उस वक्त मेरी उम्र आठ साल होगी। मैं भी पिता जी के साथ खेतों में जाया करता था। जॉइंट फैमिली में रहते थे हम। कुल 16 भाई-बहन थे। घर में इतने बच्चे थे कि कभी किसी का बाहर दोस्त नहीं बना।
मैं हमेशा से चाहता था कि मेरा घर से बाहर कोई दोस्त हो। स्कूल से वापस आने के बाद मैं सीधा पिता के पास खेत चला जाया करता था। वहीं खाना-पीना होता और खेलता था।
निमोलियां जानते हैं न आप लोग। नीम के पेड़ का फल। मेरे खेत में बहुत गिरता था। एक दिन मैंने कुछ निमोलियां उठाकर एक जगह बो दिया। कुछ दिन बाद देखा कि वह नीम का पौधा बन गया है। इसके बाद मैंने सब जगह ढिंढोरा पीट दिया कि यह है मेरा नया दोस्त। इस तरह मुझे घर के बाहर एक दोस्त मिल गया।
नए दोस्त के मिलने के बाद से मेरी जिंदगी थोड़ी बदल गई। जैसे ही मैं स्कूल से आता तो सीधा अपने दोस्त के पास चला जाता। मैं और वो दोनों साथ-साथ बड़े हो रहे थे। धीरे-धीरे वो मेरी दुनिया ही बन गया। उसी के पास बैठकर मैं खाता, उससे बातें करता, उसे पूरे दिन के कामकाज बताता, उससे लिपट जाता। घर वालों के लिए वो पेड़ था, लेकिन मेरे लिए वह मेरा जिंदा दोस्त।
एक दिन मैंने देखा कि उस पर दीमक लग रही है, कीड़े चल रहे हैं। यह देखकर मैं तो रुआंसा सा हो गया। मैंने घर जाकर अपने चाचा से कहा कि मेरे दोस्त के बदन पर कीड़े चल रहे हैं। चाचा उस समय जल्दी में थे। उन्होंने मेरी बात को गौर से सुने बिना कह दिया कि स्टोर में से फलां पेस्टिसाइड रखा है, जाकर डाल दे।
मैं तो बच्चा था उस वक्त, मुझे नहीं पता था कि उस पेस्टिसाइड को पानी में डाइल्यूट करके डाला जाता है। पेड़ में एक जगह पर एक छेद था, मैंने उसे सीधा पेड़ के उस छेद में डाल दिया। मुझे लगा कि इस छेद में ढेर सारे कीड़े होंगे और इसे डालने के बाद एक साथ मर जाएंगे। मेरा दोस्त ठीक हो जाएगा, इस बात से निश्चिंत होकर मैं स्कूल चला गया।
दोपहर में खुशी-खुशी स्कूल से वापस आया तो पेड़ को देखा कि वह तो पहले से भी ज्यादा बुरी हालत में है। वह लगभग झुलस गया था। इसके बाद दिन-ब-दिन झुलसता ही गया। मैं उसे रोज पानी देता, उसके सिरहाने बैठा रहता। दिन भर रोता रहता और उदास रहता, लेकिन मेरी सारी कोशिशें बेकार गईं। एक दिन मेरा दोस्त मर गया।
घर वालों ने बताया कि नीम का पेड़ गलत तरीके से पेस्टिसाइड डालने की वजह से मर गया। उस दिन मैं बहुत रोया। यह सोच-सोचकर मैं परेशान रहने लगा कि मैंने अपने हाथों से अपने ही दोस्त को मार डाला।
इसी गिल्ट के साथ मैं बड़ा हो रहा था। उस दिन के बाद से मैंने कभी कोई पौधा नहीं लगाया। मैं पौधों को देखता तक नहीं था। उन्हें देखकर एक अजीब सा डर लगता था।
वक्त बीतता गया। मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की, शादी हुई। साल 2003 में मेरी बीकानेर में डूंगरपुर के सरकारी कॉलेज में समाजशास्त्र के प्रोफेसर के तौर पर नियुक्ति हुई। उस दिन मेरा कैंपस में पहला दिन था। कैंपस के एंट्री गेट पर ही मेरी निगाह नीम के कुछ पेड़ों पर गई। वह सूख रहे थे। पेड़ के ऊपरी हिस्से के पत्ते पीले पड़ रहे थे। उन्हें देखकर मुझे मेरे दोस्त की याद आने लगी।
