लड़के वालों के सामने मां बाप यह कहते हैं कि "हमारी बेटी तो बहुत मेहनती है…" इस मेहनती शब्द का यह अर्थ लड़के वाले नहीं सुनना चाहते
नई दिल्ली/
‘जी; हमारी बेटी तो बहुत मेहनती है…’ लड़की वाले शादी से पहले लड़के के घरवालों से मिलने-जुलने के दौरान हाथ जोड़कर बेटी की तारीफ में ये लाइन अक्सर कहते हैं, लेकिन उनके मेहनती कहने का मतलब यह नहीं होता कि लड़की स्कूल में अच्छा पढ़ा लेती है या एक्सेल शीट पर बढ़िया काम करती है या फिर अपने ऑफिस की बेस्ट एम्प्लॉई है।
उनके कहने का सीधा-सादा मतलब होता है कि हमारी लड़की खाना बनाने से लेकर बर्तन धोने और घर के सारे कामों में मेहनती है, इसकी रोटियां गोल होती हैं और प्रेस करते हुए कपड़े जलाती नहीं। लड़के वालों को भी ऐसी ही ‘मेहनती’ दुल्हन की तलाश होती है।
लेकिन क्या होगा अगर कोई लड़की अपने ऑफिस में खूब मेहनती और सफल हो? इस बारे में हुए अलग-अलग सर्वे की मानें तो करियर में सफल महिलाओं को आदर्श दुल्हन के बतौर नहीं देखा जाता है। भारत के मैरिज मार्केट में वो लड़कियां ज्यादा पसंद की जाती हैं तो कम पढ़ी-लिखी हों और नौकरी न करती हों।
अगर आपने चेतन भगत की पॉपुलर किताब ‘वन इंडियन गर्ल’ पढ़ी होगी तो आप राधिका की कहानी से परिचित होंगे। राधिका जो अमेरिका में सेटल एक सफल बैंकर है। उसकी सैलरी करोड़ों में है। दूसरी ओर, दिल्ली में बैठे उसके मां-बाप को चिंता है कि इतना ज्यादा कमाने वाली लड़की को कौन स्वीकार करेगा। उन्हें उसकी शादी की चिंता दिन-रात सालती है।
- शादी के बाजार में बेरोजगार लड़कियों की डिमांड
जब बात लड़के की शादी की हो तो एजुकेशन, सैलरी और नौकरी के ओहदे के पैमाने पर उसकी तुलना की जाती है, लेकिन लड़कियों के मामले में स्थिति बिल्कुल अलग होती है। इंडियन परिवारों में कामकाजी लड़कियां ज्यादा पसंद नहीं की जाती हैं।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ब्लावैटनिक स्कूल ऑफ गवर्नमेंट में हुई एक स्टडी में पाया गया है कि नौकरी करने वाली महिलाओं की तुलना में बेरोजगार महिलाओं में 22% ज्यादा परिवारों ने रुचि दिखाई।
दरअसल, इस स्टडी को करने वाली दिवा धर ने देश की अलग-अलग मेट्रोमोनियल वेबसाइट पर अपनी कई फेक प्रोफाइल बनाई; जिसमें उन्होंने अपने बारे में अलग-अलग जानकारी दी।
जिस प्रोफाइल में उन्होंने खुद को बेरोजगार बताया, उसमें उनको ज्यादा रिश्ते आए। जबकि खुद को मोटी तनख्वाह वाली नौकरीपेशा महिला बताने पर उनके लिए कम रिश्ते के ऑफर आए।
98% शादीशुदा पुरुषों के मुकाबले सिर्फ 32% महिलाएं नौकरीपेशा
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 15 से 48 साल के 98% शादीशुदा पुरुष नौकरीपेशा हैं। जबकि इनके मुकाबले सिर्फ 32% महिलाएं घर के बाहर काम कर पाती हैं।
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के एक अन्य डेटा से पता चलता है कि 19 से 25 साल की उम्र के बीच वर्किंग वुमन की संख्या सबसे ज्यादा होती है। उसके बाद यह आंकड़ा तेजी से गिरता है। इसका कारण है कि वर्किंग वुमन की 25 की उम्र तक शादी होने लगती है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि पढ़ी-लिखी महिलाओं में शादी से पहले नौकरी का आंकड़ा काफी अच्छा होता है, लेकिन शादी होते ही महिलाएं धीरे-धीरे घर तक सिमटने लगती हैं।
