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भारत ने दिया दुनिया को नींबू, नींबू में 70% शुगर फिर भी लगता है खट्टा, इकलौता फल जो खाने के साथ सफाई के भी काम आता है

नई दिल्ली/यूरोप से लेकर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अरब, अफ्रीका और भारतीय खाने में एक बात कॉमन है। वह है नींबू का इस्तेमाल। कहीं सलाद के साथ तो कहीं कुकिंग-बेकिंग में तो कहीं अचार बनाकर।

नींबू के बिना किसी भी देश की थाली पूरी नहीं होती। थाली के अलावा नींबू की मौजूदगी सोडा, शिकंजी के बतौर दुनिया भर के गिलासों में भी घुली है।

टमाटर आजकल सभी के दांत खट्टे किए हुए है। कुछ महीनों पहले नींबू भी 200 रुपए किलो पहुंचकर अपना रंग दिख चुका है। हर सुबह गुनगुने पानी में नींबू-शहद पीने वालों की मॉर्निंग नींबू के बिना गुड नहीं होती। चाय में नींबू निचोड़कर लेमन टी पीने वाले हों या शिकंजी के शौकीन, किसी का नींबू के बिना गुजारा नहीं होता। आज फुरसत का रविवार है, नाश्ते के पोहे से लेकर डिनर के सलाद तक नींबू ही निचोड़ा जाएगा, इसलिए आज नींबू पर ही बात करते हैं…

असम से निकलकर दुनिया भर में फैला है नींबू

क्या आपको पता है कि अमेरिका में सिर्फ 200 साल पहले तक नींबू का चलन नहीं था। नींबू अपने देश के एक राज्य असम से ही निकलकर दुनिया भर में फैला।

5 हजार सालों से भारत को अपना खट्टा स्वाद देने वाला नींबू आज ग्लोबल फल बन गया है। असम का यह देसी फल आज व्हाइट हाउस से लेकर वेटिकन तक में जगह बना चुका है।

नींबू शायद दुनिया का इकलौता फल है जो खाने के साथ-साथ बड़ी मात्रा में साफ-सफाई के भी काम आता है।

वेदों से लेकर पुराणों तक में नींबू का उल्लेख मिलता है। आयुर्वेद में इफरात से इसका जिक्र हुआ है। हजारों साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता में लोग नींबू से नशा किया करते थे।

80 लाख साल पहले तक नींबू, संतरा जैसे तमाम फल एक ही हुआ करते थे। आज दुनिया भर में मटर के दाने से लेकर तरबूज के आकार के नींबू मिल जाते हैं। नींबू प्रजाति के सैकड़ों फलों ने दुनिया को अपना दीवाना बना रखा है।

ऐसे में असम के नींबू के ग्लोबल होने की कहानी को जान लेते हैं।

नींबू में 70% शुगर फिर भी लगता है खट्टा

खट्टेपन का पर्याय बन चुके नींबू में मीठे फलों से ज्यादा शुगर पाई जाती है।

बाजार में मिलने वाले किसी भी सामान्य नींबू में 70% तक शुगर होती है। जबकि मीठे फलों में भी 40 से 50% तक ही शुगर यानी मिठास होती है। इसके बावजूद नींबू अपने खट्टेपन के लिए ही जाना जाता है।

दरअसल, नींबू में शुगर के अलावा काफी मात्रा में साइट्रिक एसिड मौजूद होता है। जो नींबू में मौजूद शुगर के स्वाद को दबाकर उसे खट्टा बनाता है।

नींबू सिर्फ फल नहीं पूरी प्रजाति है, इसके सैकड़ों रूप

नींबू शब्द सुनते ही हमारे मन में बाजार में ‘10 के 2’ बिकने वाले पीले और रसीले गोल फल का ख्याल आता है, लेकिन हमारे किचन में इस्तेमाल होने वाले इस फल का असली नाम ‘सिट्रस लेमन’ है। जो नींबू प्रजाति के सैकड़ों फलों में से एक है।

हालांकि दुनिया भर में खट्टेपन के लिए मुख्य रूप से दो तरह के नींबू इस्तेमाल होते हैं। पहला लाइम और दूसरा लेमन।

