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ग्वालियर में देश का पहला ड्रोन स्कूल खोला गया, 10वीं पास बन सकते है ड्रोन पायलेट; एंबुलेंस ने लिया आधा घंटा, मेडिकल ड्रोन ने 15 मिनट का समय

नई दिल्ली/ आपने ग्रीन कॉरिडोर का नाम सुना होगा। सायरन बजाती एंबुलेंस जिस रास्ते से गुजरती है, वहां के सभी ट्रैफिक पोस्ट अलर्ट मोड में आ जाते हैं। सबसे पहले एंबुलेंस को रास्ता दिया जाता है, जिससे मरीज अस्पताल जल्दी पहुंचे और इलाज शुरू हो सके। लेकिन जब मरीज को कई यूनिट ब्लड की जरूरत हो तो ग्रीन कॉरिडोर से भी समस्या हल नहीं होती। समय पर ब्लड नहीं मिलने से मरीज की मृत्यु तक हो जाती है।

इन परेशानियों का हल है ‘मेडिकल ड्रोन’। खून की थैलियां और मेडिसिन लिए ट्रैफिक के झंझट से दूर और ग्रीन कॉरिडोर से कहीं आगे मेडिकल ड्रोन हवा में उड़कर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल आसानी से पहुंच जाते हैं।

‘इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ की सफल कोशिशों से पहली बार देश में ब्लड और उसके कॉम्पोनेंट्स (प्लाज्मा, रेड ब्लड सेल्स, वाइट ब्लड सेल्स, प्लेटलेट्स) को ड्रोन से भेजे जाने को तैयार है ।

  • ग्रीन कॉरिडोर से एंबुलेंस ने लिया आधा घंटा, मेडिकल ड्रोन ने 15 मिनट

गवर्नमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (GIMS) ग्रेटर नोएडा और जेपी इंस्टीट्यूट नोएडा के बीच 11 मई 2023 को 10 यूनिट ब्लड भेजा गया। 35 किमी की दूरी ड्रोन ने महज 15 मिनट में पूरी की। जबकि इसी दौरान एंबुलेंस ने आधे घंटे का समय लिया। खास बात यह रही कि ड्रोन से भेजे गए ब्लड की क्वालिटी में कोई खराबी नहीं आई।

इसके पहले, कोविड के समय मणिपुर, नगालैंड और अंडमान-निकोबार में I-ड्रोन से वैक्सीन पहुंचाई गई थी। गुजरात के कच्छ में 46 किमी की दूरी तय करके ड्रोन से मेडिकल पार्सल पहुंचाने का ट्रायल किया जा चुका है। ड्रोन का इस्तेमाल एग्रीकल्चर, माइनिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, डिफेंस, सर्विलांस में पहले से हो रहा है। अब मेडिकल फील्ड में भी होने जा रहा है।

  • 6 किलो के मेडिकल ड्रोन में 2 किलो तक सामान भेजना संभव

ड्रोन सामान्य रूप से तीन चीजों से मिलकर बनते हैं एयर फ्रेम, प्रोपल्सन और नेविगेशन सिस्टम। इसमें कई तरह के कॉन्फिगरेशन, टूल्स और एप्लीकेशंस होते हैं।

अब बहुत छोटे ड्रोन एयरक्राफ्ट भी बनाए जा रहे हैं जिनमें प्रोसेसर्स, माइक्रो इलेक्ट्रिकल मैकेनिकल सिस्टम (MEMS) सेंसर और स्मार्ट बैटरी (लिथियम) का इस्तेमाल किया जा रहा है। मेडिकल ड्रोन को सामान्य ड्रोन के मुकाबले अलग तरीके से डिजाइन किया जाता है जिसमें फोकस नेविगेशन पर होता है। दवाएं, वैक्सीन, ब्लड सैंपल, ब्लड बैग्स को ठीक तरीके से ड्रोन के चैंबर में रखा जाता है।

इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए ड्रोन ऑपरेटर या पायलट ज्यादा एहतियात बरतते हैं। ड्रोन की क्षमता के अनुसार दवाएं भेजी जाती हैं। अगर ड्रोन का वजन छह किलो है तो इस पर 2 से 3 किलो तक की दवाएं भेजी जा सकती हैं।

तेलंगाना के विकाराबाद में 'द मेडिसिन फ्रॉम द स्काई' प्रोग्राम के जरिए मेडिकल ड्रोन से मेडिसिन भेजने की शुरुआत की गई है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप की ओर से इसमें सहायता दी जा रही है।

  • हार्ट अटैक जैसे मामलों में जान बचाने के लिए बने मेडिकल ड्रोन

भारत में दवाएं, ब्लड, सर्जिकल आइटम्स, वैक्सीन सब कुछ अधिकतर सड़क के रास्ते भेजा जाता है। लेकिन खराब मौसम, एक्सीडेंट, ट्रैफिक जाम के कारण समय पर दवाएं नहीं पहुंच पातीं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की एक रिपोर्ट के अनुसार, हार्ट अटैक के 50% से अधिक मामलों में मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते।

ICMR की साइंटिस्ट डॉ. मीनाक्षी शर्मा ने बताया कि हार्ट अटैक के लक्षण आने से 30 मिनट के अंदर मरीज को अस्पताल पहुंच जाना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से मरीज को औसतन 400 मिनट यानी 6.5 घंटे से अधिक समय लग जाता है। तब तक मरीज की क्रिटिकल कंडीशन हो जाती है।

मेदांता हॉस्पिटल, रांची में कार्डियक सर्जन डॉ. संजय कुमार ने बताया कि हार्ट अटैक के पेशेंट के लिए एक-एक पल कीमती होता है. लेकिन दूरदराज के एरिया में, जहां आवाजाही के साधन पर्याप्त नहीं हैं वहां ये कीमती समय बर्बाद होता है। मेडिकल ड्रोन्स के जरिए पीड़ित व्यक्ति को तत्काल मदद पहुंचाई जा सकेगी।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट बताती है कि देश में 24 हजार से अधिक लोग मेडिकल हेल्प में देरी होने के कारण हर दिन अपनी जान गंवाते हैं।

ऐसे में ट्रेडिशनल सिस्टम से निकलकर मेडिकल ड्रोन्स हेल्थ सेक्टर में नया रेवोल्यूशन लाने में कामयाब होंगे।

  • ऋषिकेश एम्स ने टीबी की दवाएं ड्रोन्स से भेजी

ICMR की शुरुआत से पहले ऋषिकेश एम्स टिहरी गढ़वाल में टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) की दवाएं ड्रोन्स से भेजने में कामयाब हुआ था। ऋषिकेश एम्स की डायरेक्टर डॉ. मीनू सिंह ने बताया कि अस्पताल प्रबंधन ने दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में ATT ड्रग्स पहुंचाने के लिए कई बार ड्रोन्स का सहारा लिया है।

आगरा की एक ड्रोन कंपनी के जरिए दवाएं भेजने की शुरुआत हुई है। इससे टीबी के मरीजों को काफी राहत मिली।

पहले उन्हें पहाड़ी इलाकों से अस्पताल तक आने में 15-20 किमी की दूरी तय करनी पड़ती थी, लेकिन अब उनके घर पर ही ये दवाएं पहुंच रही हैं। ICMR और ऋषिकेश एम्स ने ड्रोन कंपनियों के साथ एमओयू साइन करके मेडिकल आइटम्स की डिलीवरी की शुरुआत की है।

ड्रोन किसी भी एरिया में नहीं उड़ाए जा सकते। इसके लिए कैटेगरी बनाई गई है, इसे क्रिएटिव से समझते हैं। एक मेडिकल ड्रोन पर तीन से चार लाख रुपए होते हैं खर्च