पत्नी ज्यादा कमाने लगे तो घर में काम करना बंद कर देते हैं पति
यहां सवाल उठ सकता है कि शादी के बाद वो कौन से कारण हैं जो किसी महिला को काम छोड़ने पर मजबूर करते हैं। वैसे तो उसके दर्जनों कारण गिनाए जा सकते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया की वोलोंगोंग यूनिवर्सिटी में इस बारे में एक रोचक स्टडी हुई है।
इस स्टडी में पाया गया है कि वर्किंग वुमन के पति तभी तक उसकी नौकरी को बर्दाश्त कर पाते हैं, जब तक कि पत्नी की सैलरी और ओहदा उससे कम रहे। अगर पत्नी ज्यादा कमाने लगे तो पति घर का काम करना बंद कर देते हैं। जिससे ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है कि महिलाओं को नौकरी छोड़नी पड़ जाती है।
दूल्हे से ज्यादा पढ़ी-लिखी हो लड़की तो देना पड़ता है ज्यादा दहेज
इंडियन मैरिज मार्केट में सिर्फ नौकरीपेशा ही नहीं बल्कि पढ़ी-लिखी लड़कियां भी पीछे रह जाती हैं। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी ने दक्षिण एशिया में शादी पर पर एक स्टडी की। इसमें पाया गया कि भारत में अगर लड़कियां पढ़-लिख जाएं तो उनको दहेज कम देना पड़ता है।
लेकिन ऐसा सिर्फ तभी तक होता है तब तक कि वे अपने होने वाले पति से कम पढ़ी-लिखी हों। दूल्हे से ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़कियों के घरवालों को इसके एवज में ज्यादा दहेज देना पड़ता है।
वोलोंगोंग यूनिवर्सिटी की स्टडी के मुताबिक इंडियन फैमिली में वर्किंग वुमन को तभी तक बर्दाश्त करते हैं; जब तक उसका काम उसके पति की तुलना में 'छोटा' और सैलरी कम हो।
समाज की सोच है कि महिलाएं घर में रहें
सोशियोलॉजिस्ट डॉ. मोहन सिंह बताते हैं कि वर्किंग वुमन को शादी के बाद घर बैठाने के पीछे लोगों की पुरानी सोच है। ऐसा पढ़े-लिखे और मिडिल क्लास और अपर मिडिल क्लास वाले परिवारों में ज्यादा देखने को मिलता है। उनका सबसे बड़ा तर्क होता है कि हमारे पास रहने-खाने की कमी नहीं तो हम अपनी बहू से काम क्यों कराएं।
लंबे समय से लोगों के मन में ये बात बैठी है कि घर की महिलाएं मजबूरी में काम करती हैं। जबकि गांव के खेतिहर मजदूरों या शहरी उच्च वर्ग में ये सोच नहीं है। ऐसे परिवारों की महिलाएं आराम से अपना काम करते हुए कमाई करती हैं, जिससे घर की आर्थिक स्थिति पहले से और ज्यादा मजबूत होती है। दूसरी ओर, अपनी इस पुरानी सोच से चिपकी मिडिल क्लास फैमिली, इसी में उलझी रह जाती है।
शादीशुदा महिलाएं काम करतीं तो देश की आमदनी दोगुनी होती
वर्ल्ड बैंक के आंकड़े के मुताबिक देश के कुल वर्क फोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 23% है। जबकि आबादी में उनकी हिस्सेदारी लगभग आधी है। चिंता की एक बात यह भी है कि वर्क फोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ने के बजाय धीरे-धीरे घटती ही जा रही है।
कोविड के दौरान ही देश में महिला वर्क फोर्स में 09% की बड़ी गिरावट देखी गई। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की जेंडर गैप रिपोर्ट (2021) में भारत 156 देशों की सूची में 140वें नंबर पर था। इस मामले में श्रीलंका, बांग्लादेश यहां तक कि पाकिस्तान भी भारत से बेहतर स्थिति में देखने को मिला।
