए तब क्या होगा। लोग आते जा रहे हैं और आंखें बंद किए हुए ‘या हुसैन’ बोलकर अंगारों पर चलते जा रहे हैं।

दरअसल मोहर्रम के मौके पर 10 दिन तक मातम चलता है। शिया मुस्लिम पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन की शहादत का गम मनाते हैं। इमाम हुसैन कर्बला के मैदान में अपने साथियों के साथ शहीद हो गए थे। यहां हर दिन अलग-अलग रस्में की जाती हैं।

लखनऊ की अज़ादारी दुनियाभर में मशहूर है। इस वजह से यहां देश-विदेश से लोग इस मौके पर आते हैं। कहा जाता है कि जब लखनऊ अवध की राजधानी थी, तब यहां के नवाब और बादशाह शिया थे। उनके राज में यहां अज़ादारी की अनोखी और भव्य रस्में शुरू की गई थीं। इनमें से एक है आग का मातम। यानी अंगारों पर चलकर इमाम हुसैन की शहादत को याद किया जाता है।

अब मैं देख रही हूं कि अंगारों पर चलने के बाद यही युवा जोर-जोर से अपनी छाती पीटकर या हुसैन ..या हुसैन…लब्बैक या हुसैन..लब्बैक या हुसैन बोल रहे हैं। इन लोगों की आवाज आसमान तक गूंज रही है। इसके बाद जो हुआ उसे देखकर तो हैरान रह गई।

कुछ युवा बिना कमीज के अंदर आते हैं। उनके हाथों में जंजीर है। जंजीर के एक सिरे पर छुरी बांधी गई है। इससे पहले कि मैं कुछ समझती वो लोग ‘या हुसैन’ बोलते हुए जोर-जोर से जंजीर अपनी पीठ पर मारने लगते हैं। इन्होंने अपनी पीठ को लहूलुहान कर लिया है। जंजीर से बंधे चाकू को युवा बार-बार अंगारों पर गरम कर रहे हैं ताकि तकलीफ उन्हें ज्यादा हो।

खंजर, चाकू, जंजीरें लेकर खुद को लहूलुहान कर लोग मातम मना रहे हैं। हर कोई 'अली मौला, हैदर मौला' की सदाएं लगा रहा था।

इमाम हुसैन की शहादत के नौहा यानी गीत गा रहे हैं। जैसे-जैसे गीत की लय ऊंची होती जा रही है उनमें जोश भी बढ़ रहा है। यह लगातार खुद को मारते जा रहे हैं, गोलाकार भीड़ जमा होती जा रही है। इन्हीं युवाओं में एक 21 साल का लड़का है जैनुअल अब्बास। पेशे से वेडिंग फोटोग्राफर है। वह जब छह साल का था तब से छुरियों वाले मातम में हिस्सा ले रहा है।

मैंने उससे पूछा कि दर्द नहीं होता है? जैनुअल कहते हैं, ‘दर्द ही तो नहीं होता है। बचपन से ही इसमें शामिल होने का जुनून होता है। एक बात याद रखें कि यह कोई प्रैक्टिस नहीं है बल्कि आस्था है। आस्था ऐसी कि तलवारों से अपना सिर लहूलुहान करते हैं।’

इन सभी इंतजामात के बीच भारी तादाद में पुलिस मौजूद है। आसमान में ड्रोन उड़ रहे हैं। पैरामिलिट्री फोर्स, पुलिस सभी सतर्क हैं। जगह-जगह पुलिस की जीप, पुलिस के बड़े अधिकारी घोड़े वाली पुलिस, महिला पुलिस, ट्रैफिक पुलिस सब चप्पे-चप्पे पर हैं।

इस मौके पर जरा सी बहस कई दफा बड़ी अनहोनी का रूप ले लेती है, इससे बचने के लिए इंतजाम बहुत पुख्ता किए गए हैं। बड़े इमामबाड़े से लेकर छोटे इमामबाड़े तक पुलिस ही पुलिस है।

पहले मोहर्रम की शुरुआत में जरी का जुलूस निकला है। इसमें मोम से खूबसूरत जरी बनाई गई है। फिर आग का मातम हुआ, अगले दिन शाही जुलूस निकला जो बड़े इमामबाड़े से छोटे इमामबाड़े तक गया। इसे मेहंदी का जुलूस भी कहते हैं। बाकायदा कागज का एक स्ट्रक्चर बनाया जाता है, जिसे मेहंदी कहते हैं।

मेहंदी जुलूस में हरी चूड़ियां और मेहंदी कुछ रुपयों के साथ रखी जाती है और फिर मेहंदी उठा ली जाती है। कहते हैं कि ऐसा कर लोग मन्नत मांगते हैं।

मैं भी मेहंदी के जुलूस देखने यहां पहुंची हूं। बड़े इमामबाड़े से लेकर छोटे इमामबाड़े तक सिर्फ इंसानों के सिर दिखाई दे रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि पूरा लखनऊ ही यहीं है। चारों तरफ काले कपड़े, पांव धरने की जगह नहीं, आसमान में सिर्फ ड्रोन और आधा चांद।

