राजेश्वरी कहती हैं 'तेलंगाना के एक गरीब परिवार में पैदा हुई। 90 के दशक में दादा रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई आ गए। हम चॉल में रहने लगे। जहां न ठीक से रहने की जगह थी, न खाने-पीने की चीजें। पेट पालने के लिए दादा के साथ पापा भी मजदूरी करने लगे। वो कंस्ट्रक्शन साइट पर ईंट, बालू,सरिया ढोते थे।
पढ़ाई-लिखाई से पापा का कोई वास्ता नहीं था। मेरी मां से पापा की मुलाकात भी कंस्ट्रक्शन साइट पर ही हुई थी।मां भी ईंट ढोती थी। मैं जब कुछ साल की हुई, तो पढ़ने का खर्च निकालने के लिए घर-घर जाकर बर्तन धोने लगी। टॉयलेट भी साफ करती थी।
घर की माली हालत ऐसी थी कि कई बार मैंने फेंका और गिरा हुए खाना भी उठाकर खाया है। बड़ा पाव खाने तक के पैसे नहीं होते थे।
काफी उतार-चढ़ाव के बाद आज इंग्लैंड की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में पढ़ रही हूं।'
मुंबई के स्लम एरिया में पैदा होने वाली 27 साल की राजेश्वरी मचेंदर इन दिनों इंग्लैंड की पोर्ट्समाउथ यूनिवर्सिटी से मास्टर की पढ़ाई कर रही हैं।
वो कहती हैं, ‘जिस तरह के हालात मैंने देखे हैं। एक-एक दिन काटना मुश्किल होता था। आज खाती थी, तो कल के लिए तरसती थी। कल खाती थी, तो परसों क्या होगा यह पता नहीं था। कई बार ऐसा लगता था कि जहां पैदा हुई हूं, वहीं मर जाऊंगी। जिंदगी में कुछ नहीं कर पाऊंगी।’
राजेश्वरी बताती हैं, ‘इंडिया की किसी अच्छी यूनिवर्सिटी, कॉलेज, स्कूल से मैं पढ़ाई नहीं कर पाई। जैसे-तैसे ग्रेजुएशन किया। ग्रेजुएशन के बाद 2022 में इंग्लैंड की पोर्ट्समाउथ यूनिवर्सिटी में एडमिशन का मौका मिला, तो लगा भगवान मिल गए।’
राजेश्वरी चार भाई-बहन हैं। उनके मम्मी-पापा पिछले साल तक दिहाड़ी मजदूरी करते थे। अब वो तेलंगाना स्थित अपने पुश्तैनी गांव में रहते हैं।
माता-पिता और अपने संघर्ष को याद कर वो कहती हैं, ‘अब तो उनकी उम्र भी हो चली है। 2022 तक दोनों दिहाड़ी करते थे। इसी से घर चलता था। मैंने वो दिन भी देखे हैं, जब काम करते-करते दोनों के हाथों में छाले पड़ जाते थे।’
मम्मी-पापा, दोनों कंस्ट्रक्शन साइट पर ईंट-बालू ढोते थे। कई बार मम्मी के सिर पर इतना वजन होता था कि वो वजन की वजह से गिर जाती थीं। इसके बावजूद उन्होंने घर चलाने और हम बच्चों की वजह से अपने लिए छुट्टी नहीं ली। हमें पालने के लिए जो कुछ कर सकती थीं उन्होंने किया।
हम लोग कंस्ट्रक्शन साइट के किनारे बने झुग्गियों में रहते थे। झुग्गियों की बनावट ऐसी होती थी कि कोई व्यक्ति यदि ठीक से खड़ा हो जाए, तो छत से टकरा जाए। बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता रहता था। पूरी रात हम लोग जगकर गुजार देते थे। किसी भी दिन हम लोग ठीक तरीके से खाना नहीं खा पाते थे। किसी दिन दाल है तो सब्जी नहीं, सब्जी है, तो दाल नहीं। जैसे-तैसे घर-परिवार चल रहा था।
मैं जब छोटी थी, तो मां मुझे रोटी को पानी में मिलाकर खाने को देती थीं। कभी-कभी पानी में आरारोट मिलाकर देती थीं, ताकि मेरा कम-से-कम पेट भर जाए और वो काम पर जा सकें।’
राजेश्वरी की मातृभाषा कन्नड़ है, जब वो पढ़ना चाह रही थीं तो मुंबई में कोई कन्नड़ स्कूल नहीं मिल पा रहा था।
राजेश्वरी बताती हैं, ‘ कंस्ट्रक्शन साइट्स पर रहने वाले मजदूरों के बच्चों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत पढ़ाई को लेकर ही होती है। मैं जब घर की स्थिति, मम्मी-पापा की पीड़ा को देखती थी, तो सोचती कि पढ़-लिखकर कुछ बन जाऊं। ताकि मम्मी-पापा के आंसू पोंछ सकूं, लेकिन पढ़ने की कोई व्यवस्था नहीं थी।
