खेड़ा (गुजरात)/ चिलचिलाती धूप। पारा 40 पार। आंखें भी इस धूप में सही तरह से खुल नहीं रहीं। इसके बावजूद गुजरात के गांव राधू के श्री कामनाथ महादेव मंदिर में लगातार श्रद्धालु आते हैं।
इस मंदिर में जोत 100 साल पुराने घी से जलती है। यह मैंने सुना था, मन में थोड़ी शंका थी कि ऐसा कैसे संभव है। इसी शंका के साथ मैं मंदिर परिसर में दाखिल होती हूं। जैसे-जैसे मैं अंदर बढ़ती जाती हूं, देसी घी की खुशबू मेरी सांसों में भरने लगती है।
राधू गांव। यह अहमदाबाद से लगभग 50 किमी और नडियाद से लगभग 35 किमी दूर खेड़ा जिले में है। धोलका हाईवे इसके पास है। यहां लगभग 629 साल पुराना शिव मंदिर है। श्री कामनाथ महादेव मंदिर।
राधू गांव के लोग महादेव को 'दादा' कहते है। इस मंदिर तक आप अपने निजी साधन से ही जा सकते हैं। कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा यहां पहुंचने के लिए नहीं है।
मैं अहमदाबाद से टैक्सी लेकर इस मंदिर तक पहुंची। लोगों से इतना सुना था कि लगा एक बड़ा सा मंदिर होगा। हकीकत में ऐसा नहीं कुछ नहीं था। मुझे कोई भव्यता नजर नहीं आई।
बाहरी दीवारों पर काले रंग के घड़े बने हुए हैं। मंदिर के बाहरी गेट पर टाइल आर्ट से शिव और पार्वती की तस्वीर उकेरी गई हैं। दो बड़े दरवाजे हैं, जिस पर गोल्डन पेंट किया हुआ है।
लंबे से गलियारे को पार करने के बाद मंदिर आता है। मंदिर गोलाकार है। इसके द्वार के दोनों ओर दो सुंदर हाथी हैं।
महिलाओं, गैर ब्राह्मण पुरुष और बच्चों को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने की इजाजत नहीं है। यहां के शास्त्री चिराग पुरोहित बताते हैं कि दुनिया में कोई भी आ जाए यहां तक कि प्रधानमंत्री भी आ जाएं तो उन्हें भी गर्भगृह में जाने की इजाजत नहीं है।
पुरोहित की बात सुनने के बाद मन थोड़ा उदास हो गया। सोचने लगी यह कैसी मुसीबत बिना गर्भगृह में गए, मैं अंदर के दृश्य को कैसे फील करूंगी। आप सब तक उसे कैसे पहुंचा पाऊंगी।
मेरी गुजारिश के बाद मुझे एक ऐसी जगह पर खड़े होने की अनुमति मिल गई, जहां से गर्भगृह को साफ-साफ देख सकती हूं।
और हां… आप सबको बताना भूल गई… गर्भगृह तीन सीढ़ियां नीचे उतरकर जमीन के अंदर है। सीढ़ियों से पहले दो छोटे दरवाजे हैं। जिसके आसपास शीशे पर शिव और पार्वती की तस्वीर बनाई गई हैं।
गर्भगृह में फूलों से सजा शिवलिंग है। इसके पास शिवजी का एक मुख बना है, शुद्ध सोने का। यहां पार्वती जी की भी मूर्ति है। मूर्ति के दाएं ओर 600 साल पुरानी अखंड जोत जल रही है।
गर्भगृह में फूलों से सजा शिवलिंग है। इसके पास शिवजी का एक मुख बना है, शुद्ध सोने का। यहां पार्वती जी की भी मूर्ति है। मूर्ति के दाएं ओर 600 साल पुरानी अखंड जोत जल रही है।
गर्भगृह में कोई बिजली नहीं है बावजूद इसके गर्भगृह का शिवलिंग देखा जा सकता है। गर्भगृह में दो जोत जल रही हैं। जब से मंदिर बना है तब से दाएं ओर वाली जोत ऐसे ही जल रही है। सभी इस अखंड जोत को देखना चाहते हैं। मेरी निगाहें भी उसी पर हैं। शायद मन ही मन यह चेक करना चाहती हूं कि जो सुना था, क्या वैसा है भी या नहीं…
इस मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु मन्नत मांगने आते हैं। मन्नत पूरी हो जाती है तब वापस आकर घी चढ़ाते हैं। 'दादा' के दर्शन करने राजस्थान से ईश्वर सिंह आए हैं। उन्होंने 'दादा' से जो मांगा था वो पाया है। इसलिए अब देसी घी के साथ यहां वापस आए हैं।
मन्नत के इस घी को परिसर में बने घी भंडार में रखे मटकों में पहुंचा दिया जाता है। फिर इसी घी का इस्तेमाल अखंड जोत जलाने के लिए होता है।
महाशिवरात्रि और श्रावण मास में यहां नगर पालकी निकलती है। गांव में मेला लगता है। यहां मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं। गुजरात के इस इलाके में NRI बड़ी तादाद में रहते हैं।