अब रात के दस बज चुके हैं। सबसे पहले खूबसूरत चमकीले कागजों और बेंत से बने स्ट्रक्चर लाए जाते हैं। जिसे मेहंदी कहते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे बैंड बाजे वाले, झंडे वाले, अलम वाले, ऊंट वाले, हाथी वाले, घोड़े वाले इकट्‌ठा हो जाते हैं। सभी सात दफा इमामबाड़े का चक्कर काटते हैं।

उसके बाद मेहंदी का जुलूस बड़े इमामबाड़े से होता हुआ छोटे इमामबाड़े तक जाता है। लाखों का हुजूम है। कई-कई हजार फीट के अलम पकड़े नौजवान नंगे पांव चल रहे हैं। इमाम हुसैन के घोड़े को तो चांदी के गहनों से सजाया गया है। इतना लंबा और ऐसा जुलूस मैंने तो पहले कभी नहीं देखा।

हरे, पीले, बैंगनी, नीले और लाल झंडे वालों का हुजूम, फिर हाथी, उसके पीछे ऊंटों का लंबा काफिला, फिर अलग-अलग तरह के अलम, मन्नत मांगने वालों की अलग ही भीड़ जिन्होंने कमर में घंटियां बांध रखी हैं, रोशनी उठाए लोग और तरह-तरह की झांकियां।

इसके अगले दिन दरिया किनारे मातम है। फिर उसके अगले दिन छूरियों और तलवारों से मातम है। फिर इमाम हुसैन की याद में ताजिए निकाले जाएंगे। कुछ लोग ताजिए दफना देते हैं और कुछ लोग गोमती नदी में इसे बहा देते हैं।

दो महीने आठ दिन चलने वाले मोहर्रम में पहले के 10 दिन मातम है। इसी दौरान दिन में मजलिसें हो रही हैं। दस दिन के मातम के बाद घर-घर में मजलिस है। मजलिस का मतलब बैठना है। ऐसी कई मजलिसों में मैं शामिल हुई।

सबसे पहले अकबरी गेट के पास शिया मौलाना सैफ अब्बास साहब की मजलिस में पहुंचती हूं। अब्बास साहब ने मुझे सुबह 9.30 बजे बुलाया था। मैं लाल रंग की टीशर्ट पहनकर चली गई, जिसके लिए मुझे काफी शर्मिंदा होना पड़ा। कहा गया कि कल से काला या नीला कपड़ा पहनकर आएं। शाम को आग का मातम था। शाम को मैंने देखा कि मेरे समेत बाहर से आए तमाम पत्रकारों ने काले कपड़े पहन रखे थे।

हुसैन की शहादत और उनके परिवार को दी गई यातनाओं पर शिया मौलाना सैफ अब्बास बोलते हैं, ‘जब हम कहानियां सुनाते हैं, तो सुनने वाले जार-जार रोते हैं। आप समझिए इस घटना को हुए 1400 साल बीत गए, इसके बाद भी शिया मुस्लिम ऐसे रोते हैं।

लोग कहते हैं कि या हुसैन हम होते..। यानी अगर हम वहां होते तो तुम्हारी जगह शहीद हो जाते। महिलाएं छाती पीट रही हैं, रो रही हैं। कोई किसी कोने में बैठी रो रही है तो कोई मुंह रुमाल में दिए रो रही है।

अचानक से रोने की आवाज तेज हो जाती है। मर्द भी सिर पर हाथ रखकर रो रहे हैं, बच्चे भी रो रहे हैं।

कोई पेड़ के पीछे रो रहा है, कोई सड़क पर खड़ा रो रहा है, कोई दुकान पर रो रहा है, कोई चलते-चलते रो रहा है यानी सब रो रहे हैं। बस रो रहे हैं जिसे जहां जगह मिली। जो तरीका मिला। इस बारे में भारतीय शियाओं के उलेमा यानी मौलाना, इमाम ए जुमा, लखनऊ कल्बे जवाद साहब कहते हैं कि जब किसी महिला का पुत्र या नातेदार मर जाता है तो वह छाती ही पीटती है। इसलिए यह हमारे यहां मातम का एक तरीका है। हम मुस्लिम ऐसा मानते हैं कि हम अगर जंग के मैदान में होते तो हम भी हजरत हुसैन की मदद करते। उन्हें बचा लेते।

जवाद साहब बताते हैं कि इस्लाम में मोहर्रम का महीना अहम है। जहां भी जिस मजलिस में जाओ वहां इराक के कर्बला शहर का जिक्र आने लगता है। एक हूक उठने लगती है। किसी कोने से उठती हूक के साथ ही धीरे-धीरे सब रोने लगते हैं। फिर आंसुओं का सैलाब आ जाता है।