दरअसल, जहां-जहां कंस्ट्रक्शन साइट का प्रोजेक्ट मूव होता, हम लोगों को भी वहां जाना पड़ता था। वहीं पर सड़क किनारे एक झोपड़ी शेड डालकर बनानी होती थी। एक ही छोटे से कमरे में रहना, खाना-पीना सब कुछ।
जब मैं 6 साल की हुई, तो पापा चाह रहे थे किसी कन्नड़ भाषा वाले स्कूल में मेरा एडमिशन हो जाए, लेकिन कोई भी ऐसा स्कूल मुंबई में नहीं मिला, जहां कन्नड़ लैंग्वेज पढ़ाई जाती हो। काफी मशक्कत के बाद एक मराठी स्कूल में एडमिशन हुआ, लेकिन कुछ साल बाद फिर हम लोग अपने गांव तेलंगाना चले गए।’
राजेश्वरी बताती हैं, ‘गांव में मेरी दादी रहती थीं। जब मैं थोड़ी बड़ी हो गई, तो पापा का कहना था कि कंस्ट्रक्शन साइट पर जवान बेटी का रहना ठीक नहीं। पापा ने मुझे गांव में ही दादी के पास छोड़ दिया। मेरा एडमिशन गांव के स्कूल में हो गया। कुछ साल तक वहां पढ़ी, इसी दौरान दादी की मौत हो गई। मैं गांव में घर पर अकेली रह गई।
अब पापा को यहां भी चिंता होने लगी कि घर पर अकेली बेटी कैसे रहेगी। उन्होंने मुझे फिर से अपने पास मुंबई बुला लिया।'
मेरे एक-दो बार टोकने पर कहती हैं, 'माफ करिए। दरअसल मैं जब भी उन दिनों को याद करती हूं, सहम जाती हूं। ऐसा लगता है, वो सारी चीजें मेरी आंखों के सामने किसी ड्रामे के सीन की तरह चल रही हों। घर में खाने को अक्सर कुछ नहीं होता था। यदि पापा या मम्मी काम पर नहीं जाते, तो दिहाड़ी नहीं मिलती। उस दिन हम सब भाई-बहन एक ग्लास के बदले दो ग्लास पानी पी लेते, ताकि भूख न लगे। खाली पेट कमबख्त नींद भी नहीं आती थी। आंखें खोल कई रातें गुजारी हैं हम सब ने। सच बताऊं कई बार ऐसा भी हुआ कि भूख की वजह से मैंने सड़क पर गिरे हुए बडा पाव उठाकर खाए हैं। यह बात सही है कि इंसान से भूख जो न कराए।’
इतने मुश्किल भरे हालात के बावजूद राजेश्वरी भगवान का शुक्रिया करना नहीं भूलतीं।
कहती हैं कि मेरे लाइफ की सबसे अच्छी चीज यही है कि तमाम मुश्किलों के बावजूद मैंने पढ़ाई नहीं छोड़ी। यह भगवान की कृपा के बिना संभव नहीं था। उन्होंने ही मुझे रास्ता दिखाया, पढ़ाई का खर्च निकालने का जरिया सुझाया।
वो बताती हैं, ‘10वीं पास करने के बाद मैं छोटे-छोटे काम करने लगी। जहां रहती थी, वहां के कुछ पैसे वालों के घरों में घरेलू कामकाज करने लगी।
दरअसल, गर्मी के दिनों में इन घरों में काम करने वाली महिलाएं अपने-अपने गांव छुट्टी पर चली जाती थीं। ऐसे में उन्हें घरेलू हेल्पर की जरूरत होती थी, तो मैंने इस सिचुएशन का फायदा उठाया। उनके घर साफ-सफाई, झाड़ू-पोंछा… सब करना पड़ता था। टॉयलेट भी साफ करती थी।
उम्र इतनी कम थी कि हाथ दर्द होने लगते थे। अब जो पैसे दे रहा है उसकी बातें तो सुननी पड़ती ही हैं। हालांकि कुछ लोग थे जो प्यार से बात करते थे, लेकिन ऐसे लोग बहुत कम थे।
इस बीच मेरी पढ़ाई जारी रही। 12वीं के बाद मैंने कॉल सेंटर, छोटे-छोटे कॉर्पोरेट हाउस में काम करना शुरू कर दिया।यह सब कर मैंने किसी तरह से ग्रेजुएशन कर लिया।'
वो कहती हैं, 'मेरे साथ पढ़ने वाले लोग विदेश में जाकर पढ़ाई कर रहे थे। उन्हें देखकर मैं सोचती थी कि काश! मेरे पास भी पैसे होते, तो विदेश पढ़ने जाती।
ग्रेजुएशन के करीब 5 साल बाद मैंने फिर से विदेश में पढ़ने की तैयारी शुरू की। मैं वहां जाने के लिए होने वाले एंट्रेंस एग्जाम में बैठने लगी। अंतत: उसे क्रैक कर लिया। मुझे स्कॉलरशिप भी मिली, लेकिन ये काफी नहीं थी। कॉलेज फीस ही करीब 30 लाख रुपए है।
मैंने जॉब के दौरान जो सेविंग्स की थीं, उससे एडमिशन लिया। बैंक से लोन लेकर यहां पढ़ने आई हूं। अब यहां भी मुझे अपना खर्च निकालने के लिए पढ़ाई के साथ-साथ जॉब करनी पड़ रही है। यहां रहना बहुत महंगा है। हर महीने मुझे एक लाख रुपए की जरूरत होती है।


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