कोयंबटूर के 27 वर्षीय ड्रोन पायलट वीरा विष्णु बताते हैं कि भारत में इस्तेमाल में लाए जा रहे मेडिकल ड्रोन 5 से 6 किलो वजन के मेडिकल आइटम्स ले जा सकते हैं। इन ड्रोन्स को बनाने की लागत 3 से 4 लाख रुपए तक आती है। ड्रोन अपने साइज और वजन के हिसाब से काम करता है। ये हेलीकॉप्टर की तरह ऊपर उठकर उड़ते हैं।

क्वॉडकॉप्टर मेडिकल ड्रोन में चार रोटोर होते हैं जिसपर 2 किलो का भार होता है। इसमें एक किलो का थ्रस्ट पैदा होता है। हेक्सा ड्रोन में 6 मोटर होंगे और अतिरिक्त 2 किलो का थ्रस्ट मिलेगा। इस पर 2 किलो का प्रोपल्शन मिलता है। ऑक्टो ड्रोन में 2 किलो का थ्रस्ट मिलता है। खराब मौसम में नहीं उड़ सकते ड्रोन, भटकने और टकराने का खतरा

ड्रोन्स सभी मौसम में नहीं उड़ सकते। हवा, तापमान, बारिश और दूसरी चीजें ड्रोन को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे ड्रोन की ठीक से मॉनिटरिंग नहीं हो पाती।

लाइन ऑफ साइट और नेविगेशन सेंसर्स ऐसे मौसम में काम नहीं करते। टकराने या अपने डेस्टिनेशन से भटकने की आशंका बढ़ जाती है। DGCA के अनुसार, हवा का दबाव, तापमान, नमी, बादल ये सभी कुछ पहले से देखा जाता है। यही कारण है कि ड्रोन की उड़ान भरने के लिए एटीसी से मौसम का क्लीयरेंस लिया जाता है।

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) दिल्ली के साइंटिस्ट और गोरखपुर मेडिकल रिसर्च सेंटर के डायरेक्टर डॉ. रजनीकांत ने बताया कि ड्रोन में कैरियर बॉक्स रखने और उसे उतारने के लिए एएनएम, स्टाफ नर्स, टेक्निकल असिस्टेंस और स्टोर कीपर को ट्रेनिंग दी जाती है।

जिन मेडिकल बॉक्स को लेकर ड्रोन उड़ते हैं उनकी तैयारी में काफी एहतियात बरतनी पड़ती है ताकि मेडिसिन की क्वालिटी खराब न हो।

  • डिफिब्रिलिएटर मशीनों को ड्रोन्स से भेजा जा रहा

केवल दवा, वैक्सीन, ब्लड सैंपल, ब्लड बैग्स ही नहीं, डिफिब्रिलिएटर्स भी ड्रोन से भेजे जा रहे हैं। कार्डियक अरेस्ट होने की स्थिति में डिफिब्रिलिएटर्स से मरीज की जान बचाई जा सकती है।

ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफिब्रिलिएटर (AED) कार्डियक अरेस्ट की स्थिति में दिल की धड़कन को मॉनिटर करता है। मरीज की स्थिति के अनुसार, यह हार्ट को इलेक्ट्रिक शॉक देता है ताकि हार्ट की नॉर्मल रिदम वापस आ सके।

  • क्या ड्रोन से मानव अंगों को भेजा जा सकेगा?

अमेरिका, यूरोप के कई देशों और अफ्रीकी देशों रवांडा और घाना में किडनी, हार्ट, लिवर, लंग्स को ड्रोन्स के जरिए ट्रांसप्लांट के लिए भेजा जा रहा है।

  • भारत में चेन्नई की MGM हेल्थ केयर ने एक ड्रोन कंपनी के साथ ऑर्गन ट्रांसपोर्टेशन का करार किया है।