आखिर क्या है कर्बला की लड़ाई। इसे मौलाना सुना रहे हैं, ‘रो लो आज, जितना रोना है। मौलाना खुद भी रो रहे हैं। चारों ओर गम का माहौल है जैसे ताजा-ताजा किसी का जनाजा उठा होता है। आज से 1400 साल पहले तारीख ए इस्लाम में कर्बला की जंग हुई थी। इसे मानवता के लिए लड़ी जंग माना जाता है। जुल्म के खिलाफ जंग माना जाता है।’

मौलाना आगे कहते हैं, ‘इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार पहला महीना मोहर्रम का महीना माना जाता है। दसवें दिन ‘रोज ए अशुरा’ मनाया जाता है। इस दिन शिया मुस्लिम ताजिए निकालते हैं। इन दस दिनों में हर दिन कर्बला की जंग में शहीद हुए शहीदों की शहादत की कहानियां सुनाई जाती हैं। कहते हैं कि पैगंबर मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन को मोहर्रम के महीने में कर्बला की जंग में परिवार और नातेदारों सहित शहीद कर दिया गया था।

कर्बला की जंग हजरत इमाम हुसैन और बादशाह यजीद की सेना के बीच हुई थी। मोहर्रम के 10वें दिन शिया मुस्लिम समुदाय लोग ताजिया निकालते हैं। इसे ईरान में हजरत इमाम हुसैन के मकबरे का प्रतीक माना जाता है। इस जुलूस में लोग गम मनाते हुए चलते हैं। ताजिए कागज और बांस से बनाए जाते हैं। कुछ ताजिए बनाए जाते हैं तो कुछ परमानेंट होते हैं। इसमें इमाम हुसैन की कब्र बनाई जाती है। कुछ लोग ताजिए के जुलूस के बाद उसे दफना देते हैं तो कुछ बहा देते हैं। कहते हैं कि कर्बला के बाद इस्लाम जिंदा हुआ था।’

मैं मौलवी साहब से पूछती हूं कि चाकू और अंगारों से मोहर्रम के मातम में कोई घायल नहीं होता?

शिया मौलवी सैफ अब्बास बताते हैं, ‘इमाम ए हुसैन यानी मोहर्रम में हर समुदाय अपनी आस्था रखता है। आग का मातम करने वालों के पांव देख लो किसी के पांव में एक छाला नहीं है। मजलिस में देखो कैसे लोग रो रहे थे, 1400 साल बाद ऐसे कोई रोता है क्या। इसका सीधा मतलब दिल से हम दुखी हैं। यहां तक कि छुरी वाले मातम में एक छुरी या जंजीर दूसरा मारता है, तीसरा मारता है, किसी को कोई दिक्कत नहीं होती है। पीठ और सिर पर जख्म होते हैं उस पर कोई दवा नहीं लगाई जाती है, वह गुलाब से सही होती है। सब आस्था का मामला है। आस्था पर सब भारी है।’

लखनऊ में ही मैं मौलाना सैयद अली हाशिम आब्दी से मिलने पहुंचती हूं। मैं उनसे मोर्हरम से जुड़ी और भी डिटेल जानना चाहती थी। इतने लंबे समय तक मातम क्यों मनाया जाता है?

उनके अनुसार चांद के हिसाब से मोहर्रम का महीना 29 या तीस दिन का होता है। चांद का साल 355 दिन का होता है। मोहर्रम में दो महीने आठ दिन की अज़ादारी और मातम रहता है। दो मोहर्रम को इमाम हुसैन का काफिला 72 साथियों के साथ इराक के कर्बला शहर पहुंचा था। सात मोहर्रम को कर्बला शहर में पानी बंद हो गया था, दस मोहर्रम को इस्लाम की बुनियाद को बचाने वाले इमाम हुसैन और 72 सहयोगियों को शहीद कर दिया गया।

मोहर्रम के मौके पर दो महीने आठ दिन तक मातम रहता है।

11 मोहर्रम को उनके परिवार के बच्चों और खवातीन यानी महिलाओं को कर्बला से 70 किमी दूर फूफा शहर ले जाया गया। 19 मोहर्रम तक वे लोग वहां रहे, फिर उन्हें वहां से ऊंटों पर दमिश (सीरिया) ले जाया गया। उस वक्त यदीद की आधी दुनिया में मिलकियत थी, सिंध तक उसकी रियासत थी। ईरान उसका एक स्टेट था।

इमाम हुसैन के परिवार को ऐसे शहरों से ले जाया गया, जहां उनके दुश्मन थे। यह रास्ता लेबनान से होकर गुजरता था। 27 मोहर्रम को वे लोग लेबनान (बालबक) पहुंचे। वहां इमाम हुसैन की बेटी खुला का इंतकाल यानी देहांत हो गया, वह तीन चार साल की थी।

फिर मोहर्रम के बाद सफर का महीना आता है, पहली सफर को काफिला सीरिया में दाखिल हुआ। 20 सफर को इमाम हुसैन का चेहलुम होता है। आठ रबीवुल अव्वल को कर्बला में बंद कुछ कैदी मदीना पहुंचे थे। इस तरह से दो महीने आठ दिन तक मातम रहता है, जिसमें अलग-अलग कार्यक्रम रहते हैं।

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