देश में महिलाओं को घर बैठाने से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होता है। इस बारे में मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट ने एक स्टडी की थी। इसके मुताबिक अगर वर्क फोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी उनकी आबादी जितनी यानी 50% हो जाए तो अगले कुछ सालों में देश की अर्थव्यवस्था दोगुनी हो सकती है।
पति की नौकरी और ससुराल की स्थिति पर भी निर्भर करता है महिलाओं का करियर
शादी के बाद महिलाएं किस तरह की नौकरी करेंगीं और नौकरी करेंगीं भी या नहीं; यह सब उनकी चॉइस और क्वालिफिकेशन पर निर्भर नहीं करता। शादी के बाद पति की जॉब, सास-ससुर की तबीयत या बच्चे की जिम्मेदारी के आधार पर ही बहू के नौकरी करने या न करने का फैसला होता है।
भले ही पत्नी की नौकरी पति के मुकाबले ज्यादा स्टेबल और अच्छी हो; लेकिन अगर मुश्किल परिस्थिति में किसी एक को नौकरी छोड़नी पड़ी तो लगभग सभी मामलों में यह कुर्बानी महिलाओं से ही ली जाती है।
‘शादी के बाद महिलाएं फैमिली और वर्क लाइफ को कैसे संभालें; अगर किसी कारणवश पत्नी को नौकरी छोड़नी पड़े तो पति उसकी खुशी के लिए क्या कर सकते हैं और घर संभालने वाले पतियों को पत्नी समाज के तानों से कैसे बचाए?’
ऐसे ही ही कुछ सवाल हमने मैरिज काउंसलर गीतांजलि शर्मा से पूछे। गीतांजलि के पास ऐसे जोड़े आते रहते हैं; जिनके बीच फैमिली और वर्क लाइफ को लेकर तनाव पैदा हो जाता है। गीतांजलि शादीशुदा जोड़ों को घर और बाहर दोनों को संभालने के कई टिप्स देती हैं…
घर बैठाने पर महिलाओं के अंदर पैदा होती है कुंठा, रिश्ते में आएगी खटास
डॉ. गीतांजलि शर्मा बताती हैं कि शादी के बाद कोई वर्किंग वुमन अगर सिर्फ घर की होकर रह जाए तो धीरे-धीरे उसके भीतर कुंठा पैदा होती है। उसे लगता है कि उसने इस रिश्ते के लिए बड़ी कुर्बानी दी है। उसकी सोशल लाइफ एक तरह से खत्म हो जाती है, उसकी दुनिया अचानक से छोटी हो जाती है। ये चीजें किसी भी महिला के मन पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। ऐसे में लॉन्ग टर्म में रिश्ते में खटास आनी लाजमी है।
वर्क लाइफ के साथ रिश्ते की मिठास को बनाए रखने के लिए मैरिज काउंसलर वर्किंग कपल को खास सलाह देते हैं।
वर्किंग वुमन-
अगर आप वर्किंग वुमन हैं; तो सबसे पहले यह समझें कि काम के साथ परिवार भी जरूरी है। बेहतर टाइम मैनेजमेंट की कोशिश करें।
आप कमा रही हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि आप सारे फैसले अकेले लें। अपने पति और घरवालों से भी बात करें। घर में भी टीम वर्क अप्रोच रखें।
अपनी अनमैरिड सहेलियों के साथ अपनी तुलना तत्काल बंद कर दें। समझ लें कि उनकी और आपकी जिंदगी में काफी अंतर है। आप दोनों एक जैसी नहीं हैं।
वर्किंग वुमन के पति-
सबसे पहले यह मान लें कि आपकी पत्नी का करियर आपके जितना ही जरूरी है। उसके सपने किसी भी मायने में आपसे कमतर नहीं।
कोशिश करें कि दोनों लोग मिलकर घर संभालें ताकि दोनों का काम भी चलता रहे।
अगर जरूरत पड़ने पर पत्नी नौकरी छोड़ कर घर बैठती है तो आपकी कोशिश होनी चाहिए कि उसकी सोशल लाइफ खत्म न होने दें।
