बिलासपुर/ खुली खदानों में डूबने से मासूमों की जान चली जाए लेकिन पुलिस और प्रशासन की ऐसी व्यवस्था है कि किसी को जिम्मेदार नहीं माना जाता। जिस क्षेत्र में घटना होती है, उसके टीआई, डीएसपी और एसडीएम मौत की वजह तय करते हैं कि दुर्घटनावश जान गई और केस की जांच पूरी हो जाती है।
खुली खदानों के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराना तो दूर यह भी पहल नहीं की जाती कि उसे पाट दिया जाए जिससे भविष्य में कोई और घटना न हो। पिछले पांच साल में ऐसी घटनाओं में 28 लोगों की जान जा चुकी है। इनमें 17 मौतें अवैध खदानों में डूबने से हुई है, लेकिन किसी को भी जिम्मेदार नहीं पाया गया। जिन वैध-अवैध खदानों में मौत हुई, वह आज भी खुली हुई हैं।
सेंदरी में अवैध रेत घाट में तीन बहनों की मौत की दिल दहला देने वाली घटना के बाद जो सबसे बड़ा सवाल है, वह यह है कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या इस मामले में किसी जिम्मेदार के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी? भास्कर की पड़ताल मेंे यह बात सामने आई है कि पांच साल में ऐसी घटनाओं में 17 लोगों की जान जा चुकी है। पुलिस जांच करती है। लोगों के बयान लिए जाते हैं, लेकिन किसी को भी मौत के लिए जिम्मेदार नहीं पाया जाता। परिजन के बयान और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के आधार पर ही जांच पूरी मानकर केस फाइल बंद कर दी जाती है। भास्कर ने जब एक्सपर्ट्स से पूछा कि ऐसे मामलों में कौन जिम्मेदार माना जाएगा या क्या कार्रवाई होनी चाहिए तो उनका कहना है कि पुलिस जांच और बयानों के आधार पर जो नाम सामने आते हैं, उस पर गैर इरादतन हत्या का एफआईआर कर सकती है। यदि पुरानी खदानें हैं, तो खनिज विभाग या लोकल बॉडी को उसे पाटने या सुरक्षा के लिए घेरा बनाने का भी सुझाव दे सकती है, लेकिन बिना ऐसी कोई कार्रवाई किए केस फाइल कर दी जाती है।

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