जिनकी निगरानी में निर्भया के दरिंदों को मिली फांसी वो कभी करते थे बर्तन बेचने का काम, हीरो की तरह बनाई है बॉडी, फिल्मों, रियलिटी शो से ऑफर भी मिले, यहाँ तक के संघर्ष की कहानी उन्ही की जुबानी
‘पांच भाई-बहन हैं, मिडिल क्लास फैमिली में पैदा हुआ। पापा दिल्ली में नौकरी करते थे। हमारा घर उत्तर प्रदेश के बागपत में है। गरीबी का आलम ये था कि अपने गांव बागपत से दिल्ली रोजाना साइकिल से आते थे।
हर रोज 80 किलोमीटर साइकिल चलाकर आना-जाना… समझ सकते हैं आप। आने-जाने में इतनी दिक्कतें होने लगीं कि कुछ साल बाद हम लोग शहर शिफ्ट हो गए। मैं दिल्ली में ही पढ़ाई करने लगा। पता था कि यदि पढ़ूंगा-लिखूंगा नहीं, तो घर का जो हाल है, उससे कभी नहीं निकल पाऊंगा। घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था, लेकिन आर्थिक तंगी बहुत ज्यादा थी। जब 12वीं में था, तो पार्ट टाइम जॉब करने लगा। दुकान-दुकान जाकर प्रेशर कुकर बेचने का काम मुझे मिला। उसके बाद कुछ महीने तक पुराने मोबाइल फोन भी बेचे।
नई किताब खरीदने के पैसे नहीं होते थे तो पुरानी किताबें ही खरीदकर पढ़ता। कॉलेज टाइम में महंगे रेस्टोरेंट में जाना तो दूर की बात... बर्गर खाने के भी पैसे नहीं होते थे। दोस्त लोग कार, मोटर साइकिल से कॉलेज आते, मैं बस के पीछे लटक कर कॉलेज जाता।’ ये सब बातें किसी फिल्मी स्क्रिप्ट की नहीं, दिल्ली के तिहाड़ जेल के असिस्टेंट जेलर दीपक शर्मा की जर्नी का एक हिस्सा है। यह वही दीपक शर्मा हैं, जिनकी निगरानी में निर्भया के दरिंदों को फांसी के फंदे पर लटकाया गया था।
दीपक बताते हैं, ‘मुझे याद है- जब मैं ग्रेजुएशन में था, तब मेरे पास इतने भी पैसे नहीं थे कि मैं मुखर्जी नगर में किराए पर कमरा लेकर स्टडी कर सकूं। बस से मैं हर रोज अपने घर से 20 किलोमीटर दूर पढ़ने के लिए जाता था। बस में इतनी भीड़ होती कि पसीने में भीगकर घर लौटता था। अभी तो DTC यानी दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन की ज्यादा बसें चलने लगी हैं। उस वक्त तो कम बसें थीं। यूनिवर्सिटी की बस भी चलती थी, जिससे मैं अमूमन जाता था।’
दीपक की बॉडी किसी पहलवान, बॉडी बिल्डर की तरह दिखाई दे रही है। इसके लिए कितनी मेहनत करते हैं, यह पूछने पर वो मुस्कुराने लगते हैं। दीपक अपनी एक पुरानी तस्वीर दिखाते हैं, जिसमें वो बहुत दुबले-पतले दिखाई दे रहे हैं। वो कहते हैं, ‘ये मेरी उस वक्त की तस्वीर है, जब मैंने दिल्ली के तिहाड़ जेल में बतौर असिस्टेंट जेलर जॉइन किया था। 2008-09 की बात है।
जॉइनिंग के बाद लगा कि एक जेलर को मेंटली ही नहीं बल्कि फिजिकली भी हमेशा फिट रहने की जरूरत है, क्योंकि एक तो एशिया की सबसे बड़ी जेल तिहाड़, ऊपर से यहां बड़े-बड़े क्रिमिनल रहते हैं। 2012-13 के बाद से मैंने अपनी बॉडी पर वर्क करना शुरू कर दिया।’
… तो आपको क्या जेलर ही बनना था?