खैर मैं प्रिंसिपल के रूम में गया, जॉइनिंग दी और न चाहते हुए भी कहा कि बाहर नीम के पेड़ सूख रहे हैं। उन्हें देखना चाहिए। प्रिंसिपल ने मुझसे साफ कहा कि आपका काम पढ़ाना है, आप सिर्फ पढ़ाएं ।
प्रिंसिपल की बातें सुनकर मुझे निराशा हुई। मैं अपने बचपन की गलती को दोहराना नहीं चाहता था। अगले ही दिन से कॉलेज में एक फावड़ा मंगवाया। पेड़ों के आसपास बड़े-बड़े गड्ढे करने शुरू कर दिए। अपने पैसों से पानी का टैंकर मंगवाया। मैंने अपने कुछ स्टूडेंट्स की मदद ली। हम सब ने पेड़ों पर चढ़कर उनके सूखे हिस्सों को काट दिया।
श्याम सुंदर के साथ स्टूडेंट जुड़े हैं। टीचर्स एसोसिएशन के सहयोग से भी वो गांव-गांव जाकर लोगों को बीज बांटते हैं।
इसके बाद हम सब मिलकर उन पेड़ों की देखभाल करते रहे। इस काम में बॉटनी के प्रोफेसर ने हेल्प की। कुल मिलाकर तीन महीने में हमारे वो नीम के पेड़ हरे-भरे हो गए। उन्हें देखकर अहसास हुआ कि मैंने अपने पाप का कुछ हद तक प्रायश्चित कर लिया है। इसके बाद मेरा गिल्ट कुछ हद तक कम हुआ। मेरे अंदर कुछ आत्मविश्वास भी आया। लगा कि सूख रहे पौधों को हरा-भरा करने, उनकी देखभाल करने की मुहिम पर काम करना चाहिए।
सबसे पहले तो मैंने कॉलेज की छह एकड़ जमीन में जंगल उगाने का काम शुरू किया। जिसे उगाने में दस साल लगे। इस समय बीकानेर में डूंगरपुर के सरकारी कॉलेज में आंवले, सहजन, नीम, लेसवा, बकायन, शीशम, शहतूत, अर्जुन, इमली, टीक, अमलतास समेत पेड़ों की 90 किस्में हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसका उद्घाटन किया था।
इसके बाद हिम्मत बढ़ने लगी। पैदल-पैदल बीकानेर के गांव-गांव पेड़-पौधा उगाने के लिए घूमने लगा। इस दौरान मुझे यह समझ आ गया था कि अगर मैं पर्यावरण पर भाषण दूंगा तो लोग मुझे पागल कहेंगे। कोई भी मेरी बात नहीं मानेगा, न ही पेड़ लगाएगा।
इसका तोड़ मैंने निकाला। मैं लोगों को बीज देने लगा। उनसे कहता कि यह आपके परिवार का हिस्सा है। आज से इसे परिवार को मेंबर मानें। इस बात को सुनकर लोग इमोशनल हो जाते और बीज लगाने को तैयार हो जाते।
एक और तरीका मैंने अपनाया। वो यह कि मैंने लोगों को फलदार पेड़ों के फायदे गिनाने शुरू कर दिए। उन्हें बताने लगा कि अनार खाने से क्या होगा, नींबू पीने से क्या होगा, सहजन किस तरह हमारे शरीर के लिए हेल्पफुल है। ऐसा करते-करते मैंने एक बड़ा कारवां तैयार कर लिया। मैंने इसे ‘पारिवारिक वानिकी’ नाम दिया।
पेड़ हरे-भरे हो रहे थे, लेकिन मेरी दिक्कतें बढ़ती जा रही थीं। ये सब करने के लिए मैंने कर्ज लिया था।
इस तरह मेरे ऊपर लगभग 4-5 लाख रुपए का कर्ज हो गया। इस वजह से मैं तनाव में रहने लगा। आखिरकार मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा कि हुआ क्या है। मैंने उसे सब बताया। उसने मेरा कर्ज उतारने के लिए अपना सोने का हार बेच दिया।
मैं कर्ज से तो मुक्ति पा गया, लेकिन यह काम ही मेरा जीवन बन गया। मेरा परिवार परेशान हो गया था कि मुझे क्या हो गया है। मैं जानता था कि मेरी वजह सबसे ज्यादा दिक्कत पत्नी को होगी। मैंने धीरे-धीरे उसे भी इस अभियान का हिस्सा बना लिया। वह गांवों में जाकर महिलाओं से बात करती हैं।