घर-गृहस्थी के अलावा उसे अपना सोशल सर्किल और शौक दोनों को बनाए रखने के लिए प्रेरित करें।
पत्नी के नौकरी छोड़ने के बाद ऐसा न जताएं कि वह आपके पैसों पर पल रही है।
मेडिकल पढ़ने वाली 10 में से 6 पाकिस्तानी लड़कियां करती हैं चौका-बर्तन
पाकिस्तानी में शादी के बाद आधी से अधिक मेडिकल स्टूडेंट्स प्रैक्टिस ही छोड़ देती हैं। एक आंकड़े के मुताबिक पाकिस्तान में मेडिकल की पढ़ाई करने वाली 10 में 6 लड़कियां आगे चलकर नौकरी नहीं करतीं और घर-गृहस्थी संभालने लगती हैं। ‘लेबर फोर्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में 62% पुरुषों के मुकाबले सिर्फ 18% महिलाओं को मेडिकल प्रोफेशन में नौकरी मिली। दूसरी ओर, पाकिस्तानी अस्पतालों में मेडिकल स्टाफ की भारी कमी है। जबकि इसकी पढ़ाई कर चुकी महिलाएं किसी घर में चौका-बर्तन संभाल रही हैं।
लड़का कुछ काम नहीं करता तो शादी कर दो, नौकरीपेशा लड़की की काम छुड़ाकर शादी
अपने देश में शादी दो लोगों और दो परिवारों के मिलन से इतर एक ‘सुधार अभियान’ के बतौर भी देखी जाती है। ‘लड़का कुछ नहीं करता, दिन भर मटरगश्ती करता है या गलत संगत में है।’ ऐसी स्थिति में बड़े-बुजुर्ग ‘शादी’ को शर्तिया इलाज के बतौर पेश करते हैं। कहा जाता है- ‘शादी कर दो, सुधर जाएगा, कामधाम करने लगेगा।’
हालांकि इस तरह का इलाज सिर्फ पुरुषों का होता है। लड़की का मामला ठीक उल्टा होता है। लड़की करियर में बहुत बेहतर कर रही है। नौकरी के सिलसिले में बड़े शहर में रह रही है तो शादी के लिए उसे सब कुछ छोड़ना पड़ेगा। पति और घर-गृहस्थी संभालनी पड़ेगी।
स्कूली किताब में पुरुषों की बेरोजगारी के लिए महिलाओं को जिम्मेदार बताया
‘मोहन स्कूल जाता है और गीता खाना बनाती है’ स्कूली किताबों में इस तरह के पाठ आज भी देखे जा सकते हैं, लेकिन ये लाइनें अपने आप में समाज की दकियानूसी सोच को दिखाती हैं। जिसमें मोहन, अब्दुल, विक्टर स्कूल जाते हैं और आगे चलकर ऑफिस में काम करते हैं। जबकि गीता, सलमा, मैरी बचपन से चूल्हे-चौके की ओर धकेल दी जाती हैं।
वर्किंग वुमन को लेकर 21वीं सदी में भी समाज की सोच कितनी नकारात्मक है; इसकी एक बानगी 2015 में देखी गई। जब छत्तीसगढ़ बोर्ड की एक किताब में बताया गया कि पुरुषों में बेरोजगारी इसलिए बढ़ रही है क्योंकि महिलाएं उनकी जगह नौकरी करने लगी हैं।
कुल जमा बात यह है कि सिर्फ मोहन से स्कूल जाने और गीता के अकेले रोटी बनाने का दौर बीत चुका है। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर एक महिला बैठी है। सरकार से लेकर प्रशासन तक में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। भारतीय सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन मिल रहा है। फाइटर जेट उड़ाने से लेकर जंग के मैदानों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है।
ऐसे वक्त में यह सोचना ठीक नहीं कि महिलाएं सिर्फ किचन से बंधकर ही रहें। ऐसी सोच किसी भी रिश्ते को खराब कर सकती है। इसलिए बेहतर है कि पार्टनर के साथ सामंजस्य बैठाते हुए, अपनी गृहस्थी को भी एक टीम वर्क की तरह लें और पति-पत्नी इस जिम्मेदारी को मिलकर निभाएं।


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