वो बताते हैं, ‘जब पापा बागपत से दिल्ली शिफ्ट हो गए, तो यहां हम लोग एक किराए के मकान में रहने लगे। उस वक्त भी हम मौजपुर में ही रहने के लिए आए थे। यहां पहले से हमारे कुछ जानने वाले लोग रहते थे।
मैं पढ़ाई में अपने भाई-बहनों के मुकाबले इंटेलिजेंट था। पापा हमेशा मोटिवेट करते रहते थे कि सक्सेस और पैसा, रुतबा कमाने के लिए पढ़ना बहुत जरूरी है। बड़ा भाई हमेशा मुझे गाइड करता रहता था कि करिअर को लेकर क्या करना है, क्या नहीं। उस समय कभी सोचा नहीं था कि मैं एशिया की सबसे बड़ी जेल तिहाड़ का जेलर बन जाऊंगा।
मैं तो बस चाह रहा था कि कहीं पर भी कोई ढंग की नौकरी मिल जाए। मुझे लगता है, हर मिडिल क्लास फैमिली का बच्चा यही सोचता है, क्योंकि उसके पास कोई ऑप्शन भी नहीं होता।’
दीपक 10वीं के बाद की कहानी बताते हैं।
वो कहते हैं, ‘10वीं करने के बाद से ही मैं सरकारी नौकरी की तैयारी करने लगा। गवर्नमेंट जॉब के फॉर्म भरने लगा। 12वीं होते-होते मेरा सिलेक्शन एयरफोर्स में हो गया। तकरीबन 18 साल की उम्र रही होगी।
मुझे ट्रेनिंग के लिए श्रीनगर जाना था। मैं घर का छोटा बेटा, पापा का कहना था कि इतनी कम उम्र में एयरफोर्स की नौकरी, उन्होंने ट्रेनिंग में जाने से मना कर दिया। मोटिवेट किया कि इससे भी अच्छी नौकरी मुझे मिल जाएगी।
मैंने उनकी बात मानकर एयरफोर्स की नौकरी छोड़ दी और फिर तैयारी करने लगा। इसी बीच 12वीं के बाद मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में एडमिशन ले लिया। कॉलेज की पढ़ाई शुरू हो गई।‘
कॉलेज के दिनों का जब दीपक जिक्र करते हैं, तो वो थोड़ा ठहर जाते हैं। फिर चेहरे और आवाज में कॉन्फिडेंस लाते हुए कहते हैं, ‘मैंने तो कई छोटे-छोटे काम किए हैं। अपना खर्च चलाने में शर्म कैसी, दूसरा कोई ऑप्शन भी नहीं था मेरे पास। जिस लोकैलिटी में मैं रहता था, वहां लगभग सभी फैमिली मिडिल क्लास ही थीं। सभी के बच्चे कुछ-न-कुछ कर रहे थे।
स्टडी खर्च निकालने के लिए मैंने छुट्टी के दिनों में दुकान-दुकान जाकर प्रेशर कुकर बेचना शुरू कर दिया। पुराने मोबाइल बेचने का भी काम किया। एक मोबाइल को बेचने पर मुझे दो-तीन सौ रुपए की बचत हो जाती थी।’
दीपक एक महंगी कंपनी का चश्मा पहने हुए हैं, लेकिन वो भी एक दिन था जब वो साधारण सी सिली हुई शर्ट पहनते थे। पैदल, साइकिल या बस से कॉलेज जाते थे। रेस्टोरेंट में खाने के पैसे भी नहीं होते थे।
एयरफोर्स की नौकरी छोड़कर दीपक ने दिल्ली पुलिस जॉइन किया है।
दीपक रामजस कॉलेज का किस्सा बताते हैं।
वो कहते हैं, ‘मेरे दोस्त कार से, मोटर साइकिल से कॉलेज आते थे। मैं साइकिल से या बड़े भइया की मोटर साइकिल से कभी-कभार कॉलेज चला जाता था। नहीं तो हमेशा बस से ही जाना पड़ता था।
दोस्त महंगे कपड़े पहनकर कॉलेज आते थे। मैं नॉर्मल सा कॉलेज ड्रेस पहनकर जाता। कई बार तो ऐसा भी होता कि मैं किसी कॉलेज फंक्शन या पार्टी में इसलिए भी नहीं जाता था, क्योंकि मेरे पास अच्छे कपड़े नहीं होते थे।
कॉलेज के पीछे कमला नगर मार्केट में बड़े-बड़े कैफे-रेस्टोरेंट थे, जो आज भी हैं। मैं उस मार्केट की तरफ कभी जाता ही नहीं था, क्योंकि मेरे पास बर्गर खरीदकर खाने के भी पैसे नहीं होते थे।
जाहिर सी बात है कि यदि आज आपका दोस्त खिलाएगा, तो कल उसे भी खिलाना पड़ेगा, खर्च करना होगा। मेरे पास उतने पैसे ही नहीं थे। मैं घर से जो लंच लेकर जाता, वो खाता और लाइब्रेरी चला जाता।‘
दीपक की लाइफ में एक वक्त वो भी आया, जब दो साल तक लगातार उन्हें असफलता मिलती रही। एयरफोर्स की नौकरी छोड़ने का पछतावा होने लगा।
दीपक कहते हैं, ‘दो साल तक मैंने कई कॉम्पिटिटिव एग्जाम दिए, लेकिन एक भी क्रैक नहीं कर पाया। पछतावा होने लगा कि एयरफोर्स की नौकरी छोड़कर गलती तो नहीं कर दी, लेकिन उसी के एक-दो साल बाद साल 2008-09 आते-आते मैंने एक साथ बैक-टु-बैक चार-पांच एग्जाम क्रैक कर लिया। फाइनली जेलर की जॉब चुनी।
जेलर की नौकरी क्यों?