मेडिकल ड्रोन्स के जरिए MGM हेल्थ केयर अब तक 500 से अधिक हार्ट और लंग्स ट्रासंप्लांट कराने में कामयाब हुआ है। ये ड्रोन्स एयरपोर्ट से अस्पताल तक 20 किमी की दूरी तय कर ऑर्गन को हॉस्पिटल सफलतापूर्वक पहुंचा सकते हैं।

  • रवांडा में सबसे पहले हुई मेडिकल ड्रोन्स की शुरुआत

रवांडा दुनिया का पहला देश है जहां ड्रोन से ब्लड और जरूरी दवाओं को भेजने की शुरुआत हुई। डायग्नोस्टिक सैंपल जैसे टिश्यूज, यूरिन, ब्लड, दवाएं, ब्लड बैग, वैक्सीन को ड्रोन से ग्रामीण इलाकों में भेजा गया। इसी तरह घाना, तंजानिया, साउथ अफ्रीका में भी मेडिकल ड्रोन्स का इस्तेमाल हेल्थ केयर में किया जा रहा।

अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, यूएई जैसे कई देशों में मेडिकल ड्रोन्स का इस्तेमाल हो रहा है। कुछ देशों में जहां इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर है वहां मानव अंगों को ड्रोन्स के जरिए ट्रांसपोर्ट किया जाता है।

  • ड्रोन चलाने के लिए किन्हें लाइसेंस मिलता है

  1. 18 साल से कम और 65 साल से ऊपर की उम्र न हो।
  2. 10वीं पास करना जरूरी।
  3. रिमोट पायलट ट्रेनिंग ऑर्गेनाइजेशन ट्रेनिंग देती है।
  4. माइक्रो और नैनो ड्रोन्स के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं।
  5. ग्रीन जोन में रिसर्च ड्रोन उड़ाने के लिए लाइसेंस जरूरी नहीं।
  6. ड्रोन को एक यूनिक आइडेंटिफिकेशन नंबर दिया जाता है।
  7. DGCA ही ड्रोन ट्रेनिंग, ड्रोन स्कूल की मॉनिटरिंग करता है।
  8. ड्रोन को DAN (Device Acknowledgment Number), GST पेड इनवॉयस नंबर दिया जाता है।
  9. नियमों का उल्लंघन करने पर एक लाख रुपए की पेनाल्टी लगती है।
  10. नैनो और माइक्रो ड्रोन्स के लिए लाइसेंस जरूरी नहीं

ड्रोन एयरक्राफ्ट को चार कैटेगरी में बांटा गया है। फिक्स्ड विंग एयरक्राफ्ट, सिंगल रोटोर एयरक्राफ्ट, मल्टी रोटोर एयरक्राफ्ट और कंपाउंड विंग एयरक्राफ्ट।

वजन और भार ढोने की क्षमता के आधार पर भी ड्रोन्स को बांटा गया है-

  1. ATC से अप्रूवल मिलने पर ही मेडिकल ड्रोन उड़ा सकेंगे। मेडिकल ड्रोन कैसे काम करता है, आइए इसे समझते हैं-
  2. कीहोल मार्कअप लैंग्वेज (KML) से टू डाइमेंशनल नक्शा तैयार होता है।
  3. KML फाइल हर रूट के लिए अलग बनती है जो जीपीएस के जरिए टेकऑफ और लैंडिंग साइट को जोड़ती है।
  4. हर लोकेशन की KML फाइल को एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) से शेयर किया जाता है ताकि अप्रूवल मिल सके।
  5. ATC से क्लीयरेंस मिलने के बाद ही टेकऑफ और लैंडिंग की टाइमिंग सेट की जाती है।
  6. मौसम को लेकर एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) से क्लीयरेंस लेनी जरूरी।
  7. रूट की पहचान करना, टेक ऑफ और लैंडिंग साइट्स देखना।
  8. दवा, वैक्सीन, ब्लड सैंपल, ब्लड बैग्स को लेकर कैरियर बॉक्स तैयार करना।
  9. कैरियर बॉक्स को ड्रोन के साथ अटैच करना।
  10. लैंडिंग साइट पर कैरियर बॉक्स को उतारना और अस्पताल भेजना।
  11. दोनों जगहों पर हेल्थ वर्कर्स तैनात रखना।