अपने देश में इन दोनों को नींबू कहा जाता है, लेकिन इनमें अंतर है।

80 लाख साल पहले नींबू और संतरे में नहीं था अंतर

नींबू प्रजाति के फलों को अंग्रेजी में ‘सिट्रस’ कहते हैं। ‘नेचर’ मैगजीन में पब्लिश एक DNA स्टडी के मुताबिक आज से 80 लाख साल पहले नींबू प्रजाति के एक फल से लेमन, लाइम, ऑरेंज जैसे तमाम सिट्रस फल पैदा हुए। यानी पहले नींबू और संतरे में कोई अंतर नहीं होता था।

लेकिन बाद में प्राकृतिक कारणों और फिर हाइब्रिड नस्ल के चलते नींबू और संतरे की सैकड़ों प्रजातियां विकसित हुईं।

नींबू के खट्टेपन में ऐसा क्या है कि दुनिया हुई दीवानी?

नींबू के रस में 5 से 8% तक साइट्रिक एसिड पाया जाता है। नींबू के अलावा भी सभी खट्टे फलों में साइट्रिक एसिड पाया जाता है। साइट्रिक एसिड ही नींबू प्रजाति के फलों को उनका खास टेस्ट देता है। साइट्रिक एसिड के कम या ज्यादा होने होने पर ही फलों का खट्टापन निर्भर करता है। साइट्रिक एसिड का यह प्रतिशत ही नींबू को दूसरे खट्टे फलों में सबसे पसंदीदा बनाता है।

साइट्रिक एसिड के खास टेस्ट को अब कोल्ड ड्रिंक्स से लेकर फूड फ्लेवर तक में इस्तेमाल लिया जाता है।

अंग्रेजों ने चुराया नींबू का नाम, देसी ‘लिम्बू’ बना अंग्रेजी का ‘लेमन’

दुनिया को भारत ने ही नींबू खाना सिखाया। साथ ही इसका नाम भी भारतीयों ने ही दिया। संस्कृत के पुराने ग्रंथों में नींबू का ‘निम्बूक या निम्बूकम्’ के बतौर जिक्र मिलता है। इसे आम बोलचाल की भाषा में ‘लेमू’, ‘लिम्बू’ और नींबू कहा जाता था।

अंग्रेजी का ‘लेमन’ शब्द भी इसी लेमू, लिम्बू और नींबू से निकला है।

कोलंबस अमेरिका लेकर गया था नींबू का बीज

10-11वीं सदी तक नींबू भारत से निकलकर अरब देशों में जा चुका था। रसीले नींबू ने रेगिस्तान के लोगों का गला तर किया, लेकिन पश्चिमी देशों में नींबू काफी बाद में पहुंचा।

समुद्री मार्ग से अमेरिका की खोज करने वाले कोलंबस अपने साथ नींबू के बीज ले गया था। जिसे उसने 1493 में अमेरिका की धरती पर लगाया, लेकिन अमेरिका में नींबू को पॉपुलर होने में काफी वक्त लगा। पिछले 200 सालों में नींबू अमेरिका में काफी कॉमन हो गया।

खाने के अलावा सफाई और टोटके में भी नींबू का इस्तेमाल

नींबू एक ऐसा फल है जो खाने के साथ-साथ गंदगी को साफ करने में भी काम आता है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में उगने वाले कुल नींबू का सिर्फ 60% हिस्सा खाया जाता है। बाकी नींबू हाईजीन और मेडिकल इंडस्ट्री में काम आता है।

नींबू की हाई एसिडिक वैल्यू और लो पीएच के कारण इसे अच्छा क्लिनिंग एजेंट माना जाता है। तांबे के पुराने बर्तन को चमकाने और लोहे पर लगे जंग को छुड़ाने के लिए नींबू का इस्तेमाल काफी वक्त से किया जाता रहा है। यही वजह है कि आज कई सारे क्लिनिंग प्रोडक्ट नींबू की शक्तियों से लैस होने का दावा करते हैं।

इसके अलावा नींबू का टोटका भी काफी चलन में रहा है। डरावनी फिल्मों की वजह से यह माना जाने लगा कि घर में बुरी शक्तियों का प्रभाव हो तो नींबू को काटने पर लाल रस निकलेगा।