दीपक कहते हैं, ‘आज यदि मैं टीचर होता या किसी दूसरे डिपार्टमेंट में होता, तो कौन जानता। आज लोग मुझे जेलर के रूप में जानते हैं।
अब जहां बड़े-बड़े कुख्यात अपराधी कैद रहते हैं, वो खतरों से भरा हुआ तो होगा ही।’
दीपक मुझे अपने जिम में लेकर चलते हैं, जहां इनके दिन की शुरुआत होती है।
दीपक कहते हैं, ‘2012-13 की बात है। उस वक्त तक सिंघम, दबंग जैसी कुछ फिल्में आईं थीं, जिसमें पुलिस को एकदम फिट, हट्टा-कट्टा दिखाया गया था। मैं उस वक्त तक बहुत दुबला था। इतना दुबला-पतला कि शर्ट भी ढीला-ढाला होता था।
मैंने सोचा कि रियल लाइफ में कोई पुलिस वाला सलमान, अजय देवगन जैसा क्यों नहीं हो सकता है। मैंने अपनी बॉडी पर वर्क करना शुरू कर दिया। कुछ सालों में ही मेरा वजन बढ़ने लगा। बॉडी का शेप बदल गया।'
दीपक कहते हैं, 'एक जेलर के लिए फिट रहना बहुत जरूरी होता है। मेरे फिटनेस की बदौलत ही 2020 में निर्भया गैंगरेप मामले के अपराधियों को फांसी के फंदे पर लटकाने का जिम्मा मुझे सौंपा गया। मेरी देखरेख में पूरा प्रोसेस हुआ।
72 घंटे तक बिना सोए हुए मैंने इस जिम्मेदारी को निभाया। उस वक्त मैं दिल्ली के मंडोली जेल में पोस्टेड था। 2017-20 तक मैं यहां रहा हूं।’
ठगी के मामले में गिरफ्तार सुकेश चंद्रशेखर को जब मंडोली जेल में रखा गया, तो इसके लिए दीपक को दिल्ली के तिहाड़ जेल से मंडोली ट्रांसफर कर दिया गया।
दीपक बताते हैं, ‘फिटनेस की वजह से ही मेरे सीनियर ऑफिसर्स को भरोसा होता है कि मैं इन कुख्यात अपराधियों को बेहतर तरीके से काबू में कर सकता हूं, रख सकता हूं। इसलिए जब भी लॉरेंस बिश्नोई, सुकेश चंद्रशेखर जैसे किसी अपराधियों को जेल में लाया जाता है, तो इनकी निगरानी की जिम्मेदारी मुझे दी जाती है।’
दीपक शर्मा को अब फिल्मों से भी ऑफर मिलने लगे हैं। अब तक वो तीन फिल्मों और कुछ गानों में काम कर चुके हैं। एक्टर अक्षय कुमार के साथ कुछ रियलिटी शो भी किया है।
दीपक कहते हैं, ‘अब लगातार मुझे फिल्मों, रियलिटी शो से ऑफर मिल रहे हैं। स्पेशल परमिशन लेकर मैं इन कामों को करता हूं। मुझे एक्टिंग में भी मजा आता है।
आज मैं एक जेलर के साथ-साथ फिटनेस कोच, बॉडी बिल्डर, एक्टर भी हूं। मैं इतनी सारी उपलब्धियों को पा चुका हूं, जो कभी सपने में भी नहीं सोचा था। सब संघर्ष की बदौलत ही संभव हो पाया है, नहीं तो एक छोटे से गांव में पैदा होने वाला, मिडिल क्लास फैमिली से आने वाले बच्चे के लिए ये सब पॉसिबल नहीं हो पाता।’

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