मंदिर के बाहर मनोज की दुकान है। वो घी बेचते हैं। उन्होंने बताया कि लोग दस रुपए के पाउच से लेकर 50 किलो तक घी खरीदते हैं। जिसकी जैसी मन्नत और श्रद्धा।
मनोज बताते हैं कि इस घी को कोई भी जरा सा भी नहीं चख सकता है। यह सिर्फ महादेव की जोत जलाने के लिए ही इस्तेमाल होता है। बहुत साल पहले यहां रिवाज था कि जिसके भी घर में गाय या भैंस बछड़ा-बछड़ी को जन्म होगा वो उसके पहले दूध से बना घी मंदिर को देकर आएगा।
जैसे-जैसे वक्त बदलता गया वैसे-वैसे लोगों के रोजगार भी बदलते गए। अब गांव में बहुत कम लोग गाय-भैंस पालते हैं। इसलिए श्रद्धालु मंदिर के बाहर से बाजार का घी खरीद कर चढ़ा देते हैं। कुछ लोग अपने घर से भी घी बनाकर लाते हैं। गांव में अब घी खरीदने के लिए एक डेयरी बनाई जा रही है।
मंदिर का सारा प्रबंधन ट्रस्ट से होता है। गुजरात सरकार के अधीन आने वाले इस मंदिर के मुख्य ट्रस्टी अजीत सिंह गुरबा सिसोदिया बताते हैं कि यहां इस वक्त लगभग 80,000 किलो घी है। जिसमें सबसे पुराना घी 100 साल पुराना है।
जिस मात्रा में घी चढ़ाया जा रहा है उस हिसाब से हर दो हफ्तों में मटके गुजरात के बनासकांठा जिले से आते हैं। एक मटका बनवाने में 350 रुपए लगता है। मटके के नीचे रखने के लिए फूस से गोलाकार बेस बनाया जाता है, जिस पर मटके को टिकाया जा सके।
यह सभी मटके गहरे काले रंग के हैं। पुरातन काल से घी रखने के लिए इन्हीं मटकों का इस्तेमाल किया जाता है। इस परंपरा को आज भी कायम रखा गया है। देखने में ऐसा लगेगा कि मटकों को बाहर से काले रंग से पेंट किया जाता है, असल में ऐसा नहीं है। यह सिर्फ मिट्टी ही है।
महादेव दादा के दर्शन के बाद श्रद्धालु सीधा तपते मार्बल पर चलते हुए घी भंडार की तरफ भाग रहे हैं। उनकी उत्सुकता सिर्फ इस घी भंडारण को देखने की है। हो भी क्यों न, या तो उनकी मन्नतें पूरी हुई हैं या वह मन्नत मांगने के लिए आए हैं।
मैं भी उस तरफ चल पड़ी। यहां आने से पहले इसके बारे में जो सुना और पढ़ा था मुझे भी वह मिथ्या प्रचार ही लगा रहा था। मुझे यकीन नहीं था कि सौ साल पुराना घी सुरक्षित हो सकता है। उससे दुर्गंध नहीं आ रही होगी, या वो बिगड़ा नहीं होगा।
घी भंडार वाले कमरे की जमीन इतनी साफ है कि खाने की कोई चीज नीचे गिर जाए तो उठाकर खाई जा सकती है। कोई मक्खी, मच्छर या कीट-पतंगा मुझे वहां नहीं दिखा। इतनी सफाई और देसी घी की ऐसी खुशबू की आप खुद ही उसमें कैद हो जाएं।
परिसर में इस तरह के चार कमरे घी भंडारण के लिए है। जहां लगभग 1200 मटकों में 80 हजार किलो घी रखा है। पहले कमरे में रखे मटकों में सबसे पुराना घी है और चौथे नंबर के कमरे में रखा है ताजा घी।
घी सहेजने के लिए गुजरात के बनासकांठा जिले की मिट्टी से मटके बनवाए जाते हैं। वहां से मंदिर तक इसे लाने का खर्च 73,000 रुपए सालाना आता है। मटकों को बनवाने का खर्च अलग से है।।
मैं सबसे पहले घी भंडारण के पहले नंबर के कक्ष में गई। एक मटके की प्लेट हटाई, दूसरे की हटाई, तीसरे की हटाई। इतनी गर्मी में भी घी एकदम जमा हुआ दिखाई दे रहा है। कुछ मटकों में घी एकदम सफेद रंग का है, तो कुछ में पीले रंग का।
मटकों पर पड़ी धूल बता रही है कि सालों साल हो गए इन मटकों को यहां पड़े हुए। कुछ मटके तो मैले हो चुके हैं। अपना असल काला रंग खो चुके हैं। पहले कमरे में शिव का धूणा और मूर्ति भी है। कुछ मटके लकड़ी की रैक पर रखे गए हैं तो कुछ जमीन पर हैं। दूसरे और तीसरे कमरे का भी यही हाल है।
चौथा कमरा नए घी के भंडारण के लिए है। वहां रखे मटकों के ढक्कन उठाओ तो पिघला हुआ ताजा घी दिखाई दे रहा है। कुछ ब्रांडेड घी के खाली डिब्बे भी रखे हैं। नए वाले भंडारण में समस्या आ रही है। गर्मी से घी पिघल रहा है। यहां नीचे लकड़ी के बुरादे की मुंडेर बनाई गई है ताकि मटकों से गिरता हुआ घी उसमें जज्ब होता रहे, जमीन पर न गिरे।