ऐसी मान्यता है कि हरी मिर्च के साथ नींबू को टांग दें तो ‘बुरी नजर’ से बचे रहेंगे। उत्तर और मध्य भारत की लगभग सभी दुकानों पर नींबू और मिर्च टंगे मिल जाते हैं। कई शहरों में तो इसके लिए अलग बिजनेस भी चल निकला है। सुबह-सुबह एक फेरी वाला नींबू और मिर्च की लड़ियों को दुकानों में लटकाता चलता है। इसके लिए उसे रोज के हिसाब से पैसे मिलते हैं।

नींबू की मदद से कटे हुए फल नहीं होंगे बदरंग

सेब या केले को काटने के बाद अलग कुछ देर खुला छोड़ दें तो उनका रंग हल्का काला पड़ जाता है। ऐसा ऑक्सिडेशन के कारण होता है। लेकिन अगर कटे हुए फल के टुकड़ों को नींबू पानी में डुबोकर निकाल लिया जाए तो साइट्रिक एसिड सेब में बनने वाले ऑक्सिडेशन की प्रक्रिया को बंद कर देता है। जिसके कारण कटे हुए फल काले नहीं पड़ते।

बड़े रेस्टोरेंट और 5 स्टार होटलों के चमचमाते फ्रूट कॉर्नर के फल इसी प्रक्रिया से गुजरते हैं, इसलिए देर तक ताजे लगते हैं।

बिहार का गागर नींबू, तरबूज जितना बड़ा

लेमन और लाइम के अलावा भी नींबू प्रजाति के सैकड़ों फल हैं। दुनिया भर में मटर के दाने से लेकर तरबूज जितने बड़े नींबू मिलते हैं। बिहार में ‘गागर नींबू’ होता है। इसका आकार किसी तरबूज या फुटबॉल जितना होता है। स्वाद हल्का खट्टा-मीठा और शेप बिल्कुल लेमन की तरह। बिहार के प्रसिद्ध लोकपर्व छठ में इसका प्रसाद भी चढ़ाया जाता है।

वैशाली, गया, बोधगया जैसे बिहार के जिन पर्यटक स्थलों पर विदेशी टूरिस्ट आते हैं। वहां के स्थानीय लोग उन्हें बड़ा नींबू बेचकर पैसे कमाते हैं। तरबूज जितना बड़ा नींबू देखना छोटे-छोटे लाइम के शौकीन विदेशियों को हैरत में डाल देता है और वो उसके साथ फोटो खिंचाने के भी पैसे देते हैं।

आयुर्वेद का अमृत है नींबू, इसके सैकड़ों देसी नुस्खे भी

आयुर्वेद में नींबू को अमृत के समान बताया गया है। आयुर्वेदिक पद्धति में नींबू उन फलों में शामिल है, जिसका सबसे ज्यादा जिक्र हुआ है।

पतंजलि के मुताबिक नींबू के कुछ फायदे इस तरह से हैं-

एक गिलास पानी में एक नींबू निचोड़कर रात को सोते समय पीने से पेट साफ़ हो जाता है। कब्ज की समस्या नहीं होती।

गुनगुने पानी में नींबू का रस व एक चम्मच शहद मिलाकर पिएं तो वजन घटने लगता है।

चम्मच भर नींबू का रस पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।

जैतून के तेल के साथ नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर मलने से दाग-धब्बे, मुहांसे और झाइयां खत्म हो जाती हैं। स्किन ग्लो करती है।

डिहाइड्रेशन में नींबू का पानी ज्यादा से ज्यादा पीना चाहिए, इसकी वजह से शरीर में पानी की कमी नहीं होती।

लगभग आधा कप गाजर के रस में नींबू का रस मिलकर पीने से शरीर में खून की कमी दूर होती है।

यदि किसी को खांसी-जुकाम अधिक परेशान करता हो तो आधे नींबू के रस को दो चम्मच शहद के साथ मिलाकर पीने से लाभ होता है।

आधे नींबू का रस और थोड़ा सा सेंधा नमक 100 मिली लीटर पानी में डालकर पीने से पेट दर्द में आराम मिलता है।

नींबू चाटते ही आंखें क्यों सिकुड़ती और शक्ल बिगड़ती है?