यह काम हम दोनों के लिए आसान नहीं था। लोग मुझे पागल कहते थे। फिर कहते थे कि इसमें मेरा कोई हिडन एजेंडा है। मैं चुनाव लड़ना चाहता हूं। पता नहीं क्या-क्या आरोप लगाए गए मुझ पर। इन सब पर ध्यान देने की जगह मैं अपनी धुन में काम करता गया।
कुछ लोग मुझे टेकन फॉर ग्रांटेड लेते थे। मेरे दिए बीज फेंक देते थे। यह सब जानने के बाद भी मैं रुका नहीं। इस काम के लिए मेरी पत्नी के एक-एक करके सभी गहने बिक गए। वो कभी-कभार नाराज भी होती थी, लेकिन मेरा साफ कहना था कि मेरी जिंदगी यही है, मैं इसके बिना नहीं रह सकता हूं।
फिर हमने जन्मदिन पर पौधे गिफ्ट करने का रिवाज डाला। शादी के नाम पर बीकानेर में पहली दफा ग्रीन मैरिज शुरू की। कोई मर जाए तो पौधे लगाने, कोई पैदा हो तो पौधे लगाने को कहा। सांस्कृतिक मेलों में हमने पेड़ बांटने शुरू किए।
श्याम सुंदर की पहल से उनके गांव की दुल्हन पिता का घर छोड़ने से पहले पौधा लगाती है और ससुराल में जाकर भी पौधा लगाती है। बारातियों को गिफ्ट में पौधे दिए जाते हैं।
श्याम सुंदर की पहल से उनके गांव की दुल्हन पिता का घर छोड़ने से पहले पौधा लगाती है और ससुराल में जाकर भी पौधा लगाती है। बारातियों को गिफ्ट में पौधे दिए जाते हैं।
कोविड के दिनों का एक किस्सा सुनाता हूं। मेरे घर के पास में ही एक जमीन पर अवैध खनन हो रहा था। मैं वहां पहुंच गया। कुछ लोग मेरे साथ थे। वहां लड़ झगड़कर अवैध खनन रुकवा कर हमने पौधारोपण किया। दो साल में वहां हरा-भरा जंगल बन गया है।
कोविड के दौरान ही मैंने देखा कि सहजन को साउथ इंडिया में दवा की तरह लिया जा रहा है। इसलिए हमने बीकानेर में 48 लाख सहजन के पौधे लगाए। सहजन के पेड़ का हर हिस्सा सेहत के लिए वरदान है। अब हमारे अगले कदम में सहजन के पौधे के अलग-अलग हिस्सों को ऑर्गेनिक तौर पर तैयार कर उसकी मार्केटिंग करना है। जिसके लिए हम काम कर रहे हैं।
मैं उस मुकाम तक आ चुका हूं कि लोग खुद पौधे मंगवा रहे हैं, अपने आसपास लगा रहे हैं। हमें जंगल लगाने के लिए भी बुलाया जा रहा है। मैंने अभी तक 18,000 गांवों में 200 जंगल उगाए हैं। अंदाजन 15 लाख परिवार इस समय मेरे साथ जुड़े हुए हैं।
श्याम सुंदर बताते हैं कि कुछ लोग ऐसे भी उनके पास आए हैं जो उनके लगाए जंगलों पर रिसर्च करना चाहते हैं।
मेरी इन कोशिशों को संयुक्त राष्ट्र संगठन की ओर से पर्यावरण के क्षेत्र में विश्वस्तरीय पुरस्कार देकर प्रोत्साहित किया गया। मुझे 2021 में यूएन ने लैंड फॉर लाइफ अवॉर्ड दिया। इस अवॉर्ड के लिए पूरी दुनिया से दस लोगों में से मुझे चुना गया।
भारत से सदगुरु वासुदेव जग्गी और मेरा नाम था। मुझे लगा कि सदगुरु जग्गी का तो बड़ा नाम है, मुझे तो किसी कीमत पर यह अवॉर्ड नहीं मिल सकता, लेकिन यूएन ने मेरी कोशिशों को सराहा।
मानता हूं कि आज मैं जो भी कर रहा हूं, उसकी वजह मेरा दोस्त नीम का पेड़ है। उसी की वजह से मेरी जिंदगी बदल चुकी है।

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