डॉ. रजनीकांत ने बताया कि सबसे पहले जहां से ड्रोन को उड़ान भरनी है और जहां उसे लैंड करना है इन जगहों की पहचान की जाती है। ड्रोन ऑपरेटर या पायलट वर्चुअल रूट तैयार करता है, दोनों जगहों के बीच दूरी और कितना वजन इससे भेजा जाएगा, यह तय किया जाता है।

टेकऑफ और लैंडिंग साइट को अस्पताल, स्टोरेज सेंटर, कम्युनिटी हेल्थ सेंटर के नजदीक होना चाहिए।

टेकऑफ और लैंडिंग साइट पर बिजली के तार, लंबे पेड़, बड़ी इमारतें नहीं होनी चाहिए। लोकल पुलिस को भी इसकी सूचना देनी होती है।

डॉ. रजनीकांत बताते हैं कि मेडिकल ड्रोन से पैकेज डिलिवर कैरियर बॉक्स की जांच की जाती है। कैरियर बॉक्स सही कंडीशन में है या नहीं, टूटा या डैमेज तो नहीं, स्टोरेज सेंटर का तापमान 8 डिग्री से ज्यादा न हो, इन सब बातों का ध्यान रखा जाता है।

ड्रोन के लैंड करने के पांच मिनट के अंदर हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स को वहां पहुंच जाना चाहिए। ड्रोन ऑपरेटर देखते हैं कि ड्रोन सही जगह उतरे। ड्रोन कवर को अनलॉक किया जाता है, भीतरी चैंबर के टेंपरेचर को मापा जाता है यदि ऑटोमेटेड लैंडिंग है तो हेल्थ वर्कर को चैंबर से दवाइयों को अनलोड करना होता है।

डिजिटल स्काई प्लेटफॉर्म से मिलता है लाइसेंस

डिजिटल स्काई प्लेटफॉर्म एक यूनिक अनमैन्ड ट्रैफिक मैनेजमेंट (मानव रहित ड्रोन का मैनेजमेंट) है जो इन ड्रोन्स का रजिस्ट्रेशन करता है और ड्रोन ऑपरेटरों को लाइसेंस दिया जाता है। साथ ही हर फ्लाइट के लिए तत्काल क्लीयरेंस भी मिलता है।

इस प्लेटफॉर्म के जरिए पायलट का रजिस्ट्रेशन कराया जाता है। यहां NPNT (नो परमिशन, नो टेक ऑफ) की पॉलिसी होती है।

  • ग्वालियर में पहला ड्रोन स्कूल, पायलट बनने के लिए 10वीं पास होना जरूरी

ग्वालियर में देश का पहला ड्रोन स्कूल खोला गया है। IGRUA (इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उड़ान एकेडमी) की ओर से गुरुग्राम, बेंगलुरु, ग्वालियर, कांगड़ा, मदुरै, कोयंबटूर, धर्मशाला और चंडीगढ़ में ड्रोन स्कूल चलाए जाते हैं। भोपाल, इंदौर और जबलपुर में भी सरकार की ओर से ड्रोन स्कूल खोलने की तैयारी है।

IGRUA के डायरेक्टर कृष्णनेंदु गुप्ता ने बताया कि ड्रोन इंस्ट्रक्टर कोर्स पांच दिनों का ही होता है जिसे DGCA ने अप्रूव किया है। कोर्स के लिए 10वीं पास होना जरूरी है। हालांकि साइंस ग्रेजुएट को प्राथमिकता दी जाती है। 65 हजार रुपए फीस और 100 रुपए लाइसेंस फीस के रूप में ली जाती है। इसके बाद रिमोट पायलट सर्टिफिकेट जारी किए जाते हैं।

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