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बेटी को अंतरराष्ट्रीय बास्केटबाॅल खिलाड़ी बनाने ईंट भट्‌ठे में तपी मां


अंबिकापुर/ हम लाेग दाने-दाने के लिए माेहताज हुए, शाम को चूल्हा जलेगा या नहीं, यह भी पता नहीं होता था, लेकिन जब मेरी शादी हुई, तो लगा कि जिस तरह हमने संघर्ष किया है, वैसा बच्चों को न करना पड़े। इस बीच जब शबनम का जन्म हुआ, तो मैंने ठान लिया कि हर वो काम करूंगी, जिससे बेटी के सपनों में पंख लग सकें।

शबनम कक्षा आठ में थी, तभी मुझे लगने लगा कि एक दिन ये मेरा नाम रोशन करेगी। उसी दिन मन ही मन कसम खा लिया कि इसे पढ़ाने के लिए चाहे जितनी मेहनत करनी पड़े, करूंगी। इस बीच शबनम की हाइट देखकर उसे स्थानीय स्तर पर स्कूल में बास्केटबाॅल का प्रशिक्षण देने लगे। वह वहां अच्छा खेलने लगी, उसका चयन भारतीय खेल विकास प्राधिकरण में हुआ और उनके हाॅस्टल में रहकर उसने बास्केटबाॅल का ट्रेनिंग लेनी शुरू की। वहां सब कुछ फ्री में मिलता था, लेकिन तब भी उसकी जरूरतों को पूरा करने पैसे नहीं थे।

पति शराब पीने के आदि हैं, ऐसे में मैंने ईंट भट्ठे में मजदूरी शुरू की, ताकि शबनम को पैसों की कमी न रहे। इस पर उसके पिता तो यह भी कहने लगे कि उसके ऊपर पैसा बर्बाद कर रही है। खेल का प्रशिक्षण बंद करवाकर अपने साथ मजदूरी कराओ, लेकिन मैं उसके सपनों को पूरा करने तेज धूप, बरसात और ठंड में जूझकर मजदूरी करती रही।

-अंतरराष्ट्रीय बास्केटबाॅल खिलाड़ी शबनम एक्का की मां तेरसी एक्का ने बताया..

मैनपाट और सीतापुर क्षेत्र की कई बेटियां हैं, जिनकी मां बेटियों को बास्केटबॉल में आगे बढ़ाने पूरी जी जान से लगी हुई हैं। इन्हीं में कई खिलाड़ियों की मां और अन्य परिजन इस साल महुआ बीनकर तो तेन्दूपत्ता तोड़कर उसे बेच बेटियों को पढ़ाई और खेल में नाम कमाने रुपए जोड़ रहें हैं। इस इलाके की कई आदिवासी बेटियां राजनांदगांव के साईं के हॉस्टल में रहकर बास्केटबॉल की ट्रेनिंग लें रहीं हैं।

  • बेटी को रेलवे ने दी नौकरी

शबनम का चयन पेरिस में आयोजित विश्व खेल के लिए हुआ, जहां जाने के लिए मजदूरी कर जुटाए हुए पैसे उसे देकर भेजा। 2022 में इंदौर में शबनम ने जूनियर राष्ट्रीय बास्केटबॉल प्रतियोगिता में कास्य पदक जीता, तो मुझे लगा कि मेरी मेहनत सार्थक हो रही है। उसने इसके बाद कई अन्य राष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक प्राप्त किए। उसे रेलवे ने नौकरी दी। जिस दिन मैंने सुना कि शबनम को नौकरी मिली, उस दिन मेरे जुबान से शब्द नहीं निकल रहे थे, आंखों से खुशी के आंसू थम नहीं रहे थे। हमने उस दिन गांव में मजदूरी कर रखे पैसे से मिठाई खरीदकर बांटी, लेकिन अब मेरी बेटी नौकरी में है, तो मुझे लगता है कि मैंने अपने जीवन का लक्ष्य पूरा कर लिया।

  • कोच ने काफी मदद की 

सरगुजा जिले के सीतापुर तहसील के ग्राम पेटला निवासी शबनम एक्का पिता अनिल एक्का को खेल प्रशिक्षण कोच कालवा राजेश्वर राव ने दिया। उसका दिल्ली पब्लिक स्कूल राजनांदगांव और बाद में आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर में खेल कोटे में निशुल्क एडमिशन कराया था।

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