मंदिर के एक ट्रस्टी के अनुसार इस वक्त मंदिर मैनेजमेंट की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उनके पास घी रखने की जगह नहीं है। 80,000 किलो घी पहले से यहां रखा हुआ है और लगभग 20 से 30 किलो घी हर दिन आ रहा है। कभी-कभी तो इससे भी ज्यादा आ जाता है। श्रावण के महीने में यहां पांव रखने की जगह नहीं होती है। पचास किलो तक घी चढ़ावे में आता है।
आखिर इतने साल पुराना घी खराब क्यों नहीं हुआ, यह जानने के लिए यहां कई लोग रिसर्च के लिए आ चुके हैं, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। शास्त्री चिराग पुरोहित के अनुसार बाबा रामदेव समेत कई आयुर्वेद संस्थान दवाओं में इस्तेमाल करने के लिए यहां के पुराने घी की मांग कर चुके हैं। मंदिर परिसर ने घी देने से उन सबको इनकार कर दिया। इस घी काे महादेव की अखंड ज्योति जलाने के अलावा किसी भी दूसरे काम में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
मंदिर के ऊपर वाले फ्लोर पर प्रसाद बंटता है। मैं भी प्रसाद पाने वहां पहुंचती हूं। एक नजर में ऐसा लगता है कि गांव में किसी की शादी के खाने में आए हैं।' प्रसाद लगा हुआ है। पूड़ी, दाल, साग, चावल, पापड़ और बेसन की बर्फी।
मंदिर का सारा प्रसाद शुद्ध देसी घी में बनता है। प्रसाद के लिए बाहर से घी खरीदकर आता है। मन्नत का घी खाना बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं होता।
बुजुर्ग या जिनके घुटनों में दर्द है, उनके बैठने के लिए बाकायदा कुर्सी की व्यवस्था है। हमने भी प्रसाद लिया। हालांकि, गुजराती प्रसाद में सब कुछ मीठा था, लेकिन साग मुझे लाजवाब लगा। गरमागरम पूड़ी परोसी जा रही है। बार-बार सभी की थालियां देखी जा रही हैं कि किसी चीज की कमी तो नहीं है। जिस प्रेम से यहां भोजन खिलाया जा रहा है, सभी का ख्याल रखा जा रहा है वह सच में काबिले तारीफ है।
मंदिर सुबह पांच बजे खुल जाता है। रात के नौ बजे तक खुला रहता है। सुबह पांच बजे और शाम को 7 बजे आरती होती है। प्रसाद सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक ही मिलता है। शाम को चढ़ावे में आया घी इकट्ठा करके मटकों में डाल दिया जाता है।
मंदिर बना कब, किसने बनाया? शास्त्री चिराग पुरोहित के अनुसार कहते हैं, ‘लगभग 629 साल पहले राधू में जेसंग भाई हीरा भाई नाम का शिव भक्त रहता था। उसकी शिव में अटूट आस्था थी। उस वक्त राधू गांव में महादेव का कोई मंदिर नहीं था। वह हर दिन सुबह राधू गांव से दक्षिण में वात्रक नदी पार करके पुणाज गांव महादेव के दर्शन के लिए जाता था। शिव दर्शन करने के बाद ही वह अपने हर दिन का काम शुरू करता था। महादेव के दर्शन के बिना मुंह जूठा नहीं करता।
एक दिन वात्रक नदी में पानी चढ़ा हुआ था और बाढ़ आ गई। जेसंग भाई हीरा भाई नदी किनारे पहुंचा तो देखा कि बाढ़ की वजह से नदी पार करना मुश्किल था। उसने नदी के इस पार से ही शिव की अराधना की और घर वापस चला गया।
नदी का पानी आठ दिन तक चढ़ा रहा। जेसंग भाई हीरा भाई ने आठ दिन तक उपवास किया। अन्न का एक दाना तक नहीं लिया। आठवें दिन उनका तप देखकर महादेव सपने में आए और कहने लगे कि तुम पुणज गांव से मेरी ज्योत लाकर रधू गांव में स्थापित करो।
सुबह उसने पूरे गांव को इस सपने के बारे में बताया। सब बहुत खुश हुए। बहुत सारे लोग पुणाज गांव गए और वहां से घी का दीया लेकर रधू गांव के लिए निकल पड़े। वो श्रावण का महीना था। पुणाज गांव राधू से आठ किलोमीटर की दूरी पर था। भारी बारिश और हवा थी इसके बावजूद दीया बुझा नहीं।
फिर राधू गांव में एक देहरी बनाई गई और छोटा सा मंदिर बनाकर इस दीया स्थापित किया गया। तब से यहां महादेव की अखंड ज्योत जल रही है।

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