क्या आपने कभी सोचा है कि नींबू चाटते ही शक्ल क्यों बिगड़ जाती है? दरअसल, नींबू का रस जैसे ही जीभ को छूता है, वहां मौजूद टेस्ट बड्स ब्रेन को सिग्नल भेजते हैं कि मुंह में एसिड पहुंच गया है। एसिड आंख और नाक के लिए सेंसिटिव होता है।

ऐसे में हमारा दिमाग नींबू का टेस्ट मिलते ही तुरंत आंख, नाक और कान की मांसपेशियों को सिकोड़ लेता है। ताकि नींबू का एसिडिक रस उनमें न जाए। दूसरे शब्दों में कहें तो नींबू के एसिड से डर कर दिमाग थोड़ी देर के लिए शक्ल को ही बिगाड़ देता है।


वैसे एक कहावत भी है- ‘निबुआ नोन चटाना’ यानी धोखा देना। जब कहीं से धोखा खा जाएं तब भी शक्ल और मन ऐसे ही बदरंग हो जाता है; मानो ‘निबुआ नोन चाट’ लिया हो।


जॉन थॉमस ने किया नींबू निचोड़ने वाली मशीन का आविष्कार


नींबू निचोड़ने वाली मशीन (लेमन स्क्वीज़र) का आविष्कार जॉन थॉमस वाइट नाम के एक अफ्रीकी अमेरिकी ने 8 दिसंबर 1896 को किया था। 1896 में ही जॉन थॉमस ने लेमन स्क्वीज़र मशीन को पेटेंट करवाया। इससे पहले नींबू हाथ या दांत के सहारे ही निचोड़े जाते थे, लेकिन लेमन स्क्वीज़र के आविष्कार के कुछ दशकों के भीतर ही यह दुनिया भर के घरों में नजर आने लगा और हाथ या दांत से नींबू निचोड़ना खराब माना जाने लगा।


राजस्थान के इस मंदिर में देवी को चढ़ता सिर्फ नींबू का प्रसाद


राजस्थान के बांसवाड़ा में एक ऐसा देवी मंदिर है; जिसमें सिर्फ नींबू का ही प्रसाद चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि काफी पहले यहां अकाल पड़ा था। इस दौरान लोगों के पास देवी को चढ़ाने के लिए कुछ भी नहीं था। ऐसे में लोगों ने नींबू देवी को अर्पित किया। कुछ दिनों में अकाल टल गया। लोगों ने इसे देवी और नींबू का चमत्कार माना।


तब से लेकर आज तक नाहरसिंह माता मंदिर में सिर्फ और सिर्फ नींबू का प्रसाद चढ़ाया जाता है। पुजारी दर्शन के लिए आने वाले भक्तों के हाथों में नींबू की फांक रखते जाते हैं।


नींबू एक ऐसा फल है जिसका सब्जियों के साथ पुराना याराना है। इसे डालकर खाएं तो टेस्ट लाजवाब हो जाएगा। दरवाजे के बाहर टांग दें तो बुरी नजरों से बचाएगा। पेड़ पर लटका हो तो बगीचे की खूबसूरती बढ़ाएगा। संभवतः नींबू इकलौता फल है जो खाने में, पीने में, सजाने और पूजा-टोटके में भी इस्तेमाल किया जाता है।


नींबू इकलौता फल है जिसे किसी फल की तरह अकेले नहीं खाया जा सकता, लेकिन इसके एक से ज्यादा इस्तेमाल हैं। अंग्रेजी की एक कहावत यह तक कहती है, 'When life gives you lemons, make lemonade' यानी जब जिंदगी का स्वाद खट्टा हो जाए यानी आपको जिंदगी मुश्किल हालात में पहुंचा दे तो ऐसी आपदा को अवसर में बदल लीजिए। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि अगर आपको मीठे फल मिलने के बजाय सिर्फ नींबू भी मिलें तो आप उससे शर्बत-शिकंजी बना लें।

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